Home /News /literature /

sudhanshu gupta story terahvan mahina hindi sahitya literature

सुधांशु गुप्त की कहानी 'तेरहवां महीना'


सुधांशु गुप्त की कहानियां अपनी-सी ही लगती हैं. लगता है उनकी कहानियां अपने बीच से ही पनपी हैं.

सुधांशु गुप्त की कहानियां अपनी-सी ही लगती हैं. लगता है उनकी कहानियां अपने बीच से ही पनपी हैं.

पिछले तीन दशकों से पत्रकारिता में सक्रिय रहने के बाद सुधांशु गुप्त अब पूरी तरह से स्वतंत्र लेखन में रमे हुए हैं. उनके चार कहानी संग्रह 'खाली कॉफी हाउस', 'उसके साथ चाय का आख़िरी कप', 'स्माइल प्लीज़' और 'तेरहवां महीना' प्रकाशित हो चुके हैं. रेडियो और टेलीविजन के लिए नियमित लेखन करते रहते हैं.

अधिक पढ़ें ...

सुधांशु गुप्त की कहानियां पाठकों को वास्तिकता के धरातल की सैर कराती हैं. ‘तेरहवां महीना’ पढ़ते हुए लगता है कि ऐसा घटनाक्रम लगभग हर निम्न मध्यवर्गीय लोगों के जीवन में जरूर आता है. अभावों से ग्रस्त जीवन में खुशी के पल खोजते एक नौजवान की भावनाओं और जीवन संघर्ष का बड़े ही सुंदर ढंग से वर्णन किया गया है.

सुधांशु गुप्त की कहानियों में पाठक को हर छोटी से छोटी चीज का भी इतनी सटीक विवरण मिलता है कि पाठक उसमें खो जाता है. यह विवरण पाठक को यथार्थ तक ले जाता है. आदमी के मन में और आसपास की दुनिया में क्या घट रहा है, सुधांशु इसका इस्तेमाल करना बखूबी जानते हैं. कुछ ऐसे ही अनुभव समेटे हुए हैं उनकी कहानी ‘तेरहवां महीना‘-

साल में बारह महीने होते थे, कोई भी महीना सुखों का और प्रेम का नहीं था. सुख और प्रेम क्या हैं, यह वह जानता ही नहीं था. लोगों से सुनता और आसपास देखता, उन लोगों को जो सुखी हैं या प्रेम में हैं. उसे लगता कि ये लोग कुछ अलग प्रजाति के हैं. वह इस प्रजाति का नहीं है. लेकिन धीरे-धीरे उसे लगने लगा कि सुख और प्रेम का कोई अलग महीना होता है. वह महीना उसके जीवन में नहीं था. उसे लगने लगा कि उसके जीवन में, साल में एक महीना कम है. उम्र बढ़ने के साथ-साथ यह अहसास और भी ज्यादा बढ़ता गया. अपनी किशोरावस्था और युवावस्था में उसे कभी ऐसा नहीं लगा था. लेकिन अब उसे भी लगने लगा है कि साल में एक महीना कम है. प्रेम का महीना. ऐसा क्यों है, उसे नहीं पता.

यह भी पढ़ें- मैथिलीशरण गुप्त की नहीं बल्की पंडित गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ की है ये प्रसिद्ध रचना

साल में अब भी बारह ही महीने होते हैं. कब कौन-सा महीना आया और कब चला इसका उसे कभी अहसास ही नहीं हुआ. उसके लिए ऋतुएं सिर्फ दो ही होती थीं. सर्दी और गर्मी. यह भी उसे इसलिए याद है कि गर्मियों में उन्हें एक ही कमरे में रहना होता था. दो कमरों के मकान में एक ही पंखा था. घर में लोग ज्यादा थे. इसलिए बच्चों की पूरी दोपहर ब्लॉक में ही बने जीने में गुज़रती.

एक ब्लॉक में 12 मकान थे. छह ऊपर, छह नीचे. ऊपर जाने के लिए सीढ़ियां थीं. यहीं बीच में कुछ जगह थी, जहां छाया होती थी. वहीं बैठकर बच्चे कभी शतंरज खेलते, कभी लूडो और कभी ताश खेलते. वह भी साथ में होता.

सर्दियों की जो तस्वीर उसके ज़हन में दर्ज थी, वह बताती थी, कैसे कम से कम रजाई में अधिक लोग सो सकते हैं. आज वह सोचता है तो उसे हंसी आती है. वह दो कुर्सियों को जोड़कर, एक स्टूल लगाकर उस पर सोया करता था. उसके हिस्से रजाई नहीं आती थी. वह कंबलों को जोड़कर उसे ओढ़ता था. कंबल छोटा था, जिससे उसके पैर नहीं ढंकते थे. लिहाजा कंबल के साथ उसने एक बोरी को सिल रखा था. इस तरह वह अपने पैरों को सर्दी से बचा पाता था. उनके जीवन में बस यही दो ऋतुएं थीं. इससे बाहर कुछ भी सोच पाना न संभव था और न ही इसकी कोई संभावना थी. अब सोचना पड़ता है.

आज 14 फरवरी है. वेलेंटाइन डे. सुबह ही उसकी एक युवा महिला मित्र ने फोन करके उसे ‘वेलेंटाइन विश’ किया था. महिला मित्र ने ही यह भी बताया था कि फरवरी का महीना प्रेम का महीना होता है. उम्र की आधी सदी देखने के बाद अब वह इतना तो जान ही गया था कि फरवरी का महीना प्रेम का महीना होता है. लेकिन प्रेम को जानने और समझने की उम्र निकल चुकी थी. फिर भी महिला मित्र की सलाह के अनुसार उसे यह खोज करनी थी कि क्या उसके जीवन में भी कभी यह महीना आया था. क्या सबके जीवन में प्रेम का महीना आता है!

यह भी पढ़ें- संस्मरण: इस साहस को जिंदा रखना, बहुत काम आएगा- कुंअर बेचैन

अगर उसके जीवन में भी यह महीना आया था तो वह इसे पहचान क्यों नहीं पाया. क्या इसलिए कि इस महीने का उससे कोई परिचय नहीं था. वह किसी अजनबी की तरह आया होगा. अजनबी की तरह गुजर गया होगा. यह भी संभव है कि उसने जो महीने देखे थे, उसमें इस माह की कोई गुंजाइश ही नहीं थी. लेकिन आज उसे उस तेरहवें महीने की तलाश करनी है. वह घर से बाहर निकल गया है.

सुबह का समय है. सूरज रोज ही तरह निकल रहा है. हवा में हल्की-सी ठंडक है. हवा शरीर को छू रही है लेकिन ठंड नहीं लग रही, बल्कि हवा अच्छी लग रही है. आसपास के पेड़-पौधे भी उसे हमेशा की तरह ही लगे. संभव है उन पर आज हरियाली कुछ ज्यादा हो. संभव है कुछ फूल भी खिले हों. लेकिन फूलों का उसका ज्ञान बहुत सीमित है. वह गुलाब, कमल, चंपा, चमेली, सूरजमुखी से ही वाकिफ था. लेकिन वह देखता है कि लोग आजकल नए-नए फूलों की बात करते हैं, बुरांश, डेफोडिल, कैक्टस, अमलतास, हरसिंगार, गुड़हल… और भी बहुत सारे फूलों का नाम लोग रूमानियत के साथ लेते हैं. इन लोगों के जीवन में प्रेम का महीना जरूर आया होगा. उसे ऐसे मौकों पर हमेशा चुप रहना पड़ता है.

उसने कहीं पढ़ा है कि वसंत ऋतु में पृथ्वी भी बहुत खूबसूरत हो जाती है. उसने पैरों के नीचे की पृथ्वी को देखा. वह बिल्कुल रोज जैसी ही थी. कहीं कोई सौंदर्य उसे दिखाई नहीं दिया. उसने सोचा शायद वह सौंदर्य को पहचान नहीं पाता या पहचानना ही नहीं सीख पाया. उसने गर्दन उठाकर आकाश की ओर देखा. उसमें भी उसे कोई अतिरिक्त रंग नहीं दिखाई दिया. सब स्थाई रंग ही थे. प्रेम का रंग कहीं नहीं था.

उसे याद आया कि हमारे देश में छह ऋतुएं होती हैं. इनमें से एक ऋतु है वसंत. फरवरी, मार्च और अप्रैल में आती है यह ऋतु. लेकिन वह उन कुछ लोगों में है जिनके जीवन में ऋतु परिवर्तन भी नहीं होता! वह यह भी जानता है कि वह अकेला ऐसा नहीं व्यक्ति नहीं हैं. लाखों-करोड़ों लोग ऐसे होंगे. वह भी इनमें से एक है!

यह भी पढ़ें- हिंदी अकादमी दिल्ली ‘बाल उत्सव 2022’ का रंगारंग समापन, आखिरी दिन ‘सिक्का बदल गया’ का मंचन

वसंत ऋतु को नीचे ही छोड़कर वह वापस लौट आया. एक कुर्सी पर बैठकर उसने दूसरी कुर्सी को सामने खींच लिया है और उस पर पैर रख लिए हैं. उसने आंखें बंद कर ली हैं. युवा मित्र की सलाह पर उसे प्रेम के महीने की तलाश करनी है. शायद उसके जीवन में भी यह महीना आया हो-तेरहवां महीना. उसे इस तेरहवें महीने की तलाश करनी है. शायद वह महीना आया ही हो.

उसे याद आया. पिता अक्सर कहा करते थे कि हमारे यहां (घर में) मई-जून के महीने बहुत कष्टकारी होते हैं. लेकिन वह बच्चों का दिल रखने के लिए ऐसा कहते होंगे. ताकि बच्चों की अन्य महीनों में कुछ अच्छा होने की उम्मीद जीवित रहे. मई के महीने से ही परिवार कष्ट उठाने के लिए तैयार हो जाता. कोई पिता से पूछ इसलिए नहीं पाता था, क्योंकि वह पहले ही यह बता चुके होते थे. शायद पिता परिवार को कष्ट सहने के लिए तैयार कर रहे थे. बच्चों को मजबूत बना रहे थे. बच्चे मजबूत बन रहे थे.

मई-जून बीत जाता. लेकिन अजीब बात यह थी कि घर में कुछ भी नया न होने के बावजूद कष्ट कुछ कम लगने लगे थे. इसी तरह दिन और महीने बीत रहे थे. कब वह इन महीनों को लांघ कर बड़ा हो गया पता ही नहीं चला. वह छोटी-मोटी नौकरी करने लगा. कभी टॉफी बनाने वाली फैक्टरी में, कभी ऑल पिन और यू क्लिप्स बनाने बनाने वाली फैक्टरी में. घर में थोड़ा बहुत पैसा आना शुरू हुआ तो घर के हालात भी कुछ बेहतर होने लगे. लेकिन ऋतुएं अब भी नहीं बदली थीं. साल में अब भी 12 ही महीने थे.

उसकी तन्ख्वाह 325 रुपए महीने हो गई थी. वह एक पत्रिका का दफ्तर था, लेकिन वह संपादकीय विभाग में नौकरी नहीं करता था. संपादकीय विभाग फर्स्ट फ्लोर पर था और बेसमेंट में अलग- अलग तरह के विभाग थे. एक तरफ बेंच पर बैठकर लड़कियां ‘इंडेक्स कार्ड’ को क्रम से लगाती रहती थीं. पहले ए से फिर बी से…फिर सी से….इसी तरह जेड तक. कुछ लोग लिफाफों पर टिकट चिपकाने का काम करते थे. वह एक अलग विभाग में था ‘स्टेनसिल्स डिपार्टमेंट’. यहां से पत्रिका अलग-अलग ग्राहकों को भेजी जाती थी. पत्रिका की ग्राहक संख्या बहुत ज्यादा थी. लिहाजा वह किसी धातु की प्लेट पर उन ग्राहकों के नाम मशीन के द्वारा लिखवाती थी, जिन्हें पत्रिका भेजी जानी है. वह स्टेंसिल्स की मशीन पर बैठता था. मशीन में उसकी सीट के सामने एक गोल स्टीयरिंग व्हील था, जिस पर एक सुई लगी थी. मशीन में स्टेंसिल लगाना पड़ता और सुई को ‘की बोर्ड’ पर जो अक्षर लिखना होता, वहां तक लाना पड़ता. इसके बाद सिलाई मशीन की तरह पैरों के पास एक चौकोर-सा टुकड़ा लगा रहता. उस पर पैरों का दबाव पड़ते ही स्टेंसिल पर वह अक्षर अंकित हो जाता. वह दिन भर यही काम करता. उन लोगों के पते लिखता, जिन्हें पत्रिका भेजी जानी है. लोगों के घर पत्रिका पहुंचती और उसके घर तन्ख्वाह. सुबह 9 बजे से 6बजे तक ड्यूटी होती. सामने बैठी लड़कियों से बात करने का समय उसे कभी नहीं मिला. समय कब बीत जाता उसे पता ही नहीं चलता. पूरा दिन इसी तरह गुजर जाता.

यह भी पढ़ें- गिरिजाकुमार माथुर की कविता ‘दो पाटों की दुनिया, चारों तरफ शोर है’

उसने सामने की दीवार पर लगी घड़ी देखी. छह बज रहे हैं. उसने देखा, सामने बैठी लड़कियां सामान समेट रही हैं. उसने भी मशीन को ऑफ कर दिया है. 8 घंटे की नौकरी के बाद तुरंत घर भागने का मन करता है. घर! सब लोग खरामा-खरामा बाहर की तरफ निकलने लगे हैं. वह भी बाहर की तरफ चल दिया. बेसमेंट से ऊपर ग्राउंड फ्लोर पर जाने के लिए कुछ सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं. सब एकसाथ सीढ़ियों पर चढ़ रहे हैं. लड़कियां भी साथ में ही हैं. सब एक दूसरे से टकरा रहे हैं. सबको बाहर निकलना है. बाहर एक लोहे का बड़ा-सा गेट लगा है. लेकिन कोई भी गेट से बाहर नहीं जा पाया. सबने देखा बाहर तेज बारिश हो रही है, हवा के साथ. अब क्या किया जाए. हवा और बारिश के बीच मानो मुकाबला चल रहा है. जिनके पास छतरियां हैं, वे एक-एक करके खिसकने लगे हैं. उसके पास छतरी नहीं है. उनके घर में भी कोई छतरी नहीं है. उसके लिए बारिश का मतलब ही भीगना है. वह भीड़ के एक तरफ किनारे पर खड़ा हो गया है.

सुबह मौसम ने बारिश के कोई संकेत नहीं दिए थे. अचानक ही इतनी तेज बारिश! अचानक आई बारिश का अपना सुख है. सब कुछ पूर्वनियोजित नहीं होना चाहिए. यही जीवन का रोमांच है. उसने बाहर की तरफ देखा. बारिश के साथ हवा भी तेज चल रही है. बारिश भीतर खड़े लोगों को भिगो रही है. लोग भीग रहे हैं. भीड़ धीरे-धीरे छंट रही थी. कुछ लोग गेट के बाहर खड़े रिक्शों पर बैठ कर निकल रहे हैं और कुछ पैदल ही बारिश में भीगने का लुत्फ उठाने के लिए. बाहर खड़ी रिक्शाएं खत्म हो चुकी हैं. अचानक उसकी नजर एक लड़की पर पड़ी. वह एक किनारे पर खड़ी है. बारिश उस पर भी पड़ रही है लेकिन वह मानो बारिश से बेखबर घर पहुंचना चाहती है. इंडेक्स डिपार्टमेंट में ही काम करती है. पता नहीं कहां रहती होगी, कैसे जाएगी. एक दो बार ही उससे बात हुई है.

एक दिन लंच के समय उसने ही पहल करते हुए पूछा था, तुम्हारा नाम क्या है? ‘नैन्सी’ उसने इतना संक्षिप्त जवाब दिया था कि आगे बातचीत की उसकी इच्छी बिल्कुल मर गई. वह धीरे-धीरे खिसकता हुआ नैन्सी के करीब पहुंच गया. उसने एक बार चारों तरफ देखा. कोई भी उसे नहीं देख रहा था. किसी को उसे देखने की फुर्सत नहीं थी. सब बारिश को देख रहे थे. देख रहे थे कि बारिश रुके तो वे निकलें. लेकिन बारिश रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी.

उसने बहुत धीमी आवाज में नैन्सी से कहां, कहां रहती हैं आप?
‘मौजपुर..’ पता नहीं उसने धीमी आवाज में बोला था या बारिश के शोर ने उसकी आवाज को धीमा कर दिया था.
‘बारिश तेज हो रही है, कैसे जाएंगी आप… ?’
‘वही सोच रही हूं…’
‘चलिए मैं आपको छोड़ देता हूं.’
‘आप कैसे छोड़ेंगे…’
‘आप आती कैसे हैं’
‘मौजपुर से शाहदरा का रिक्शा और फिर शाहदरा से ऑफिस तक, रिक्शा पर…’
‘मैं भी इसी तरह छोड़ूंगा…’
‘लेकिन रिक्शा तो कोई दिखाई ही नहीं दे रहा..बाहर जितने खड़े थे सब चले गए हैं…’
‘कोई नहीं, आगे मिल जाएगा…’

उसने कुछ नहीं कहा, वह बारिश में खुले आकाश के नीचे उतर गई. दोनों पैदल चलने लगेॉ. बारिश की वजह से अंधेरा भी वक्त से पहले आ गया था. उसने पीछे मुड़कर देखा कोई रिक्शा नहीं दिखाई दिया. उसके मन में आया कि क्यों न पैदल ही चला जाए. पैदल चलना उसे हमेशा से पसंद रहा है. अगर बारिश हो और साथ में कोई लड़की हो तो उससे खूब सारी बातें हो सकती हैं. बस इतना ही. उसे इस बात की भी खुशी हुई कि रिक्शा नहीं मिली. रिक्शा मिल जाती तो व्यर्थ ही दो-चार रुपए का खर्चा हो जाता. आटा 1 रुपए 55 पैसे किलो आता है. तीन किलो आटे में तीन दिन का घर चल सकता है. पैदल ही ठीक है.

‘आप कहां रहते हैं…’
‘मैं पास ही रहता हूं. मेरी चिंता न करें..’
‘मेरी वजह से आप भी भीग जाएंगे…’
‘भीगना कभी बुरा नहीं होता और किसी की वजह से भीगना तो बिल्कुल नहीं…’

उसने कुछ नहीं कहा. नैन्सी के चेहरे को देखने की कोशिश की. वह सांवली है, लेकिन उसके चेहरे पर आकर्षण है. वह चाहता था कुछ देर इसी तरह उसका चेहरा देखता रहे. लेकिन चलते हुए साथ वाले का चेहरा देखना मुमकिन नहीं होता. उसने नजरें नैन्सी के चेहरे से हटा लीं.

दोनों फिर चलने लगे. बारिश अब भी उसी रफ्तार से पड़ रही है. सामने कोई रिक्शा वाला नहीं है. पीछे से भी कोई रिक्शा वाला आता दिखाई नहीं दे रहा. जीटी रोड एकदम ग्रामीण सड़क लग रही थी. एक बार उसके मन में आया कि रिक्शा मिल जाता तो अच्छा था, वह जल्दी अपने घर पहुंच जाती. रिक्शा में बैठकर वे बातें भी कर सकते थे. दोनों एक दूसरे के करीब बैठ सकते थे. लेकिन पैदल चलना भी उसे बुरा नहीं लग रहा था.

बातचीत का कोई सिरा नहीं मिल रहा था. या संभव है बारिश ही बातचीत में बाधा पैदा कर रही हो. या यह भी हो सकता है कि बातचीत के लिए उसके पास कुछ हो ही ना. फिर भी बारिश में नैन्सी के साथ भीगना अच्छा लग रहा था. वह बारिश में बहुत भीगा था लेकिन बारिश इतनी अच्छी उसे पहले कभी नहीं लगी थी. वह डरी सहमी-सी चुपचाप चल रही थी. पता नहीं बारिश से डरी हुई थी, घर न पहुंच पाने से या किसी अजनबी के साथ घर जाने से. वह लगातार मुड़-मुड़कर किसी रिक्शे के आने की राह देख रही थी. अच्छी बात यह थी कि उसे भी कोई रिक्शा दिखाई नहीं दिया. मौजपुर यहां से पांच छह किलोमीटर दूर था. अगर कोई सवारी नहीं मिली तो पता नहीं कितनी देर लग जाएगीब. हो सकता है एक घंटा या उससे भी अधिक समय लग जाए. उसके अपने घरवाले भी उसके लिए परेशान हो रहे होंगे.

वह खुश था कि वह नैन्सी के साथ चल रहा है. उसने एक बार फिर नैन्सी को देखा. बारिश में उसके कपड़े पूरी तरह भीग चुके थे. बाल भी गीले थे. उसने सलवार कमीज पहना हुआ था. रंग उसे दिखाई नहीं पड़ रहा था. कपड़े उसके शरीर के साथ खेल रहे थे. उसे ऐसा ही लगा.

वह उसके दायीं तरफ चल रही थी. पीछे से कोई न कोई वाहन आ रहा था. वह नहीं चाहता था कि कोई वाहन नैन्सी के पास से गुजरे और उसके ऊपर छींटें फेंकता हुआ जाए. अचानक एक स्कूटर उनके पास से गुजरा. लड़का स्कूटर धीमी रफ्तार से चला रहा था. पीछे एक जवान लड़की बैठी हुई थी. लड़की शायद बारिश से बचने के लिए लड़के के साथ चिपकी हुई थी. चिपकने की और क्या वजह हो सकती है? स्कूटर ने जाते हुए उन पर कुछ छींटें बिखेरीं. अचानक उसे लगा कि उसके हाथ किसी और चीज से छू रहे हैं. उसने देखा. नैन्सी का हाथ उसके हाथ से छू रहा था. उसने अपने हाथ को उसके हाथ से दूर किया. नैन्सी को अपने बायीं तरफ कर लिया. वह सहज रूप से उसकी बायीं तरफ चलने लगी.

अंधेरा बारिश और हवा को पराजित करते हुए अपनी जगह बना चुका था. वे दोनों चलते रहे. नैन्सी कुछ बोल नहीं रही थी और उसे यह समझ नहीं आ रहा था कि क्या बोले. उसे नहीं पता था कि बारिश में भीगते एक लड़के को अपने साथ चल रही लड़की से क्या बोलना चाहिए। दोनों बस चल रहे थे. एकसाथ…अलग-अलग. बोलना कुछ जरूरी भी नहीं होता. उसने अचानक अपनी चलने की रफ्तार तेज कर दी. नैन्सी पीछे रह गई. उसने उसके साथ बने रहने के लिए कोई प्रयास नहीं किया. वह उससे कुछ दूरी पर चलती रही. नैन्सी ने उसे धीरे चलने के लिए भी नहीं कहा. उसने स्वयं ही अपनी चाल धीमी कर दी और नैन्सी के करीब पहुंच गया.

यह भी पढ़ें- कन्हैयालाल नंदन- ‘नदी की कहानी कभी फिर सुनाना, मैं प्यासा हूं दो घूंट पानी पिलाना’

कहीं से कोई रिक्शा नहीं आया और वे पैदल चलते हुए शाहदरा पहुंच गये थे. वहां भी कोई रिक्शा नहीं मिली. वे चलते रहे…चलते रहे. मौजपुर अभी भी डेढ़ किलोमीटर दूर था. खुशी बस इस बात की थी कि उसने साथ चलने से मना नहीं किया था. एक बार फिर से उसने नैन्सी की तरफ देखा. उसका दुपट्टा बारिश में भीग कर उसके शरीर के साथ मिल चुका था. उसे अलग से खोज पाना मुश्किल था. लेकिन उसे खोजने की जरूरत क्या थी. इस समय तो यह भी ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था कि उसने किस रंग का सूट पहना हुआ है. आसमान में कोई बिजली भी नहीं चमक रही थी. कम से कम उसके कपड़ों के रंगों पर तो नजर जाती. लेकिन कोई नहीं, रंग देखने से बेहतर था कि वे दोनों साथ थे. इस साथ का भी कोई अपना रंग होता हो शायद. यह साथ अब ऑफिस में भी उससे बातचीत के दरवाजे खोल रहा था. यह भी संभव है कि अब वह भी सहज रूप से बात कर पाए. लेकिन ऑफिस में तो बात करना संभव ही नहीं हो पाता. लेकिन बारिश में इस लंबी मुलाकात के बाद बात करने का कोई न कोई अवसर तो मिलेगा ही. क्या पता? फिर उससे मिलने की फुर्सत भी कहां होगी. सुबह 9 बजे से छह बजे तक ड्यूटी. फिर घर. क्या पता फिर से किसी दिन इसी तरह बारिश ही आ जाए. बारिश इस तरह मन के अनुसार कहां होती है! लेकिन इस तरह चुपचाप चलने से भी क्या फायदा. पता नहीं कितनी देर वे दोनों इसी तरह चलते रहे. दोनों के बीच अबोले की वजह शायद ये थी कि दोनों ही इस छोटे से साथ से खुश थे. कुछ भी बोलकर वे इस साथ में कोई बाधा नहीं पहुंचाना चाहते थे. शायद ऐसा ही हो. उसने देखा कि अचानक नैन्सी की चाल में उत्साह आ गया है. पता नहीं क्यों?

‘बस इसी गली में मेरा घर हैं, अब आप भी वापस लौट जाइये…’ नैन्सी ने कहा.
वह एक पल इसी तरह खड़ा रहा. उसे देखता रहा. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि सफर खत्म हो गया है. वह शायद यह सोच रहा था कि नैन्सी चाय के लिए तो अवश्य पूछेगी. लेकिन उसने नहीं पूछा. उसने भी कुछ नहीं कहा.
‘ध्यान से जाना, वैसे बारिश अब कम हो गई है,’ नैन्सी ने फिर कहा.
उसने कुछ नहीं कहा. वह मुड़ा और उसी रास्ते से लौटने लगा, जिस रास्ते आया था.
बारिश रुक चुकी थी.
वह घर आ गया.

उसने आंखों खोलीं. वह कुर्सी पर बैठा है. सामने वाली कुर्सी से पैर उतार कर जमीन पर रखे हैं. उसने पाया कि उसमें एक उत्साह पैदा हो गया है. उसने अपने भीतर झांका तो लगा कि वह संतुष्ट है. यह संतुष्टि तेरहवें महीने को खोज लेने की है. उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कराहट भी न जाने कहां आ गई है. अब वह अपनी युवा मित्र को बता सकेगा कि उसके जीवन में भी प्रेम का महीना आया था. लेकिन वह उसे पहचान नहीं पाया! फिर भी वह खुश है. आखिर उसने अपनी जीवन के तेरहवें महीने को पहचान लिया था!

Tags: Hindi Literature, Hindi Writer, Literature

विज्ञापन

राशिभविष्य

मेष

वृषभ

मिथुन

कर्क

सिंह

कन्या

तुला

वृश्चिक

धनु

मकर

कुंभ

मीन

प्रश्न पूछ सकते हैं या अपनी कुंडली बनवा सकते हैं ।
और भी पढ़ें
विज्ञापन

टॉप स्टोरीज

अधिक पढ़ें

अगली ख़बर