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हिंदी कविता: एक बच्चा नींद में हंस रहा है, इससे पवित्र क्या हो सकता है!

कृष्ण कल्पित के छह कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं.

कृष्ण कल्पित के छह कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं.

हिंदी कविता में कृष्ण कल्पित का अलग स्थान है. बहैसियत कवि उन्हें जितनी चिन्ता अपने समय और समाज की है, उतने ही गम्भीर वे ...अधिक पढ़ें

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खाली पोस्टकार्ड

वहां एक मीठे पानी का कुआं था
जहां लोगों की बस्ती थी
एक पहाड़ था वहां
एक पुराना मंदिर

थोड़ा आगे चलकर
धूल-भरे रस्ते के पार
एक घर था
उस घर में एक वेश्या रहती थी

उसके पास था एक पुराना सिक्का
एक खाली पोस्टकार्ड
जिस पर स्वर्ग का पता लिखा था

गर्मी की एक दोपहर
लपलपाती लूओं के मौसम
उसने मुझे बुलाया
पिलाया मीठे कुएं का जल
खिलाई बाजरे की रोटी गुड़ के साथ
फिर रोई धार-धार
मेरी हथेलियों पर गिरे उसके खारे आंसू

रेगिस्तान की वह एक न भूलने वाली बारिश थी।

मेरा चेहरा

मेरा चेहरा एक गड़रिये-सा दिखाई पड़े
एक मोची

रिक्शा खींचने वाले मजदूर
एक बढ़ई एक मोची
या फिर लुहार का लोहे-सा तपा चेहरा

मैं नहीं चाहता
मेरा चेहरा दिखाई पड़े
किसी ऐय्याश की तरह
कातिल लुटेरे आततायी जैसा
अहंकार से जर्जर राजा का चेहरा
लालच टपकाता उसके मुसाहिब का चेहरा

मैं एक ठोस चेहरा चाहता हूं
किसी किसान का पसीने से लथपथ
मेले में खो गए बच्चे का
मासूम और डरा हुआ चेहरा
जिसके गालों पर ढुलके हुए आंसू
सूखकर नमक में बदल रहे हैं
प्रतीक्षारत स्त्री का चेहरा तो एक स्वप्न है

मैं चाहता हूं अपने आप को भाषा से नहीं
चेहरे से व्यक्त कर सकूं

मैं नहीं चाहता
मेरा चेहरा धड़ पर लटके हुए
किसी भिक्षापात्र की तरह दिखाई पड़े
मैं चाहता हूं
मेरा चेहरा किसी लेटरबॉक्स की तरह हो
किसी लैम्पपोस्ट पर
या फिर किसी
पेड़ के तने पर लटकता

जिसमें
चलती हुई लू या फिर भीषण जाड़े में भी
कोई थरथराता हुआ हाथ
दिखाई पड़ता हो
चिट्ठी डालता हुआ।

आखिरी चुम्बन

एक बढ़ई एक मेज बना रहा है
इससे बेहतर क्या है दुनिया में

एक कु्म्हार चाक पर घड़े रच रहा है
इससे सुंदर कुछ नहीं है शायद

एक बच्चा नींद में हंस रहा है
इससे पवित्र क्या हो सकता है

अगर मुझे कहने का मौका दिया गया
तो मैं जरूर कहूंगा
भेड़ों का यह झुंड
एफिल टॉवर से
ज्यादा जरूरी है दुनिया के लिए

प्यार कहीं नहीं था
शताब्दी के आखिरी वर्षों में
सिर्फ दीवारों पर गुलाबी धब्बे थे

नक्षत्रो, थम जाओ
अभी मत बरसना बादल

अभी एक कवि
एक औरत को चूम रहा है

सृष्टि का प्रथम चुम्बन
एक कवि ने लिया था
सृष्टि का आखिरी चुम्बन भी
एक कवि ही लेगा

क्षमा करें विद्वतनजन!
वैसे तो चूमने चाटने की परम्परा
सदियों से चली आ रही है संसार में!

मॉडर्न टाइम

एक दिन मैं
चार्ली चैप्लिन की तरह जूते चबाऊंगा

घर में खत्म हो जाएगा अन्न
काला बाजार में चली जाएंगी सारी फसलें
फिर आकाल पड़ेगा मुल्क में
फिर होंगे गरीबों के फाके
फिर होगा अन्याय होगी बर्बरता
खूख जाएगा बावड़ियों का पानी
आसमान से बरसेगा शोक
स्त्रियां सुबकेंगी सामूहिक स्वर में

यह जो समय आ रहा है जनाब
बहुत भयानक होगा
रंगीन सिर्फ टेलीविजन होंगे
जिनमें मृत सुन्दरियों की देह
गिद्ध नोचते रहेंगे दिन-रात
यहीं कहीं होगा मध्यांतर

आप चल कहां दिए जनाब
अभी तो आधा बाकी है
मॉडर्न टाइम्स!

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राजकमल प्रकाशन से छपकर आया कृष्ण कल्पित का कविता संग्रह ‘रेख़्ते के बीज’ काफी चर्चित रहा है.

सूखी टहनियां

जाओ लड़कियो, अपने-अपने घर जाओ
अब हम नहीं कर सकते प्रेम

हमारे बाल अब हो चले हैं सफेद
पानी का गिलास उठाते हुए कांपते हैं हमारे हाथ

हम जो साफ कपड़े पहने हुए आकर्षक दिखते हैं
दरअस्ल मिट्टी के पुतले हैं
हमें मत छुओ लड़कियो
हम भरभराकर गिर जाएंगे

हम बोलते हुए तुम्हें अच्छे लगते हैं
हमारी भद्रता शालीनता तुम्हें लुभाती है
हमारे चमकदार जुमलों पर मत जाओ लड़कियो
ये हमारी निराशा की अभिव्यक्तियां हैं
हमारा आत्मविश्वास हमारा डर है

पानी में तैरने वालों से प्रेम करो
पेड़ पर चढ़ने वालों से प्रेम करो
मैदान में खेलने वालों से प्रेम करो
हम नहीं रह गए हैं प्रेम के काबिल

अब पुरानी हुई हमारी प्रेम-कहानी

जिस पेड़ के नीचे बैठते थे हम
अब वहां पर शानदार शॉपिंग मॉल है
बनने से पहले ही उजड़ गए
हमारे प्यार के स्मारक

अब हम थक चले हैं सुन्दरियो
हमारे पास नहीं है करने को कोई बात
सुनाने को कोई गीत कोई रहस्य

अब सब कुछ उजागर है
झकझकाती रोशनी की तरह बेजान
जर्जर आत्मा में बजती रहती है
एक उदास सिम्फनी

जाओ स्त्रियो, जाओ
मुझे अकेला छोड़ दो इस बियाबान में
जहां मैं सूखी लकड़ियां चुन रहा हूं
अपने दाह-संस्कार के लिए!

Tags: Hindi Literature, Hindi poetry, Hindi Writer, Literature, Poem

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