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New Books: कविता, कहानी, इतिहास और नाटक से लबरेज राजकमल प्रकाशन की नई आमद

राजकमल प्रकाशन समूह से प्रकाशित नई पुस्तकों में इस बार साहित्य की तमाम विधाओं के रंग देखने को मिले हैं.

राजकमल प्रकाशन समूह से प्रकाशित नई पुस्तकों में इस बार साहित्य की तमाम विधाओं के रंग देखने को मिले हैं.

इस बार नई आमद में राजकमल प्रकाशन समूह से कहानी, कविता संग्रह और नाटक छपकर आए हैं. कुछ 8 पुस्तकों के सैट में पाठकों को इतिहास के पन्नों में झांकने का मौका मिलेगा तो कविता का अनूठा प्रयोग देखने को मिलेगा. ग़ज़लों के माध्यम से चार दशक की यात्रा पर जब पाठक निकलता है तो उसके सामने कई मोड़ पर दुनिया के बिगड़ने और बनने के नक्शे दिखलाई देते हैं.

राजकमल प्रकाशन समूह के नई किताबों के इस पुस्तकदस्ते में पाठक विमल चंद्र पांडेय का “मारण मंत्र” पढ़ने तो मिलेगा तो “एक जीवन अलग से” की मांग उठाती रूपम मिश्र से संवाद होगा. यहां शिवाजी के छत्रपति शिवाजी महाराज बनने की कहानी बताते हुए विश्वास पाटिल मिलेंगे तो “कछार कथा” कहते हुए हरीश चंद्र पांडे भी नजर आएंगे. कविताओं के माध्यम से बड़े रचनाकारों की कृतियों की समीक्षा करते हुए यतीश कुमार अलग ही रूप में खड़े हैं तो आदिवासियों का दर्ज बयां करता हुआ रवींद्र भारती का नाटक देखने को मिलेगा. देवी प्रसाद मिश्र सुना रहे हैं मनुष्य होने के संस्मरण तो रामकुमार कृषक की ग़ज़लों के माध्यम से 40 साल की यात्रा पर जाने का मौका मिलेगा.

पढ़िए तो आंख पाइए- रामकुमार कृषक
वरिष्ठ साहित्यकार रामकुमार कृषक ग़ज़ल संग्रह है ‘पढ़िए तो आंख पाइए’. हिंदी ग़ज़ल को उर्दू की परम्परा से अलग अपनी पहचान देने वालों में कृषक जी का विशिष्ठ स्थान है. हिंदी अकादमी दिल्ली द्वारा साहित्यिक कृति सम्मान सहित तमाम प्रतिष्ठित सम्मानों से अलंकृत रामकुमार कृषक के इस संग्रह में 1978 से अब तक की उनकी चुनिंदा ग़ज़लें संकलित हैं. ये रचनाएं न केवल रामकुमार कृषक के रचनाकार के रूप में उनके विकास क्रम को ही नहीं दर्शातीं बल्कि इस समयावधि में हमारे सामाजिक-राजनीतिक इतिहास का भावनात्मक रोजनामचा प्रस्तुत करती हैं. इसकी बानगी यहां देखी जा सकती है-
अपने हर ज़ख्म की बेखौफ कहानी कहिए
जिनकी आवाज़ नहीं उनकी जुबानी कहिए।

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पिछले चार दशकों के दौरान आम आदमी ने जो कुछ झेला है कृषक ने उसे अपनी रचनाओं में अंकित किया है. रामकुमार कृषक की चार दशकों की ग़ज़लों का चयन किया है डॉ. जीवन सिंह ने.

पुस्तक: पढ़िए तो आंख पाइए
लेखक: रामकुमार कृषक
मूल्य: 250 रुपये

आविर्भाव- यतीश कुमार
‘अन्तरस की खुरचन’ के बाद यतीश कुमार का यह दूसरा काव्य संग्रह है. भारतीय रेलवे में प्रशासनिक अधिकारी यतीश कुमार कहानियां लिखते रहे हैं, उपन्यासों की दुनिया में भी चर्चित रहे हैं. ‘अन्तरस की खुरचन’ भी काफी चर्चित रहा है. हिंदी काव्य की दुनिया में ‘आविर्भाव’ यतीश कुमार का अनूठा प्रयोग है. असल में यह कुछ गद्यकारों की चर्चित कृतियों की काव्यात्मक समीक्षा है. यहां आपको सुरेंद्र शर्मा का ‘मुझे चांद चाहिए’ मिलेगा तो स्वदेश दीपक का ‘मैंने मांडू नहीं देखा’ भी देखने को मिलेगा, लेकिन एक अलग ही रूप में. फणीश्वर नाथ रेणु के ‘मैला आंचल’ से गुजरते हुए आपको ओमप्रकाश वाल्मिकी की ‘जूठन’ का स्वाद भी चखने को मिलेगा. इस संग्रह में 11 बड़े रचनाकारों के उपन्यासों पर लिखी गई कविताएं हैं, जिन्हें लेखक ने काव्यात्मक समीक्षा नाम दिया है.

ओमप्रकाश वाल्मिकी की ‘जूठन’ पर कविता रचते हुए यतीश कुमार लिखते हैं-
सवर्ण और अवर्ण के बीच
कोई पुल नहीं होता
भूतकाल से चली आ रही
थप्पड़ और गालियों की लड़ी होती है

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यतीश कुमार के इस प्रयोग पर कवि और पत्रकार देवी प्रसाद मिश्र लिखते हैं- हिंदी में किसी ने इस तरह का काम नहीं किया हो मैं नहीं जानता. यतीश कुमार ने जो काम इस फॉरमेट में किया है वह गहन और सूझ भरा है जो अपने दुस्साहस और संश्लिष्ट काव्यगत स्थापत्य के लिए अपनी विरल पहचान बनाएगा.

पुस्तक: आविर्भाव (कविता)
लेखक: यतीश कुमार
मूल्य: 299 रुपये

मनुष्य होने के संस्मरण- देवी प्रसाद मिश्र
हिंदवी के सलाहकार संपादक देवी प्रसाद मिश्र कवि हैं, कथाकार हैं, फिल्मकार और विचारक हैं. ‘मनुष्य होने के संस्मरण’ में छोटी-छोटी कहानियों के माध्यम से बड़ी बात कही गई है. दार्शनिक अंदाज में कही गई ये कथाएं आपको जातक कथा, पंचतंत्र, हितोपदेश या अरेबियन नाइट्स की दुनिया में ले जाएंगी. प्रयोगधर्मी युग में यह संकलन देवी प्रसाद मिश्र का एक अनोखा प्रयोग कह सकते हैं. इन्हें पढ़ते हुए ये कभी कहानी लगती हैं तो कभी कविता. कुछ रचनाएं तो दीवार पर लिखी इबारत लगती हैं. जैसे- “यह जादू तो है मेरे पास कि मैं तकलीफ को कविता में बदल देता हूं और सौभाग्य को खाक में.”

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पुस्तक: मनुष्य होने के संस्मरण
लेखक: देवी प्रसाद मिश्र
मूल्य: 250 रुपये

मारण मंत्र- विमल चन्द्र पाण्डेय
भारतीय ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार और मीरा स्मृति पुरस्कार से सम्मानित युवा कथाकार और फिल्मकार विमल चंद्र पांडेय का नए कहानी संग्रह ‘मारण मंत्र’ में कुल जमा 6 कहानियां हैं. ‘मारण मंत्र’, ‘केशव की दौलत और नीम वाला सर्प’ तथा ‘छूटना’ लंबी कहानियां हैं.

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‘ई इलाहाब्बाद है भइया’ जैसा चर्चित संस्मरण लिखने वाले विमल चंद्र पांडेय का यह चौथा कहानी संग्रह है. इससे पहले ‘डर’, ‘मस्तूलों के इर्द-गिर्द’ और ‘उत्तर प्रदेश की खिड़की’ कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. करियर की शुरूआत पत्रकारिता से की लेकिन पत्रकारिता के दलदल में फंसने से पहले ही त्यागपत्र देकर पूरी तरह से लेखन की दुनिया में कूद पड़े.

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प्रसिद्ध कहानीकार मनोज रूपड़ा ‘मारण मंत्र’ के बारे में लिखते हैं- विमल की कहानियों में गजब का आमादापन है, बेधड़क लड़कपन है, लेकिन इनके पात्र लम्पट नहीं हैं. ‘मारण मंत्र’ की मार्मिकता जितनी विध्वंसक है उतनी ही आत्मघाती भी.

पुस्तक: ‘मारण मंत्र’ (कहानी संग्रह)
लेखक: विमल चंद्र पांडेय
मूल्य: 199 रुपये

कछार कथा- हरीश चन्द्र पाण्डे
शमशेर सम्मान, केदार सम्मान और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान जैसे कई अलंकृतों से सम्मानित कवि हरीश चंद्र पांडे का नया काव्य संग्रह ‘कछार कथा’ 66 कविताओं का संग्रह है. इस संग्रह में हरीश ने जीवन के अनुभव को शब्द दिए हैं. इसमें प्रकृति, मानवीय संवेदना और नारी विमर्श को दर्शाया गया है. हरीश चंद पांडे की कविताएं साधारण बातों से शुरू होती हैं और पाठकों को गंभीर सवालों के बीच खड़ा कर देती हैं. जैसे-

मैं बहुत देर तक अपने कंधे के विकल्प ढूंढ़ता रहा
पर सारे विकल्पों के मुहाने पैसे पर ही जाकर गिरते थे।

हरीश चंद्र पांडे की कविताओं के बारे में प्रसिद्ध कवि अष्टभुजा शुक्ल लिखते हैं- ‘गले को ज्योति मिलना’ से लगायत ‘फूल को खिलते हुए सुनना’ जैसे तमाम प्रयोग हरीश चन्द्र पांडे के काव्य-संसार में पारम्परिक इन्द्रियबोध को धता बताकर सर्वथा नई तरह की अनुभूति का अहसास कराने में सक्षम हैं. आभासी दृश्यों के घटाटोप को भेदती हुई उनकी कविताएं उन अनगिन आवाजों को ठहरकर सुनने का प्रस्ताव करती हैं जिनमें एतराज़, चीत्कार, हंसी और ललकार के अनेक कंठ ध्वनित होते हैं और ‘हर आवाज़ चाहती है कि उसे ग़ौर से सुना जाए’. क्योंकि हमारी दुनिया ‘अंधेरे के टापू’ में तब्दील होती जा रही है और भयावह अंधेरे को बेकाबू हाथी के अक्स में ढालती जा रही है.

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हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताएं अपनी सौन्दर्यदृष्टि, प्रतिरोधी चेतना, भावाभिव्यक्ति और इन्द्रियबोध से कविता की तथाकथित मुख्यधारा से अलग उद्गम और सरणी निर्मित करती हैं. उनका प्रस्तावित नया संग्रह ‘कछार-कथा’ कोई मील का पत्थर नहीं बल्कि कवि के काव्य-परिसर को और आगे तक देखने का आमंत्रण है.

हरीश चंद्र पांडेय ने अपना यह कविता संग्रह प्रसिद्ध कथाकार शेखर जोशी को समर्पित किया है. उत्तराखंड के अल्मोड़ा में जन्मे हरीश चंद्र के काव्य संग्रह ‘कुछ भी मिथ्या नहीं है’, ‘एक बुरूंश कहीं खिलता है’, ‘भूमिकाएं खत्म नहीं होतीं’ और ‘असहमति’ चर्चित रहे हैं.

पुस्तक: कछार-कथा (काव्य संग्रह)
लेखक: हरीश चंद्र पांडे
मूल्य: 199 रुपये

महासम्राट झंझावात- विश्वास पाटिल 
शिवाजी महाराज के जीवन पर आधारित उपन्यास श्रृंखला का पहला खंड है. आईएएस अधिकारी और मराठी लेखक विश्वास पाटिल के इस उपन्यास का हिंदी में अनुवाद किया है पत्रकार, कहानीकार और फिल्म निर्देशक रवि बुले ने. मराठी में इस कृति की रिकॉर्ड बिक्री हुई है. कहा जाता है कि झंझावत की 5 महीने में 20 हजार से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं.

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इससे पहले ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर लिखे विश्वास पाटिल के उपन्यास ‘पानीपत’, ‘महानायक’, ‘सम्भाजी’ और ‘झाड़ाझड़ती’ काफी चर्चित रह चुके हैं. साहित्य में विशेष योगदान के लिए विश्वास पाटिल को इन्दिरा गोस्वामी राष्ट्रीय साहित्य पुरस्कार, साहित्य अकादेमी पुरस्कार और कोलकाता के भारतीय भाषा परिषद के साहित्य पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है.

वैसे तो छत्रपति शिवाजी तमाम देशी-विदेशी लेखकों ने खूब लिखा है. लेकिन महासम्राट में विश्वास पाटिल ने उन तथ्यों पर भी रौशनी डाली है जो अभी तक या तो गुमनाम थे या फिर जिनके बारे में बहुत कम जानकारी थी. इसमें आपको शिवाजी के पिताजी शाहजी राजे भोसले के जीवन के अनछुए पहलुओं के बारे में भी पढ़ने को मिलेगा.

पुस्तक: महासम्राट झंझावात
लेखक: विश्वास पाटिल
अनुवाद: रवि बुले
मूल्य: 399 रुपये

एक जीवन अलग से- रूपम मिश्र
रूपम मिश्र ने बहुत जल्द ही अपने लेखनी के माध्यम से समकालीन रचनाकारों में अपनी पहचान कायम की है. ‘एक जीवन अलग से’ रूपम का पहला कविता संग्रह है. स्त्री मुद्दों पर मुखर होकर लिखने वाली रूपम मिश्र के लेख और कविताएं नियमित रूप से तमाम पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं. उनकी कविताओं का कई भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है. ‘एक जीवन अलग से’ रूपम की 80 कविताओं का संग्रह है.

तुमने जब-जब कहा, “तुम बच्ची हो”
मैं सच में बच्ची बन गई
याद ही नहीं रहा कि मेरी कोई देह भी है
जो इतनी मादक है कि तुम्हें बेचैन कर रही है

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सरल शब्दों में “बेचैन” कर देने वाली रूपम मिश्र साधारण शब्दों में असाधारण बात कह जाती हैं. उनकी रचनाओं में स्त्री की वेदना है. रुदन इतना कि देह में कंपन कर जाता है.

पुस्तक: एक जीवन अलग से (कविता)
लेखक: रूपम मिश्र
मूल्य: 199 रुपये

हुलहुलिया- रवींद्र भारती
राजकमल प्रकाशन के बुक के बुके में एक नाटक भी है- रवीन्द्र भारती का हुलहुलिया. नाभिनाल और जगन्नाथ का घोड़ा जैसे चर्चित कविता संग्रहों के लेखक रवींद्र भारती नाटकों के लिए जाने जाते हैं. ‘हुलहुलिया’ उनका काफी चर्चित नाटक है. आदिवासी जनजातियों के बीच घूमते और उठते-बैठते रवींद्र ने उन्हीं के बीच से इस नाटक की पृष्ठभूमि तैयार की है.

इस देश में तमाम ऐसी जनजातियां हैं जिनके पास पहचान के नाम पर कोई भी सरकारी दस्तावेज नहीं है. ‘हुलहुलिया’ नाटक ऐसे ही लोगों की पीड़ा है, जिनके मन में हमेशा डर समाया रहता है कि कब उन्हें देश की नागरिकता से वंचित कर घुसपैठिया ना घोषित कर दिया जाए.

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‘हुलहुलिया’ में आदिवासी समाज का निश्चछल चरित्र है तो पूंजवादियों का कठोर धूर्तपन भी. नाटक के माध्यम से आधुनिक दुनिया को लेकर तीखी टिप्पणी की गई है- “शॉर्टकट के चक्कर में हम कबीली जिंदगी से निकलकर फिर कबीली जिंदगी में पहुंच गए हैं. भाग रहे हैं इस शहर से उस शहर- लगातार भाग रहे हैं.”

नाटक में नाम और पहचान को लेकर एक डर है द्वन्द्व है तो वहीं बेनामी के लिए संदेश भी- “दुनिया की अधिकांश जीवनदायिनी शक्तियां अपने नाम को छिपाकर हमें धन्य करती हैं. वे दुनिया में रहकर दुनियादारी से बाहर रहती हैं. वे किसी देश की नागरिक नहीं हैं, सबकी हैं.”

19 दृश्यों वाले इस नाटक में लगातार ऐसे दृश्य जीवंत हो उठते हैं जो मन को द्रवित कर जाते हैं. इसमें मिटाए जा रहे जंगल, छिनी जा रही जमीन, नदियों को निगलते बांध से रिसने वाला विस्थापितों का दर्द है.

पुस्तक: हुलहुलिया (नाटक)
लेखक: रवींद्र भारती
मूल्य: 199 रुपये

Tags: Books, Hindi Literature, Hindi Writer, Literature

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