Home /News /literature /

'नाव जर्जर सही, लहरों से टकराती तो है' दुष्यंत कुमार की गज़ल

'नाव जर्जर सही, लहरों से टकराती तो है' दुष्यंत कुमार की गज़ल

दुष्यंत कुमार की गज़लें केवल दुष्यंत कुमार के शब्द या उनकी आवाज़ नहीं थीं बल्कि हज़ारों-लाखों आम लोगों की आवाज़ हैं.

दुष्यंत कुमार की गज़लें केवल दुष्यंत कुमार के शब्द या उनकी आवाज़ नहीं थीं बल्कि हज़ारों-लाखों आम लोगों की आवाज़ हैं.

दुष्यंत कुमार की गज़ल (Dushyant Kumar) जहां आम आदमी की अंतरात्मा झंझोरती हैं तो उनमें सत्ता से टकराने के जज्बा भी दिखाई देता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated :

    दुष्यंत कुमार (Dushyant Kumar) ने हिंदी और उर्दू को मिलाकर गज़ल रचना का प्रयोग किया. वे धारण शब्दों में अपनी बात लोगों तक पहुंचाते थे.

    ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा,
    मैं सजदे में नहीं था, आपको धोखा हुआ होगा।

    यहां तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियां
    मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा।

    ग़ज़ब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते,
    वो सब-के-सब परीशां हैं वहां पर क्या हुआ होगा।

    तुम्हारे शहर में ये शोर सुन-सुनकर तो लगता है,
    कि इन्सानों के जंगल में कोई हांका हुआ होगा।

    कई फ़ाके बिताकर मर गया, जो उसके बारे में,
    वो सब कहते हैं अब, ऐसा नहीं हुआ होगा।

    यहां तो सिर्फ़ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं,
    ख़ुदा जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा।

    चलो, अब यादगारों की अंधेरी कोठरी खोलें,
    कम-अज़-कम एक वो चेहरा तो पहचाना हुआ होगा।

    (अपने मित्र के.पी. शुंगलु को समर्पित, जिसने मतले का विचार दिया)

    —-
    इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
    नाव जर्जर सही, लहरों से टकराती तो है।

    एक चिनगारी कहीं से ढूंढ़ लाओ दोस्तो,
    इस दीये में तेल से भीगी हुई बाती तो है।

    एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,
    आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।

    एक चादर सांझ ने सारे नगर पर डाल दी,
    यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।

    निर्वचन मैदान में लेटी हुई हैज जो नदी,
    पत्थरों से, ओट में जो-जाके बतियाती तो है।

    दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
    और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।

    यह भी पढ़ें- मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूं, वो गज़ल आपको सुनाता हूं- दुष्यंत कुमार

    —–
    देख, दहलीज से काई नहीं जाने वाली, ये
    ख़तरनाक सचाई नहीं जाने वाली।

    कितनी अच्छा है कि सांसों की हवा लगती है,
    आग अब उनसे बुझाई नहीं जाने वाली।

    एक तालाब-सी भर जाती है हर बारिश में,
    मैं समझता हूं ये खाई नहीं जानेवाली।

    चीख़ निकली तो है होंठों से, मगर मद्धम है,
    बंद कमरों को सुनाई नहीं जाने वाली।

    तू परेशान बहुत है, तू परेशान न हो,
    इन ख़ुदाओं की ख़ुदाई नहीं जाने वाली।

    आज सड़कों पे चले आओ तो दिल बहलेगा,
    चंद ग़ज़लों से तन्हाई नहीं जाने वाली।
    (साभार- साये में धूप- राजकमल प्रकाशन)

    Tags: Books

    विज्ञापन

    राशिभविष्य

    मेष

    वृषभ

    मिथुन

    कर्क

    सिंह

    कन्या

    तुला

    वृश्चिक

    धनु

    मकर

    कुंभ

    मीन

    प्रश्न पूछ सकते हैं या अपनी कुंडली बनवा सकते हैं ।
    और भी पढ़ें
    विज्ञापन

    टॉप स्टोरीज

    अधिक पढ़ें

    अगली ख़बर