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यात्राएं हमें महसूस करा देती हैं कि एक दुनिया के भीतर कई दुनिया हैं- अनुराधा बेनीवाल

‘लोग जो मुझमें रह गए’ अनुराधा बेनीवाल की दूसरी पुस्तक है.

‘लोग जो मुझमें रह गए’ अनुराधा बेनीवाल की दूसरी पुस्तक है.

अनुराधा बेनीवाल लन्दन में एक जानी-मानी शतरंज कोच हैं और रोहतक में लड़कियों के सर्वांगीण व्यक्तित्व-विकास के लिए ‘जियो बेटी’ नाम से एक स्वयंसेवी संस्था भी चला रही हैं. अनुराधा पहले एक घुमक्कड़ हैं, जिज्ञासु हैं, समाजों और देशों के विभाजनों के पार देखने में सक्षम एक संवेदनशील ‘सेल्फ़’ हैं, उसके बाद और इस सबको मिलाकर एक समर्थ लेखक हैं.

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नई दिल्ली: आजादी मेरा ब्रांड के बाद अनुराधा बेनीवाल की दूसरी कृति ‘लोग जो मुझमें रह गए’ बाजार में आ गया है. नई दिल्ली स्थित इंडिया हैबिटैट सेंटर में ‘लोग जो मुझमें रह गए’ का लोकार्पण किया गया. इस मौके पर लेखिका और यायावर अनुराधा बेनीवाल ने कहा कि यात्राएं आपको आज़ाद करती हैं. वे आदमी को उसकी बंधी-बंधाई जिंदगी के दायरों से बाहर नई अनदेखी अनजानी दुनिया से परिचित कराती हैं, जिससे आपकी दुनिया बड़ी होती है और आपका हौसला भी बढ़ता है. खुद पर भरोसा भी बढ़ता है.

अनुराधा ने कहा कि आजादी आदमी का जन्मसिद्ध अधिकार है. यह अपने आप और आसानी से मिलनी चाहिए. आजादी हासिल करने के लिए अगर जद्जोहद करनी पड़े तो यह अच्छी स्थिति नही कही जा सकती. लेकिन दुर्भाग्य से आजादी के लिए लोगों को काफी मेहनत करनी पड़ती है, जदोजहद करनी पड़ती है यह वास्तविकता है.

अनुराधा बेनीवाल ने कहा कि यात्राएं आपको हदों को पार कर नई हदों तक पहुंचाती हैं. आपके दायरे का विस्तार करती हैं. यात्रा का मतलब केवल एक जगह से दूसरी जगह जाना नही है. इसका मलतब उन लोगों, संस्कृतियों, रवायतों, मसलों को देखना–समझना और उनसे जुड़ना भी है, जिनसे आप अब तक अनजान हैं.

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हरियाणा के रोहतक जिले के खेड़ी महम गांव से निकलकर दुनिया की सैर करने वाली अनुराधा कहती हैं उन्होंने अपनी नई किताब में उन लोगों को खासतौर पर जगह दी है जिनसे अपनी यायावरी के दौरान वह मिलीं और जिनकी जिंदगी के अनदेखे-अनजाने पहलुओं ने उनके दिल-दिमाग पर गहरी छाप छोड़ी.

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अनुराधा ने कहा कि यात्राओं में हमेशा आपको लोग मिलते हैं. लोगों के साथ उनकी कहानियां मिलती हैं. इस तरह मेरे पास ऐसी तमाम कहानियां हैं, जिनमें से कुछ इस किताब में दर्ज की हैं. इसके लिए मुझे शोर्ट स्टोरी का फॉर्मट अच्छा लगा. वैसे ये फिक्शन नहीं था. सच बातें थीं. इसलिए एकदम कहानी भी नही हैं जो फिक्शन में होता है. उन्होंने कहा कि यात्राओं में आप देखते हैं तो सवाल उठता है कि किसके के लिए देखते हैं, अपने लिए या दूसरों के लिए कि वे जान सकें कि आपने ये–ये चीजें देखी हैं.

अनुराधा ने कहा कि यात्राएं हमें महसूस करा देती हैं कि एक दुनिया के भीतर कई दुनियां हैं और एक देश के भीतर कई देश हैं. किसी का रहन–सहन या खानपान अलग हो सकता है पर वास्तव में हम सब एक हैं. विविधिताओं पर विशिष्टताओं को स्वीकार करना चाहिए.

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सुपरिचित लेखक आलोचक सुजाता ने कहा कि ‘लोग जो मुझमें रह गए’ में अनुराधा ने जगहों के साथ-साथ वहां मिले लोगों के बारे में भी लिखा है. वे जिन जगहों से होकर गुजरीं उन्हें शायद कोई भूल जाए पर उन जगहों पर जिन लोगों से वह मिलीं और जिनकी कहानियां उन्होंने दर्ज की उन्हें भूलना मुश्किल है.

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मीडियाककर्मी विश्लेषक विनीत कुमार ने कहा कि सुनना आजकल एक मुश्किल क्रिया है, लेकिन अनुराधा की किताब हमें सुनने के लिए विवश करती है. आजकल हमारा ज्यादातर कहा और लिखा शार्ट बन जा रहा है. ऐसे में अनुराधा के लिखे यात्रा आख्यान में विश्वसनीयता हासिल करने की दुर्लभ क्षमता है, क्योंकि इसमें वह सब भी दर्ज है जो उन्होंने मन की आंखों से देखा और महसूस किया है.

अनुराधा बेनीवाल (Anuradha Beniwal Author)
अनुराधा बेनीवाल का जन्म हरियाणा (Haryana) के रोहतक जिले के खेड़ी महम गांव में 1986 में हुआ. उनकी 12वीं तक की अनौपचारिक पढ़ाई घर में हुई. 15 वर्ष की आयु में राष्ट्रीय शतरंज प्रतियोगिता की विजेता रहीं. 16 वर्ष की आयु में विश्व शतरंज प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व किया. उसके बाद उन्होंने प्रतिस्पर्धी शतरंज खेल की दुनिया से खुद को अलग कर लिया. दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस कॉलेज से अंग्रेजी विषय में बी.ए. (ऑनर्स) करने के बाद एलएलबी की पढ़ाई की. फिर अंग्रेजी साहित्य में एमए किया.

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