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सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की कालजयी रचना 'राम की शक्ति पूजा'

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की कालजयी रचना 'राम की शक्ति पूजा'

सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' की कविता 'राम की शक्ति पूजा' हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर है.

सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' की कविता 'राम की शक्ति पूजा' हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर है.

'राम की शक्ति पूजा' (ram ki shakti puja) काव्य को निराला जी ने 23 अक्टूबर, 1936 में पूरा किया था. इलाहाबाद से प्रकाशित दैनिक समाचारपत्र 'भारत' में पहली बार उसी वर्ष 26 अक्टूबर को इस कविता का प्रकाशन हुआ था.

    Nirala Ki Shakti Puja: सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' (Suryakant Tripathi Nirala) को 'महाप्राण' भी कहा जाता है. उनकी कविता 'राम की शक्ति पूजा' हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर है. खड़ी बोली की इस लंबी कविता में रामायण की कथा बताई गई. इसमें खासकर राम और रावण के भीषण युद्ध का वर्णन है.

    'राम की शक्ति पूजा' (Ram ki Shakti Puja) काव्य को निराला जी ने 23 अक्टूबर 1936 में पूरा किया था. इलाहाबाद से प्रकाशित दैनिक समाचारपत्र 'भारत' में पहली बार 26 अक्टूबर 1936 को उसका प्रकाशन हुआ था.

    'राम की शक्ति पूजा' कविता 312 पंक्तियों की एक लम्बी कविता है. इसमें 'महाप्राण' के स्वरचित छंद 'शक्ति पूजा' का प्रयोग किया गया है. इस कविता में कवि ने राम को एक साधारण मानव के धरातल पर खड़ा किया है, जो थकता भी है, टूटता भी है और उसके मन में जय एवं पराजय का भीषण द्वन्द्व भी चलता है.

    'राम की शक्ति पूजा' की कुछ पंक्तियां-

    रवि हुआ अस्त, ज्योति के पत्र पर लिखा
    अमर रह गया राम-रावण का अपराजेय समर
    आज का तीक्ष्ण शरविधृतक्षिप्रकर, वेगप्रखर,
    शतशेल सम्वरणशील, नील नभगर्जित स्वर,
    प्रतिपल परिवर्तित व्यूह भेद कौशल समूह
    राक्षस विरुद्ध प्रत्यूह, क्रुद्ध कपि विषम हूह,
    विच्छुरित वह्नि राजीवनयन हतलक्ष्य बाण,
    लोहित लोचन रावण मदमोचन महीयान,
    राघव लाघव रावण वारणगत युग्म प्रहर,
    उद्धत लंकापति मर्दित कपि दलबल विस्तर,
    अनिमेष राम विश्वजिद्दिव्य शरभंग भाव,
    विद्धांगबद्ध कोदण्ड मुष्टि खर रुधिर स्राव,
    रावण प्रहार दुर्वार विकल वानर दलबल,
    मुर्छित सुग्रीवांगद भीषण गवाक्ष गय नल,
    वारित सौमित्र भल्लपति अगणित मल्ल रोध,
    गर्जित प्रलयाब्धि क्षुब्ध हनुमत् केवल प्रबोध,
    उद्गीरित वह्नि भीम पर्वत कपि चतुःप्रहर,
    जानकी भीरू उर आशा भर, रावण सम्वर
    लौटे युग दल, राक्षस पदतल पृथ्वी टलमल,
    बिंध महोल्लास से बार बार आकाश विकल
    वानर वाहिनी खिन्न, लख निज पति चरणचिह्न
    चल रही शिविर की ओर स्थविरदल ज्यों विभिन्न.

    'राम की शक्तिपूजा' (Ram Ki Shakti Pooja) की अन्तिम पंक्तियां में बताया गया है कि शक्ति की उपासना में लीन राम के सिर उठाते ही पूरा ब्रह्माण्ड कांप उठा और विद्युत् वेग से देवी का वहां पर अभ्युदय हुआ. उन्होंने तुरंत राम का हाथ थाम लिया. राम ने विथकित होकर देखा कि सामने मां दुर्गा अपने पूरे स्वरूप-श्रृंगार में भास्वर थीं. उन्होंने राम को आशीर्वाद दिया – ‘होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन!’ इतना कहकर देवी राम के ही मुख में लीन हो गईं.

    ये पंक्तियां इस प्रकार हैं-

    "साधु, साधु, साधक धीर, धर्म-धन धन्य राम!"
    कह, लिया भगवती ने राघव का हस्त थामज
    देखा राम ने, सामने श्री दुर्गा, भास्वर
    वामपद असुर स्कन्ध पर, रहा दक्षिण हरि पर
    ज्योतिर्मय रूप, हस्त दश विविध अस्त्र सज्जित,
    मन्द स्मित मुख, लख हुई विश्व की श्री लज्जित
    हैं दक्षिण में लक्ष्मी, सरस्वती वाम भाग,
    दक्षिण गणेश, कार्तिक बायें रणरंग राग,
    मस्तक पर शंकर! पदपद्मों पर श्रद्धाभर
    श्री राघव हुए प्रणत मन्द स्वरवन्दन कर

    “होगी जय, होगी जय, हे पुरूषोत्तम नवीन”
    कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन.

    अंतिम पंक्तियों से पहले की कविता में कवि (Kavi Nirala) ने मां दुर्गा की आराधना में भगवान राम द्वारा अपने नेत्र समर्पित करने की घटना को बड़े ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है-

    यह अन्तिम जप, ध्यान में देखते चरण युगल
    राम ने बढ़ाया कर लेने को नीलकमल
    कुछ लगा न हाथ, हुआ सहसा स्थिर मन चंचल,
    ध्यान की भूमि से उतरे, खोले पलक विमल
    देखा, वहां रिक्त स्थान, यह जप का पूर्ण समय,
    आसन छोड़ना असिद्धि, भर गये नयनद्वय,
    धिक् जीवन को जो पाता ही आया है विरोध,
    धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध
    जानकी! हाय उद्धार प्रिया का हो न सका,
    वह एक और मन रहा राम का जो न थका
    जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय,
    कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय.

    बुद्धि के दुर्ग पहुंचा विद्युतगति हतचेतन
    राम में जगी स्मृति हुए सजग पा भाव प्रमन
    "यह है उपाय", कह उठे राम ज्यों मन्द्रित घन
    "कहती थीं माता मुझको सदा राजीवनयन
    दो नील कमल हैं शेष अभी, यह पुरश्चरण
    पूरा करता हूं देकर मात एक नयन."
    कहकर देखा तूणीर ब्रह्मशर रहा झलक,
    ले लिया हस्त लक लक करता वह महाफलक
    ले अस्त्र वाम पर, दक्षिण कर दक्षिण लोचन
    ले अर्पित करने को उद्यत हो गये सुमन
    जिस क्षण बंध गया बेधने को दृग दृढ़ निश्चय,
    कांपा ब्रह्माण्ड, हुआ देवी का त्वरित उदय.undefined

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