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कविता: केवल इक 'मैं' शब्द से, 'हम' की बस्ती लगी उजड़ने- उषा खाती

Image/shutterstock

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उषा खाती ने अपनी कलम से उस महिला की वेदना और सपनों को शब्द दिए जिन्होंने खुद को अपने परिवार के लिए समर्पित कर दिया.

  • News18Hindi
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    परिवार की परवाज़ में एक महिला अपनी उड़ान भूल जाती है. परिवार की वेदी पर स्वाह हो जाते हैं उसके सभी सपने, दफ़न हो जाती हैं इच्छाएं. लेकिन घर की चार दीवारियों में रहते हुए भी उषा खाती ने अपनी लेखनी को पंख दिए. अपनी कलम से उस महिला की वेदना और सपनों को शब्द दिए जिन्होंने खुद को अपने परिवार के लिए समर्पित कर दिया.

    उषा लेखन के साथ-साथ पिंकिश फाउंडेशन के मंच से जरूरतमंदों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहती हैं. प्रस्तुत हैं उनकी कुछ रचनाएं-

    पछता रहा हूं

    सोचकर पछता रहा हूं
    अस्पताल जाना दर्द में तुम्हारा
    अंत मिलन का रहा वह हमारा
    काश! लगा तुम्हें गले रुख्सत कर
    खुद को ढांढस बंधा पाता मन ही मन में।।

    माना कि आना अकेले
    जाना भी जग से अकेले है
    पर आदत तुम्हारी इस कद्र थी
    जीवन अब अर्थहीन लगने लगा
    इच्छाएं अब नहीं शेष रही इस मन में।।

    मायावी जगत में स्मृतियां शेष हैं
    कर उन्हें स्मरण हर पल बिता रहा हूं
    थाम उस लाठी को कदम बढ़ा रहा हूं
    सहारा जो कभी तुम्हारा हुआ करती थी
    ऐसे ही हर्षित मैं हो जाता हूं मन ही मन में।।

    व्यथित और विचलित हो जाता हूं
    नहीं सुनता स्वर कोयल का वो मधुर
    जो इक नई उज्जवल सुहानी भोर से
    मिलन कराती बैठ आम की डाली से
    अहसास तुम्हारा जगा जाती बुझे मन में।।

    सुनो! एक तुमसे है गुजारिश
    ख्याल इस बात का रखना तुम
    शाम जीवन की लगे जब ढलने
    एक पल को आकर सहला जाना तुम
    त्यागने पर इस तन का मोह न रहे मन में।।

    ढलते रिश्ते

    जन्म लेते ही खूबसूरत
    रिश्तों के पालने में लगी झूलने।।

    हर चेहरा देख मुझे
    फूल माफिक लगा महकने।।

    उम्र बढ़ने के साथ-साथ
    रिश्ते बखूबी लगी समझने।।

    अनभिज्ञ रही कब
    रिश्ते कुछ लगे झुलसने।।

    केवल इक ‘मैं’ शब्द से
    ‘हम’ की बस्ती लगी उजड़ने।।

    अति अपनत्व से भी
    रिश्तों में बढ़ने लगी उलझने।।

    मुक्ति की कशमकश में
    मोह पाश में फिर लगी जकड़ने।।

    शाम ढल रही जीवन की
    शायद रिश्ते भी हैं लगे दुबकने।।

    Usha Khati

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