शमीम हनफ़ी को पढ़ना शायरी को नयी आंखों से देखना है

शमीम हनफ़ी की किताब ‘हमसफ़रों के दरमियां’ को पढ़ते हुए शायरों के बारे में बहुत सी नयी जानकारियां मिलती हैं.

शमीम हनफ़ी ने ग़ालिब अकादमी, अंजुमन तारक़ी उर्दू , ग़ालिब इंस्टीट्यूट और रेख्ता जैसे कई भाषाई और सामाजिक संगठनों के साथ काम किया.

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    सुधांशु गुप्त

    कोरोना महामारी ने उर्दू के बड़े आलोचक और आधुनिक उर्दू के पुरोधा शमीम हनफ़ी (Shamim Hanafi) को हमसे दूर कर दिया. इसी साल मई की 6 तारीख को कोरोना से जूझते हुए 82 साल के हनीफ़ हमेशा के लिए इस दुनिया से रुख़सत हो गए. प्रोफेसर हनीफ़ का जन्म उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में 17 नवंबर, 1938 को हुआ था.

    प्रोफेसर शमीम हनफ़ी दिल्ली में रहते थे और उन्होंने ग़ालिब अकादमी, अंजुमन तारक़ी उर्दू , ग़ालिब इंस्टीट्यूट और रेख्ता जैसे कई भाषाई और सामाजिक संगठनों के साथ काम किया. उन्होंने चार नाटक लिखे, चार किताबों का अनुवाद किया और बच्चों की चार किताबें भी लिखीं.

    शमीम हनफ़ी (Shamim Hanafi) को पढ़ना शायरी (Shayari) को समझने की तमीज़ सीखना है. शमीम हनफ़ी को पढ़ना ग़ालिब से लेकर आधुनिक शायरों के जरिये समकालीन साहित्य और उनसे जुड़े समस्याओं को जानना-समझना है. शमीम हनफ़ी को पढ़ना परंपरागत और आधुनिक शायरी के बीच के फर्क को समझना है. शमीम हनफ़ी को पढ़ना आधुनिकता को नये अर्थ में समझना है. शमीम हनफ़ी को पढ़ना भारतीय संदर्भ में सौंदर्यशास्त्र को समझना है.

    हाल ही में प्रकाशित उनकी किताब ‘हमसफ़रों के दरमियां’ (Humsafar Ke Darmiyaan) को पढ़ते हुए शायरों के बारे में बहुत सी नयी जानकारियां मिलती हैं. साथ ही यह भी पता चलता है कि शायरी में आधुनिकता के क्या अर्थ हैं, किसे क्लासिक शायर माना जाए, इक़बाल को आधुनिक उर्दू नज़्म का आखिरी बड़ा शायर क्यों माना जाता है.

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    शमीम हनफ़ी सौन्दर्यशास्त्र और आधुनिकता को भी अलग ढंग से परिभाषित करते हैं. वह बेहद विनम्र शब्दों में कहते हैं, पारंपरिक प्रगतिवाद, आधुनिकतावाद और उत्तर आधुनिकतावाद में मेरा विश्वास बहुत कमजोर है. मैं समझता हूं कि हमारी अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परंपरा के संदर्भ में ही हमारे अपने प्रगतिवाद, आधुनिकतावाद और उत्तर-आधुनिकतावाद की रूपरेखा तैयार की जानी चाहिए. जिस तरह हमारा सौंदर्यशास्त्र अलग है, उसी तरह हमारी प्रोग्रेसिविज्म या ज़दीदियत या आधुनिकता भी अलग है. शमीम हनफ़ी ने इसी नज़रिये से आधुनिक युग के शायरों को समझने की कोशिश की है.

    Shamim Hanafi Books

    इस पुस्तक में शायरों का स्वभाव, चरित्र, चेतना और रूप रंग बेशक अलग अलग है, लेकिन शमीम साहब मानते हैं कि आधुनिकतावाद को इसी भिन्नता और बहुलता का प्रतीक होना चाहिए. उनका साफतौर पर मानना है कि आधुनिकतावाद से संबंधित विचारधारा किसी प्रत्यक्ष और सुसंगठित वैचारिक आंदोलन पर आधारित नहीं है. यह तो एक नया नज़रिया और एक नया अंदाज़ था अपने समय और इस समय में उलझती-सुलझती जिन्दगी का. पुस्तक में भी यह दिखाई पड़ता है कि फ़ैज़, राशिद, मीराजी और उनके बाद सामने आने वाले तमाम शायर एक दूसरे से इतने अलग दिखाई देते हैं. इनके चारों तरफ इतिहास और काल का एक ही दायरा है मगर इन सबकी अपनी अपनी दुनियायें हैं.

    ‘हमसफ़रों के दरमियां’ में शमीम हनफ़ी शायरों की इसी दुनिया को उद्घाटित करते हैं. इक़बाल को वह हाली और आज़ाद द्वारा कायम की गई रिवायत का शिखर बिन्दू मानते हैं. वह इक़बाल को उर्दू नज़्म का आखिरी बड़ा शायर मानते हैं. साथ ही वे उन्हें उर्दू की नयी नज़्म के पहले बड़े शायर के रूप में भी देखते हैं. लेकिन वह यह भी कहते हैं कि इक़बाल के सामने आने वाले तमाम अहम नज़्मगोइयों में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने इक़बाल की अज़मत का इक़रार सबसे ज्यादा खुले दिल से किया. उन्होंने इक़बाल से अपनी इरादत और अक़ीदत का इज़हार एक ऐसे दौर में किया जो तरक्कीपसंद के जज़्बाती उबाल और फिक्री इंतिहापसंदी का दौर कहा जाता है. यहां इक़बाल की शायरी के जो पहलू उजागर होते हैं उनमें कुछ बातें प्रमुख हैं. इक़बाल की शायरी की पहली ख़ूबी उनकी खुशनवायी है. उनकी शायरी में जज़्ब और कलन्दरी की एक फिज़ा समायी हुई है. इक़बाल की शायरी सिर्फ़ हमारे दिमाग से रिश्ता कायम नहीं करती, हमारे हवस पर भी वारिद होती है.

    शमीम हनफ़ी ने इस पुस्तक में अख्तरुल ईमान, सरदार जाफरी, फिराक गोरखपुरी, अमीक हनफ़ी, काज़ी सलीम, किश्वर नाहीद, कुमार पाशी, बलराज कोमल, मनमोहन तल्ख, अहमूद अयाज़, शहरयार, बाकर मेहदी और मुहम्मद अलवी जैसे शायर मौजूद हैं. इनकी शायरी का रुझान, रिवायत और आधुनिकता सब कुछ इस किताब में दर्ज है. इतना ही नहीं ख़ालिस शायरी को पसंद करने वालों को यह पुस्तक एक नया नज़रिया देती है.

    पुस्तक में शायरी के साथ साथ कई दिलचस्प किस्से भी हैं. लेकिन यह पुस्तक दिलचस्पियों के लिए या किस्सागोई के लिए नहीं है. यह एक नितांत गंभीर किताब है, जो शायरी की समझ और तमीज देती है. शमीम हनफ़ी ने पचास साठ साल के दौरान जो साठ सत्तर निबंध लिखे हैं, वही निबंध इस पुस्तक में दिए गए हैं. इसमें 19वीं और 20 वीं सदी के बहुत से शायरों पर शमीम हनफ़ी के आलोचनात्मक निबंध हैं, जिन्हें पढ़ना शायरी को नयी आंखों से देखना सिखाएगा.

    पुस्तकः हमसफ़रों के दरमियां
    लेखकः शमीम हनफ़ी
    उर्दू से लिप्यांतरः शुभम् मिश्र
    प्रकाशकः राजकमल प्रकाशन

    Sudhanshu Gupt

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