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Air force Day: मन आकाश में तैरता बादल सा सपना- अलका सिन्हा

रिष्ठ साहित्यकार अलका सिन्हा का हाल ही में प्रकाशित उपन्यास 'जी-मेल एक्सप्रेस' काफी चर्चित रहा है.

रिष्ठ साहित्यकार अलका सिन्हा का हाल ही में प्रकाशित उपन्यास 'जी-मेल एक्सप्रेस' काफी चर्चित रहा है.

हिंदी की प्रसिद्ध कवि और कथाकार अलका सिन्हा के कविता संग्रह 'काल की कोख से', 'मैं ही तो हूँ ये', 'मैं तेरी रोशनाई होना चाहती हूँ' साहित्य जगत की चर्चित कृति हैं.

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    Air force Day 2021: आज 8 अक्टूबर है. वर्षों बीत गए पर कुछ बातें सालों की गिनती से भुलाए नहीं जा सकतीं. वह साल होगा 1984-85 का, मैं तब कॉलेज में पढ़ती थी. मेरे कॉलेज के नोटिस बोर्ड पर लगी एक सूचना ने ध्यान आकर्षित किया जिसमें 8 अक्टूबर को होने वाले एअर शो के लिए कमेंटेटर का ऑडिशन किया जाना था. यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी. बड़ी इसलिए कि मुझे एंकरिंग करने का शौक तो था ही, उस पर से देश के लिए या फिर सैनिकों के लिए कुछ बोलना मेरे लिए सबसे बड़ा गौरव था.

    दो से चार बजे के बीच यह ऑडिशन होना था. दो बजे की क्लास के बाद मैं एअरफोर्स मुख्यालय के लिए निकल गई. उन दिनों ओला-ऊबर तो थे ही नहीं और ऑटो में चलने का रिवाज भी ना था. बसों में धक्के खाती मैं जब तक वहां पहुंची, लगभग पौने चार बज रहे थे. खैर, अभी चार बजने में समय था. मगर मैंने पाया कि मुझसे पहले ही दो और महारथी दरवाजे पर ही रोक दिए गए थे.

    “अभी चार कहां बजे हैं?” उनकी दलील थी.
    “ऑडिशन दो से चार के बीच था. आपको ऑडिशन देना था तो दो से पहले आना चाहिए था.” वे लोग अनुशासन के पक्के थे.
    “मैंने तो चार बजे तक पहुंचने के लिए अपनी एक क्लास भी छोड़ दी.” हताश स्वर में कहती हुई मैं भी उन दोनों की टीम में जा मिली.

    पता नहीं, उन्हें हम पर दया आ गई या क्या हुआ, ठीक से याद नहीं, पर उसने इंटरकॉम से अपने सीनियर से बात की. कुछ ही देर में एक वर्दीधारी फौजी आता दिखाई दिया. उसने हमारा पास बनवाया और हम तीनों को लेकर भीतर ले चला. पहली सीढ़ी पार कर ली थी. हम तीनों बहुत खुश थे. मुझे तो ऐसा लग रहा था जैसे मेरी फौज में भर्ती हो गई हो.

    हमें एक बड़े से हॉल में ले जाया गया जहां कुछ उम्मीदवार पहले से बैठे थे. सबके हाथ में कागज था जिससे देख कर वे अपनी कमेंटरी पढ़ रहे थे. मुझे कागज से पढ़ कर बोलना कभी भी पसंद नहीं था पर शायद वहां कागज देख कर ही बोलने का रिवाज था. संभवतः उन्हें पहले से कुछ ब्रीफिंग दी गई थी जिसके आधार पर उन लोगों ने अपनी स्क्रिप्ट तैयार कर रखी थी.

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    एक व्यक्ति जो स्क्रिप्ट नहीं लिख पाया था, उसका ऑडिशन लिए बिना उसे वापस भेज दिया गया. यह सब देख कर मैं बहुत आशंकित हो गई. मुश्किल से तो यहां तक पहुंची हूं, अब नई दलील देना और किसी तरह का प्रलाप करना मुझे जंचा नहीं. मैंने अब तक जो कुछ सुना था, उसी के आधार पर कुछ लिख लेने में अपनी भलाई समझी और बैग से एक कॉपी निकाल कर कुछ लिखने का मन बनाया मगर अभी मूड बना ही रही थी कि मेरा नाम पुकार लिया गया.

    इस वक्त कुछ भी कहना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा था. मैं लड़खड़ाते कदमों से उठी और पोडियम के पास जा कर खड़ी हो गई. कॉपी हाथ में देख कर किसी ने कोई आपत्ति नहीं की और मुझे बोलने का अवसर मिल गया. मैंने कॉपी खोल ली और जहन में जो विचार आ रहे थे, भरपूर आत्मविश्वास के साथ उसे शब्द देने लगी. मंच पर बोलने का अभ्यास मुझे स्कूल के जमाने से ही था.

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    कार्यक्रम की शुरुआत में बोली जाने वाली औपचारिक शैली में मैंने कुछ कहा. क्या-क्या कहा, इतना तो याद नहीं पर हां, दुष्यंत कुमार के इस शेर पर अपनी बात को विराम दिया कि “कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो.”

    मेरे धाराप्रवाह बोलने और स्पष्ट उच्चारण से वहां के अधिकारी प्रभावित हुए. उत्साह में भरकर उन्होंने मेरे हाथ से कापी ले ली और पलटने लगे. मगर वहां कुछ लिखा था ही नहीं. वो हैरानी से मेरी ओर देखने लगे. बना-बनाया खेल बिगड़ चुका था. मैं मन मसोस कर रह गई. अवसर मेरे हाथ आकर भी निकल चुका था.

    मुझे बताना पड़ा कि मैंने बिना स्क्रिप्ट ही ऑडिशन दिया था.
    “अरे, क्या खूब कमांड है अपने बोलने पर!” उन्होंने खुशी से ताली बजा दी.
    मैं दंग रह गई.
    “तो मैं बिना स्क्रिप्ट भी बोल सकती हूं?” मैं अविश्वास से पूछ रही थी.

    उन्होंने समझाया कि इस कार्यक्रम की बेसिक स्क्रिप्ट तो मुझे वहीं से मिलेगी जिसमें विमानों की क्षमता और विशेषताओं के बारे में जानकारी होगी. इसके अलावा पायलटों और उनकी शौर्यगाथाओं की जानकारी तो मुझे पढ़ कर ही बतानी होगी. उन्होंने बताया कि दो दिन बाद आकर, मैं यहीं से इसकी अप्रूव्ड स्क्रिप्ट ले जाऊं. मेरी खुशी देखने लायक थी.

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    मगर यहीं से कहानी ने यू टर्न ले लिया, जिस कारण से यह मेरी डायरी का कभी न भूलने वाला एक पन्ना बन कर स्मृतियों के संग्रहालय में दर्ज हो गया.
    “कहां जाओगे?” चलते हुए, एअरफोर्स के उसी अधिकारी ने मुझसे पूछा था.
    “आर के पुरम…” मैंने जवाब दिया.
    “आर के पुरम में कहां?”
    “सेक्टर आठ.”
    “सेक्टर वन तक तो मैं ही छोड़ दूंगा तुम्हें…” वे अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ गए. दिमाग तो बादलों की सवारी कर रहा था. सम्मोहित-सी मैं उनकी गाड़ी में जा बैठी. हम रास्ते भर बातें करते रहे. मैं देश और फौज के प्रति अपनी भावनाएं बताते हुए फूली नहीं समा रही थी. वे मुझसे मेरी पढ़ाई-लिखाई और मेरे परिवार के बारे में बात करते रहे. परिवार में कौन-कौन है, पापा कहां काम करते हैं, हम कितने भाई-बहन हैं… जैसे कई सवाल.

    “मेरा एक भतीजा है,” आखिर वे असल मुद्दे पर आए. उन्होंने बताया कि वो भी एअरफोर्स में है. उन्होंने उसका रैंक भी बताया था पर वह मुझे याद नहीं. उन्होंने कहा कि वह भी इस तरह की गतिविधियों में जुड़ा रहता है और शेर-ओ-शायरी का भी उसे बहुत शौक है.

    “तुम दोनों एक-दूसरे के लिए बहुत कम्पैटेबल रहोगे…” जैसे ही उन्होंने ऐसा कहा, मेरे तो होश फाख्ता हो गए. समझ न आया, कैसे रिएक्ट करूं, क्या कहूं… मुझे घर में काफी छूट दी गई थी और मैं एनसीसी में बाहर कैंप वगैरह भी कर के आई थी, मगर अपनी शादी की बात खुद से ही सुनना, खुद से ही कुछ कहना, इतने आधुनिक नहीं थे हम लोग. मैं तो शर्म से गड़ी जा रही थी. मेरे कान सुन्न हो चुके थे और घबराहट में मैं खिड़की से बाहर देखने लगी थी.

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    “अपने पापा का नंबर दो मुझे.” उनकी इस बात से तो मैं बिलकुल ही असहज हो गई थी. पापा का नंबर उन्हें देकर मैं अपने भविष्य को अवरुद्ध कैसे कर सकती थी. मैं बहुत कुछ करना चाहती थी जो शादी के बाद धरा ही रह जाता. शादी करना, फिलहाल मुझे कतई गवारा नहीं था.

    “आप गाड़ी चला रहे हैं, कैसे लिखेंगे? मैं उतरते समय दे दूंगी.” ऐसा कह कर कुछ देर की मोहलत हासिल की मैंने. अब दिमाग के घोड़े दौड़ रहे थे क्योंकि जल्दी ही मुझे उतरना था. मैं उन्हें और बातों में इस बात को भुला देना चाहती थी मगर अब उनसे बात करना सहज नहीं रह गया था मेरे लिए.

    अब सोचती हूं तो हंसी आती है कि उस वक्त मैं किस कदर घबरा गई थी. अरे, मुझे नहीं करनी अभी शादी, इतनी-सी बात साफ-साफ कही जा सकती थी मगर मेरी तो जबान तालु से जा चिपकी थी और दिमाग कितने करतब कर रहा था कि इस मुसीबत से किस प्रकार निपटा जाए.

    “सर, मेरे पापा सीक्रेट सर्विस में हैं और उनसे पूछे बिना उनका नंबर देना शायद ठीक नहीं होगा…” आखिर दिमाग ने काम किया और गाड़ी से उतरते समय मैंने उनसे क्षमा मांगते हुए कहा.

    “कोई बात नहीं,” उन्होंने कहा तो मेरी सांस में सांस आई मगर आगे उन्होंने जोड़ दिया, “ऐसा करो, आप मेरा नंबर उन्हें दे देना और मुझसे बात करने को कहना.”

    मैंने हामी भरी और बैग से कॉपी निकालने की जहमत उठाए बिना अपनी हथेली पर ही उनका नंबर लिख लिया. जल्दीबाजी में उनसे विदा ली और संगम सिनेमा वाली रोड की तरफ मुड़ गई. उनकी गाड़ी आंखों से ओझल होते ही मैंने हथेली पर लिखा उनका नंबर रगड़-रगड़ कर मिटा दिया. दो दिन बाद मुझे अपनी स्क्रिप्ट लेने उनके पास दोबारा जाना था. मारे डर के मैंने उस कार्यक्रम का ख्याल भी मन से निकाल दिया.

    आज इस बात को कितना अरसा गुजर चुका है. अब तक कितनी ही बार गणतंत्र दिवस की भव्य परेड का आंखों देखा हाल सुनाने का गौरव पाया है, फिर भी, अपनी बेवकूफी और नादानी के कारण जिस कमेंटरी को करने से वंचित रह गई वह सपना आज भी मन आकाश में बादल-सा तैरता रहता है…

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