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स्वाति शर्मा की कविता- 'सिनेमाघर'


स्वाति शर्मा के समकालीन भारतीय साहित्य, नया ज्ञानोदय, दैनिक भास्कर, लोकमत,  संडे नवजीवन जैसे पत्र-पत्रिकाओं में स्वाति की अंग्रेजी और हिंदी कविताएं और लेख प्रकाशित होते रहते हैं.

स्वाति शर्मा के समकालीन भारतीय साहित्य, नया ज्ञानोदय, दैनिक भास्कर, लोकमत, संडे नवजीवन जैसे पत्र-पत्रिकाओं में स्वाति की अंग्रेजी और हिंदी कविताएं और लेख प्रकाशित होते रहते हैं.

स्वाति शर्मा दिल्ली में कम्युनिकेशन्स कंसलटेंट हैं. उनका लेखन हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में है. वे जर्मन और फ़ारसी जैसी विदेशी भाषाएँ जानती हैं.

    सिनेमाघरों के बाहर
    होनी चाहिएं
    बौगनविलिआ के सभी रंगों की बेलें
    सफ़ेद, ग़ुलाबी, संतरी
    मधुमती से सनी दीवारें
    और होने चाहिएं
    मक़बरों के बाहर लगने वाले
    बूढ़े शहतूत के दरख़्त

    थियेटरों के बाहर
    खच्च- छप्प करते गिरते
    सेमल के फूलों से
    ज़मीन रंगी होनी चाहिए

    और पार्किंग के बाहर
    हरे चने छीलता बेचता
    आदमी बैठा होना चाहिए

    बॉक्स ऑफिस के बाहर
    प्रेमी जोड़ों की लाइन
    अलहदा होनी चाहिए

    यह भी पढ़ें- स्वाति शर्मा की कविता: अनंत के शोर-ओ-गुल में अनंत की शान्ति

    लॉबी की ज़मीन पर
    गुदे होने चाहिए
    नक्षत्रों के जटिल जाल

    फ़िल्म शुरू होने से पहले
    खड़ा कर हर एक हाथ में
    थमा देने चाहिए
    कॉम्प्लिमेंटरी पॉपकॉर्न के डब्बे

    और स्क्रीन पर शहर के
    सभी पुराने नीम के पेड़ों की
    तसवीरें चलनी चाहिएं

    सिनेमाघरों के बाहर
    मिलने चाहिए मुफ्त शब्दकोष
    होनी चाहिएं सभी रोक देने की कवायदें
    सारे थाम लेने के सामान
    पेट और मन भरने के सभी इंतज़ाम

    थिएटरों और मकबरों के बाहर
    होनी चाहिए एक अदद
    बैठ जाने की छाँव।

    Tags: Hindi Literature, Literature

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