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रामधारी सिंह दिनकर की बाल कविता- 'चांद का कुर्ता'

रामधारी सिंह 'दिनकर' आजादी से पहले एक विद्रोही कवि तो स्वतन्त्रता के बाद 'राष्ट्रकवि' के नाम से जाने गए.

रामधारी सिंह 'दिनकर' आजादी से पहले एक विद्रोही कवि तो स्वतन्त्रता के बाद 'राष्ट्रकवि' के नाम से जाने गए.

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने ओज और श्रृंगार के साथ-साथ बाल कविताएं भी लिखी हैं. "चांद का कुर्ता" उनकी बहुत ही चर्चित बाल कविता है. यह कविता कई पाठ्यक्रमों में भी लगी हुई है. कविता में आसमान की यात्रा करता चांद अपनी मां से एक झिंगोला सिलवाने की बात कहता है क्योंकि खुले आसमान में उसे सर्दी लगती है. लेकिन मां की समस्या यह है कि वह अपने चांद को किस नाप का झिंगोला सिलवाए क्योंकि चांद का आकार तो रोजाना बदलता रहता है.

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  • News18Hindi
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हठ कर बैठा चांद एक दिन, माता से यह बोला,
‘सिलवा दो मां मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला।

सनसन चलती हवा रात भर, जाड़े से मरता हूं,
ठिठुर-ठिठुरकर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूं।

आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का,
न हो अगर तो ला दो कुर्ता ही कोई भाड़े का।’’

बच्चे की सुन बात कहा माता ने, ‘अरे सलोने!
कुशल करें भगवान, लगें मत तुझको जादू-टोने।

जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूं,
एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूं।

कभी एक अंगुल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा,
बड़ा किसी दिन हो जाता है, और किसी दिन छोटा।

घटता-बढ़ता रोज किसी दिन ऐसा भी करता है,
नहीं किसी की भी आंखों को दिखलाई पड़ता है।

अब तू ही ये बता, नाप तेरा किस रोज़ लिवाएं,
सी दें एक झिंगोला जो हर रोज बदन में आए?’

Tags: Hindi Literature, Hindi poetry, Hindi Writer, Literature

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