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जन्मदिन विशेष: गांव, चोपाल, खेत, पनघट की भाषा है कवि चंद्रसिंह बिरकाली की रचनाएं

जन्मदिन विशेष: गांव, चोपाल, खेत, पनघट की भाषा है कवि चंद्रसिंह बिरकाली की रचनाएं

चंद्रसिंह बिरकाली (Poet Chandra Singh Birkali) को आधुनिक राजस्थानी साहित्य का अग्रदूत कहा जाता है.

चंद्रसिंह बिरकाली (Poet Chandra Singh Birkali) को आधुनिक राजस्थानी साहित्य का अग्रदूत कहा जाता है.

चंद्रसिंह बिरकाली की कालजयी रचनाएं 'बादळी' और 'लू' ने पूरे देश का ही नहीं बल्कि दुनिया का ध्यान राजस्थानी साहित्य की ओर आकर्षित किया. इन दोनों रचनाओं का अंग्रेजी समेत कई अन्य भाषाओं में भी अनुवाद हुआ है.

Chandra Singh Birkali Birthday: राजस्थानी साहित्य (Rajasthani Sahitya) को नई पहचान दिलाने वाले, बुलंदियों पर पहुंचाने वाले कवि चंद्रसिंह बिरकाली (Kavi Chandra Singh Birkali) का आज जन्मदिवस है. उनकी ‘बादळी’, डाफर और ‘लू’ काव्य रचनायें कालजयी हैं और इन रचनाओं ने पूरे देश का ध्यान राजस्थान (Rajasthan) की ओर आकर्षित करने का काम किया. बिरकाली का जन्म 24 अगस्त, 1912 को राजस्थान के जिले हनुमानगढ़ (Hanumangarh) की नोहर तहसील के बिरकाली गांव (Birkali Village) में हुआ था.

बिरकाली ने राजस्थान के गांवों, चोपाल, खेतों और पनघटों पर बोली जाने वाली मायड़ भाषा (मारवाड़ी- Marwadi) को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया और इसी भाषा में रचनाएं रचीं. मायड़ भाषा, राजस्थान के कुछ इलाकों की लोकभाषा है. बताते हैं कि चंद्रसिंह बिरकाली ने बचपन में ही कविता रचना शुरू कर दिया था. वे प्रकृति प्रेमी थे. इसलिए उनकी रचनाओं में कुदरत के विभिन्न रूपों का वर्णन पढ़ने और सुनने को मिलता है. बताते हैं कि बरकाली गांव में रेत के टीलों पर बैठकर कविता सुनाते थे.

चंद्रसिंह बिरकाली (Poet Chandra Singh Birkali) को आधुनिक राजस्थानी साहित्य का अग्रदूत कहा जाता है. उन्होंने महाकवि कालीदास के कई नाटकों का मारवाड़ी भाषा में अनुवाद किया था. वे वाल्मिकी रामायण का भी राजस्थानी भाषा में अनुवाद करना चाहते थे, और अपने गांव बिरकाली में राजस्थानी भाषा का एक शोध केंद्र खोलना चाहते थे, लेकिन उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हुई. 14 सितम्बर, 1992 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

उनकी कालजयी रचनाएं ‘बादळी’ और ‘लू’ ने पूरे देश का ही नहीं बल्कि दुनिया का ध्यान राजस्थानी साहित्य की ओर आकर्षित किया. इन दोनों रचनाओं का अंग्रेजी समेत कई अन्य भाषाओं में भी अनुवाद हुआ है. राजस्थान जैसे सूखे इलाके में बारिश का क्या महत्व हो सकता है और गर्मी में लू के थपड़ों का दर्द तो एक किसान और रेत में खड़े पेड़-पौधे ही अच्छी तरह समझ सकते हैं, इन बातों को बिरकाली ने ‘बादळी’ और ‘लू’ के माध्यम से बयां किया है.

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चंद्रसिंह बिरकाली को कुदरत से इतना लगाव था कि एक बार किसी ने उनसे पूछा कि वे अपना घर कहां और कैसा बनाना चाहेंगे. इस पर उनका जवाब था कि दो कमरे बादळी और आसमान में घर बनाया है.

बादली नामक काव्य रचना का प्रकाशन 1941 में हुआ था. इसमें 130 दोहे हैं. बादली में कवि ने बरसात से पहले मरूभूमि की स्थिति का वर्णन किया है. उनकी यह रचना इतनी प्रसिद्ध हुई कि काशी की नागरी प्रचारणी सभा ने बरकाली को रत्नाकर पुरस्कार देकर सम्मानित किया.

आप भी पढ़ें उनकी कालजयी रचना बादळी (बादली- Badali)

आठूं पोर उडिकतां , वीतै दिन ज्यूं मास !
दरसण दे अब बादळी, मुरधर नै मत तास !!

(आठों पहर इंतजार करते हुए दिन भी महीनों की तरह बीत रहे हैं. बादली, अब तो दर्शन दो. मरूधर को और अधिक दुख मत दो)

आस लगायां मरुधरा, देख रही दिन रात !
भागी आ तू बादळी, आई रुत बरसात !!

(मरूधरा तुम्हारी आशा लगाए दिन-रात देख रही है. बादली, तू दौड़ी चली आ. बारिश का मौसम आ गया है.)

कोरां कोरां धोरिया, डूंगा डूंगा डैर !
आव रमां ऐ बादळी, ले ले मुरधर ल्हैर !!

(बादली आओ. मरूधरा में लहरें ले ले कर आओ. कोरे-कोरे टीलों और गहरे-गहरे डैरों में रमण करो.)

ग्रीखम रुत दाझी धरा, कलप रही दिन रात !
मेह मिलावण बादळी, बरस बरस बरसात !!

(गरमी से धरती दिन रात कलप रही है. बारिश से मिलन कराने वाली बादली, बरसों और खूब बरसों,)

नहीं नदी नाला अठै, नहीं सरवर सरसाय !
एक आसरो बादळी, मरू सूकी मत जाय !!

(यहां ना तो नदीं-नाले हैं और ना ही कोई सरोवर सरसा रहे हैं. बादली एक तेरा ही आश्रय है. इसलिए मरूधरा में बरसे बिना मत चली जाना.)

खो मत जीवण बावळी, डूंगर खोहां जाय !
मिलण पुकारै मरुधरा, रम रम धोरां आय !!

(बादली, पर्वत-गुफाओं में जाकर मत खो जाना. तुमसे मिलने के लिए मरूधरा पुकार रही है. यहां आकर टीलों में रमण करो.)

नांव सुण्या सुख उपजे जिवडै हुऴस अपार !
रग रग नाचै कोड में, दे दरसण जिणवार !!

(तुम्हारा नाम सुनते ही सुख उपजता और प्राणों में हुलास होता है. जिस दिन बादली तू दर्शन देती है रग-रग नाच उठती है.)

आयी घणी उडीकतां, मुरधर कौड करै !
पान फूल सै सुकिया, कांई भेंट धरै !!

(बहुत इंतजार के बाद तू आई है, इसलिए मरूधरा चाव कर रही है. पर फूल-पत्ते सब सूख गए हैं, तुम्हें क्या भेंट दें.)

आयी आज अडिकता, झडिया पान ‘ र फूल !
सूकी डाल्यां तीणकला, मुरधर वारे समूल !!

(लंबा इंतजार करते हुए तू आई है. पर फूल-पत्ते सब झड़ चुके हैं. मरूधरा, सूखी डालियां-तिनके अपना सब न्यौछावर कर दे.)

आतां देख उतावली, हिवड़े हुयो हुलास !
सिर पर सूकी जावता, छुटी जीवण आस !!

(तुम्हें तेजी से आता देख मन में हुलास हुआ है, पर तुम्हें बिना बरसे जाता देख जीवन की आशा छूट रही है.)

सोनै सूरज उगियो, दिठी बादळीयां !
मुरधर लेवै वारणा, भर भर आंखडियां !!

सूरज किरण उतावली, मिलण धरा सूं आज !
बादळीयां रोक्याँ खड़ी, कुण जाणे किण काज !!

सूरज ढकियो बादल्यां, पडिया पडद अनेक !
तड़फे किरणा बापड़ी, छिकै न पड़दो एक !!

सूरजमुखी सै सुकिया, कंवल रह्या कुमालय !
राख्यो सुगणे सूरज नै, बादलीयां बिलमाय !!

छिनेक सूरज निखलियो, बिखरी बदलियाँ !

(कविता साभार- कविताकोश)

Tags: Books, राजस्थान

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