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लेखन और फिल्म निर्माण की दुनिया में सशक्त माध्यम बन कर उभर रहा है मोबाइल फोन

सामाजिक जागरुकता के लिए बनाई गई मोबाइल फिल्म ‘कुछ पल सुकून के’ में एक सार्थक संदेश है.

सामाजिक जागरुकता के लिए बनाई गई मोबाइल फिल्म ‘कुछ पल सुकून के’ में एक सार्थक संदेश है.

मोबाइल फोन द्वारा बनाई गई फिल्म ‘कुछ पल सुकून के’ का रांची में प्रीमियर शो आयोजित किया गया. फिल्मों के बदलते कैनवास पर पत्रकारों और साहित्यकारों ने चर्चा भी की.

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    पहले दुनिया को मुट्ठी में बंद करने जैसी कहावतें कहीं जाती थीं. मुट्ठी का तो पता नहीं लेकिन दुनिया मोबाइल फोन में जरूर सिमटती जा रही है. डिजिटल होती दुनिया में मोबाइल फोन जीवन का एक जरूरी हिस्सा सा बन गया है. अब दिनभर के कई काम मोबाइल फोन की मार्फत ही होने लगे हैं.

    इसी तरह फिल्मी दुनिया में भी मोबाइल की पैठ तेजी से हो रही है. अब मोबाइल से फिल्में बनाई जा रही हैं और ये फिल्में चर्चा में भी आ रही हैं. मोबाइल फोन द्वारा बनाई गई फिल्म ‘कुछ पल सुकून के’ का रांची में प्रीमियर शो आयोजित किया गया. फिल्मों के बदलते कैनवास पर पत्रकारों और साहित्यकारों ने चर्चा भी की.

    सामाजिक जागरुकता के लिए बनाई गई मोबाइल फिल्म ‘कुछ पल सुकून के’ में एक सार्थक संदेश है. एक हंसता-खेलता खुशहाल परिवार में यदि पति-पत्नी के बीच किसी बेबुनियाद शक की वजह से दूरियां बढ़ जाएं, उस घर के बुजुर्गों को घर छोड़ के दूसरे घर में रहना पड़ जाए तो वह परिवार बिखर जाता है. अगर समझदार दम्पति ऐसी समस्याओं को आपसी सहमति से सुलझा लें तो परिवार फिर से एक होकर खुशहाल और संगठित हो जाता है.

    मोबाइल फिल्म ‘कुछ पल सुकून के’की स्क्रिप्टिंग से लेकर कैमरा, एडिटिंग, डायरेक्शन तक का काम किया है रांची विश्वविद्यालय पत्रकारिता एवं जन संचार विभाग के पूर्व निदेशक और मारवाड़ी कॉलेज, रांची के डिजिटल फोटोग्राफी एवं फिल्म निर्माण विभाग के निदेशक डॉक्टर सुशील कुमार अंकन ने.

    सुशील कुमार अंकन ने एक प्रयोग के तहत इस फिल्म का निर्माण किया है. उनका मानना है कि फ़िल्म निर्माण के लिए अब बड़े-बड़े कैमरे की बाध्यता समाप्त हो गई है. तकनीकी विकास के साथ यह नैनो टेक्नोलॉजी का ही कमाल है कि मोबाइल फोन के कैमरे से भी अच्छी गुणवत्ता वाली फिल्में बनाई जा सकती हैं.

    इस फिल्म में मुख्य भूमिका निभाई है चर्चित कवि मुक्ति शाहदेव और पत्रकार नवीन शर्मा ने.

    फिल्म के शो के बाद ‘आने वाला समय मोबाइल फोन फिल्मिंग का है’ विषय पर एक चर्चा भी हुई. चर्चा में वक्ताओं ने कहा कि जिस तरह ड्राइंग रूम में रखे फोन सेट, दिवार घड़ी, कैलेन्डर, कैलकुलेटर समेत बैंकिग सुविधाओं समेत कई कामों को एक मोबाइल फोन में समेट कर रख दिया गया है उसी तरह अब फिल्म निर्माण में भी मोबाइल फोन का दखल हो गया है. अब तो हम जब चाहें जहां चाहें वहीं फिल्म शूट करने को तैयार हो जाते हैं. पहले यह कार्य बहुत ही मेहनत वाला और दुष्कर था. वक्ताओं ने कहा कि साहित्य जगत, फिल्मी दुनिया समेत तमाम क्षेत्रों में मोबाइल का पर्दापण किसी क्रांति से कम नहीं है.

    परिचर्चा में महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष डॉक्टर महुआ मांझी, केन्द्रीय विश्वविद्यालय, झारखंड के पूर्व प्रोफेसर तथा हिन्दी फीचर फिल्म ‘आक्रांत’ के निर्माता-निदेशक डॉक्टर विनोद कुमार. सेंट जेवियर कॉलेज में मास कम्युनिकेशन विभाग के निदेशक तथा वरिष्ठ पत्रकार डॉक्टर संतोष किड़ो और हिन्दी पटकथा लेखन के साथ फिल्म निर्माण से जुड़े और हिन्दी रंगमंच तथा क्षेत्रीय फिल्मों में अभिनय करने वाले राकेश रमण शामिल हुए.

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