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व्योमेश शुक्ल के 'रूपवाणी' रंगसमूह द्वारा 'राम की शक्तिपूजा' का सशक्त मंचन

व्योमेश शुक्ल के 'रूपवाणी' रंगसमूह द्वारा 'राम की शक्तिपूजा' का सशक्त मंचन

निराला की 'राम की शक्तिपूजा' में दरअसल, राम-रावण युद्ध चल रहा है. युद्धरत राम निराश हैं और हार का अनुभव कर रहे हैं.

निराला की 'राम की शक्तिपूजा' में दरअसल, राम-रावण युद्ध चल रहा है. युद्धरत राम निराश हैं और हार का अनुभव कर रहे हैं.

व्योमेश द्वारा निर्देशित निरालाकृत 'राम की शक्तिपूजा' की रचनात्मक यात्रा दरअसल एक ही मंच पर बनारस की प्राचीनतम् रामलीला और कथक से लेकर भरतनाट्यम और छऊ की झांकी के अलावा आधुनिक नृत्य-मुद्राओं का संगम है.

    – राजन कुमार झा
    भुवनेश्वर में सम्पन्न हुए कलिंग साहित्य महोत्सव (Kalinga Literary Festival) में हिंदी के अमर कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला (Suryakant Tripathi Nirala) की कालजयी कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ (Ram Ki Shakti Puja) का मंचन ‘रूपवाणी’ (Rupvani) के कलाकारों द्वारा किया गया. ‘रूपवाणी रंगसमूह’ वाराणसी की तीस बरस पुरानी संस्था है. संस्था के निदेशक व्योमेश शुक्ल (Vyomesh Shukla) हिंदी के सुपरिचित कवि, अनुवादक और आलोचक हैं. व्योमेश को कविता के लिए 2010 में ‘भारतभूषण अग्रवाल’ और ‘संगीत नाटक अकादमी’ द्वारा नाटकों के निर्देशन के लिए 2018 में ‘बिस्मिल्लाह खां युवा पुरस्कार’ जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाज़ा जा चुका है.

    ‘रूपवाणी’ संस्थान को ‘राम की शक्तिपूजा’ (Ram Ki Shakti Puja) के अलावा ‘कामायनी’, ‘रश्मिरथी’, ‘चित्रकूट’, ‘पञ्चरात्रम’ आदि कविताओं पर एकाग्र नाटकों की प्रस्तुति पर पर्याप्त सराहना मिली है. इसी तरह का एक और मंचन कलिंग साहित्य महोत्सव में किया गया. इस समारोह में देश-विदेश से आए हुए विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों के प्रतिनिधि शामिल थे.

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    यों तो सभी भारतीय भाषाओं में कवियों-लेखकों ने रामकथा को अन्यान्य तरीक़ों से रचा है. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला विकट बहुआयामी क्षमताओं से संपन्न कलाकार थे. इस कविता में स्वयं निराला का जीवन-समर राम की तकलीफ़ों में झलकता है. यह कविता इसी अर्थ में सच्ची आधुनिक कविता है और इसे मंच पर प्रस्तुत कर व्योमेश ने इसकी सार्थकता को सिद्ध किया.

    Ram Ki Shakti Puja

    निराला की ‘राम की शक्तिपूजा’ में दरअसल, राम-रावण युद्ध चल रहा है. युद्धरत राम निराश हैं और हार का अनुभव कर रहे हैं. उनकी सेना भी खिन्न है. प्रिया सीता की याद, अवसाद को और घना बना रही है. वह बीते दिनों के पराक्रम और साहस के स्मरण से उमंगित होना चाहते हैं लेकिन मनोबल ध्वस्त है. शक्ति भी रावण के साथ है. देवी स्वयं रावण की ओर से लड़ रही हैं – राम ने उन्हें देख लिया है. वह मित्रों से कहते हैं कि विजय असंभव है और शोक में डूब जाते हैं. बुज़ुर्ग जामवंत उन्हें प्रेरित करते हैं, वह राम की आराधन-शक्ति का आह्वान करते हैं. उन्हें सलाह देते हैं कि तुम सिद्ध होकर युद्ध में उतरो. राम ऐसा ही करते हैं.

    उधर लक्ष्मण, हनुमान आदि के नेतृत्व में घनघोर संग्राम जारी है, इधर राम की साधना चल रही है. उन्होंने देवी को एक सौ आठ नीलकमल अर्पित करने का संकल्प लिया था, लेकिन देवी चुपके से आकर आख़िरी पुष्प चुरा ले जाती हैं. राम विचलित और स्तब्ध हैं. तभी उन्हें याद आता है कि उनकी आंखों को मां नीलकमल कहा करती थीं. वह अपना नेत्र अर्पित कर डालने के लिए हाथों में तीर उठा लेते हैं. तभी देवी प्रकट होती हैं. वह राम को रोकती हैं, उन्हें आशीष देती हैं, उनकी अभ्यर्थना करती हैं और राम में अंतर्ध्यान हो जाती हैं और यहीं शक्ति की मौलिक कल्पना का यथार्थ समझ में आता है.

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    व्योमेश द्वारा निर्देशित निरालाकृत ‘राम की शक्तिपूजा’ की रचनात्मक यात्रा दरअसल एक ही मंच पर बनारस की प्राचीनतम् रामलीला और कथक से लेकर भरतनाट्यम और छऊ की झांकी के अलावा आधुनिक नृत्य-मुद्राओं का संगम है. नाटक में मैथड एक्टिंग की काफ़ी मौजूदगी दिखती है, जहां चेहरे के हाव-भाव से कलाकार बिना संवाद ही कहानी कह देते हैं. राम की निराशा, सीता की याद में गुज़रे समय का फ्लैशबैक, हनुमान का क्रोध, हनुमान की माता अंजना का वात्सल्य इत्यादि के प्रसंग काफ़ी प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत हुए हैं.

    संगीत निर्देशक जेपी शर्मा और पंडित आशीष मिश्र ने कविता की मांग के मुताबिक लोकधुनों के साथ पाश्चात्य यंत्रों की मदद से नाटकीयता को संपृक्त किया है और नृत्य की कई मुद्राओं के लिए संगीत के काफ़ी स्पष्ट टुकड़े बनाए हैं जो दर्शकों को मंच से निगाह न हटाने के लिए मजबूर करते हैं. यह इसकी लोकप्रियता का मुख्य आकर्षण है. इस प्रकार नाट्य-पक्ष से लेकर नृत्य तक और भाव से लेकर कहानी तक; यह नृत्य-नाटिका अन्तःकरण पर समृद्ध छाप छोड़ती है.

    आमतौर पर बनारस की रामलीलाओं में पुरुष ही स्त्री-पात्रों का अभिनय करते आये हैं, लेकिन इस नृत्य-नाटिका की ख़ासियत यह है कि इसमें परंपरा के विपरीत राम की भूमिका में स्वाति और लक्ष्मण की भूमिका में साखी जैसी अभिनेत्रियों के माध्यम से व्योमेश ने जड़ परंपराओं के उल्लंघन का एक महत्वपूर्ण उदाहरण पेश किया है. हनुमान, जामवंत और यूथपति की भूमिका में तापस शुक्ल और शाश्वत त्रिपाठी अपने प्रभावशाली अभिनय से दर्शकों का मन मोह लिया और दर्शकों ने भी प्रस्तुति के उपरांत खड़े होकर करतल ध्वनि की गरगराहट से सभी कलाकारों उत्साहवर्धन किया.

    Tags: Hindi Literature, Literature

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