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मैथिली साहित्य की ज्ञान परम्परा समृद्ध, फिर भी युवा लेखकों के सामने चुनौतियां अनेक

मैथिली में सृजनात्मक साहित्य की एक सुदीर्घ परम्परा रही है, उसका एक व्यापक और उन्नत स्वरूप पूरी दुनिया के सामने है.

मैथिली में सृजनात्मक साहित्य की एक सुदीर्घ परम्परा रही है, उसका एक व्यापक और उन्नत स्वरूप पूरी दुनिया के सामने है.

युवा उपन्यासकार के सामने अभी भी यह चुनौती है की गद्य की प्राणवत्ता को बनाए रखते हुए अपने उपन्यास को गांव से बाहर निकालकर नगर, महानगर की तरफ यात्रा करवाना शेष है.

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    – पंकज कुमार
    Maithili Literature: साहित्य रहस्य का अनुसंधान है, ज्ञान प्राप्ति का सचेष्ट प्रयत्न है. मिथिला की ज्ञान परम्परा अत्यंत समृद्ध है इसलिए मैथिली साहित्य में भी पीढ़ी दर पीढ़ी नये साहित्यकारों का आगमन होता रहा है. ज्योतिरीश्वर, विद्यापति, यात्री, सुमन, मधुप के बाद ललित, राजकमल, मायानन्द, सोमदेव, धीरेंद्र का आगमन फिर अगली पीढ़ी में राजमोहन, प्रभास, जीवकांत, धूमकेतु, बलराम, गंगेश गुंजन आदि का आगमन और यह आगमन अविरल-अविराम चलता आ रहा है.

    इतिहास गवाह है कि जब-जब नये साहित्यकार आये हैं कुछ ना कुछ परिवर्तन होता आया है. स्वाभाविक है उसका विरोध भी मुखर रूप से होता आया है. यह भी एक परम्परा की तरह ही है.

    अगर मैथिली साहित्य में आधुनिक कविता की बात करें तो चन्दा झा को इसका श्रेय जाता है परंतु प्रगतिशील धारा और नई कविता की बात करें तो इसका श्रेय भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’ और रामकृष्ण झा ‘किसुन’ को जाता है. इसके बाद 1949 ई. में बैधनाथ मिश्र ‘यात्री’ जी का कविता संग्रह ‘चित्रा’ प्रकाशित हुआ था जो प्राचीन सामंती विचार-व्यवस्था से भिन्न एक सफल प्रयास कहा जा सकता है. इस संग्रह में पहली बार स्वतंत्रतापूर्वक मिथिला की मिट्टी, पानी, अशिक्षा, रीति-कुरीति, संकोच, शील और संस्कार का गंध वृक्ष रोपा गया.

    यहां से एक प्रगाढ़ता आयी और काव्य का स्वरुप बदल गया. समकालीन मैथिली कविता में युवा रचनाकार का आगमन आह्लादित करता रहा है. बाबा यात्री के बाद राजकमल चौधरी, सोमदेव, जीवकांत, धूमकेतु, गंगेश गुंजन, उदयचंद्र झा ‘विनोद’, केदार कानन, नारायण जी, देवशंकर नवीन, विद्यानन्द झा, अजीत आजाद, रमन कुमार सिंह, अरुणाभ सौरभ, नारायण झा, चंदन कुमार झा, मनोज शांडिल्य, मैथिल प्रशांत, प्रणव नार्मदेय, अंशुमान सत्यकेतु, बालमुकुंद, गुंजन श्री, विकास वत्सनाभ, शारदा झा, रोमिशा झा, राजीव रंजन झा, अनुराग मिश्र, सुमित मिश्र, उगना शंकर, अम्बिकेश मिश्र, नारायण जी मिश्र आदि कुछ ऐसे नाम हैं जिनके लेखन को सार्थकता का अभिप्राय समझा सकता है परन्तु अभी भी मैथिली कविता को जिस ऊंचाई पर पहुंचाने की आशंसा लिए हुए हम बैठे है उसके लिए अभी बहुत कार्य शेष है. और निस्संदेह इसकी जिम्मेवारी आज के युवा रचनाकारों पर ही है.

    मैथिली गद्य साहित्य में सर्वप्रथम निबन्ध और नाटक का जन्म हुआ था. चौदहवीं शताब्दी के आसपास यह अस्तित्व में आ गया था। जिसमें ज्योतिरीश्वर ठाकुर अग्रगण्य हैं. वैष्णव आंदोलन से अभिप्रेरित कीर्तनियां नाटक ने बिहार के पड़ोसी राज्य असम और पड़ोसी देश नेपाल के रंगमंच को भी अनुप्राणित किया है.

    मैथिली नाटक (Maithili Natak)
    आधुनिक मैथिली नाटक का आदिपुरुष कविवर जीवन झा (1848-1912) को माना जाता है. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद तन्त्रनाथ झा, पण्डित गोविंद झा, उत्तम लाल मंडल, महेन्द्र मलंगिया, उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’, कांचीनाथ झा ‘किरण’, सुधांशु शेखर चौधरी, अरविंद ‘अक्कू’, लल्लन प्रसाद ठाकुर, गंगेश गुंजन, विभूति आनन्द, कमल मोहन चुन्नू आदि ने अपना योगदान दिया है. परंतु उसके बाद फिर से नाटक लेखन लगभग ठप्प सा हो गया. आनन्द कुमार झा जैसे कुछेक नाटककार आगे आये हैं परन्तु समकालीन मैथिली नाट्य लेखन अभी भी अपने समय के लेखक का राह देख रहा है जो आज के वातावरण में उसकी महक को बिखेरने का काम करें.

    मैथिली उपन्यास (Maithili Novels)
    मैथिली में उपन्यास लेखन लगभग पिछले आठ दशक से चलता आ रहा है. 1907 ई. में जीवनाथ मिश्र रचित ‘मोहिनी-मोहन’ से उपन्यास की यात्रा शुरू हुई थी. उसके बाद जनार्दन झा ‘जनसीदन’, जीबछ मिश्र, रासबिहारी लाल दास, कांचीनाथ झा ‘किरण’, हरिमोहन झा, निरजा रेणु, मायानन्द मिश्र, धीरेंद्र, ललित सरीखे कई महत्वपूर्ण रचनाकारों ने अपना योगदान दिया.

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    मैथिली के उपन्यासकार पर फ्रायड जैसे मार्क्सवादी का गहरा प्रभाव पड़ा है. मनोविश्लेषण से उपन्यास के स्वरुप में एक परिवर्तन आया जिसका चित्रण राजकमल चौधरी, मायानन्द मिश्र, सुधांशु शेखर चौधरी आदि के उपन्यास में सहज रुप से मिलता है. मायानन्द मिश्र के ‘मंत्रपुत्र’, चन्द्र नारायण मिश्र का उपन्यास ‘बालादित्य’ एवं ‘वैशाखी पूर्णिमा’ की भाषा में स्थान, पात्र और समय का भी ध्यान रखा गया है जो महत्वपूर्ण है. उसी प्रकार मणिपद्म लिखित लोकगाथा से सम्बध्द उपन्यास में जो भाषा प्रयोग की गई है यह सर्वथा नई है.

    युवा उपन्यासकार के सामने अभी भी यह चुनौती है की गद्य की प्राणवत्ता को बनाए रखते हुए अपने उपन्यास को गांव से बाहर निकालकर नगर, महानगर की तरफ यात्रा करवाना शेष है. आज के आधुनिक जीवन की उदासीनता, जटिलता, समग्रता को दिखाने वाला उपन्यास को मैथिली साहित्य में लाने की जिम्मेवारी युवा कंधों पर ही है. यदा-कदा प्रयास भी किया जा रहा है जो आवश्यक है.

    मैथिली साहित्य में कथा का जन्म (Maithili Sahitya)
    कथा का जन्म भी मैथिली साहित्य में उपन्यास के समय में ही हुआ था. दोनों को आप जुड़वा समझ सकते हैं. कथा को मैथिली गद्य साहित्य की सबसे छोटी संतान माना जाता है. निबन्ध और नाटक पहले आ चुके थे.परन्तु अगर विकास की दृष्टिकोण से देखा जाये तो कथा की परिपक्वता कहीं इन सबसे अधिक है.

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    उन्नीसवी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में विद्यापति कृत ‘पुरुष-परीक्षा’ का गद्य-पद्यमय अनुवाद चन्दा झा के द्वारा किया गया. ‘पुरुष-परीक्षा’ को आधुनिक काल के मैथिली कथा लेखन का श्रीगणेश माना जा सकता है, परन्तु इसकी भाषा कृत्रिम है जो थोड़ा सा असहज करती है. चन्दा झा की इस भाषा से कथा लेखन प्रेरित-प्रभावित नहीं हुआ.

    निश्चित रूप से मैथिली में नवजागरण के साहित्यिक अभिव्यक्ति का सूत्रपात चन्दा झा ने किया परन्तु मात्र पद्य में, गद्य में नहीं. इसलिए मैथिली की प्रथम मौलिक कथा जनार्दन झा ‘जनसीदन’ रचित “ताराक वैधव्य” है. जो मिथिला मिहिर के दूसरे अंक में 1917 में प्रकाशित हुई थी.

    हरिनन्दन ठाकुर ‘सरोज’, वल्लभ झा, श्यामानन्द झा आदि की कथा में संस्कृत के शब्दों की बहुलता है जो पाठकीय दृष्टिकोण से थोड़ा सा असहज प्रतीत होती है. जब कुमार गंगानन्द सिंह, प्रबोध नारायण चौधरी, कांचीनाथ झा ‘किरण’, हरिमोहन झा, उपेंद्रनाथ झा जैसे कथाकार आये तो देशज शब्दों के प्रयोग के साथ वाक्य संरचना भी बदल गई.

    आधुनिक मैथिली कथा को एक दिशा मिली, जिसमें हरिमोहन झा का बहुमुल्य योगदान है. उनकी कथा के सम्बंध में कुलानन्द मिश्र ने लिखा है- मैथिली कथा जब अपनी भाषा, वस्तु बोध, शिल्प और समन्वित अभिव्यक्ति के लिए किसी राह बनाने वाले रचनाकार की प्रतीक्षा में थी तभी प्रो. हरिमोहन झा का अपनी क्रांतिकारी भाषा-दृष्टि के साथ मैथिली कथा के अव्यवस्थित क्षेत्र में प्रवेश हुआ था.

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    ‘प्रणम्य देवता’ और ‘रंगशाला’ की वाक-भंगिमा आज भी अन्यत्र दुर्लभ है. कथा-भाषा को सहज स्वाभाविक रूप से पाठकों के समक्ष रखा जाने लगा जिसका दर्शन बाद के कथाकार रमानन्द रेणु, विभूति आनन्द, विनोद बिहारी लाल, शैलेंद्र आनन्द, प्रदीप बिहारी, शिवशंकर श्रीनिवास, कथाकार अशोक आदि की कथाओं में मिलता है.

    रंगीन पर्दा (लिली रे), मुक्ति (ललित), शिवगंगा (उग्रानन्द), ‘खड़िकाक हिस्सक’ (इंद्रानन्द सिंह), ‘टिल्हाक धुकधुकी (जीवकांत), बोझ (राजमोहन झा), मिस लाल (वीरेंद्र मल्लिक) ये कुछ ऐसी कथा और कथाकार हैं जिन्होंने साहस का अद्भुत परिचय दिया है. ऐसे साहसी कथाकार की श्रेणी में अग्रगण्य हैं राजकमल चौधरी, जिन्होंने ‘एकटा चम्पाकली एकटा विषधर’ कथा संग्रह में बिल्कुल सही स्थान पर जाकर चोट की जिससे खलबली मच गई. समकालीन कथा में भी युवाओं कर सामने चुनौती है कि वो साहस दिखाए और समाज के सच को अपनी रचना में स्थान दें.

    आधुनिक स्त्री लेखन
    अगर मैथिली साहित्य में आधुनिक स्त्री लेखन की बात करें तो यहां भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. आदिकाल में भारती, लखिमा, विद्यापति की पुत्रवधु चन्द्रकला, पुत्री दुल्लहि आदि विदुषी की विधा-कला-कौशल में प्रवीणता सिद्ध हुई है. जो प्राचीन साहित्य में स्त्री के शिक्षित एवं साहित्यिक क्षेत्र में सहभागिता का संकेत देती हैं.

    लिली रे, गौरी मिश्र, शेफालिका वर्मा, इंदिरा झा, नीता झा, ज्योत्सना चंद्रम, नीरजा रेणु, अरुणा चौधरी, अभिलाषा झा, ये कुछ नाम हैं जिन्होंने मैथिली कथा साहित्य में अपना योगदान दिया है. उपन्यास में गौरी मिश्र, जयंती देवी, लिली रे, श्यामा झा, उषा किरण खान आदि ने अपना योगदान दिया है. ठीक उसी प्रकार कविता में राजलक्ष्मी, नन्दिनी देवी, शांति सुमन, शेफालिका वर्मा, इलारानी सिंह, वीणा कर्ण, वाणी मिश्र, सुष्मिता पाठक, ज्योत्सना चंद्रम, कमला चौधरी, निक्की प्रियदर्शिनी, कामिनी, बिभा कुमारी, शारदा झा, रोमिशा झा, सोनी नीलू झा आदि का महत्वपूर्ण योगदान है. यहां भी एक महत्वपूर्ण चुनौती लिंग चेतना का अभाव है. सन 2000 ई. से पूर्व स्त्री का स्तरीय लेखन अब उस रूप में सामने नहीं आ रहा है. निश्चित रूप से इस चुनौती को स्वीकार कर युवा लेखिका को लेखन कार्य करना होगा. सिर्फ सांस्कृतिक समायोजन ही नहीं प्रतिरोध के स्वर को मुखर करने की आवश्यकता है.

    युवा साहित्यकार की चुनौतियां
    युवा साहित्यकार के सामने आज जो चुनौतियां हैं उनकी बात करें तो बहुत सारे तथ्य हैं जिन पर सबका ध्यान आकृष्ट कराना जरूरी है. सर्वप्रथम यह महत्वपूर्ण है कि आधुनिक साहित्य में आज क्या लिखा जा रहा है? सृजन का ध्येय क्या है? लेखन कितना जनोपयोगी है? लेखक की पुस्तक में कितने ऐसे तथ्य समाहित हैं जिस पर विमर्श हो सके, जिस पर शोध किया जा सके.

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    मैं मानता हूं कि आज लिखने वाले लोग पहले की तुलना में अधिक हैं सिर्फ साहित्यिक पृष्ठभूमि से ही नहीं यद्यपि कई पेशेवर लोग भी नियमित लेखन कार्य को अंजाम दे रहें हैं. ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती है कि आगे कितना बढ़ रहा है हमारा साहित्य? हम अपने लेखन में ऐसी कितनी बातों को, तथ्यों को आम पाठक के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं जो आज तक ना हुई हों. क्या ऐसा सचमुच हो रहा है? अगर ध्यान से देखा जाय तो बिल्कुल नहीं. सिर्फ 25-30 प्रतिशत सार्थक लेखन हो रहा है जिस पर साहित्य संवर्द्धन का अस्तित्व टीका हुआ है.

    अब इसका कारण क्या है? मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं? मुझे बोलना चाहिए था कि नहीं सब कुछ ठीक है, बहुत अच्छा चल रहा है, मगर नहीं. जो चलना चाहिए वह “अध्ययन” नहीं चल रहा है. जब तक आज के युवा लेखक प्राचीन एवं आधुनिक साहित्य का समुचित अध्ययन नहीं करते हैं, वे इस बात से अनभिज्ञ ही रहेंगे कि कितना काम हुआ है और कितनी जिम्मेदारी उन पर है. क्योंकि बिना जिम्मेदारी का बोध हुए किसी भी कार्य की दिशा निश्चित नहीं की जा सकती है.

    दूसरी बात यह है कि विधा चुनाव की भी समस्या उनके सामने होती है. जब तक वे पढ़ेंगे नहीं यह समझना सम्भव नहीं है कि आपमें किस विधा पर कार्य करने की क्षमता है. बहुविधावादी बनने के चक्कर में कुछ सार्थक नहीं हो पाता है.

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    अब अगर आलोचना-समालोचना और समीक्षा की बात करें तो इसकी स्थिति भी ठीक-ठाक ही कही जा सकती है. इसकी एक स्वस्थ परम्परा होनी चाहिए जिससे साहित्य का स्तरीय विकास सम्भव हो सके. रचनाकार और आलोचक में घनिष्ठ सम्बंध होता है. कोई रचनाकार यदि आनन्दानुभूति की सामग्री को प्रस्तुत करता है तो आलोचक उस आनन्द को अनुभव करने की दृष्टि प्रदान करता है. इसलिए साहित्य की सर्वांगीण समृद्धि के लिए जितनी आवश्यकता सृजन की है ठीक उतना ही आवश्यक है उसकी समालोचना.

    मैथिली साहित्य में सृजनात्मक साहित्य की एक सुदीर्घ परम्परा रही है, उसका एक व्यापक और उन्नत स्वरूप पू दुनिया के सामने है. उसी प्रकार आलोचना में आचार्य रमानाथ झा, मोहन भारद्वाज, कुलानन्द मिश्र, हरेकृष्ण झा, तारानन्द वियोगी, शिवशंकर श्रीनिवास, कथाकार अशोक, रमेश, कमल मोहन चुन्नु, अरुणाभ सौरभ आदि कई विशिष्ट नाम हैं जिनका इस श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण योगदान है. परन्तु आज भी एक स्वस्थ समालोचना की आधुनिक परंपरा को स्थापित करने का काम शेष है, आज के युवा लेखक के सामने यह एक बड़ी चुनौती है.

    युवा रचनाशीलता के नाम पर छापी जा रही पुस्तकें भी कई बार प्रश्नों के घेरे में आ जाती हैं. ऐसी अराजकता वाली स्थिति में कुछ पुस्तकों को मील का पत्थर साबित किया जा रहा है जो निंदनीय है. आज सबसे दुःखद यह है कि लेखक का निर्धारण उसके लेखनी से नहीं वरन उसके पद और पोजिशन से किया जा रहा है. हालात यह है कि लेखक की प्रतिबद्धता भी लेखन और समाज, दोनों के प्रति लगभग शून्य होती दिख रही है. उनकी प्रतिबद्धता आज उन सभी चीजों के प्रति होती है जो उनके कमजोर लेखन को भी महान सिद्ध कर दें.

    आज का समय जो कई तरह की विसंगतियों और कुरीतियों से संघर्ष कर रहा है ऐसे में युवा लेखक के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती है कि स्वयं की सार्थकता सिद्ध करें. पूंजीवाद आज ऐसा नकेल कस चुका है जिससे एक गहरी खाई पैदा हो गई है और उसको पाटना इतना भी सहज नहीं है. दूसरी ओर गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, मानव मूल्यों का हनन ऐसी अराजक स्थिति में एक उम्मीद का दीपक साहित्य ही जला सकता है. जहां हर तरफ से मान मर्दन किया जा रहा हो वहां साहित्य व्यक्ति के लिए एक औषधि की तरह ही है. समाज के ऐसे सभी व्यक्तियों के पक्ष में खड़े रहकर न्यायोचित लेखन ही साहित्य का धर्म है. क्या आज का युवा लेखन ऐसा हो रहा है? जबाब है ‘नहीं’.

    मैथिली साहित्य में शोध
    आज अगर शोध की तरफ दृष्टि डालें तो यहां भी परिणाम कुछ ज्यादा संतोषजनक नहीं हैं. किसी भी विश्वविद्यालय के शोध प्रभाग की स्थिति देख स्वतः पता चल जायेगा कि कितना सार्थक कार्य हो रहा है.

    मैथिली में एक कहावत है “हल्लुक माटि बिलाड़ि कोरैत अछि” मतलब आसान काम सब लोगों को पसंद है. धड़ल्ले से शोधार्थी सिर्फ कथा-साहित्य पर शोध कर रहे हैं. कविता, आलोचना, भाषा-साहित्य इतिहास और इसके अतिरिक्त अन्य सम्यक मुद्दों पर शोध करना उनकी दृष्टि में छोटे स्तर का कार्य समझा जा रहा है. यहां सिर्फ एक ही कारण है, संश्लिष्ट विषयों पर कौन अपना दिमाग लगाए? कौन दिन-रात इन सब चीजों का विश्लेषण करे? जब आज हर जगह लोगों का काम दो-चार कवि, लेखक और उनके विचार को मानक रूप प्रदान कर हो ही जाता है तो क्यों बहुतेरे लेखक को पढ़कर उनका वास्तविक स्वरूप समझा जाये? कवि की दो पंक्तियों को पढ़कर उसकी व्याख्या कौन करे? जो ना लिखा गया हो उसको भी समझने की कोशिश कौन करे? इतना सब करने के बाद भी एक व्यक्तिगत राय कौन दे?

    जब आज रातोंरात स्टार बनने की होड़ लगी हो और मान-प्रतिष्ठा को ही सब कुछ समझा जाने लगा हो तो क्या किया जा सकता हैं? यह एक महत्वपूर्ण चुनौती है क्योंकि जब तक आज के युवा लेखक साकांक्ष नहीं होंगे तब तक नये युग की परिकल्पना असम्भव सा ही है.

    Maithili Literature

    (आलेख साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित ईस्टर्न रीजनल यंग राईटर्स मीट में पढ़ा जा चुका है)

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