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गिरिजाकुमार माथुर की कविता 'दो पाटों की दुनिया, चारों तरफ शोर है'

गिरिजा कुमार माथुर का साहित्‍य कर्म 1934 में ब्रज भाषा के कवित्त-सवैया लेखन से हुई.

गिरिजा कुमार माथुर का साहित्‍य कर्म 1934 में ब्रज भाषा के कवित्त-सवैया लेखन से हुई.

गिरिजाकुमार माथुर का ही लिखा एक गीत "हम होंगे कामयाब" समूह गान के रूप में अत्यंत लोकप्रिय है. आज भी राष्ट्रीय पर्व और राजनीतिक आंदोलनों, स्कूल-कॉलेजों में यह गीत खूब गाया-गुनगुनाया जाता है. छायावाद के प्रभाव में रहे गिरिजा कुमार माथुर ने स्‍वयं स्‍वीकारा है कि उन पर कार्ल मार्क्‍स का प्रभाव रहा है.

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गिरिजाकुमार माथुर एक कवि, नाटककार और समालोचक थे. उनका जन्म 22 अगस्त, 1919 को मध्य प्रदेश के अशोक नगर में हुआ था. गिरिजाकुमार माथुर ने की कविताओं में यथार्थवाद दिखाई देता है तो उनमें प्रेम और सौन्दर्य की बारीकियां भी हैं.

गिरिजाकुमार माथुर के पिता देवीचरण माथुर अध्यापक थे. वे साहित्य और संगीत के शौकीन थे. माता लक्ष्मीदेवी मालवा की रहने वाली एक शिक्षित महिला थीं. गिरिजाकुमार की प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई. स्थानीय कॉलेज से इण्टरमीडिएट करने के बाद 1935 में ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज से स्नातक उपाधि प्राप्त की. 1941 में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम. ए. किया तथा वकालत की परीक्षा भी पास की.

गिरिजाकुमार का विवाह दिल्ली में शकुन्त माथुर से हुआ. शकुन्त अज्ञेय द्वारा सम्पादित सप्तक परम्परा (‘दूसरा सप्तक’) की पहली कवयित्री रहीं.

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1943 से आकाशवाणी दिल्ली में अनेक महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए अंग्रेजी और उर्दू के वर्चस्व के बीच हिन्दी को पहचान दिलाई. लोकप्रिय रेडियो चैनल ‘विविध भारती’ उन्हीं की संकल्पना का मूर्त रूप है. संयुक्त राष्ट्र संघ के अन्तर्गत न्यूयार्क में हिंदी पदाधिकारी के रूप में वे अमेरिका गए. माथुर जी दूरदर्शन के उप-महानिदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए.

गिरिजाकुमार की काव्यात्मक शुरुआत 1934 में ब्रजभाषा के परम्परागत कवित्त-सवैया लेखन से हुई. सन 1943 में अज्ञेय द्वारा सम्पादित एवं प्रकाशित ‘तारसप्तक’ के सात कवियों में से एक कवि गिरिजाकुमार भी हैं. कविता के अतिरिक्त वे एकांकी नाटक, आलोचना, गीति-काव्य तथा शास्त्रीय विषयों पर भी लेखन कार्य किया है.

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भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद की साहित्यिक पत्रिका ‘गगनांचल’ का संपादन किया. 1991 में कविता-संग्रह “मै वक्त के हूं सामने” के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा इसी काव्य संग्रह के लिए 1993 में के. के. बिरला फाउंडेशन द्वारा दिया जाने वाला प्रतिष्ठित व्यास सम्मान प्रदान किया गया. उन्हें हिंदी अकादमी दिल्ली द्वारा शलाका सम्मान से भी सम्मानित किया जा चुका है.

उनकी प्रमुख रचनाओं में कविता संग्रह ‘मंजीर’, ‘नाश और निर्माण’, ‘धूप के धान’, ‘शिलालेख ये पंख चमकीले’, ‘जो बन्ध न सका’, ‘भीतरी नदी की यात्रा’, ‘साक्षी रहे वर्तमान’, ‘कल्पान्तर’, ‘मैं वक्त के सामने हूं’ और ‘मुझे और अभी कहना है’, ‘पृथ्वीकल्प’ शामिल हैं.

छाया मत छूना मन
होता है दुख दूना मन

जीवन में हैं सुरंग सुधियां सुहावनी
छवियों की चित्र-गंध फैली मनभावनी;
तन-सुगंध शेष रही, बीत गई यामिनी,
कुंतल के फूलों की याद बनी चांदनी।

भूली-सी एक छुअन
बनता हर जीवित क्षण
छाया मत छूना मन
होगा दुख दूना मन

यश है न वैभव है, मान है न सरमाया;
जितना ही दौड़ा तू उतना ही भरमाया।
प्रभुता का शरण-बिंब केवल मृगतृष्‍णा है,
हर चंद्रिका में छिपी एक रात कृष्‍णा है।

जो है यथार्थ कठिन
उसका तू कर पूजन-
छाया मत छूना मन
होगा दुख दूना मन

दुविधा-हत साहस है, दिखता है पंथ नहीं
देह सुखी हो पर मन के दुख का अंत नहीं।
दुख है न चाँद खिला शरद-रात आने पर,
क्‍या हुया जो खिला फूल रस-बसंत जाने पर?

जो न मिला भूल उसे
कर तू भविष्‍य वरण,
छाया मत छूना मन
होगा दुख दूना मन।

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‘हम होंगे कामयाब एक दिन’ गिरिजाकुमार माथुर की कालजयी रचना है. भारत में शायद ही ऐसा कोई स्कूल-कॉलेज (खासकर हिंदी भाषी) होगा जिसमें उनका यह गीत न गाया जाता हो. राष्ट्रीय पर्व हो या फिर को राजनीतिक आंदोलन या फिर निराश मन में जोश-उत्साह भरने का संदेश, हर जगह यह गीत आपको जरूर सुनाई देगा-

होंगे कामयाब, होंगे कामयाब
हम होंगे कामयाब एक दिन
हो-हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
हम होंगे कामयाब एक दिन

होंगी शांति चारो ओर
होंगी शांति चारो ओर
होंगी शांति चारो ओर एक दिन
हो-हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
होंगी शांति चारो ओर एक दिन

हम चलेंगे साथ-साथ
डाल हाथों में हाथ
हम चलेंगे साथ-साथ एक दिन
हो-हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
हम चलेंगे साथ-साथ एक दिन

नहीं डर किसी का आज
नहीं भय किसी का आज
नहीं डर किसी का आज के दिन
हो-हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
नहीं डर किसी का आज के दिन

हम होंगे कामयाब एक दिन।

बदलते वक्ते में घटते सामाजिक दायरों का माथुरजी ने इस कविता के माध्यम से बड़ा ही सुंदर वर्णन किया है-

उन पर क्‍या विश्‍वास जिन्‍हें है अपने पर विश्‍वास नहीं
वे क्‍या दिशा दिखाएंगे, दिखता जिनको आकाश नहीं

बहुत बड़े सतरंगे नक्शे पर
बहुत बड़ी शतरंज बिछी
धब्‍बोंवाली चादर जिसकी
कटी, फटी, टेढ़ी, तिरछी
जुटे हुए हैं वही खिलाड़ी
चाल वही, संकल्‍प वही
सबके वही पियादे, फर्जी
कोई नया विकल्‍प नहीं

चढ़ा खेल का नशा इन्‍हें, दुनिया का होश-हवास नहीं
दर्द बँटाएँगे क्‍या, जिनको अपने से अवकाश नहीं

एक बांझ वर्जित प्रदेश में
पहुंच गई जीवन की धारा
भटक रहा लाचार कारवां
लुटा-पिटा दर-दर मारा
बिक्री को तैयार खड़ा
हर दरवाजे झुकनेवाला
अदल-बदल कर पहन रहा है
खोटे सिक्‍कों की माला

इन्‍हें सबसे ज़्यादा दुख का है कोई अहसास नहीं
अपनी सुख-सुविधा के आगे, कोई और तलाश नहीं

खत्म हुई पहचान सभी की
अजब वक्त यह आया है
सत्‍य-झूठ का व्‍यर्थ झमेला
सबने खूब मिटाया है
जातिवाद का जहर किसी ने
घर-घर में फैलाया है
वर्तमान है वृद्ध
भविष्‍यत अपने से कतराया है

उठती हैं तूफ़ानी लहरें, तट का है आभास नहीं
पृथ्‍वी है, सागर सूरज है लेकिन अभी प्रकाश नहीं।

माथुरजी की कविताओं में मानवीयता का उद्‌घोष है. वे प्रयोगधर्मी कवि रहे हैं. इसकी एक बानगी ‘आदमी का अनुपात’ कविता में देखी जा सकती है-

दो व्‍यक्ति कमरे में
कमरे से छोटे —

कमरा है घर में
घर है मुहल्‍ले में
मुहल्‍ला नगर में
नगर है प्रदेश में
प्रदेश कई देश में
देश कई पृथ्‍वी पर
अनगिन नक्षत्रों में
पृथ्‍वी एक छोटी
करोड़ों में एक ही
सबको समेटे हैं
परिधि नभ गंगा की
लाखों ब्रह्मांडों में
अपना एक ब्रह्मांड
हर ब्रह्मांड में
कितनी ही पृथ्वियां
कितनी ही भूमियाँ
कितनी ही सृष्टियां
यह है अनुपात
आदमी का विराट से
इस पर भी आदमी
ईर्ष्‍या, अहं, स्‍वार्थ, घृणा, अविश्‍वास लीन
संख्‍यातीत शंख-सी दीवारें उठाता है
अपने को दूजे का स्‍वामी बताता है
देशों की कौन कहे
एक कमरे में
दो दुनिया रचाता है।

माथुरजी की कविताओं में जीवन दर्शन की भी झलक दिखाई पड़ती है-
मेरे सपने बहुत नहीं हैं

मेरे सपने बहुत नहीं हैं —
छोटी-सी अपनी दुनिया हो,
दो उजले-उजले से कमरे
जगने को-सोने को,
मोती-सी हों चुनी किताबें
शीतल जल से भरे सुनहले प्‍यालों जैसी
ठण्‍डी खिड़की से बाहर धीरे हंसती हो
तितली-सी रंगीन बगीची;
छोटा लॉन स्‍वीट-पी जैसा,
मौलसिरी की बिखरी छितरी छांहों डूबा —
हम हों, वे हों
काव्‍य और संगीत-सिन्‍धु में डूबे-डूबे
प्‍यार भरे पंछी से बैठे
नयनों से रस-नयन मिलाए,
हिल-मिलकर करते हों
मीठी-मीठी बातें
उनकी लटें हमारे कन्‍धों पर मुख पर
उड़-उड़ जाती हों,
सुशर्म बोझ से दबे हुए झोंकों से हिल कर
अब न बहुत हैं सपने मेरे
मैं इस मंज़िल पर आ कर
सब कुछ जीवन में भर पाया।

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महानगरों के जीवन की भागम-भाग को माथुरजी ने बहुत पहले ही भांप लिया था. दिखावे और ढकोसले की दुनिया का एक सुंदर चित्रण उनकी इस कविता में देखने को मिलता है-

दो पाटों की दुनियादो पाटों की दुनिया
चारों तरफ शोर है,
चारों तरफ भरा-पूरा है,
चारों तरफ मुर्दनी है,
भीड़ और कूड़ा है।

हर सुविधा
एक ठप्पेदार अजनबी उगाती है,
हर व्यस्तता
और अधिक अकेला कर जाती है।

हम क्या करें-
भीड़ और अकेलेपन के क्रम से कैसे छूटें?

राहें सभी अंधी हैं,
ज्यादातर लोग पागल हैं,
अपने ही नशे में चूर-
वहशी हैं या गाफिल हैं,

खलानायक हीरो हैं,
विवेकशील कायर हैं,
थोडे से ईमानदार-
हम क्या करें-
अविश्वास और आश्वासन के क्रम से कैसे छूटें?

तर्क सभी अच्छे हैं,
अंत सभी निर्मम हैं,
आस्था के वसनों में,
कंकालों के अनुक्रम हैं,

प्रौढ़ सभी कामुक हैं,
जवान सब अराजक हैं,
बुद्धिजन अपाहिज हैं,
मुंह बाए हुए भावक हैं।

हम क्या करें-
तर्क और मूढ़ता के क्रम से कैसे छूटें!

हर आदमी में देवता है,
और देवता बड़ा बोदा है,
हर आदमी में जंतु है,
जो पिशाच से न थोड़ा है।

हर देवतापन हमको
नपुंसक बनाता है
हर पैशाचिक पशुत्व
नए जानवर बढ़ाता है,

हम क्या करें-
देवता और राक्षस के क्रम से कैसे छूटें?

Tags: Hindi Literature, Hindi poetry, Hindi Writer, Literature, Poem

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