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भारतेन्दु हरिश्चंद्र की जयंती पर पढ़ें उनका नाटक 'अन्धेर नगरी'

भारतेन्दु हरिश्चंद्र की जयंती पर पढ़ें उनका नाटक 'अन्धेर नगरी'

भारतेन्दु के साहित्यिक योगदान के कारण ही 1857 से 1900 तक के काल को 'भारतेन्दु युग' के नाम से जाना जाता है.

भारतेन्दु के साहित्यिक योगदान के कारण ही 1857 से 1900 तक के काल को 'भारतेन्दु युग' के नाम से जाना जाता है.

हिंदी में नाटकों (Hindi Natak) का प्रारम्भ भारतेन्दु हरिश्चंद्र से माना जाता है. नियमित रूप से खड़ी बोली में नाटक लेखन की परंपरा शुरू करने का श्रेय भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को ही जाता है.

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    Bhartendu Harishchandra Birth Anniversary: आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाने वाले भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का आज जन्मदिवस है. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी में आधुनिकता के पहले रचनाकार थे. भारतेन्दु के वृहत साहित्यिक योगदान के कारण ही 1857 से 1900 तक के काल को भारतेन्दु युग (Bhartendu Yug) के नाम से जाना जाता है.

    महज पंद्रह वर्ष की आयु से ही भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (Bhartendu Harishchandra) ने हिंदी साहित्य (Hindi Sahitya) सेवा शुरू कर दी थी. अठारह वर्ष की अवस्था में उन्होंने ‘कविवचनसुधा’ नामक पत्रिका (Kavi Vachan Sudha) निकाली, जिसमें उस समय के बड़े-बड़े विद्वानों की रचनाएं छपती थीं. बीस वर्ष की अवस्था में हरिश्चन्द्र को ऑनरेरी मैजिस्ट्रेट बनाया गया.

    हरिश्चन्द्र की लोकप्रियता से प्रभावित होकर काशी के विद्वानों ने 1880 में उन्हें ‘भारतेंदु’ (भारत का चंद्रमा) की उपाधि प्रदान की.

    हिंदी में नाटकों (Hindi Natak) का प्रारम्भ भारतेन्दु हरिश्चंद्र से माना जाता है. हालांकि उनसे पहले भी नाटक लिखे जाते रहे लेकिन नियमित रूप से खड़ी बोली में नाटक लेखन की परंपरा शुरू करने का श्रेय भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को ही जाता है.

    भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के नाटकों में ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’ (1873, प्रहसन), ‘सत्य हरिश्चन्द्र’ (1875, नाटक), ‘श्री चंद्रावली’ (1876, नाटिका), ‘विषस्य विषमौषधम्’ (1876, भाण), ‘भारत दुर्दशा’ (1880, नाट्य रासक), ‘नीलदेवी’ (1881, ऐतिहासिक गीति रूपक), ‘अंधेर नगरी’ (1881, प्रहसन), ‘प्रेमजोगिनी’ (1875, प्रथम अंक में चार गर्भांक, नाटिका), ‘सती प्रताप’ (1883,अपूर्ण, केवल चार दृश्य, बाबू राधाकृष्णदास ने पूर्ण किया)

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    राजकमल प्रकाशन समूह (Rajkamal Prakashan) के लोकभारती प्रकाशन ने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का नाटक ‘अंधेर नगरी‘ (Andher nagri) प्रकाशित किया है. प्रस्तुत हैं नाटक के कुछ अंश-

    (महन्त जी और नारायणदास एक ओर से ‘राम भजो’ इत्यादि गाते हुए आते हैं और दूसरी ओर से गोबरधनदास ‘अन्धेर नगरी’ गाते हुए आते हैं)
    महन्त: बच्चा गोबरधनदास! कह, क्या भिक्षा लाया? गठरी तो भारी मालूम पड़ती है.
    गोबरधनदास: बाबा जी महाराज! बड़े माल लाया हूं, साढ़े तीन सेर मिठाई है.
    महन्त: देखूं बच्चा! (मिठाई की झोली अपने सामने रखकर खोलकर देखता है) वाह! वाह! बच्चा! इतनी मिठाई कहां से लाया? किस धर्मात्मा से भेंट हुई?
    गोबरधनदास: गुरु जी महाराज! सात पैसे भीख में मिले थे, उसी से इतनी मिठाई मोल ली है.
    महन्त: बच्चा! नारायणदास ने मुझसे कहा था कि यहां सब चीज टके सेर मिलती है, तो मैंने इसकी बात का विश्वास नहीं किया. बच्चा, यह कौन-सी नगरी है और इसका कौन राजा है, जहां टके सेर भाजी और टके सेर ही खाजा है?
    गोबरधनदास: अन्धेर नगरी चौपट्ट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा.
    महन्त: तो बच्चा! ऐसी नगरी में रहना उचित नहीं है, जहां टके सेर भाजी और टके ही सेर खाजा हो.

    दोहा
    सेत सेत सब एक से, जहां कपूर कपास,
    ऐसे देस कुदेस में, कबहुं न कीजै बास.

    कोकिला बायस एक सम, पण्डित मूरख एक. इन्द्रायन दाड़िम विषय, जहां न नेकु विवेक.
    बसिये ऐसे देस नहिं, कनक-वृष्टि जो होय, रहिये तो दुख पाइये, प्रान दीजिये रोय.

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    सो बच्चा चलो यहां से. ऐसी अन्धेर नगरी में हजार मन मिठाई मुफ्त की मिले तो किस काम की? यहां एक छन नहीं रहना.
    गोबरधनदास: गुरु जी, ऐसा तो संसार-भर में कोई देस ही नहीं है. दो पैसा पास में रहने ही से मजे में पेट भरता है. मैं तो इस नगरी को छोड़कर नहीं जाऊंगा. और जगह दिन-भर मांगो तो भी पेट नहीं भरता. वरंच बाजे-बाजे दिन उपास करना पड़ता है. सो मैं तो यही रहूंगा.
    महन्त: देख बच्चा, पीछे पछतायेगा.
    गोबरधनदास: आपकी कृपा से कोई दु:ख न होगा; मैं तो यही कहता हूं कि आप भी यहीं रहिये.
    महन्त: मैं तो इस नगरी में अब एक क्षण भर नहीं रहूंगा. देख मेरी बात मान नहीं पीछे पछतायेगा. मैं तो जाता हूं. पर इतना कहे जाता हूं कि कभी संकट पड़े तो हमारा स्मरण करना.
    गोबरधनदास: प्रणाम गुरु जी, मैं आपका नित्य ही स्मरण करूंगा. मैं तो फिर भी कहता हूं कि आप भी यहीं रहिये.
    (महन्त जी नारायणदास के साथ जाते हैं; गोबरधनदास बैठकर मिठाई खाता है)

    (यवनिका गिरती है)

    स्थान—राजसभा
    (राजा, मन्त्री और नौकर लोग यथास्थान स्थित हैं)
    एक सेवक : (चिल्लाकर) पान खाइये, महाराज।
    राजा: ( पीनक से, चौंक के घबड़ाकर उठता है) क्या कहा? सुपनखा आयी ए महाराज. (भागता है)
    मन्त्री: (राजा का हाथ पकड़कर) नहीं-नहीं, यह कहता है कि पान खाइये महाराज.
    राजा: दुष्ट, लुच्चा, पाजी. नाहक हमको डरा दिया. मन्त्री, इसको सौ कोड़े लगें.
    मन्त्री: महाराज! इसका क्या दोष है? न तो तमोली पान लगाकर देता, न यह पुकारता.
    राजा: अच्छा, तमोली को दो सौ कोड़े लगें.
    मन्त्री: पर महाराज, आप पान खाइये सुनकर थोड़े ही डरे हैं, आप तो सुपनखा के नाम से डरे हैं, सुपनखा को सजा हो.

    राजा: (घबड़ाकर) फिर वही नाम? मन्त्री तुम बड़े खराब आदमी हो. हम रानी से कह देंगे कि मन्त्री बेर-बेर तुमको सौत बुलाने चाहता है. नौकर! नौकर! शराब—
    दूसरा नौकर: (एक सुराही में से एक गिलास में शराब उलझ कर देता है) लीजिये महाराज, पीजिये महाराज.
    राजा: (मुंह बना-बनाकर पीता है) और दे.

    (नेपथ्य में—‘दुहाई है दुहाई’ का शब्द होता है.)
    कौन चिल्लाता है—पकड़ लाओ.
    (दो नौकर एक फरियादी को पकड़ लाते हैं)

    फरियादी: दोहाई है महाराज दोहाई है. हमारा न्याव होय.
    राजा: चुप रहो. तुम्हारा न्याव यहां ऐसा होगा कि जैसा जम के यहां भी न होगा—बोलो क्या हुआ?
    फरियादी: महाराज! कल्लू बनिया की दीवार गिर पड़ी सो मेरी बकरी उसके नीचे दब गयी. दोहाई है महाराज, न्याव हो.
    राजा: (नौकर से) कल्लू बनिये की दीवार को अभी पकड़ लाओ.
    मन्त्री: महाराज, दीवार नहीं लायी जा सकती.

    राजा: अच्छा, उसका भाई, लड़का, दोस्त, आशना जो हो उसको पकड़ लाओ.
    मन्त्री: महाराज! दीवार ईंट-चूने की होती है, उसको भाई-बेटा नहीं होता.
    राजा: अच्छा, कल्लू बनिये को पकड़ लाओ.

    (नौकर लोग दौड़कर बाहर से बनिये को पकड़ लाते हैं) क्यों बे बनिये! इसकी लरकी, नहीं बरकी, क्यों दबकर मर गयी?
    मन्त्री: बरकी नहीं महाराज, बकरी.
    राजा: हां-हां, बकरी क्यों मर गयी—बोल, नहीं अभी फांसी देता हूं.
    कल्लू: महाराज! मेरा कुछ दोष नहीं. कारीगर ने ऐसी दीवार बनायी कि गिर पड़ी.
    राजा: अच्छा, इस मल्लू को छोड़ दो, कारीगर को पकड़ लाओ. (कल्लू जाता है, लोग कारीगर को पकड़कर लाते हैं) क्यों बे कारीगर! इसकी बकरी किस तरह मर गयी?
    कारीगर: महाराज, मेरा कुछ कसूर नहीं, चूनेवाले ने ऐसा बोदा चूना बनाया कि दीवार गिर पड़ी.
    राजा: अच्छा, इस कारीगर को बुलाओ, नहीं-नहीं निकालो, उस चूनेवाले को बुलाओ. (कारीगर निकाला जाता है, चूनेवाला पकड़कर लाया जाता है) क्यों बे खैर-सोपाड़ी-चूनेवाले! इसकी कुबरी वैसे मर गयी?

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    चूनेवाला: महाराज! मेरा कुछ दोष नहीं, भिश्ती ने चूने में पानी ढेर दे दिया, इसी से चूना कमजोर हो गया होगा.
    राजा: अच्छा, चुन्नीलाल को निकालो, भिश्ती को पकड़ो. (चूनेवाला निकाला जाता है, भिश्ती लाया जाता है) क्यों बे भिश्ती! गंगा- जमुना की किश्ती! इतना पानी क्यों दिया कि इसकी बकरी गिर पड़ी और दीवार दब गयी.

    भिश्ती: महाराज! गुलाम का कोई कसूर नहीं, कसाई ने मसक इतनी बड़ी बनायी कि उसमें पानी जादे आ गया.
    राजा: अच्छा, कसाई को लाओ, भिश्ती निकालो.
    (लोग भिश्ती को निकालते हैं, कसाई को लाते हैं)
    क्यों बे कसाई, मशक ऐसी क्यों बनायी कि दीवार लगायी बकरी दबायी?

    कसाई: महाराज! गड़ेरिया ने टके पर ऐसी बड़ी भेड़ मेरे हाथ बेची कि उसकी मशक बड़ी बन गयी.
    राजा: अच्छा कसाई को निकालो, गड़ेरिये को लाओ.
    (कसाई निकाला जाता है, गड़ेरिया आता है)
    क्यों बे ऊख पौंड़े के गड़ेरिये ऐसी बड़ी भेड़ क्यों बेचा कि बकरी मर गयी?
    गड़ेरिया: महाराज! उधर से कोतवाल साहब की सवारी आ गयी, सो उसके देखने में मैंने छोटी-बड़ी भेड़ का ख्याल नहीं किया, मेरा कुछ कसूर नहीं.

    राजा: अच्छा, इसको निकालो, कोतवाल को अभी सरबमुहर पकड़ लाओ.
    (गड़ेरिया निकाला जाता है, कोतवाल पकड़कर आता है) क्यों बे कोतवाल! तैंने सवारी ऐसी धूम से क्यों निकाली कि गड़ेरिये ने घबड़ाकर बड़ी भेड़ बेची, जिससे बकरी गिरकर कल्लू बनिया दब गया?
    कोतवाल: महाराज महाराज! मैंने तो कोई कसूर नहीं किया, मैं तो शहर के इन्तजाम के वास्ते जाता था.

    मन्त्री : (आप ही आप) यह तो बड़ा गजब हुआ, ऐसा न हो कि यह बेवकूफ इस बात पर सारे नगर को फूंक दे या फांसी दे दे. (कोतवाल से) यह नहीं, तुमने ऐसे धूम से सवारी क्यों निकाला?
    राजा: हां-हां, यह नहीं, तुमने ऐसे धूम से सवारी क्यों निकाला कि उसकी बकरी दबी?
    कोतवाल: महाराज महाराज—
    राजा: कुछ नहीं, महाराज महाराज, ले जाओ, कोतवाल को अभी फांसी दो. दरबार बरखास्त.
    (लोग एक तरफ कोतवाल को पकड़कर ले जाते हैं, दूसरी ओर से मन्त्री को पकड़कर राजा जाते हैं)

    (यवनिका गिरती है)

    पुस्तक–अंधेर नगरी
    लेखक- भारतेंदु हरिश्चंद
    प्रकाशक–लोकभारती प्रकाशन

    Tags: Books

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