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रघुवीर सहाय की चुनिंदा कविताएं, पढ़ें 'हमने यह देखा'

रघुवीर सहाय की चुनिंदा कविताएं, पढ़ें 'हमने यह देखा'

रघुवीर सहाय ने कविताओं के लिए हमेशा नए विषय और नए क्षेत्र का चुनाव किया.

रघुवीर सहाय ने कविताओं के लिए हमेशा नए विषय और नए क्षेत्र का चुनाव किया.

रघुवीर सहाय ऐसे कवियोंं में से हैं जो बदले हुए समय की जरूरत के अनुसार कविता की भूमिका को नए उद्देश्यों से जोड़ते हैं.

करीब 8 साल पहले रांची में एक नाटक के सिलसिले में निर्मला पुतुल (Nirmala Putul) और रघुवीर सहाय (Raghuvir Sahay) की चुनिंदा कविताओं (Hindi Kavita) पर काफी दिनों तक रिहर्सल की. दोनों ही कवियों ने महिला और आम आदमी की पीड़ा को इस तरह से अपने शब्दों में पिरोया है कि पहली बार पढ़ने पर ही सीधे दिमाग के तारों को झंझोर दिया. करीब 10 दिन हमने इन कविताओं पर खूब रिहर्सल की. फिर रांची में जाकर स्टेज शो किया. लोगों को खूब पसंद आया. इसके बाद तो ‘यह कील कहां से रोज़ निकल आती है, इस दु:ख को रोज़ समझना क्यों पड़ता है’ लाइनें किशोर या रफी के किसी पॉपुलर गाने से भी ज्यादा प्रिय लगने लगीं और अक्सर होंठों पर खुद ही उभर आती हैं.

नाटक के बाद रघुवीर सहाय और निर्मला पुतुल की किताबों को पढ़ा. दोनों ही कवियों ने दिल पर अमिट छाप छोड़ी है.

‘राजकमल प्रकाशन’ (Rajkamal Prakashan) से प्रकाशित ‘रघुवीर सहाय- प्रतिनिधि कविताएं’ उनकी रचनाओं का ऐसा संकलन है कि आपको इसे पढ़ने के बाद काफी हद तक रघुवीर सहाय समझ में आ जाते हैं. इस संग्रह में उनकी कविताओं का संपादन किया है कि सुरेश शर्मा ने.

सुरेश शर्मा, रघुवीर सहाय के बारे में लिखते हैं, वर्तमान समाज व्यवस्था के बीच आम लोगों का मानवीय गरिमा के साथ जीना लगभग असंभव हो गया है. रघुवीर सहाय की कविताएं पहले तो इस जीवन विरोधी स्थिति की पहचान कराती हैं, फिर उससे मुठभेड़ के लिए हमें शक्ति देती हैं.

बिल्कुल सही कहते हैं सुरेश शर्मा. क्योंकि अच्छी तरह से याद है हमने अपने नाटक की शुरूआत सहाय जी की इस कविता के साथ की थी-

शक्ति दो

शक्ति दो, बल दो, हे पिता
जब दुख के भार से से मन थकने आय
पैरों में कुली की-सी लपकती चाल छटपटाय
इतना सौजन्य दो कि दूसरों के बक्स-बिस्तर घर तक पहुंचा आयें
कोट की पीठ मैली न हो, ऐसी दो व्यथा-
शक्ति दो, बल दो हे पिता

और यह नहीं दो तो यही कहो,
अपने पुत्रों मेरे छोटे भाइयों के लिए यही कहो-
कैसे तुमने अपनी पीढ़ी में किया होगा क्या उपाय?
कैसे सहा होगा, पिता, कैसे तुम बचे होगे..?

तुमसे मिला है जो विक्षत जीवन का हमें दाय
उसे क्या करें?
तुमने जो दी है अनाहत जिजीविषा
उसे क्या करें?
कहो, अपने पुत्रों मेरे छोटे भाइयों के लिए यही कहो।
—-

हमने यह देखा

ये क्या है जो इस जूते में गड़ता है
यह कील कहां से रोज़ निकल आती है
इस दु:ख को रोज़ समझना क्यों पड़ता है

फिर कल की जैसी याद तुम्हारी आयी
वैसी ही करुणा है वैसी ही तृष्णा
इस बार मगर कल से है कम दुखदायी

फिर ख़त्म हो गये अपने सारे पैसे
सब चला गया सुख-दुख बट्टेखाते में
रह गये फ़कत हम तुम वैसे के वैसे

फिर अपना पिछला दर्द अचानक जागा
फिर हमने जी लेने की तैयारी की
उस वक़्त तकाज़ा करने आया आग़ा

इस मुश्किल में हमने आख़िर क्या सीखा
इस कष्ट उठाने का कोई मतलब है
या है केवल अत्याचार किसी का

‘यह तो है ही’ शुभचिन्तक यों कहते हैं
‘अपमान, अकेलापन, फ़ाका, बीमारी’
क्यों है? और वह सब हम ही क्यों सहते हैं?

हम ही क्यों यह तकलीफ़ उठाते जायें
दुख देनेवाले दुख दें और हमारे
उस दुख के गौरव की कविताएं गाएं!

यह है अभिजात तरीक़े की मक्कारी
इसमें सब दुख हैं, केवल यही नहीं हैं
– अपमान, अकेलापन, फ़ाका, बीमारी

जो हैं, वे भी हो जाया करते हैं कम
है ख़ास ढंग दुख से ऊपर उठने का
है ख़ास तरह की उनकी अपनी तिकड़म

जीवन उनके ख़ातिर है खाना-कपड़ा
वह मिल जाता है और उन्हें क्या चहिए
आख़िर फिर किसका रह जाता है झगड़ा

हम सहते हैं इसलिए कि हम सच्चे हैं
हम जो करते हैं वह ले जाते हैं वे
वे झूठे हैं लेकिन सबसे अच्छे हैं

पर नहीं, हमें भी राह दीख पड़ती है
चलने की पीड़ा कम होती जाती है
जैसे-जैसे वह कील और गड़ती है

हमने यह देखा दर्द बहुत भारी है
आवश्यक भी है, जीवन भी देता है
-यह नहीं कि उससे कुछ अपनी यारी है

हमने यह देखा अपनी सब इच्छाएं
रह ही जाती हैं थोड़ी बहुत अधूरी
-यह नहीं कि यह कहकर मन को समझाएं

– यह नहीं कि जो जैसा है वैसा ही हो
यह नहीं कि सब कुछ हंसते-हंसते ले लें
देनेवाले का मतलब कैसा ही हो

– यह नहीं कि हमको एक कष्ट है कोई
जो किसी तरह कम हो जाये, बस छुट्टी
कोई आकर कर दे अपनी दिलजोई

वह दर्द नहीं मेरे ही जीवन का है
वह दर्द नहीं है सिर्फ़ विरह की पीड़ा
वह दर्द ज़िन्दगी के उखड़ेपन का है

वह दर्द अगर ये आंखे नम कर जाये
करुण कर आप हमारे आंसू पोंछे
-वह प्यार कहीं यह दर्द न कम कर जाये

चिकने कपड़े, अच्छी औरत, ओहदा भी
फ़िलहाल सभी नाकाफ़ी बहलावे हैं
ये तो पा सकता है कोई शोहदा भी

जब ठौर नही मिलता है कोई दिल को
हम जो पाते हैं उस पर लुट जाते हैं
क्या यही पहुंचना होता है मंज़िल को?

हमको तो अपने हक़ सब मिलने चहिए
हम तो सारा का सारा लेंगे जीवन
‘कम से काम’ वाली बात न हमसे कहिए।

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