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'आटे के सिपाही' के माध्यम से आम और खास आदमी की दशा का मंचन

हिंदी अकादमी दिल्ली के बाल उत्सव में आनंद प्रकाश जैन की कहानी 'आटे के सिपाही' का मंचन किया गया.

हिंदी अकादमी दिल्ली के बाल उत्सव में आनंद प्रकाश जैन की कहानी 'आटे के सिपाही' का मंचन किया गया.

हिंदी अकादमी दिल्ली के लगातार 6 दिन चले बाल उत्सव 2022 में विभिन्न लेखकों की 13 कहानियों पर नाट्य मंचन किया गया. बच्चों में अभिनय का प्रशिक्षण देने के लिए 13 स्कूलों में एक महीने की कार्यशालाओं का आयोजन किया गया था.

नई दिल्ली: हिंदी अकादमी दिल्ली के बाल उत्सव 2022 में पांचवें दिन आनंद प्रकाश जैन की कहानी “आटे के सिपाही” का मंचन किया गया. इस कहानी का नाट्य रूपांतरण किया था निर्देशक नवीन दिवाकर ने. नवीन दिवाकर और सहायक निर्देशक सपना मिश्रा ने लगातार एक महीने तक बच्चों को “आटे के सिपाही” के मंचन का प्रशिक्षण दिया.

नाटक में आजादी के आंदोलन का समय है. सभी आम जनता और कुछ नेता टाइप लोग भी जेल में हैं. परंतु गरीब लोगों को तो खाने को रोटी नहीं मिलती और वहीं जो नेता हैं वो शतरंज खेलते हैं तो वो मोहरे भी रोटी की बनाते हैं. तो कहने का आश्य यह है कि आज के समय में जो समाज में मुख्य काम तो गरीब, आम जनता ही करती है परंतु उनका कहीं नाम नहीं होता और जो नेता या कोई प्रभावशाली या धनवान व्यक्ति होता है तो उसका ही नाम होता है.

नाटक में आजादी से पूर्व असहयोग आंदोलन के दौरान बरेली का एक किस्सा है. इसमें दिखाया गया है कि गांधीजी के आह्वान पर देश के कोने-कोने से क्या बच्चा और क्या बूढ़ा अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आंदोलन में उतर पड़ता है. बरेली में भी आंदोलन कर रहे बड़ी संख्या में लोगों को अंग्रेजी पुलिस गिरफ्तार कर लेती है. इस आंदोलन में आम आदमी से लेकर खास आदमी तक शामिल थे.

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यहां भी भेदभाव की राजनीति दिखाई देती है. पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए सब्जीवाला, सफाईवाला, धोबी, मोची समेत गरीब-मजदूरों को एक जेल डाल दिया जाता है. उन पर अत्याचार किया जाता है. कठीन कार्य कराए जाते हैं, खाने के लिए भी बहुत कम दिया जाता है. उसी समय खास लोग (नेता और वकील ) दूसरी जेल से ट्रांसफर होकर बरेली जेल में आते हैं.

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आम राजनीतिक कैदी की दुर्दशा देख नेताओं का समूह उन्हें राजनीतिक बंदी मानने से इंकार करता है. आम लोग 3 बीघा धान बटना, 15-15 किलो गेंहू का आटा पीसने, पत्थर तोड़ने की सजा पाता है. लेकिन खास लोगों का समूह इसे नीचे दर्जे का काम कह कर ये काम करने को मना कर देता है. और नेता अपने को राजनीतिक बंदी बता अपने लिए चरखा और रूई कातने का काम की बात करते हैं और उन्हें यही काम मिलता भी है.

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नाटक में बड़ी ही खूबसूरती से जेल में बंद आम जन और खास लोग के बीच की असमानता को दिखाया गया है. नाटक के माध्यम से दिखाया गया है कि किस तरह नेता लोग काम करने का नाटक कर राष्ट्र निर्माता कहलाते हैं और वहीं, आम जन की भागीदारी देश के विकास, सड़क, ट्रेन, उद्योग, बड़ी-बड़ी इमारतें आदि राष्ट्र निर्माण में सबसे आगे होते हुए भी वह पीछे रह जाता है. जिस प्रकार पुलिस में किसी भी बड़ी उपलब्धि का श्रेय अधिकारी ले जाते हैं और आम सिपाही अपनी जान न्यौछावर करके भी गुमनाम रहता है, उसी तरह आम जन सिर्फ अपनी रोटी और आटे के जुगाड़ में जीवन निकाल देता है और कहलाता है आटे का सिपाही.

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आम और खास आदमी की लड़ाई
नाटक में आम आदमी और खास आदमी के संघर्ष को बड़ी खूबसूरती के साथ पेश किया गया. नेता (खास लोग) जेल में बोरियत महसूस कर रहे है और उनके पास करने के लिए कुछ भी नहीं है. वहीं आम लोग दिनभर कड़ी मेहनत करने के बाद मिट्टी से तिया पांचा की गोटी बना खेल खेल रहें है. खास लोग देखा-देखी शतरंज के प्यादे हाथी, घोड़ा, वज़ीर, बादशाह बना खेलने लगते हैं. पर जेलर इन्हें ज़ब्त कर लेता है और मिट्टी के उपयोग पर प्रतिबंध लगा देता है. अब लोगों समस्या ये आती है की अब शतरंज केसे खेला जाए?

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आम लोग तरकीब लगा सूखी हुई रोटी भीगो कर उसे मिस कर गोटिया फिर से बना खेलने लगते हैं. खास लोग फिर से देखा देखी प्यादे आदि बना खेलने लगते है. लेकिन जेल के चूहे आटे के इन प्यादों को खा जाते हैं. खास लोग फिर से प्यादे बनाते हैं लेकिन फिर से उन्हें चूहे खा जाते हैं. ऐसा कई बार होता है. खास लोग प्यादों की चोरी का इल्जाम आम लोगों पर लगा देते हैं. आखिर में पता चलता है कि आम लोगों में शामिल एक आदमी का जेल में दी जाने वाली तीन रोटियों से पेट नहीं भरता है, वह रात में आकर आटे से बने प्यादे खा जाता है. आम आदमी इस सच्चाई को जानकर खाल लोग दंग रह जाते हैं.

शानदार अभिनय और निर्देशन
बादली गांव के रॉयल पब्लिक स्कूल केंद्र के बच्चों ने “आटे के सिपाही” के सिपाही का बहुत ही सजीव ढंग से मंचन किया. इस मंडली में 8 से 12 साल तक के 34 बच्चे शामिल थे. निर्देशक की मेहनत काबिले तारीफ है कि उन्होंने इन नन्हें कलाकार को बहुत ही सुंदर ढंग से अभिनय के गुर सिखाए. नाटक में विहानी, अमानत, तन्मय, हेमंत, वेदांश, अयांश, डेज़ी, यश और विदुषी सहित सभी बच्चों ने अच्छा अभिनय किया.

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नाटक को अधिक आकर्षक बनाने के लिए निर्देशक ने इसमें चार गीतों का इस्तेमाल किया. संगीत और गीतों की वजह से नाटक दर्शकों को लंबे समय तक बांधे रखने में कामयाब रहा. हास्य के लिए निर्देशक ने कहानी में जेल में कुछ दृश्य अलग से गढ़े, जो कहानी का हिस्सा नहीं थे. इन दृश्यों ने दर्शकों को हंसने पर मजबूर कर दिया. नाटक में संगीत भी नवीन दिवाकर का है और इसमें संगत दी सुमित शर्मा ने. गीत संगीत, हास्य, और अभिनय के मिलन से नाटक के गंभीर विषय को दर्शकों तक बहुत रोचकता से पहुंचाते हैं.

Tags: Hindi Literature, Literature, Literature and Art

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