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मीना सिंह की कविता- जिस घर में रोती हैं औरतें, वहां चिराग नहीं जलते

'इस बार उनके लिए' कवयित्री मीना सिंह का नवीनतम संग्रह है. यह 164 कविताओं का संकलन है.

'इस बार उनके लिए' कवयित्री मीना सिंह का नवीनतम संग्रह है. यह 164 कविताओं का संकलन है.

मीना सिंह कवयित्री, कथाकार और समालोचक हैं. उनके छह कविता संग्रह, एक कहानी संग्रह 'अंधेरी सुरंग' प्रकाशित हो चुके हैं. उ ...अधिक पढ़ें

Hindi Kavita: मीना सिंह पिछले चार दशकों से साहित्य रचनाकर्म में रमी हुई हैं. 19 दिसंबर, 1950 में जन्मीं मीना सिंह छात्र जीवन से ही कविता और कहानियां लिख रही हैं. उनकी रचनाएं तमाम पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं. मीना सिंह ने कई देशों की यात्राएं करते हुए काफी लेखन किया है. खासकर 14 वर्ष के बोत्स्वाना प्रवास के दौरान उनकी लेखनी और प्रखर हुई. बोत्स्वाना प्रवास के दौरान उनका कविता संग्रह ‘काली कविताएं’ प्रकाशित हुए. यह संग्रह काफी चर्चित रहा.

मीना सिंह का नया संग्रह ‘इस बार उनके लिए’ इसी वर्ष प्रकाशित हुआ है. इस संग्रह की हर कविता एक अलग कहानी समेटे हुए है. ये कविताएं खुद मनुष्य की अंर्तमन की यात्राएं हैं. इनमें स्त्री विमर्श है. कविताओं बदलते समाज का बिम्ब है और खत्म होते रिश्तों का विलाप. तमाम वेदनाओं के बाद भी नए जीवन, नई ऊर्जा की किरण भी नजर आती है. इसकी बानगी उनकी कविता ‘बरसात में’ स्पष्ट देखी जा सकती है.

अच्छा हुआ, बह गए आंसू
मन का मौसम धुला-धुला-सा हो गया
किरकिरी-सी जो कसक रही थी
देर से
बह कर, निकल गई
और मुस्कुरा उठी पलकें
आभार में, फिर डबडबा गईं आंखें
अच्छा हुआ, बह गए आंसू…!

‘उनके लिए’ कविता में स्त्री देह को एक अलग ही अंदाज में प्रस्तुत किया गया है. पितृसत्ता समाज को स्त्री में केवल देह नजर आती है. देह में छिपी प्रेम से पूर्ण स्त्री किसी को नहीं दिखाई देती-

धरती के एक हिस्से से
औरतें और बच्चियों
चिल्ला, चीखकर
बुला रही हैं

यदि तुम्हारे कान
बहरे नहीं हो गये हैं
तो सुनो उन्हें

औरत और बच्चियों की
कोई जात नहीं होती
धर्म नहीं होता
अपने खालिस वजूद में
वो केवल औरतें और बच्चियां
होती हैं अपने मूर्त नारीत्व के साथ

उनके नामों पर भी मत जाओ
किसी भी धर्म के द्वारा दिए गए
नामों से- वो सजी होती हैं
उनके परिधानों पर मत जाना
कभी वो पहनती हैं बुरका, सभी साड़ी
लहंगा, सलवार सूट या स्कर्ट, फ्रॉक…

पर उन परिधानों के नीचे होती है वो
एक पवित्र कोमल मन-प्राण वाली औरतें!

इतिहास गवाह है जब-जब इस धरती पर युद्ध हुए,,सत्ता की लोलुपता के चलते लड़ाइयां लड़ी गईं, विनाश के केंद्र में केवल स्त्री ही रही. आंसू का कतरा के बहाने कवयित्री ने न केवल कटाक्ष किया है बल्कि बड़ी ही तार्तिक बात भी कही है, जिसे शायद ही हर कोई समझ पाए कि- जिस घर में रोती हैं औरतें, वहां चिराग नहीं जलते-

आंसू का कतरा

रोने लगी हैं औरतें, मॉंयें
सहमी हुई बच्चियां
वो अभागे नहीं जानते
जहां जिस घर में रोती हैं औरतें
वहां चिराग नहीं जलते
देहरियों पर
फैले काले-धुंआते अंधेरे में

रोते हैं सियार, कुत्ते
अताताइयों ठहर जाओ
जब एक साथ रोती हैं हजारों हजार औरतें

पुंसत्व ही हो जाता है
यातनाओं का साम्राज्य
कितना फोड़ोगे कोख की धरती
होता था जिन्हें प्रसवित
मखमली खेमों के बिस्तर पर
खड़ी है हर खोह, दर्रे, गली
पहाड़ों की नोक पर

सोचो जरा, जब जल उठेगी सारी फिज़ा
धुंए में घुटेगा ससार सारा
हरापन बदल जाएगा राख में
रोयेगी वह आखिरी औरत
और बुझते आखिरी दीये के साथ
वही होगा प्रलय का आखिरी दिन

जब रोने की आवाजें
बंद हो जाएंगी
सीत्कारियां भरेंगी ऋगालिकाएं
गिद्ध मंडराना छोड़ देंगे
जल उठेगा ब्रह्मांड
नदियां बहने लगेंगी
पलटकर दिशाएं
पोखरों में फूटेंगे ज्वालामुखी
लावों से पटेगी धरती
और तुम अपनी गर्म राख के
ठंडा होने के इंतजार में
फिर ढूंढोगे
कोई सूखा हुआ
आंसू का कतरा
हां, आंसू का कतरा।

रक्त की खुरचन

भूख, रोटी, जरूरतों और सही
सुरक्षित घोंसलों की तलाश में
उड़-उड़ कर तलाशते हुए
जंगल, पहाड़, जमीन
देश-परदेश द्वीप-महाद्वीप
चिड़िया के पंख
आंधियों के धक्के से
उलट कर टूटने की

पीड़ा में बन गए शिला के पंख
जिसमें न थरथराहट बची न गर्मरक्त को
प्रवाह की सुरसुराहट।

और वक्त रोने लगा…
भीगने लगे शिला के पंख
ठीक वहीं से
जहां से उखड़ने के घाव के
निशान से टपका था खून!

कर सको तो कोशिश करना
उस सूखे खून के
निशान खुरच कर

उस ताबीज में भर लेना
जिसे दिया था चिड़िया ने
तुम्हें तुम्हारे जन्म के बाद
विरासत की तरह।

पुस्तक- इस बार उनके लिए (काव्य संग्रह)
लेखक- मीना सिंह
प्रकाशक- हंस प्रकाशन

Tags: Hindi Literature, Hindi poetry, Hindi Writer, Literature, Poem

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