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द्वारिका उनियाल की कविता- 'मैं जो तेरी ज़मीं से अपना आसमान पाटता हूं'

द्वारिका उनियाल की कविता- 'मैं जो तेरी ज़मीं से अपना आसमान पाटता हूं'

द्वारिका उनियाल की कविताओं को पढ़ते हुए पाठक आसपास के परिवेश के साथ-साथ खुद के अंदर की भी यात्रा करता है.

द्वारिका उनियाल की कविताओं को पढ़ते हुए पाठक आसपास के परिवेश के साथ-साथ खुद के अंदर की भी यात्रा करता है.

द्वारिका प्रसाद उनियाल का जन्म उत्तराखंड के टिहरी-गढ़वाल के रूमधार गांव में हुआ. प्रारंभिक शिक्षा उदयपुर में हुई. गुजरात से प्रबंधन के क्षेत्र में पी.एच. डी की और पिछले बाईस वर्षों से अध्यापन के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. वर्तमान में बेंगलुरु के राष्ट्रीय विद्यालय (आरवी) विश्वविद्यालय (Rashtreeya Vidyalaya University) में उप-कुलपति के पद पर कार्यरत हैं.

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डॉ. द्वारिका उनियाल (Dwarika Prasad Uniyal) ने हिंदी साहित्य के परिचित हस्ताक्षर हैं. काव्य सृजन में गहन रुचि है. पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचनाएं नियमित प्रकाशित होती रहती हैं. कवि सम्मेलनों और रेडियो पर भी आपनी उपस्थिति नियमित रहती है.

उनका हाल ही में एक कविता संग्रह “उम्मीदों के पंख” प्रकाशित हुआ है. “उम्मीदों के पंख” कविता संग्रह के बारे में द्वारिका उनियाल कहते हैं- ‘एक महज़ कविताओं का संकलन नहीं बल्कि ये हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी के बिखरे पन्ने हैं जिन्हें मैंने बस समेटने भर का एक प्रयास किया है. लिखना आदत है और मैं लिखता हूं क्योंकि, ख्याल को बेवजह मन में सोच कर ज़ाया नहीं करते, ख्याल को हवा लगनी चाहिए, चाहे कलम की निब से उसकी निभे या न निभे.’

प्रस्तुत हैं “उम्मीदों के पंख” संग्रह से चुनिंदा कविताएं-

उम्मीदों के पंख

सपनों को उड़ने के लिए,
हवाई जहाज का टिकट नहीं लगता
बस,
पलकों को उम्मीदों के पंख चाहिए

ख्याल पकाने के चूल्हे कम नहीं,
नई सोच के कोयलों को एक चिंगारी चाहिए

सुर्ख कंक्रीट की ईमारतों में ज्ञान कसमसाता है,
विचारों को पनपने के लिए हरी घास, खुली धूप चाहिए

सितारों के आगे जहां और भी हैं शायद,
मरते-जन्मते तारों को एक क्षीण स्वर की क्षणिक प्रतिध्वनि चाहिए

सपनों को उड़ने के लिए,
हवाई जहाज का टिकट नहीं लगता
बस,
पलकों को उम्मीदों के पंख चाहिए।

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बाईस साल बाद के बाईस मिनट कविता ने अपनी जड़ों से दूर होने की कसक को बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है द्वारिका उनियाल ने. इस कविता में आजीविका की खोज में गांव और परिवार छोड़ महानगरों में बसे जीवन के फिर से जड़ों की ओर लौटने का बड़ा ही सुंदर वर्णन है-

पगडंडियों पे बरसों से कोई नहीं चला
मिट्टी और पत्थर जंगली झाड़ियों और फूलों से ढके हुए थे
तिमले के धारे में पानी
फिर से फूट रहा था
कुछ सालों से बारिश अच्छी हुई
गांव की चाची ने बताया

खेतों में अब धान नहीं सिर्फ घास थी
खेती अब हमारे बस की नहीं
भैंस पाल के अपना वक़्त गुजर जाता है
लोहार खाले के गोल महाराज
अपने पोते को घुमा रहे थे
दो साल पहले देहरादून में एक विक्रम ने टक्कर मार दी थी,
घाव भरा नहीं अभी तक

जाने-पहचाने चेहरे
मैं अनजाना पथिक
अपने पुरखों के नाम से अपनी पहचान बनाते
पैर छूते, गले लगाते, आशीर्वाद लेते-देते
रिश्तों को फिर से जिंदा करते
बाईस सालों बाद
मैं रूमधार में था

मेरा गांव
जब बीस का था तब आया था आखिरी बार
वो घर, उसकी दीवार और पठ्यालों वाली छत दोनों गिर चुके थे
बस दादा दादी के कमरे वाली दीवार ने घर बचा रखा था
जैसे बोल रहीं हों
कि तुमने इस घर को छोड़ा होगा,
हमने नहीं
धारे से पानी पिया
मन और तन की जैसे तृप्ति हुई

बहुत कुछ बदल गया था
बहुत कुछ वैसा ही था!
सड़क थी जिस पर कार चला आया था मैं
बिजली का पंखा था
दो किराने की दुकानें भी
वो धारे, वो खेत, वो पेड़ वो वहीं थे
जैसे के तैसे

कुलदेवी के नए मंदिर में फूल चढ़ा
चचेरे भाई की दुकान से समान ले
फिर आने का वादा दे
भारी मन और रूंधे गले से
वापस लौट आया मैं
बाईस सालों की याद को
बाईस मिनटों में समेट
एक बार फिर
उस चीड़ की एक छैंती लिए
उससे झूठ बोल
स्मृतियों को छोड़ पीछे
आगे निकल आया मैं।

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उधार की हसरतें कविता में द्वारिका उनियाल ने बढ़ते बाजारवाद को शब्द दिए हैं. बाजारीकरण की दुनिया में हर कोई कर्ज के जाल में फंसता जा रहा है. भौतिक वस्तुओं की चाह में हमारे रिश्ते और परिवार में कहीं पीछे छूटते जा रहे हैं-

जिंदगी का हिसाब थोड़ा उलटा है
जितना ज़्यादा मिलता गया
उतना कम पाते गए
मिलने और पाने के इस सिलसिले में
अब आलम ये है कि
हसरतें भी उधार की हैं

अजीब सा बाजार है
ख़ुशियां डिस्काउंट में खरीदते हैं
चाहतें महज क्रेडिट कार्ड बन गई हैं
महीने दर महीने उसका हिसाब चुकाते हैं हम

घर बड़े हैं
लोग कम
सामान ज़्यादा
जगह कम
खाना ज़्यादा
स्वाद कम!
हमारी जीभों को
होम डिलीवरी की आदत सी लग गई है

परिवार शादी के कार्ड में दिखता है कभी
रिश्ते भी कामकाजी हो गए
हर पल बढ़ते फेसबुक की लाइक्स में
दोस्त कहीं खो से गए हैं
हम सब बोलते बहुत हैं
मगर
बातें कम ही होती हैं
हर पल सेल्फी लेते फोन से
वो यादों के ऐल्बम अब बनते नहीं
शायद यही अब हमारी जिंदगी है
यही उसके तरीके
कल जब मां ने हलवा भेजा
तो मैंने कहा फ़्रीजर में रख दो
संडे को माइक्रोवेव पे गरम कर लेंगे।

अजीब हैं ये मकड़ियां शीर्षक में कवि ने जीवन दर्शन का संदेश दिया है. लगातार मिटते और बनते रहना ही जीवन है-

ये जाल जो थोड़ा फट गया है
लम्हे रिस गए थे कल
उन मकड़ियों को पूछा था मैंने-
उन लमहों का क्या हुआ?
बोलीं कि
जो गुम गए सो गुम गए
आज कुछ नए सिए

फिर इन पत्तियों को देखो
हर मौसम में रंग बदलती हैं
खिलती, पकती, फटती, बिखरती हैं
और वो फूल
जिसे बस बसंत का इन्तज़ार रहता है
अब हवाएं हैं
तो हरकत भी
तभी तो हम भी जिंदा हैं

अजीब हैं ये मकड़ियां
सिर्फ जाल नहीं
ज़िंदगी बुना करती हैं।

और मैं?
बीते, छूटे, रिसे हुए लम्हे तलाशता हूं

तेरी ज़मीं, अपना आसमान

यूं तो पानी के छपाकों से
हवाओं को काटता हूं
बादलों के संग उड़कर
सपनों को हांकता हूं
मैं जो तेरी ज़मीं से
अपना आसमान पाटता हूं

नहीं देखता मैं
पर देखता गज़ब हूं
बोलता हूं नहीं
मगर सोचता अजब हूं
तैरता संग बुलबुलों के
पल पल नया सोचता हूं

जिंदगी है मुश्किल माना
पर जीना दुशवार नहीं
दोस्त जुगनुओं का मैं
सितारों का यार नहीं
चांद को कटोरे में रख
हर ओर चांदनी बांटता हूं

जो चाह तेरी
वो ना राह मेरी
सवालों में कैद जाने
क्या खोजती आह मेरी
चीखती ख़ामोशियों से
एक अंजाना राबता हूं

मैं जो तेरी ज़मीं से
अपना आसमान पाटता हूं।।

Tags: Hindi Literature, Hindi poetry, Hindi Writer, Literature, Poem

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