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Republic Day 2022: अलका सिन्हा की देशभक्ति कविता 'मेरा देश'

Republic Day 2022: अलका सिन्हा की देशभक्ति कविता 'मेरा देश'

कवि और कथाकार अलका सिन्हा की देश प्रेम से ओत-प्रोत कविताएं भी चर्चा में रही हैं.
(Image- @sudarsansand)

कवि और कथाकार अलका सिन्हा की देश प्रेम से ओत-प्रोत कविताएं भी चर्चा में रही हैं. (Image- @sudarsansand)

अलका सिन्हा हिंदी साहित्य की सशक्त हस्ताक्षर हैं. साहित्य की हर विधा में अलका सिन्हा की लेखनी चली है. कहानी हो या कविता, याफिर कोई संस्मरण अलका के शब्द सीधे दिल पर दस्तक देते हैं. देश-विदेशों में हिंदी साहित्य के प्रचार-प्रसार में जुटीं अलका सिन्हा ने देशप्रेम से ओतप्रोत कविता तथा कहानियां भी रची हैं.

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    मेरा देश

    पासपोर्ट के कागज पर लिखा हुआ
    नाम भर नहीं है मेरा देश
    कि जब चाहो लगाकर एक मोहर
    कर लो उसमें प्रवेश
    सीमा रेखाओं की भौगोलिक हदों में
    महदूद नहीं होता देश
    देश होता है
    जिसके भीतर रहती हूं मैं
    और
    मेरे भीतर रहता है देश।

    मैं खुश होती हूं, हंसती हूं
    तो मुस्काता है देश
    मैं पढ़ती हूं तो पढ़ता है देश
    मैं चढ़ती हूं सीढ़ियां, बढ़ती हूं आगे
    तो बढ़ता है देश।

    भावनाओं से खिलवाड़
    सिद्धांतों से समझौता
    झकझोरता है
    तोड़ता है मुझे
    मेरे देश को
    मेरी लाचारी, मेरी बीमारी
    बीमार कर देती है देश को
    बिवाई-सी फट जाती है उसके भीतर
    वह तड़पता है, छटपटाता है
    रुग्ण हो जाता है
    उसका विकास अवरुद्ध हो जाता है।

    पर अगर मैं रहती हूं दृढ़
    सहती हूं अंधड़-पानी
    तो वह भी चट्टान हो जाता है
    खुद पर इतराता है।

    मैंने कहा न —
    देश के भीतर रहती हूं मैं
    और
    मेरे भीतर रहता है देश।

    यह भी पढ़ें- वरिष्ठ पत्रकार जयंती रंगनाथन की कहानी ‘अजीब मानुस था वो’

    जब किसी की बदनजर
    मेरे देश पर पड़ती है
    तो सीने में
    खंजर सी गड़ती है
    खेतों में फसलों की जगह
    बंदूकें उग आती हैं
    सुखोई, राफेल-सी चक्कर लगाती हैं…
    भयंकर गर्जन, शिव नर्तन
    तांडव रचाता है
    और तब
    सीमा पर लड़ते सैनिक की आंखों में
    देश उतर आता है…
    क्योंकि देश में रहते हैं हम
    और हमारे भीतर रहता है देश।

    मेरे देश का रंग अनूठा है, निराला है
    यहां की मिट्टी में चंदन है
    खेतों में सोना
    भुजाओं में फड़कती हैं
    हिमालय की चोटियां
    पैरों में गहरा सागर लहराता है
    घर-घर में जलती हैं दीपशिखाएं
    आकाश को छूती हैं सुवासित हवाएं
    इसी मिट्टी, पानी, आकाश,
    अग्नि और वायु में
    धड़कता है मेरा देश
    इसी मिट्टी, पानी, आकाश,
    अग्नि और वायु से
    धड़कती हूं मैं
    इसीलिए कहती हूं —
    पासपोर्ट के कागज पर लिखा हुआ
    नाम भर नहीं है मेरा देश
    देश के भीतर रहती हूं मैं
    और मेरे भीतर रहता है देश।

    Hindi Author Alka Sinha

    Tags: Hindi Literature, Literature

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