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कवि ओम प्रकाश आदित्य का अनूठा प्रयोग है उनकी कविता 'गोरी बैठी छत्त पर'

ओम प्रकाश 'आदित्य' दिल्ली में एक अध्यापक थे. 8 जून, 2009 को भोपाल के निकट एक कार दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई थी.

ओम प्रकाश 'आदित्य' दिल्ली में एक अध्यापक थे. 8 जून, 2009 को भोपाल के निकट एक कार दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई थी.

ओम प्रकाश 'आदित्य' हिंदी के प्रसिद्ध हास्य कवि और व्यंग्यकार हैं. हिंदी कवि सम्मेलन की दुनिया में वे चर्चित कवि रहे हैं ...अधिक पढ़ें

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Hindi Kavita: ओम प्रकाश ‘आदित्य’ हिंदी में वाचिक परम्परा में हास्य रस की प्रतिष्ठापना करने वाले रचनाकारों में से एक अग्रणी कवि हैं. उनका जन्म हरियाणा के गांव रणसीका में 5 नवंबर, 1936 को हुआ था. प्रसिद्ध हास्य कवि और व्यंग्यकार सुरेन्द्र शर्मा उनके बारे में लिखते हैं- ”50 साल के कवि सम्मेलन के इतिहास में मैं जिन रचनाकारों से मिला, उनमें ओम प्रकाश ‘आदित्य’ अग्रिम पंक्ति में आते हैं.”

ओम प्रकाश ‘आदित्य’ को याद करते हुए सुरेन्द्र शर्मा लिखते हैं- ‘मैंने व्यंग्य लेख लिखे तो उनके पहले श्रोता आदित्य जी ही होते थे. रात के एक बजे भी कोई लेख पूरा हुआ तो उसी वक्त उन्हें जगाकर लेख सुनाता था.’

आदित्य जी की एक रचना ‘गोरी बैठी छत्त पर’ पर बहुत मशहूर हुई है. इस रचना में उन्होंने अभिनव प्रयोग किया है. किस्सा कुछ यह है कि एक युवती छज्जे पर उदास बैठी है. उसके हाव-भाव और चेहरा देखकर लग रहा है कि जैसे वह छत से कूदनकर अपनी जीवनलीला समाप्त करने वाली है. ओम प्रकाश ‘आदित्य’ ने इस प्रसंग को अपनी शैली में लिखकर विभिन्न कवियों की शैलियों में लिखा है कि इस दृश्य को देखकर अलग-अलग विधा के कवियों के मन में क्या विचार आते और वे क्या रचते-

मैथिलीशरण गुप्त

अट्टालिका पर एक रमिणी अनमनी सी है अहो
किस वेदना के भार से संतप्त हो देवी कहो?
धीरज धरो संसार में, किसके नही है दुर्दिन फिरे
हे राम! रक्षा कीजिए, अबला न भूतल पर गिरे।

सुमित्रानंदन पंत

स्वर्ण–सौध के रजत शिखर पर
चिर नूतन चिर सुंदर प्रतिपल
उन्मन–उन्मन‚ अपलक–नीरव
शशि–मुख पर कोमल कुंतल–पट
कसमस–कसमस चिर यौवन–घट

पल–पल प्रतिपल
छल–छल करती निर्मल दृग–जल
ज्यों निर्झर के दो नीलकमल
यह रूप चपल ज्यों धूप धवल
अतिमौन‚ कौन?
रूपसि‚ बोलो‚
प्रिय‚ बोलो न?

रामधारी सिंह ‘दिनकर’

दग्ध हृदय में धधक रही
उत्तप्त प्रेम की ज्वाला।
हिमगिरि के उत्स निचोड़‚ फोड़
पाताल बनो विकराला।
ले ध्वंसों के निर्माण त्राण से
गोद भरो पृथ्वी की।
छत पर से मत गिरो
गिरो अंबर से वज्र–सरीखी।

काका हाथरसी

गोरी बैठी छत्त पर‚ कूदन को तैयार
नीचे पक्का फर्श है‚ भली करे करतार
भली करे करतार‚ न दे दे कोई धक्का
ऊपर मोटी नार कि नीचे पतरे कक्का
कह काका कविराय‚ अरी! मत आगे बढ़ना
उधर कूदना‚ मेरे ऊपर मत गिर पड़ना

गोपाल प्रसाद व्यास

छत पर उदास क्यों बैठी है‚
तू मेरे पास चली आ री।
जीवन का सुख–दुख कट जाए‚
कुछ मैं गाऊं‚ कुछ तू गा री।

तू जहां कहीं भी जाएगी‚
जीवन–भर कष्ट उठाएगी।
यारों के साथ रहेगी तो‚
मथुरा के पेड़े खाएगी।

श्यामनारायण पाण्डेय

ओ घमंड मंडिनी‚
अखंड खंड–खंडिनी।
वीरता विमंडिनी‚
प्रचंड चंड चंडिनी।

सिंहनी की ठान से‚
आन–बान–शान से।
मान से‚ गुमान से‚
तुम गिरो मकान से।

तुम डगर–डगर गिरो
तुम नगर–नगर गिरो।
तुम गिरो‚ अगर गिरो‚
शत्रु पर मगर गिरो।

भवानीप्रसाद मिश्र

गिरो!
तुम्हें गिरना है तो ज़रूर गिरो
पर कुछ अलग ढंग से गिरो
गिरने के भी कई ढंग होते हैं!
गिरो!
जैसे बूंद गिरकर किसी बादल से
बन जाती है मोती
बख़ूबी गिरो, हँसते-हँसते मेरे दोस्त
जैसे सीमा पर गोली खाकर
सिपाही गिरता है
सुबह की पत्तियों पर
ओस की बूंद जैसी गिरो
गिरो!
पर ऐसे मत गिरो
जैसे किसी की आँख से कोई गिरता है
किसी गरीब की झोपड़ी पर मत गिरो
बिजली की तरह
गिरो! पर किसी के होकर गिरो
किसी के ग़म में रोकर गिरो
कुछ करके गिरो

गोपालदास “नीरज”

यों न उदास रूपसी‚ तू मुस्कुराती जा‚
मौत में भी ज़िन्दगी के फूल कुछ खिलाती जा।
जाना तो हर एक को एक दिन जहान से‚
जाते–जाते मेरा एक गीत गुनगुनाती जा।

सुरेन्द्र शर्मा

ऐ जी, के कर रही है
छज्जे से नीचे कूदै है?
तो पहली मंज़िल से क्यूँ कूदे
चौथी पे जा!
जैसे के बेरो तो लाग्ये के कूदी थी!

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