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जसिंता केरकेट्टा की 5 चुनिंदा कविताएं- "लोग मरते रहे, सिर्फ ईश्वर बचा रहा"

जसिंता केरकेट्टा बेहद चर्चित युवा कवयित्री हैं. उनकी कविताओं में आदिवासी-जीवन पर मंडराते खतरे की घंटी का स्वर साफ सुना जा सकता है.

जसिंता केरकेट्टा बेहद चर्चित युवा कवयित्री हैं. उनकी कविताओं में आदिवासी-जीवन पर मंडराते खतरे की घंटी का स्वर साफ सुना जा सकता है.

जसिंता केरकेट्टा की कविताएं पाठक के मन में कई सवाल खड़े कर जाती हैं. उनकी कविताओं में प्रतिरोधी स्वर सहज ही महसूस किया ...अधिक पढ़ें

राजकमल प्रकाशन से छप कर आए जसिंता केरकेट्टा के कविता संग्रह ‘ईश्वर और बाजार’ से ईश्वर पर लिखी कुछ कविताएं यहां प्रस्तुत की जा रही हैं. इस कविताओं के माध्यम से जसिंता ने कई सवाल खड़े किए हैं, मसलन- ईश्वर किस तरह आदत में शामिल हो जाता है, क्या ईश्वर हमारी मदद करते इनसान ही हैं, आखिर जब कोई सताया जाता है तो उसे बचाने ईश्वर क्यों नहीं आता….

ईश्वर और बाजार

लोग ईश्वर को राजा मानते रहे
और राजा में ईश्वर को ढूंढ़ते रहे

राजा ने खुद को एक दिन
ईश्वर का कारिंदा घोषित कर दिया
और प्रजा की सारी सम्पत्ति को
ईश्वर के लिए
भव्य प्रार्थना-स्थल बनाने में लगा दिया
उसके नाम पर बाजार सजा दिया

भूखी असुरक्षित बेरोजगार पीढ़ियां
अपने पुरखों की सम्पत्ति
और समृद्धि वापस मांगते हुए
उन भव्य प्रार्थना-स्थलों के दरवाजों पर
अब सिर झुकाए बैठी हैं

आदमी के लिए
ईश्वर तक पहुंचने का रास्ता
बाजार से होकर क्यों जाता है?

मैं और मेरा ईश्वर

एक दिन ईश्वर
मेरी आदत में शामिल हो गया
अब मेरी आदत में ईश्वर था
जैसे मेरी आदत में तंबाकू

जिस दिन कुछ लोगों ने मिलकर ईश्वर के ही घर में
नन्हीं बच्ची के साथ दुष्कर्म किया
बच्ची ने दिल से ईश्वर को याद किया
मगर वह मंदिर के कोने में खड़ा रहा
और दुष्कर्म के बाद आदतन उस दिन भी
लोगों ने सबसे पहले ईश्वर को ही प्रणाम किया

मजदूर जब अपने अधिकार के लिए उठे
तो कुछ ईश्वर भक्तों ने उनसे
हाथ जोड़कर प्रार्थना करने को कहा
मजदूरों ने कहा अब प्रार्थना का समय नहीं है
वे जीवन-भर प्रार्थना करते रहे अपने मालिक से
पर ईश्वर को मानने वाला उनका मालिक बेरहम निकला

वह मजदूरों की नहीं सुनता
पर यह जरूर कहता
ईश्वर पर भरोसा रखो
वह देगा इससे भी बेहतर दुनिया
मगर इस दुनिया में वह
उन्हें उनका हक नहीं देना चाहता

उस दिन जिस आदमी ने
प्रार्थना की शुरूआत की
उसकी प्रार्थना इतनी लंबी और उबाऊ थी
कि लोग नींद में डूबने लगे
मगर हिम्मत किसी में न थी कि उसे सच बता सके
इस तरह चुपचाप हर बात स्वीकार कर लेना
मेरी आदत-सी बन गई
जैसे मेरी आदत में मेरा ईश्वर
जैसे मेरी आदत में तंबाकू

मुझे अच्छा बना रहने के लिए
ईश्वर की जरूरत थी
और बुरे कामों के बाद
बचने के लिए भी ईश्वर का रास्ता
हत्या और दया
लूट और दान
सबकुछ साथ-साथ चलता
मैं उससे दोनों तरह के काम लेता
इस सच को नकारता हुआ
कि दुनिया में दो ही तरह के लोग हो सकते हैं
भले या फिर बुरे

और कितनी अजबी-सी बात है
भले और बुरे दोनों ही आदमियों के पास
एक बात बिल्कुल एक-सी है
कि दोनों की आदत में
शामिल है एक ही ईश्वर।

लोग मरते रहे, सिर्फ ईश्वर बचा रहा

राजा क्या चाहता था
अपने राज्य का विस्तार
वह सरहदों के पार जाता
और खुद को लोगों का ईश्वर बताता

जब राजाओं का गढ़ ढहने लगा
तक कुछ चालाक लोग उठे और
उन्होंने ईश्वर को राजा घोषित किया
अपने राज्य की मजबूती के लिए
वे सरहदों के पार गए

ईश्वर के नाम पर वे उधर मुड़े
जिधर लोग नाचते-गाते और पेड़ों को पूजते थे
सूरज घड़ी की तरह आकाश में लटकता था
और चांद तारीखों में बदल जाता था
उनके पास पहाड़ थे और पहाड़ों में सोना
मगर वे बीमारियों से डरते थे

वे इनके बीच
एक ऐसा ईश्वर लेकर आए
जो लोगों की गांठ से
बची-खुची कमाई निकालने में
उनकी मदद करने लगा
भूख और दु:ख से छुटकारा पाने की
मन्नत मांगते लोगों ने देखा
उनके पहाड़ों से निकले सोने से
राजा का मंदिर चमक रहा था
बदले में कुछ लोगों के हाथ में सिक्के थे
जो उनके हाथ का हुनर खोने की कीमत थी

जिनके पास कुछ नहीं बचा
उनके पास ईश्वर के होने का भरम था
और जिनके पास पैसे बहुत थे
उन्होंने ईश्वर को छोड़ दिया
अब ईश्वर उनके किसी काम का नहीं रहा

एक दिन एक आदमी को
भूख से तड़प रहे
अपने नन्हें बच्चे के लिए दूध खरीदना था
पर उसकी गांठ के पैसे गायब थे
उसने रात-भर ईश्वर को पुकारा
पर सुबह बच्चे को मरा हुआ पाया
आस्थावान लोगों ने कहा
ईश्वर ने तुम्हारी सुनी उसे मुक्ति मिली
उसने कहा-
उसे मुक्ति नहीं दूध चाहिए था

तिलमिलाकर उठा आदमी
और दर्द से चीखने लगा
उस दिन पहली बार
वह ईश्वर के खिलाफ था
राजा और राज्य के खिलाफ था
ईश्वर को मानने वाले गुस्से में थे

उन्होंने उसे चौराहे पर जिन्दा जला दिया
यह कहते हुए कि उनका ईश्वर राजा है
और राजाओं के खिलाफ बोलने का हश्र यही है

एक दिन राजाओं के गढ़ ध्वस्त हो गए
पर उन्होंने ईश्वर को राजा बनाए रखा
हर सदी में अपना गढ़ बचाए रखा।

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मेरे ईश्वर की हत्या

बीमारी की हालत में अकेली
कई दिनों तक खाट पर पड़ी रही
मैंने याद किया ईश्वर को
पर एक पुराना मित्र दौड़ा चला आया
गोद में उठाकर मुझे अस्पताल पहुंचाया
कई दिनों तक भूखी जब भटकती रही शहर में
मोड़ पर दुकान वाले भैया बहुत दिनों तक
देते रहे आटा उधार में
पड़ोस की दीदी कटोरी-भर सब्जी
पहुंचा जाती थी अक्सर
मेरी नाक तक खुशबू पहुंचाने से पहले
मैंने देखा मेरा ईश्वर मेरे इर्द-गिर्द रहता है

एक दिन वे आए
जिन्होंने ईश्वर को कभी नहीं देखा
वे ईश्वर के नाम पर
करने लगे हत्या मेरे ईश्वर की
जो मेरे इर्द-गिर्द ही रहता था।

स्त्रियों का ईश्वर

पिता और भाई की हिंसा से
बचने के लिए मैंने बचपन में ही
मां के ईश्वर को कसकर पकड़ लिया
अब कभी किसी बात को लेकर
भाई का उठा हाथ रुक जाता
तो वह सबसे बड़ा चमत्कार होता

धीरे-धीरे हर हिंसा हमारे लिए
ईश्वर द्वारा ली जा रही परीक्षा बन गई
और दिन के बदलने की उम्मीद
बचे रहने की ताकत
मैं ईश्वर के सहारे जीती रही
और मां ईश्वर के भरोसे मार खाती रही

मैं बड़ी होने लगी
और मां बूढ़ी होने लगी
हम दोनों के पास अब भी वही ईश्वर था
मां की मेहनत का हिस्सा
अब भी भाई छीन ले जाता
और शाम होते ही पिता
पीकर उस पर चिल्लाते

वे कभी नहीं बदले
न मां के दिन कभी सुधरे

मैंने ऐसे ईश्वर को विदा किया
और खुद से पूछा
सबके हिस्से का ईश्वर
स्त्री के हिस्से में क्यों आ जाता है?

क्यों उसके पास सबसे ज्यादा ईश्वर हैं
और उनमें से एक भी काम का नहीं?
वह जीवन-भर सबको नियमित पूजती है
फिर पूजे जाने और हिंसा सहने के लिए
ताउम्र बुत बनकर क्यों खड़ी रहती है?

Tags: Hindi Literature, Hindi poetry, Literature, Poem

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