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स्त्री आजादी की पैरोकार रही हैं मृदुला गर्ग, पत्नी के 'प्रेमी' को ठहराया था जायज

'स्त्री विमर्श' और रज़ा फाउंडेशन मिलकर प्रसिद्ध लेखिका मृदुला गर्ग के लेखन पर एक कार्यक्रम आयोजित कर रहा है.

'स्त्री विमर्श' और रज़ा फाउंडेशन मिलकर प्रसिद्ध लेखिका मृदुला गर्ग के लेखन पर एक कार्यक्रम आयोजित कर रहा है.

हिंदी की यशस्वी लेखिका मृदुला गर्ग के लेखन के 50 साल पूरे होने के अवसर पर 7 दिसंबर को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में 'स्त्र ...अधिक पढ़ें

(विमल कुमार/ Vimal Kumar)

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रार्थना सभा में एक छोटी-सी बच्ची अपने पिता के साथ अक्सर गांधीजी को सुनने जाया करती थी. जब गांधी जी पर जानलेवा हमला हुआ था तो वह वहीं थी, उस घटना की साक्षी. उस घटना का बच्ची पर काफी असर पड़ा था. इस घटना से बच्ची के भीतर कुछ आदर्श, संवेदना और मानवीय मूल्य निर्मित हुए. यह दौर राष्ट्रीय आंदोलन का था. 1960 में उस बच्ची ने दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से तालीम हासिल की और चार साल एक कॉलेज में बढ़ाया भी. लेकिन बच्ची ने शिक्षक बने रहने के जगह कलम पकड़ी और स्त्रियों की आजादी के लिए अपनी लेखनी से एक अभियान छेड़ा. वह बच्ची और कोई नहीं बल्कि हिंदी की सुप्रतिष्ठित कथाकार मृदुला गर्ग हैं. मृदुला गर्ग ने पांच दशक तक अनवरत साहित्य साधना की और 25 से अधिक पुस्तकें लिखकर साहित्य को समृद्ध किया. उन्होंने साहित्य की हर विधा में कलम चलाई.

हिंदी साहित्य में बहुतेरे लेखकों की चर्चा तो हो ती रहती है पर उनका समग्र मूल्यांकन कम ही होता है. जीते-जी तो बिल्कुल नहीं. वैसे भी हिंदी साहित्य में लेखक के नहीं रहने पर ही उसके मूल्यांकन का प्रयास किया जाता है. पुरुष लेखकों का थोड़ा बहुत मूल्यांकन तो हो जाता है पर लेखिकाओ का तो वह भी नहीं. महादेवी वर्मा के निधन के बाद उन्हें एक स्त्री विमर्शकार के रूप में जाना गया. सुभद्रा कुमारी चौहान के निधन के वर्षों बाद उनके समग्र अवदान की तरफ ध्यान गया. कृष्णा सोबती की चर्चा तो बहुत हुई पर अब उन पर जाकर शोधपरक पुस्तकें अब आईं. मंन्नू भंडारी का भी सम्यक मूल्यांकन नहीं हुआ है.

ऐसे में अगर लेखकों के जीवन काल में उनका मूल्यांकन हो तो बेहतर होगा. देखा यह जाता है कि लेखक के लिखते हुए 50 साल हो जाते हैं पर हिंदी साहित्य में उसका मूल्यांकन नहीं होता. ‘स्त्री दर्पण’ का प्रयास है कि जिन लेखिकाओं के लेखन के 50 वर्ष हो गए हैं उनके मूल्यांकन का प्रयास हो.

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इस कड़ी में पहली बार मृदुला गर्ग के लेखन पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है. लेकिन इस मूल्यांकन की कई चुनौतियां हैं. पहली तो यह कि उस लेखक की छवि उसकी किसी खास कृति में कैद हो जाती है. कभी-कभी किसी लेखक की कोई कृति इतनी महत्वपूर्ण और लोकप्रिय हो जाती है कि वह लेखक की पहचान ही नहीं बन जाती बल्कि उसका पर्याय भी बन जाती है. जैसे प्रेमचन्द का नाम लेते ही ‘गोदान’ की याद आती है. रेणु का नाम लेते ही ‘मैला आंचल’, कृष्णा सोबती के नाम पर ‘मित्रो मरजानी’ और मंन्नू भंडारी के पर ‘महाभोज’ की छवि उभरने लगती है. कुछ ऐसे ही मृदुला गर्ग का नाम लेते ही ‘चितकोबरा’ का स्मरण होना स्वाभाविक है. पर कई बार इस पहचान से लेखक अपनी एक कृति विशेष की छवि में कैद हो जाता है. इसका नतीजा यह होता है कि हम उस लेखक का सम्यक मूल्यांकन नहीं कर पाते और लेखक की अन्य रचनाओं पर हम बहुधा उतना ध्यान नहीं देते या उसकी उतनी चर्चा नहीं करते जितनी अपेक्षित है.

हिंदी की मूर्धन्य लेखिका मृदुला गर्ग के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ कि उन्हें हिंदी पट्टी में आम लोगों के बीच ‘चितकोबरा’ की लेखिका के रूप में अधिक जाना गया जबकि वह ‘अनित्य’, ‘उसके हिस्से की धूप’ और ‘कठगुलाब’ की भी लेखिका हैं. पर ‘चितकोबरा’ शब्द मानो लेखिका से चस्पां हो गया. उनके कथा साहित्य की ओर सबका ध्यान जरूर गया. पर हमलोग यह भूल ही गए कि उन्होंने साहित्य की हर विधा में लिखा, लेकिन उनकी अन्य रचनाओं का उतना मूल्यांकन नहीं हुआ जितना एक कथाकार और एक उपन्यासकार के रूप में मुख्यतः उनकी पहचान बनी.

मृदुला गर्ग एक मुकम्मल लेखिका
मृदुला गर्ग के नाटककार, व्यंगकार और कवि रूप पर लोगों का ध्यान नहीं किया जबकि वह एक मुकम्मल लेखिका हैं. वह स्त्रीविमर्श को ही नहीं बल्कि साहित्य को भी मुक्कमल ढंग से देखती हैं और लेखकीय स्वाधीनता पर अधिक जोर देती हैं.

25 अक्टूबर, 1938 कोलकता में को जन्मीं मृदुला गर्ग, उषा प्रियम्बद, कृष्णा सोबती और मंन्नू भंडारी की त्रयी के बाद ममता कालिया, सुधा अरोड़ा के साथ मिलकर एक त्रयी बनाती हैं. इस त्रयी में एक अन्य लेखिका शामिल हो सकती थीं. पर अपने राजनीतिक विचारों और स्टैंड के कारण उनकी पक्षधरता अब पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है. लेकिन मृदुला गर्ग राजनीतिक रूप से भी सजग सचेत लेखिका हैं.

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पिछले दिनों ‘हंस महोत्सव’ के उद्घाटन समारोह में उनका दिया वक्तव्य इस बात का प्रमाण है कि वह फांसीवादी ताकतों के खतरे, बाजारीकरण और भूमंडलीकरण के कारण मानवीय संवेदना के सामने उत्पन्न संकट को वह बखूबी समझती हैं और न्याय के पक्ष में खड़े होना पसंद करती हैं.

स्त्री को भी पति के अलावा प्रेमी चाहिए
1972 में सारिका में प्रकाशित उनकी कहांनी “रुकावट” के छपे 50 साल हो गए. उनके इतने विशद अवदान को रेखांकित करने के लिए हम यह विशेषांक उन पर निकाल रहे हैं. 85 वर्ष की उम्र में वह सक्रिय हैं और अपनी गरिमामयी उपस्थिति से नई पीढ़ी के लिए रोल मॉडल बनी हुई हैं. मृदुला गर्ग एक बेबाक निर्भीक लेखिका हैं और बिना लाग लपेट के अपनी बात कहती हैं. उनकी कहानियों को आप पढ़ें तो वह भाषा और शिल्प के चमत्कार के बिना अपनी बात कहती हैं. उनकी कहानियों में पात्रों के बीच संवाद अधिक है. उनकी कई कहानियां संवाद शैली में ही लिखी गई हैं. कुछ कहानियां इतनी छोटी हैं कि बहुत आश्चर्य भी होता है. हिंदी साहित्य में इतनी छोटी कहानियां शायद ही किसी ने लिखी हों. दो-ढाई पेज में भी उनकी कहानियां खत्म हो जाती हैं. वैसे उन्होंने कुछ बड़ी कहानियां भी लिखी हैं लेकिन वह मूलतः आत्मस्वीकर की भी लेखिका हैं. चाहे वह विवाहेत्तर प्रेम क्यों न हों. एक टीवी चैनल के फेस्टिवल में उन्होंने स्वीकार किया कि स्त्री को भी पति के अलावा प्रेमी चाहिए. जैनेंद्र कुमार ने 50 साल जो बहस चलाई थी कि पत्नी के अलावा प्रेयसी चाहिए उसका माकूल जवाब मृदुला जी ने दिया. सबसे बड़ी बात है कि उन्होंने स्त्री के साथ-साथ पुरुषों की आज़ादी और मुक्ति की भी बात उठाई है. उनका कहना है कि एक गुलाम पुरुष से प्रेम की अपेक्षा करना वाजिब नहीं है. जो खुद गुलाम है वह एक स्त्री से कैसे प्रेम करेगा. इस दृष्टि से देखा जाए तो मृदुला गर्ग ने स्त्री विमर्श के दायरे को बढ़ाया है और उसके अर्थ का विस्तार भी किया है.

नहीं बदली स्थिति
मृदुला गर्ग अभी भी मानती हैं कि हमारे समाज में यौनिकता पर बात करना दकियानूसी माना जाता है. ‘चितकोबरा’ के प्रकाशन के समय उन्हें गिरफ्तारी का सामना करना पड़ा. आज स्थिति में कमोबेश कोई फर्क नहीं पड़ा है. जब गीतांजलि श्री के उपन्यास “रेत समाधि” में यौनिकता का मामला उठाकर आगरा में कार्यक्रम नहीं होने दिया गया तो मृदुला गर्ग ने उस घटना का तीखा प्रतिवाद किया और एक चैनल को कहा कि “चितकोबरा” की घटना के बाद भी स्तिथि बदली नहीं है.

मृदुला गर्ग ने साहित्य की लगभग सभी विधाओं में लिखा. वह एक गम्भीर बौद्धिक और उदार स्त्री विमर्श की पैरोकार हैं पर साहित्य में स्त्री-पुरुष लेखक के विभेद की समर्थक नहीं हैं. दोनों की एकसाथ मुक्ति की कामना करती हैं. वह स्त्री अस्मिता की भरोसेमंद आवाज होने के साथ-साथ व्यापक सामाजिक बदलाव की आकांक्षी और स्वप्नदर्शी रचनाकार हैं. उनके लेखन में स्वतंत्रता, न्याय, बराबरी, धर्मनिरपेक्ष मूल्यों और मानवीय संवेदना की पुकार सुनी जा सकती है. वह बेबाक और पारदर्शी लेखन में यकीन करती हैं और समाज के प्रति गहरी प्रतिबद्धता रखती हैं पर अपने लेखन में इसका प्रदर्शन जरूरी नहीं समझती हैं. वह अपने समाज की हलचलों से बाख़बर भी रहती हैं तथा भूमंडलीकरण, बाजार तथा राजनीतिक मूल्यों के पतन से चिंतित भी रहती हैं.

मृदुला गर्ग आज नई पीढ़ी की लेखिकाओं की रोल मॉडल भी हैं. एक स्त्री किस तरह अपनी अस्मिता को बनाये रखने के साथ-साथ पुरुषों को साथ लेकर चलती हैं और अपने लेखन से बेहतर संसार रचती हैं.

स्त्री दर्पण पत्रिका
‘स्त्री दर्पण’ हिंदी साहित्य विमर्श का एक डिजिटल प्लेटफार्म है. कोविड काल में साहित्यिक गतिविधियों के संचालन के लिए ‘स्त्री विमर्श’ पोर्टल शुरू किया गया था. आज इसके 11,000 से अधिक सदस्य हैं. 54 देशों में और भारत के 99 शहरों में इस पोर्टल को देखा और पढ़ा जाता है. स्त्री दर्पण के बैनर तले 60 लेखिकाओं पर कार्यक्रम हो चुके हैं. इसकी एक वेबसाइट है. वेबसाइट पर 200 से अधिक लेखिकाओं के पेज बने हैं. लेखक विमल कुमार स्त्री विमर्श पोर्टल के संचालक विमल कुमार हैं.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)

 Writer Vimal Kumar, Author Vimal Kumar, Hindi Sahitya News, Literature News,

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