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बादशाह अकबर ने दिया अपने बहादुर चीते को पुरस्कार, बना दिया दूसरे चीतों का सरदार

भारत के राजा और बदाशाह चीतों के साथ शिकार पर जाया करते थे, इस बाते के उल्लेख इतिहास में मिलते हैं.

भारत के राजा और बदाशाह चीतों के साथ शिकार पर जाया करते थे, इस बाते के उल्लेख इतिहास में मिलते हैं.

एक बार शिकारगाह में चितरंजन नामक शाही चीता एक हिरण के पीछे छोड़ दिया गया तभी उसके सामने एक खाई आ गई जो पचीस गज चौड़ी थी. हिरण डेढ़ भाले की ऊंची कूद उछला और खाई पार गया. चीता अपने शिकार को कहां छोड़ने वाला था.

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17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस के मौके पर नामीबिया से लाए गए आठ चीतों को आज मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में छोड़ा गया. उसी दिन से चीता भारत की मीडिया में प्रमुखता से छाया हुआ है. भारत में चीते विलुप्त हो चुके थे. लगभग 72 साल बाद एक बार फिर से भारत के जंगल चीतों से गुलजार हुए हैं.

अगर इतिहास के पन्नों पर नजर डालें तो किसी जमाने में यहां अच्छी-खासी तादाद में चीते हुआ करते थे. राजा और बादशाह चीते साथ लेकर शिकार पर जाया करते थे. बादशाह अकबर चीतों के बड़े शौकीन थे. बादशाह अकबर पर नेशनल बुक ट्रस्ट की एक पुस्तक अकबर के जीवन की कुछ घटनाएं में एक अध्याय चीतों के बारे में है. इसमें बताया गया है कि बादशाह अकबर को चीतों से कितना प्रेम था. उन्होंने एक चीते को उसकी बहादुरी से खुश होकर अन्य चीतों का सरदार बना दिया था. पढ़ें पूरा किस्सा-

एक समय तक बादशाह अकबर को चीतों के साथ शिकार पर जाने का बड़ा शौक हो गया था. वह विभिन्न दलों के साथ चीते कर देता था, फिर अपने विशिष्ट साथियों के साथ स्वयं भी शिकार पर चल देता था. एक बार शिकारगाह में चितरंजन नामक शाही चीता एक हिरण के पीछे छोड़ दिया गया तभी उसके सामने एक खाई आ गई जो पचीस गज चौड़ी थी. हिरण डेढ़ भाले की ऊंची कूद उछला और खाई पार गया. चीता अपने शिकार को कहां छोड़ने वाला था. वह भी बड़ी चुस्ती-फुर्ती तथा मुस्तैदी से खाई पार कर गया और हिरण को जा दबोचा. इस चमत्कार पूर्ण घटना को सभी देख अचंभे में आ गए और बड़े प्रसन्न भी हुए. बादशाह ने उस चीते को दूसरे चीतों का सरदार बना दिया. उसने यह भी आदेश दिया कि चीते की इज्जत बढ़ाने के लिए उसके आगे-आगे एक नगाड़ची भी ढोल बजाता चला करे.

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(सन् 1572 के अपने पहले गुजरात अभियान के समय अकबर राजस्थान के मार्ग से गया. आमेर के दक्षिण में स्थित सांगानेर के जंगल में उसने जुलाई 1572 में एक शिकार पर जाने का आयोजन किया. अकरनामा-2, पृष्ठ-371 पर अबुल फज्ल ने इसका उल्लेख किया.)

हाथी की लड़ाई (1561-62)

इन दिनों की विशेष घटनाओं में से एक है- अकबर द्वारा हवाई नामक हाथी की सवारी और उसे एक लड़ाई के लिए प्रेरित करना. हवाई हाथी बादशाह की गजशाला का एक अत्यंत भीमकाय, बलशाली हाथी था. अपने भयानक क्रोध, कुटिल चालों तथा क्षण-क्षण बदलते हाव-भाव के लिए वह मशहूर था. बड़े-बड़े अच्छे हाथीवान जिन्हें ऐसे हाथियों को संभालने का वर्षों का अनुभव था- वह भी, उस पर सवारी करने में हिचकिचाते थे. फिर ऐसे बिगडै़ल जीव को लड़ाई के लिए उकसाना तो और भी जोखिम का काम था. बादशाह ने आगरा के दुर्ग के पास अपने आमोद-प्रमोद के लिए चौगान का मैदान बनवाया था.

एक दिन जब उस हाथी को साधने का यत्न चल रहा था और वह जंगलीपन दिखा रहा था तो अकबर सहज ही युक्ति से उसके ऊपर सवारी गांठने में सफल हो गए. लोग बादशाह की समझ और दिलेरी पर वाह-वाह कर उठे. उसके बाद बादशाह ने हाथी की सवारी के कुछ अत्यंत कठिन करतब भी दिखाए. इसके बाद बादशाह ने उसे प्रसिद्ध लड़ाकू हाथी रण-बाघ के सामने ला डटाया. दोनों हाथी बड़े क्रूर और दुर्दांत थे और क्रोध में चिंघाड़ रहे थे. लोगों में घबराहट थी और सभी अपना दिल थामे इस अनहोनी को देख रहे थे.

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बादशाह की सुरक्षा की सभी को चिंता थी. ऐसे में सभी दरबारी जो इस तमाशे को देख रहे थे- वक्त ज्यादा लगता देख और घबड़ा उठे. लेकिन वे बादशाह को इसमें न फंसने के लिए कुछ कह नहीं सकते थे. इसलिए उन्होंने सोचा कि यदि प्रधानमंत्री अतका खां को वहां बुला लिया जाए तो शायद उनका ध्यान करके ही, बादशाह अपने इस दुस्साहसपूर्ण खेल को रोक दें. इस भयानक दृश्य को देखकर बड़े-बड़े शेर दिल बहादुरों की सांस रुक रही थी.

अतका खां ने वहां पहुंचकर जब यह दृश्य देखा तो उसका आत्म-नियंत्रण जाता रहा. उसने पगड़ी उतार कर न्याय मांगने को आए एक प्रार्थी की तरह बादशाह से इस खेल को रोकने की विनती की. छोटे-बड़े सभी लोगों ने अतका खां के साथ ईश्वर से बादशाह की रक्षा करने की प्रार्थना की. जब अतका खां की घबराहट, चिंता और परेशानी को बादशाह ने देखा तो कहा- ”तुम्हें इस तरह हाय-हाय नहीं करनी चाहिए. अगर तुमने इसे नहीं रोका तो मैं स्वयं हाथी के ऊपर से नीचे कूद पडूंगा.”

जब अतका खां ने बादशाह को दृढ़ निश्चय को देखा तो उसने आज्ञापालन करने में ही कुशल मानी और किसी प्रकार, अपने रोष तथा चिंता वेग को रोकने का भरसक प्रयास किया.

शेर दिल बादशाह हाथियों के इस युद्ध में पूरे मन से लगा रहा जब तक कि हवाई हाथी ने आत्मिक शक्ति और दैवी कृपा से अपने प्रतिद्वंदी हाथी पर विजय नहीं पा ली. रण-बाघ रस्सी तुड़ा कर भाग खड़ा हुआ. हवाई ने इधर-उधर, ऊपर-नीचे कहीं न देखते हुए, ऊबड़-खाबड़ जमीन से बेपरवाह होकर भगोड़े हाथी का पीछा किया.

बादशाह अकबर इस सब दिल दहलाने वाले माहौल में भी हाथी की पीठ पर चट्टान-सा जमा रहा और ध्यानस्थ दर्शक की तरह मजे लेता रहा और भाग्य के बदलते तेवर देखता रहा.

जमुना पर नावों का एक पुल बना था, दोनों हाथी भागते, पीछा करते नदी किनारे पहुंचे. रण-बाघ घबराहट में पुल में धंस गया और हवाई ने उसका पीछा किया. इन दोनों दैत्याकार हाथियों के बोझ से पुल को साधने वाली नावें डूबने-उतराने लगीं किंतु बादशाह हवाई की पीठ पर धैर्य से डटा रहा. नौकर-चाकर और दूसरे लोग नावों को संभालने के लिए जमुना में कूद पड़े और तब तक संभालते रहे जब तक दोनों हाथी नदी के दूसरे किनारे पर पहुंच नहीं गए. ऐसे में खेल लंबा होता देख तथा देखने वालों की घबराहट को समझकर बादशाह ने हवाई हाथी को बड़ी धीरता और शांति से रोक लिया जो उस समय क्रोध में अग्निज्वाला बना हुआ था और जिसकी गति में वायु का वेग समाया था. समय देख रण-बाघ अपनी जान बचाकर भाग खड़ा हुआ.

इस पर लोगों की सांसत में पड़ी जान को राहत मिली और दिलों को चैन आया. कुछ अदूरदर्शी तथा अविचारी लोगों ने समझा कि बादशाह नशे में धुत होने के कारण ही इस जानलेवा खेल में पड़ा था. किंतु इस पूरे घटना चक्र को देखकर उन्हें पता चल गया कि उनका शक गलत था. बादशाह को तनिक भी नशा न था. वह तो केवल लोगों को दिखाना चाहता था कि बड़े से बड़े पागलपन और बर्बरता को तर्क-बुद्धि और ज्ञान से समाप्त किया जा सकता है.

(तुज्के जहांगिरी, पृष्ठ 246-7 अनु. खंड 2, पृष्ठ-11)

पुस्तक- अकबर के जीवन की कुछ घटनाएं
अंग्रेजी अनुवाद- शीरीं मूसवी
हिंदी अनुवाद- उमेश दत्त दीक्षित
प्रकाशन- नेशनल बुक ट्रस्ट

Tags: Asiatic Cheetah, Books, Hindi Literature, Literature

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