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जन्मदिन विशेष: महेश दर्पण की कहानी 'इधर आना ज़रा'

महेश दर्पण की कहानियों में बिखरते सामाजिक ताने-बाने का बड़ा ही मार्मिक वर्णन भी मिलता है.

महेश दर्पण की कहानियों में बिखरते सामाजिक ताने-बाने का बड़ा ही मार्मिक वर्णन भी मिलता है.

महेश दर्पण की प्रमुख कृतियों में ‘अपने साथ’, ‘चेहरे’, ‘मिट्टी की औलाद’, ‘पंचतंत्र की कथा निराली’ (नाटक); ‘रचना-परिवेश’ (आलोचना); ‘पुश्किन के देश में’ (यात्रा-वृत्‍तान्‍त) और ‘बहादुरशाह जफ़र’ (जीवनी) शामिल है. साहित्य सृजन के लिए आपको हिंदी अकादमी दिल्ली का 'साहित्यकार सम्मान', ‘पुश्किन सम्‍मान’ (मास्‍को), ‘राजेन्‍द्र यादव पुरस्‍कार’, ‘गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्‍कार’ आदि से सम्मानित किया जा चुका है.

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Mahesh Darpan Ki Kahaniyan: हिंदी के वर्तमान सशक्त हस्ताक्षरों में महेश दर्पण की गिनती शीर्ष रचनाकारों में होती है. सरल और आत्मीय स्वभाव के धनी महेश दर्पण का आज जन्मदिन है. उनका जन्म हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में 1 जुलाई, 1956 में हुआ था. पत्रकार और कहानीकार महेश दर्पण को उनकी साहित्य सेवा के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है.

‘सारिका’ और ‘दिनमान’ जैसी प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिकाओं के सम्पादन विभाग में काम करने के बाद आप सान्ध्य दैनिक ‘सान्ध्य टाइम्स’ के वरिष्ठ सम्पादकीय सहयोगी रहे हैं. महेश दर्पण के जन्मदिन पर पढ़ें उनकी कहानी –

दोपहर के वक्त खाना खाने के बाद, थोड़ी देर कोई कमर सीधी करना भी चाहे तो गली से आ रही आवाज़ें चैन नहीं लेतीं. ऐसी भरी उमस में भी कभी जामुन वाला अपनी तान छेड़ता निकल आयेगा तो कभी चना-सत्तू-मुरमुरे वाला अपनी बुलंद आवाज से नींद का तार जुड़ने न देगा. धीरे-धीरे वह इन आवाजों की अभ्यस्त ही हो चली है. आवाजें हों न हों, उनकी गूंज नींद में भी बनी रहती है. पर यह कैसी आवाज आ रही है आज! समवेत स्वर में उठ रही यह जैसे अचानक ही उसे आमंत्रित किए जा रही है. रोज़मर्रा की आवाजों से अलग कुछ सुनते ही वह उठकर दरवाजा खोलती जरूर है.

मैं अभी सोच ही रहा था कि पत्नी उठ बैठी. उसने दरवाजा खोल कर गली में झांका, तो जमा भीड़ को ऊपर की ओर देखता पाया. लोगों की नजर की सीध में उसकी आंखें भी ऊपर चढ़ती अपनी बेल से जा लगी. घबराहट में उसे और कुछ तो न सूझा, मुझे ही पुकार बैठी, ‘तन्नू के दादा, इधर आना ज़रा!’

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उसका बोलने का तरीका ही बता देता है कि माजरा है क्या! किसी अनहोनी की आशंका से भरा मैं दरवाजे पर पहुंचा, तो देखता क्या हूं कि गली की तमाम औरतें, बच्चे और राह चलते लोग हत्यारे को गरियाए जा रहे हैं.

‘जिस किसी नासपीटे का काम है यह, उसे जिंदगी में कभी छांह नसीब न हो…’ गुस्से में भरी सेठानी के मुंह से निकल पड़ा. दुकानवाली ने तो श्राप ही दे डाला-‘आप छांह की बात कर रही हो, मैं तो कहूं मुए की जिंदगी से हरियाली ही खत्म हो जाये.’

‘जाने कौन सिरफिरा होगा जिसने इतनी खूबसूरत फलती-फूलती बेल काट डाली… हम लोग इसी की छांव में खड़े हो के तो आप लोगन कू कपड़े दिखाते थे…ये सुख भी छीन लिया कातिल ने!’ मैक्सी, प्लाजो, टी-शर्ट और सूट बेचने वाला अपने भीतर का तमाम दुख घोलकर कह रहा था. उसकी आवाज में आवाज मिलाता टमाटर वाला आवेश में भर उठा था-‘लेकिन जे देख लेना आप, भारी पाप लगेगा उसे. हरी बेल काटना तो हत्या बरोबर माना जाता है हमारे यहां.’

मंदिर वाली की आंखें भर आई थीं, ‘अजी, कित्ता बड़ा सुभीता खतम कर दिया हमारा! जब चाहो, ठाकुर जी के वास्ते फूल तोड़ के ले जाओ! बेल किसी का कुछ बिगाड़े थोड़ी ही थी!’ कभी मुंह न खोलने वाला कबाड़ी भी अपना डंडा फटकारते हुए मौजूद लोगों के बीच आंखें घुमा-घुमाकर अपनी नाराजगी जाहिर कर रहा था. गुस्से में उसके मुंह से फेन-सा निकलने लगा था- ‘देख लेना, जिसने किया है ये खराब काम, कोढ़ फूटेगा उसे. करमजले को पानी देने वाला भी नसीब न होगा हां!’

पत्नी कभी लोगों को देखती तो कभी मुझे. मैं कभी पत्नी को देख रहा था तो कभी कटकर मुरझा गई बेल को. हवा में हरदम लहराने वाले बेल के पत्ते निष्प्राण हो उलटे लटके पड़े थे. गुच्छों के गुच्छे फूल मुंह लटकाए ऐसे लग रहे थे जैसे अचानक किसी ने उनकी सांस ही खींच कर अलग कर दी हो.

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कोरोना के भय से, जिन दिनों बाहर से कोई भी सामान लाने में घबराहट महसूस होने लगी थी, मुहल्लेभर ने पूजा के लिए मंदिर चौक से फूल लाने भी बंद कर दिए थे. फूलों लदी यह बेल ऐसे में हर किसी के लिए वरदान साबित हुई. जितने फूल तोड़ ले जाओ, दूसरे दिन उससे दुगने फूल बेल पर फिर लहलहाने लगते. पास से गुजरो, तो बेल कहती लगती- ‘जब तक मैं हूं, फूल हमेशा रहेंगे… किसी को फिक्र करने की जरूरत नहीं है.’

शाम के वक्त बच्चे इकट्ठे हो जाते तो गली गुलजार हो जाती. बच्चे बेल के पत्ते तोड़ कर बंद मुट्ठी के ऊपर रख पटाखा- सा फोड़ते या पत्तों से पीपनी बजाने लगते तो बेल ज़रा भी नाराज न होती। हवा का झोंका आता तो वह बच्चों के साथ-साथ खुद भी नाच उठती.

‘इलाके में नए आए लोग नहीं समझ सकते कि बेल के छाने में कितना वक्त लगता है! उसके चढ़ने के साथ-साथ आस-पास के लोगों में कैसे खुशी की लहर दौड़ पड़ती है! मुझे तो लगता है…’ पत्नी जैसे अपने आप से बात कर रही थी.

‘क्या लगता है तुम्हें?’ मैंने छूट गए आध-अधूरे वाक्य को उससे पूरा करने का आग्रह करते हुए कहा, तो उसने अपने दुपट्टे से भीग आई आंख का कोना पोंछते हुए कहा, ‘हो न हो, है ये किसी नए आदमी का ही काम. जिनके साथ-साथ यह बेल बड़ी हुई है, वो तो ऐसा करने की सोच भी नहीं सकते..’

पत्नी अपनी बात कहकर काम में व्यस्त हो गई, पर मुझे बेल के शुरुआती दिन याद आने लगे.

बेल लगाई तो बगल वाले शर्मा-परिवार ने ही थी, पर इसका सुख भोगना जैसे उनकी किस्मत में न लिखा था. चार-छह साल में जब तक मधुमालती की यह बेल बिजली के खंभे के सहारे ऊपर तक चढ़ी और छोटी गली के दोनों तरफ के मकानों की बालकनी पर छा गई, तब तक शर्मा परिवार गाजियाबाद के अपने बड़े फ्लैट में शिफ्ट हो गया. जब तक यहां रहीं, शर्माइन बेल की छांव में खटिया बिछवाकर अक्सर बैठ जाया करती थीं. उनके बच्चों को उनका इस तरह बैठना बिलो स्टैंडर्ड तो लगता था, पर वे चाहकर भी मां से कुछ कह न पाते.

अर्से बाद आज शर्माइन की याद आ रही थी. पत्नी का तो कहना था- ‘वह आज यहां होतीं, तो क्या मजाल थी कि कोई ऐसी ओछी हरकत कर जाता. जान न ले लेतीं वह उसकी!’ पत्नी के लिए बेल का कट जाना बड़ी तकलीफ थी तो उसने मुझे भी कम गहरा घाव न दिया था.

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पत्नी का दरअसल, इस बेल से इस कदर लगाव था कि शाम के वक्त वह अक्सर उसके करीब होने के लिए फर्स्ट फ्लोर की बालकनी पर पहुंच जाती. कभी उसके नए कोमल पत्तों को देखकर उत्फुल्लित होती तो कभी झुंड के झुंड खिले फूलों को आहिस्ता से इस अंदाज में छूती कि कहीं वे कुम्हला न जाएं. एक रोज तो उसने सुबह-सुबह मुझे गेट से बाहर बुलाया और बिजली के केबल की तरफ इशारा करते हुए बहुत धीमे से कहा- ‘देखो-देखो, यही है वह चिड़िया जो सुबह चार बजे से भी पहले तेज आवाज में बुलाने लगती है.’
मैंने नजर उठाकर चिड़िया की तरफ देखा तो दंग रह गया- ‘छोटी-सी यह काली चिड़िया इतनी तेज आवाज करती है कि लेटा भले ही रहे, चाहकर भी कोई फिर सो नहीं सकता..’ मैं कुछ और कहता, इससे पहले ही एक गिलहरी चिड़िया के ठीक पास से सरकसी करतब दिखाते हुए आगे निकल गई. गिलहरी की पूंछ हवा में लहराते हुए उससे छू भर क्या गई, चिड़िया अपनी उसी तेज आवाज के साथ देखते-देखते जाने कहां फुर्र हो गई!

मैंने गौर किया, पत्नी उसे उल्लसित मन उड़ते हुए देखकर बहुत खुश थी. उसने मेरी तरफ इस भाव से देखा, जैसे कह रही हो- देखो, मैं तुम्हें बुला-बुला कर कैसी चीजे दिखा देती हूं! पर जो मैंने उसकी आवाज में सुना, वह यह था कि बेल न होती न, तो ये दूर-दराज की चिड़ियां यहां जो क्या आतीं!

बेल से छाई हरियाली ने हमारे एकरस जीवन में काफी कुछ नया जोड़ दिया था. कभी-कभी तो एक साथ इतनी गौरेया आकर बेल पर सत्संग करने लगतीं कि उनकी चीं-चीं से एक अलग ही लहरभरा संगीत पैदा होने लगता. सुबह-शाम, जब कभी हवा चलती, मधुमालती के फूलों की भीनी गंध उसमें घुलकर हमारी सांसों में इस तरह प्रवेश करती जैसे कह रही हो- ‘यह लो, यह रही मैं. भर लो मुझे अपने में!’

उस गंध को अपने भीतर भरते हुए मैं देखता- गिलहरी चुन-चुन कर मधुमालती के फूल कुतर रही है. कभी बेल के भीतर छुपकर तो कभी अपनी चपलता का प्रदर्शन करते हुए.

मौसम बदलने लगता, तो पहले बेल से फूल नदारद होते, फिर उसमें नए पत्ते आने बंद हो जाते. बचे रह गए पत्ते अपनी ताकत भर बेल पर बना रहने की कोशिश करते, फिर धीरे-धीरे पीले पड़ने लग जाते. रंग बदल जाने के बावजूद, उनका मन बेल का साथ छोड़ने का बिल्कुल न होता. पर साथ कैसा भी क्यों न हो, कोई हमेशा के लिए थोड़े ही होता है! हवा में जरा भी तेजी आती, तो पीले पत्ते समय से कुछ पहले ही जमीन पर आ गिरते. और हवा न चलती तो वह अचानक एक दिन किसी आश्चर्य की तरह जमीन पर एकदम बेआवाज चले आते. अक्सर ऐसा सुबह-सुबह या शाम घिरने से कुछ पहले होता.

बेल हमारी जिंदगी में छाती जा रही थी. गर्मियां आने को होतीं और उसमें नये पत्ते आने लगते, तभी से हम उसके फूलों का इंतजार करने लगते.

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बेल कट जाने के दुष्प्रभाव के बारे में सोचकर मैं गमजदा हुआ जा रहा था. जाने क्यों, एक-एक कर मेरी आंखों में वे दृश्य आते जा रहे थे जो इस बेल के आकार लेने से करीबन चालीस साल पहले अपने इलाके के थे. छोटे-से अपने इस मुहल्ले में हर गली में चार-छह घर तो ऐसे थे ही जहां कोई न कोई पेड़ दूर से ही नजर आ जाता था. नीम, पीपल, अमलतास, जामुन, अमरूद, शहतूत, पपीता, केला, कचनार, आम और नीबू… जाने कितने किस्म के पेड़ घर के बाहर खुली छोड़ दी गई जमीन में यहां के लोगों ने लगा रखे थे! जमीन तो बढ़िया थी ही, लिहाजा पेड़ फलते भी खूब थे. दो-तीन गलियों में बेल पेड़ पर इस कदर लदे रहते कि देखने वाले हैरान रह जाएं.

पेड़ों पर लदे फल इलाके के लोगों को जोड़ने का काम इतनी सहजता से करते कि कुछ पता ही न चलता. कोई किसी के यहां अमरूद ले के चला हा रहा है तो दूसरे रोज उसके यहां किसी घर से केले या पपीते पहुंच रहे हैं. पांच नंबर गली में तो जामुन की ऐसी बहार थी कि मुहल्ले भर के बच्चे वहीं पहुंचे मिलते. सिन्हा साहब के यहां आम फलता, तो वह पड़ोसियों को जरूर चखवाते. जिन लोगों के यहां फलों के पेड़ न होते, वे छोटी-छोटी क्यारियों में मौसमी सब्जी ही लगा लेते.

गजब का नजारा बना रहता था- कहीं टमाटर हो रहे हैं तो कहीं बैंगन, भिंडी, गोभी या गाजर. कोई मटर लगाकर खुश है तो किसी ने घीया-तोरी या कद्दू ही उपजा लिया. अरबी, प्याज, लहसुन और फ्रेंचबीन तक इतनी होती कि बगैर पास-पड़ोस में बांटे काम ही न चले. बाजार की सब्जी तब लेता ही कौन था!

अब भला इलाके में बचा ही क्या है! बचे रह गए कुछ खाली बड़े प्लाटों में झाड़-झंखाड़ के बीच कहीं पीपल, कहीं नीम तो कहीं आम और यूक्लिप्टिस के ऊंचे पेड़ जरूर खड़े हैं. बड़े प्लाटों में बने आलीशान मकानों में तो नकली अशोक के सीधे खड़े पेड़ों की बगल से झांकते रबर प्लांट ही हरियाली का संकेत देते हैं या फिर बालकनियों में लटके गमलों से झांकते अल्पजीवी फूलों के पौधे, मनीप्लांट या कैक्टस. जिन लोगों ने दलदल से बचाव की खातिर कभी यूक्लिप्टिस के पेड़ लगवा लिए थे, उसकी खराबियां पता चलते ही मन बदला और कटवा डाले. आज भी उनकी तेज गंध उसकी स्मृति में बसी है.

अपना वह पुराना मुहल्ला तो अब अतीत की चीज हो चुका है. जाने कैसी मार पड़ी वक्त की कि अच्छे-खासे बड़े प्लॉट भी छोटे होते चले गए. अब हाल ये है कि दरवाजा खुलवाओ और सीधे घर में प्रवेश कर जाओ. न आंगन रहा और न बगीचा. क्यारियां कहां से होंगी जब गमलों तक के लिए जगह न बची. इंच-इंच जगह के लिए जहां कहा-सुनी शुरू हो गई हो, वहां हरियाली की कौन सोचे! वो तो भला हो सरकार की उस सोच का कि सड़कों-गलियों में जहां मुफीद जगह मिल सके, पेड़ लगवाए जाएं. कुछ बेलों की कटिंग भी उपलब्ध कराई गई.

उन्हीं दिनों की बात है, शर्माइन ने भी सरकारी कारिंदे से एक हरे जंगले के साथ बेल की एक कटिंग ले ली. बिजली के खंभे के पास ही गड्ढा खुदवाकर पहले कटिंग रोंपी और फिर जंगला लगवा दिया. कभी शर्माइन पानी डालतीं तो कभी पत्नी. कुछ दिनों बाद ही जब बेल ने जड़ पकड़ ली तो उसमें नए पत्ते भी नजर आने लगे.

यह खुशी का ऐसा आलम था कि पत्नी और शर्माइन में पहले अक्सर बना रहने वाला खिंचाव भी जाता रहा.

‘पत्ता ही लगेंगे कि फूल भी आएंगे इसमें?’ शर्माइन ने एक दिन शंका जाहिर करते हुए जिज्ञासा रखी तो पत्नी ने उसे बताया-‘ये तो बहन जी, मधुमालती के पत्ते लग रहे हैं. थोड़ा सब्र करो, ऐसे फूलेगी कि तुम बस देखती रह जाओगी.’

देखते-देखते बेल जंगले से ऊपर निकल आई. जंगले के भीतर थी तो आवारा पशुओं से सुरक्षित थी, पर जब बाहर झांकने लगी तो उसकी फिक्र दोनों पड़ोसनों को लगी रहती. कभी वे उसे बारीक कपड़े से ढंकने की कोशिश करतीं तो कभी सहारा देकर ऊपर चढ़ाने का इंतजाम करती रहतीं. जब तक हाथ पहुंचता रहा, कोई न कोई बेल को ऊपर चढ़ने में मदद करता रहा, फिर एक दिन जैसे बेल ने अपने जवान हो जाने का संकेद दे दिया. अपने अगले हिस्से की वह कोमल घुंडी से किसी भी चीज़ का सहारा ले अपनी राह खुद बनाने लगी. उसके नए-नवेले घुमावदार हाथ अपने सहारे को इतने प्यार से गले लगाते कि वह हमेशा के लिए बेल का होकर रह जाता. बेल भी उससे ऐसी लिपटती चली जाती, जैसे अब कभी अलग ही न होना हो.

बेल ने उठान पकड़ ली थी. उसके नए-नए कल्ले फूटकर नई-नई दिशाओं में बढ़ते जा रहे थे. जाने कब, केबल के सहारे उसकी दो-एक शाखें हमारी बालकनी तक भी खिंची चली आईं. शर्माजी की बालकनी का कोना तो बेल पहले ही ढांप चुकी थी. धीरे-धीरे उसने स्ट्रीट लाइट पर भी ऐसा छाता-सा तान दिया कि रात के वक्त जब हवा चलती तो रोशनी का झिलमिल-झिलमिल करता नृत्य बच्चों के लिए एक दर्शनीय खेल ही बन गया. हवा में हिलते बेल के पत्ते दीवारों पर प्रकाश की ऐसी आकृतियां बनाते कि बच्चे उसे देखते रहने के फेर में घर के भीतर आने का नाम ही न लेते.

‘यहां खड़े-खड़े क्या सोचे जा रहे हो? पता है, मैं तो उसी रोज समझ गई थी कि अब बेल का बुरा वक्त आने वाला है जब वह औरत बेल की जड़ के पास बैठकर जाने क्या गुल खिला रही थी!’ पत्नी ने मेरा कंधा हिलाते हुए कहा तो मैं बमुश्किल बेल से बाहर निकल सका. पर इसके साथ ही मेरे भीतर यह सवाल जोर मारने लगा कि पत्नी ये किस औरत की बात ले बैठी है? और आखिर वह बेल की जड़ में कर क्या रही थी? जब मुझसे रहा न गया तो मैंने पत्नी से पूछ ही लिया, ‘कौन थी वह औरत और वहां क्या कर रही थी?’

पत्नी ने बताया, ‘अरे कुछ दिनों पहले, एक शाम की बात है. मैंने देखा, एक बच्चे के साथ एक औरत बेल के जंगले के पास बैठी कुछ खोदा-खादी-सी करने में लगी हुई है. मैंने उसे टोका तो जानते हो क्या बोली? कहने लगी, ‘मैंने मकान मालिक से पूछ लिया है. मुझे इस बेल की कलम लेनी है.’

मैंने झुंझलाकर कहा- ‘कलम लेनी है तो फिर जड़ क्यों खोद रही हो? ऊपर से काटकर एक टहनी ले जाओ.’ लेकिन, फिर भी वह देर तक जंगले के पास बैठी-बैठी जाने क्या करती रही! मुझे तो लगता है…’

पत्नी ने गुजरे दिनों का वाकया सुनाने के साथ ही अपनी शंका भी प्रकट कर दी थी. उसे मकान मालिक शर्मा जी पर गुस्सा भी आ रहा था कि यहां से गए तो ऐसे कि फिर शक्ल तक नहीं दिखाई! मकान बेच-बाच के छुट्टी कर देते तो बात अलग थी, लेकिन किरायेदारों के भरोसे ऐसे निश्चिंत बैठे हैं जैसे किराये के अलावा किसी चीज से कोई मतलब ही नहीं रहा. ऊपर वाले किरायेदार ऊपर और नीचे वाले नीचे मगन रहते हैं. उन्हें तो बेल जैसे काटने को दौड़ती हो.

एक दिन तो पत्नी ने दोनों किरायेदारों को बुरी तरह से झाड़ दिया था. दोनों बेल को भला-बुरा कह रहे थे कि उससे गली में गंदगी बहुत हो जाती है. ऊपरवाली किराएदारिन कुछ ज्यादा ही बोल रही थी-‘जब देखो तब पत्ते गिरते रहते हैं. सारी गली पत्तों से भर जाती है. झाडू़ लगाने वाला आता है तो सारे पत्ते एक किनारे कर चला जाता है. थोड़ी देर बाद ही फिर वे नाली में तैरते नजर आते हैं.’

पत्नी तो जैसे पहले से तैयार बैठी थी-‘जब फूल खिलते हैं और खुशबू आती है, तब तो बड़े खुश होते हो. जरा से पत्ते क्या गिर गए, बर्दाश्त नहीं होते तुमसे! दुनिया में कौन-सी चीज है ऐसी, जिसमें सब अच्छा ही अच्छा है….अपने भीतर ही झांक के देख लो…पता लग जाएगा कितनी दूध की धुली हो.’

सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा हो तो इंसान सब भूल जाता है, लेकिन जरा भी उलटा-सीधा हो जाए तो पुरानी बातें खुद-ब-खुद यादों के रास्ते सामने आ खड़ी होती हैं.

पत्नी को, कटी हुई बेल देख अब बीती हुई एक-एक बात याद आए जा रही थी. उसने एक शंका यह भी प्रकट कर दी कि हो न हो, यह काम दोनों में से किसी एक किराएदार का लगता है. अनजान ऐसे बन रहे हैं जैसे इन्हें कुछ खबर ही नहीं!

सबसे ज्यादा दुख तो उसे इस बात का था कि बेल हमारे और आस-पास के मकानों के लिए एक खास पहचान बन चुकी थी. इलाके से अनजान कोई मेहमान या कूरियर वाला आ रहा हो तो सभी निश्चिंत होकर पहले डेविड स्कूल का मेन गेट बताते और फिर उसके सामने गली की बेल हो जाती पक्की पहचान. स्कूल की तरफ से गली में प्रवेश करने वाले को छायी हुई बेल दूर से ही नजर आ जाती.

सुबह, दोपहर, शाम, जब कभी पत्नी को बेल से जुड़ा कुछ याद हो आता, वह सुनाने बैठ जाती. एक शाम अच्छी-खासी हवा चल रही थी. पत्नी अपनी पोती तन्नू के साथ बालकनी में घूम रही थी. अचानक तन्नू ने पूछा, ‘अम्मा, वो बेल में घूमने वाला काला कीड़ा कहां चला गया?’
‘कौन-सा कीड़ा?’
‘अरे वही न अम्मा, जो गुन-गुन करता रहता था. फूलों के ऊपर…’
‘अरे बेटी, अब वो यहां आकर क्या करेगा? अब तो देखना, मधुमक्खी भी नहीं आने वाली.’
‘और कौए?’
‘कौए भी कहां आते हैं अब?’

तन्नू बात को जब जहां चाहे घुमा देती है, ‘अम्मा, हमारी ये बेल सूख क्यों गई?’
‘क्या बताऊं तुझे तन्नू.’
‘बंदर अब क्यों नहीं आते अम्मा?’

दादी पोती की खुशी को पंक्चर नहीं करना चाहती, ‘बंदर तो तभी आते हैं न, जब उनका मन होता है!’

दरअसल, हुआ यह कि एक रोज जाने कहां से मुहल्ले पर बंदरों ने धावा बोल दिया. जहां-जहां सारे रास्ते बंद थे वहां तो उनकी दाल न गली, पर कुछ खुली बालकनियों और मधुमालती की बेल पर तो उन्होंने ऐसा उत्पात मचाया कि किसी के रोके वे न रुके. देर तक न सिर्फ उछलकूद करते रहे, जो कुछ खाने-पीने का उनके हाथ लगता चट कर जाते. जाली के दरवाजे से दादी तन्नू को यह नजारा दिखाकर खुश होती रही. उसी दिन तन्नू को हनुमानजी की अशोक वाटिका पहुंचने की कहानी भी दादी ने सुनायी थी.

लाड़ में दादी पोती को तन्नू कहती हैं. वह भी कुछ देर यही बदला हुआ नाम सुनकर खुश रहती है. ‘दादी, देखो न वो बंदर कैसे बेल के फूल तोड़-तोड़ के खा रहे हैं.’ तन्नू ने चीखकर कहा.

‘हां बेटी, बंदर सब खाता है- रोटी, चना, चावल, फल, फूल… जो कुछ उसे मिल जाए. वह तो साग-सब्जी भी कच्ची ही चट कर जाता है.

तन्नू उसी दिन से बंदरों के आने के इंतजार में रहती है. उसे बंदरों का ऊघम मचाना बड़ा अच्छा लगा था-‘क्यों दादी, बंदरों ने उस दिन कैसे बेल के ढेर सारे पत्ते तोड़ डाले थे न!’

‘हां बेटी, उन्हें खाने से कहीं ज्यादा मजा उजाड़ने में आता है.’
‘हनुमान जी की तरह?’
‘हां बेटी! वैसे ही जैसे लंका में पहुंचकर हनुमान जी ने किया था.’
‘तो दादी, अब बंदर यहां आएंगे तो क्या खाएंगे? क्या कौवे उन्हें भगाने फिर आ जाएंगे?’

तन्नू के सवालों ने दादी को उदास कर दिया है. बेल थी तो कितना हरा-भरा रहता था यहां! फूल खिले हों, तब तो फिर कहना ही क्या! जाने कितने किस्म के पक्षी बेल पर अठखेलियां करते रहते! सीनियर सिटिजन से कबूतर उन्हें दूर से बैठे बस देखते रहते.

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बेल सूखकर पहले केबल पर लटकी रही. फिर कभी आंधी तो कभी बारिश से टूट-टूट कर टुकड़ों-टुकड़ों में गिरती रही. बेल से हुई खाली जगह, नजर पड़ते ही उदास कर जाती. तन्नू की दादी बेल वाली जगह को देखती तो उसके भीतर से हूक-सी उठने लगती. उसका बालकनी पर आना अब बहुत कम हो गया था. वहां वह तभी जाती है जब उसे तार पर कपड़े सुखाने होते हैं. कहती है-‘मुझसे बेल वाली खाली जगह की तरफ देखा ही नहीं जाता. कितनी भी कोशिश कर लूं, बेल मुझे भुलाए नहीं भूलती.’

दादी कभी तन्नू को विचारमग्न दिखाई देती है, तो वह पूछ बैठती है- ‘क्यां दादी, बेल की याद आ रही है क्या?’ दादी खामोश रह जाती है और तन्नू उसके चारों तरफ घूमती कुछ न कुछ बोलती जाती है. बेल नहीं है, पर लगता है जेसे हरदम साथ चले आ रही है.

तन्नू मगन मन दूसरे खेल में आ पहुंची है, पर दादी की आंखों में अब भी बेल की स्मृतियां लहलहा रही हैं. वह सोच रही है- मुआ हाथ भर लग जाता वो बेल काटने वाला, सारी अक्ल ठिकाने न लगा देती उसकी!

सुबह के वक्त रोज का नियम था उसका. वह पानी चलाती. गेट के बाहर रखे तुलसी के गमले सहित फूलों के गमलों को ताजा पानी पिलाती. बाल्टी में बचा रह गया पानी बेल की जड़ में डाल देने की पुरानी आदत थी उसकी. लेकिन जब से बेल की हत्या हुई है, वह बाल्टी में बचा पानी गली पर ही छिड़क देती है.

उस रोज जाने क्या हुआ, पानी छिड़कते हुए ही धार के साथ-साथ उसकी नजर बेल की जड़ तक जा पहुंची. जो कुछ उसे नजर आया, उसे देख वह खुशी से चीख ही उठी-‘तन्नू के दादाऽऽ इधर आनाऽऽ ज़राऽऽऽ’

उसकी आवाज की विकलता में ऐसी कशिश थी कि हाथ का अखबार मेज पर रख मैं फौरन बाहर जा पहुंचा। वहां देखता क्या हूं, पत्नी गली में उतर कर बेल के जंगले के पास जाकर बैठी हुई है. उसके हाथों में उस रोज जाने कहां से ऐसी फुर्ती आ गई थी कि वह तेजी से बेल के आसपास जमा कूड़ा-करकट हटाए जा रही थी. जंगला नीचे की तरफ से टूटा हुआ था, इसलिए वह बड़ी सावधानी से भीतर का कूड़ा बाहर करने में लगी थी. पत्नी की नजर बेल से फूट रही नई कोंपल पर जमी थी और लग रहा था जैसे वह उसे अपने समूचे प्यार से सींच रही हो.

मेरी ओर देखने की तो उसे फुरसत ही न थी. उसकी खुशी में इजाफा करने की गर्ज से मैंने भीतर लौटकर एक बाल्टी में थोड़ा पानी भरा और उसके पास जा पहुंचा. बाल्टी रखने की आवाज के साथ ही हम दोनों की नजरें मिलीं तो मैंने पाया वह कह भले कुछ न रही हो, पर जैसे बेल की तरह मुझसे बस लिपट जाना चाहती हो.

आज जाने कितने दिनों बाद बेल को पानी मिला था! पत्नी बेल में खोई थी और मैं पत्नी की उस आवाज में…इधर आनाऽऽ ज़राऽऽ.

Tags: Hindi Literature, Hindi Writer, Literature

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