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सुरेश ऋतुपर्णा की कविताएं 'सपनों का कोई इतिहास नहीं, पसीनों का कोई दस्तावेज नहीं'

सुरेश ऋतुपर्णा प्रवासी भारतीय समाज के महासचिव तथा विश्व हिंदी न्यास के अंतरराष्ट्रीय समन्वयक हैं.

सुरेश ऋतुपर्णा प्रवासी भारतीय समाज के महासचिव तथा विश्व हिंदी न्यास के अंतरराष्ट्रीय समन्वयक हैं.

विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए सुरेश ऋतुपर्णा को 'ट्रिनीडाड हिंदी भूषण सम्मान' तथा 'हिंदी निधि सम्मान' से सम्मानित किया जा चुका है.

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    विदेशों में हिंदी की पताका लहरा रहे डॉ. सुरेश ऋतुपर्णा (Suresh Rituparna) के दो कविता संग्रह सहित कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. आप प्रवासी भारतीय समाज के महासचिव तथा विश्व हिंदी न्यास के अंतरराष्ट्रीय समन्वयक हैं.

    डॉ. ऋतुपर्णा हिंदी साहित्य की त्रिमासिक पत्रिका ‘हिंदी जगत’ के संपादक भी हैं. आप के. के बिरला फाउंडेशन के निदेशक भी हैं. उनके कविता संग्रह ‘ये मेरे कामकाजी शब्द‘ से प्रस्तुत हैं कुछ चुनिंदा कविताएं-

    घर लौट रहे हैं बच्चे

    स्कूल जा रहे हैं बच्चे
    पोथियों की लादी लादे
    आंखों में नींद झपझपाते
    देर रात
    चुपके-चुपके देखी
    फिल्म की बातें
    बतियाते जा रहे हैं बच्चे।

    रिक्शों में लदे-फदे
    ढेर बस्ते लटकाये
    बस में लड़ते-झगड़ते
    ऊंघते-गाते जा रहे हैं बच्चे।

    बज न जाये पहली घंटी
    फटे जूतों की खैर मनाते
    डर से भागे जा रहे हैं बच्चे।

    प्रार्थना में प्रभु से
    विद्या की भीख मांग
    क्लास रूमों की ओर
    दौड़ रहे हैं बच्चे।

    टाट-पट्टी बिछाते
    डेस्कों पर धमाचौकड़ी मचाते
    ब्लैकबोर्ड पर कार्टून बना
    मास्साब की गैर हाजिरी में
    शोर मचा रहे हैं बच्चे।

    छीना-झपटी में
    अरे…अरे फटी किताब
    धक्का-मुक्की में
    देखो…देखो गिरी दवात
    कॉपी के पन्ने
    फाड़-फाड़
    कागज़ की नाव
    बना रहे हैं बच्चे।

    हाशियों पर दर्ज चेहरे

    ये हाशियों पर दर्ज चेहरे
    नहीं पराये
    मेरे अपने हैं

    आकाशगंगा से टूटे
    सितारे नहीं
    मेरे सपने हैं
    ये गुज़रे कल के बच्चे हैं।

    ये गुज़रे कल के बच्चे हैं
    जिन्होंने संवारा है हमारा आज
    बस के टायरों के साथ-साथ भागते
    बेचा है अख़बार

    उनके सपनों के धागों से
    बुनी गयीं हैं हमारी सुविधाएं

    हमारे जूतों के नीचे बिछा कालीन
    उनकी मासूम उंगलियों के खून की
    रंगत से रंगा है।

    उनके सपनों का कोई इतिहास नहीं
    उनके पसीनों का कोई दस्तावेज नहीं
    वे हाशियों में दर्ज चेहरे हैं
    ये गुजरे कल के बच्चे हैं

    नहीं पराये
    मेरे अपने हैं
    ये गुजरे कल के बच्चे हैं।

    Suresh Rituparna

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