कविता: 'भूल जाना भी यहां प्यार-सा है, चोट लगना भी नमस्कार-सा है'

केदारनाथ सिंह को वर्ष 2013 में प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

केदारनाथ सिंह की कृति ‘अकाल में सारस’ को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला. इसके अलावा उन्हें व्यास सम्मान, मध्य प्रदेश का मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, उत्तर प्रदेश का भारत-भारती सम्मान, बिहार का दिनकर सम्मान तथा केरल का कुमार आशान सम्मान मिला था.

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    केदारनाथ सिंह (Kedarnath Singh) हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि व साहित्यकार थे. वे अज्ञेय द्वारा सम्पादित तीसरा सप्तक के कवि रहे हैं. केदारनाथ सिंह की प्रमुख काव्य कृतियां 'जमीन पक रही है', 'यहां से देखो', 'उत्तर कबीर', 'टालस्टॉय और साइकिल' 'बाघ', मतदान केंद्र पर झपकी, अकाल में सारस, बिल्कुल अभी, सृष्टि का पहरा चर्चित रही हैं. प्रस्तुत हैं 'मतदान केंद्र पर झपकी' काव्य संग्रह से कुछ कविताएं. इस काव्य संग्रह का प्रकाशन 'राजकमल प्रकाशन' (Rajkamal Prakashan) ने किया है.

    पानी

    मैं घोषित करता हूं
    कि पानी
    मेरा धर्म है
    आग मेरा वेदांत
    हवा से मैंने दीक्षा ली है
    घास-पात मेरे सहपाठी
    रास्ता मेरा देवता है
    मकई मेरा कल्पवृक्ष
    भागड़नाला मेरी गंगा

    इस तरह यह वृद्ध शिशु
    दुनिया के चौराहे पर
    खड़ा है चंगा.

    सज्जनता

    यह जीवन
    खोई हुई चीज़ों का
    एक अथाह संग्रहालय है
    जिसका दरवाज़ा खोलते
    मुझे डर लगता है

    मुझे सांप से
    डर नहीं लगता
    अंधेरे से डर नहीं लगता
    कांटों से
    बुझती लालटेन से
    डर नहीं लगता

    पर सज्जनो,
    मुझे क्षमा करना
    मुझे सज्जनता से
    डर लगता है.

    वसीयतनामा

    मेरी खाल दे दी जाए
    किसी खेत को
    कविताएं कर दी जाएं प्रवाहित
    किसी नाले में
    कौओं को दिया जाए निमत्रंण
    कि आवें और छज्जे पर बैठकर
    कांव-कांव करें
    मेरा कुर्ता किसी पेड़ को
    दे दिया जाए
    कमीज़ किसी झाड़ी को
    मेरी चिट्ठियां भेज दी जाएं
    किसी और पते पर
    किसी और का नाम लिख दिया जाए
    मेरे नाम की जगह
    मेरा बिस्तर दे दिया जाए
    किसी बेबिस्तर पड़ोसी को

    जो कहता हूं
    सो मैं कहता हूं
    पर जो नहीं कहता
    वह पत्थरों को दे दिया जाए
    कि शायद...शायद...
    कुछ बोलें.

    चोट लगना भी...

    भूल जाना भी यहां प्यार-सा है
    चोट लगना भी नमस्कार-सा है.
    कैसी ये धुंध छा गई कि उन्हें
    पेड़ भी लगता गुनहगार-सा है.
    टुक पठा देना चिरइते का रस
    शहर को इन दिनों बुखार-सा है.
    होंठ पर ठिठका है कई दिन से
    शब्द को मेरा इंतजार-सा है.
    वे कि जो छूट गए रास्तों में
    उनका भी मुझ पर कुछ उधार-सा है.
    ये मेरा दौर है-इस दौर को समझूं कैसे
    लगता दुश्मन भी ज़रा यार-सार है.
    लोग कुछ जा रहे थे छोड़ शहर
    देखा उनमें कोई केदार-सा है.

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