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Book Review : यह वक्त है 'रामभक्त रंगबाज' हो जाने का

Book Review : यह वक्त है 'रामभक्त रंगबाज' हो जाने का

राकेश कायस्थ का व्यंग्य उपन्यास 'रामभक्त रंगबाज'.

राकेश कायस्थ का व्यंग्य उपन्यास 'रामभक्त रंगबाज'.

Rambhakt Rangbaaz : उपन्यास का नाम 'रामभक्त रंगबाज' पढ़कर ऐसा लगता है कि यह उपन्यास हिंदू राष्ट्र के नाम पर मची गुंडागर्दी को केंद्र में रखकर लिखा गया होगा. लेकिन उपन्यास के शुरुआती हिस्से में ही यह भ्रम टूट जाता है और पता चलता है कि यह तो सामाजिक बुनावट में शामिल तरह-तरह के रेशों और उनकी प्रकृति की बारीक पड़ताल है. इस उपन्यास का केंद्रीय चरित्र एक मुस्लिम है, जिसका नाम आशिक है. दरअसल, यह आशिक हिंदू-मुस्लिम जैसे भेद से परे है. बचपन में उसकी शिक्षा-दीक्षा इंद्रदेव पांड़े के घर में हुई है. इसलिए वह राम और राम की महिमा से परिचित है और घर के अपने परिवेश की वजह से वह रहमान में भी यकीन करता है.

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Hindi Literature News: ‘रामभक्त रंगबाज’ राकेश कायस्थ (Rakesh Kayasth) का दूसरा उपन्यास है. ‘प्रजातंत्र का पकौड़ा’ उनका पहला उपन्यास था और इससे पहले राकेश का व्यंग्य संग्रह ‘कोस-कोस शब्दकोश’ आ चुका है. राकेश अपनी चुटीली भाषा और धारदार व्यंग्य के लिए ‘कोस-कोस शब्दकोश’ और ‘प्रजातंत्र के पकौड़े’ से पहचाने गए थे. अपने इसी पैने तेवर के साथ राकेश कायस्थ ‘रामभक्त रंगबाज’ में एकबार फिर हाजिर हैं. राकेश को निजी जीवन में न जानने वाले भी इस उपन्यास से गुजरते हुए अनुमान लगा सकते हैं कि राकेश हाजिरजवाब होंगे. राकेश की यह हाजिरजवाबी इस उपन्यास के कई पात्रों में दिखती है.

यह सही है कि ‘रामभक्त रंगबाज’ (Rambhakt Rangbaaz) व्यंग्य संसार में एक जरूरी हस्तक्षेप की तरह याद किया जाएगा. शैली इसकी व्यंग्य की जरूर है, लेकिन इस व्यंग्य से ज्यादा ध्यान समाज के उस बारीक विश्लेषण पर जाना चाहिए, जिसके जरिए उपन्यासकार ने बताया है कि आज के समाज में जो मनुष्यता गुम है, जिस समाज के अधिकतर लोगों के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य से ज्यादा महत्वपूर्ण मंदिर हो गया है, जिसके लिए वह किसी भी हद तक जा सकता है, आखिर उस समाज की जड़ें कब और कैसे रोपी गईं. कैसे गंगा-जमुनी संस्कृति की हमारी चमड़ी उतरती गई और भगवा रंग का चोला हमें ढंकता गया? कैसे हमारी मनुष्यता की जमीन खिसक गई और हम हिंदू-मुसलमान में तब्दील हो गए. खास बात यह है कि उपन्यास के अंत में राकेश कायस्थ ने एक ऐसे समाज की उम्मीद जगाई है जहां इनसानियत के तत्व भरपूर मात्रा में दिखाई पड़ रहे हैं.

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उपन्यास का नाम ‘रामभक्त रंगबाज’ पढ़कर ऐसा लगता है कि यह उपन्यास हिंदू राष्ट्र के नाम पर मची गुंडागर्दी को केंद्र में रखकर लिखा गया होगा. लेकिन उपन्यास के शुरुआती हिस्से में ही यह भ्रम टूट जाता है और पता चलता है कि यह तो सामाजिक बुनावट में शामिल तरह-तरह के रेशों और उनकी प्रकृति की बारीक पड़ताल है. इस उपन्यास का केंद्रीय चरित्र एक मुस्लिम है, जिसका नाम आशिक है. दरअसल, यह आशिक हिंदू-मुस्लिम जैसे भेद से परे है. बचपन में उसकी शिक्षा-दीक्षा इंद्रदेव पांड़े के घर में हुई है. इसलिए वह राम और राम की महिमा से परिचित है और घर के अपने परिवेश की वजह से वह रहमान में भी यकीन करता है. बल्कि पांड़े जी के यहां पढ़ते-बढ़ते उसकी जबान पर राम नाम ही बसने लगा है और बात-बेबात खुदा के बजाए, श्रीराम का ही नाम उसकी जुबान पर आता है. उसकी इसी आदत की वजह से आरामगंज के लोग उसे रामभक्त कहने लगते हैं. चूंकि इसी आरामगंज मुहल्ले के चौराहे पर उसकी लेडिज और जेंट्स टेलरिंग दुकान है, इसलिए महिलाओं के बीच भी उसका ठीक-ठाक प्रभाव है. इसी प्रभाव की वजह से आरामगंज के युवा साथी उसे प्यार से रंगबाज भी पुकारते हैं.

वैसे तो उपन्यास की कहानी अविभाजित बिहार के रांची के किशोर गंज (उपन्यास में आरामगंज) की है, लेकिन इस कहानी को सिर्फ किशोर गंज की कहानी कहना इसके विस्तृत फलक को समेट देना होगा. ऐसे किशोर गंज देश के लगभग हर शहर में मौजूद रहे हैं और इस उपन्यास के तमाम पात्र आपको उस किशोर गंज मुहल्ले में घूमते-फिरते मिल जाएंगे. कहानी शुरू होती है 1990 में आडवाणी की रथयात्रा से उपजे माहौल से. सितंबर में रामंदिर के नाम पर सोमनाथ से अयोध्या तक की यात्रा के राजनीतिक लाभ उसी समय दिखने शुरू हो गए थे. आरामगंज मुहल्ले में जहां हिंदू और मुसलमान जैसा कोई फर्क नहीं दिखता था, वहां भी इस यात्रा की खूब चर्चा होने लगी थी. अब लोग खुद को हिंदू और मुसलमान के रूप में पहचानने लगे थे. आरामगंज चौराहे पर भी राम नाम की खिचड़ी पकने लगी थी. इसी आरामगंज चौराहे पर आशिक उर्फ रामभक्त रंगबाज की लेडिज और जेंट्स टेलरिंग की दो दुकानें हैं, जो ‘इंटरकनेक्टेड’ हैं. ऐसा ही ‘इंटर कनेक्शन’ देश के तमाम आरामगंजों में हिंदू और मुसलमानों के बीच दिखता था. बाहर से दो दरवाजे लेकिन अंदर से जुड़े हुए.

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इस उपन्यास को पढ़ते हुए आप महसूस करेंगे कि हिंदू-मुसलमानों के ये ‘इंटरकनेक्टेड’ दरवाजे कैसे उखड़े और दरवाजे की जगह कैसे दीवार खड़ी हो गई. आशिक नाम का यह चरित्र इसी इंटर कनेक्शन का प्रतिनिधित्व करता है. आशिक को आरामगंज के इंद्रदेव पांड़े ने पढ़ाया था. आशिक पांड़े जी को बाबा बुलाया करता था. बाबा में उसे अब्बू की झलक दिखाई देती थी. बकौल लेखक, ‘बाबा के साथ रहकर उसको धर्म-कर्म का इतना ज्ञान हो चुका था कि अगर ब्राह्मण होता तो पंडिताई करके घर चला लेता. जी हां, इस सुन्नी मुसलमान को कुंडली बांचना और पतरा भी देखना आ गया है.’ हिंदू मुहल्ले में थी आशिक की टेलरिंग दुकान. अपने ग्राहकों और हिंदू-मुसलमान साथियों से बातचीत के क्रम में अक्सर श्रीराम के जीवन के उदाहरण आशिक के जुबान से निकलते. मानस की चौपाइयां वह कह बैठता. उसके मुसलमान साथी आशिक का मजाक उसे ‘मिसिर’ जी कहकर उड़ाते.

हिंदू मुहल्ला आरामगंज के पड़ोस में ही है मुसलमानों की रैयत टोली. यहीं आशिक का घर भी है. आरामगंज और रैयत टोली के लोगों में एक-दूसरे को लेकर छोटी-मोटी शिकायतें तो रहती हैं, लेकिन ये शिकायतें कभी इतनी बड़ी नहीं हुईं कि शहर में चर्चा बन जाएं. आरामगंज और रैयत टोली के बीच में पड़ता था मोची गोपाल का झोपड़ीनुमा मकान. इस उपन्यास के पात्र ‘ओम जी’ ने गोपाल को ‘नेपाल’ नाम दे रखा है. नेपाल यानी भारत और चीन के बीच का वह बफर स्टेट, जो दोनों महाशक्तियों में किसी की भी नाराजगी मोल नहीं ले सकता. ओम जी कहा करते ‘मरेगा नेपाल एक दिन! जरूर मरेगा कोल्ड वार में’ एक दिन यह कोल्ड वार सामने भी आ गया. रथयात्रा के शुरू होने के बाद यह कोल्ड वार अचानक एक दिन सामने आ गया. गोपाल नेपाल की तरह पिसने लगा. रैयत टोले के लोग उसे पीट रहे थे, क्योंकि पिछड़ी जाति का होने के बावजूद उसने सरकारी नल से पानी लेकर नल को नापाक करने की कोशिश की थी. ऐसे में बीच-बचाव के लिए आशिक सामने आता है. लेकिन आशिक को सलीम कहता है ‘ऐ मिसिर, हमसे रंगबाजी नहीं. ये आरामगंज चौक नहीं है.’ इसके बाद भी आशिक पर कोई फर्क नहीं पड़ता और वह मोची गोपाल की बाल्टी नल के नीचे लगा देता है. सलीम यह देखकर आशिक की ओर लपकता है लेकिन कुछ लोग उसे पकड़कर किनारे ले जाते हैं. जाते-जाते सलीम अपनी नफरत की वजह उड़ेलता जाता है,

वह कहता है ‘रैयत टोली में कोई एक ठो कटिया भी डाले तो ‘उन सब’ की छाती पर ऐसे सांप लोटता है कि बिजली विभाग में कंप्लेन कर देते हैं. एक हमीं चूतिए हैं कि उनके नीचजतियों को पानी भरने दें. बहिनचोद वाल्मीकि नगर तक में भी तीन-तीन ठो सरकारी नल है, हियां केवल एक. हम भंगी-चमार से भी गए-गुजरे हैं. घर के सामने है तो इसका मतलब थोड़े ना है कि नल आशिकवा के बाप का हो गया. अशराफ हिंदू मोहल्ले में रहकर ज्यादा चर्बी चढ़ गई है. बता रहे हैं हम, उतार देंगे पूरी चर्बी एक दिन.’

इस प्रसंग की चर्चा करते हुए उपन्यास का एक और हिस्सा याद आता है जब आरामगंज में एक चाची ने आशिक को उसकी औकात बताई थी. दरअसल छुआछूत कर रही चाची को समझाने के लिए आशिक ने कहा था, ‘अरे चाची ई नया जमाना है, छुआछूत भला कौन मानता है! रामजी भी तो केवट की नाव पर चढ़े और शबरी के जूठे बेर खाए थे. गलत बोल रहे हैं तो बताइए.’ इस पर चाची ने कहा था, ‘तुम हो कौन रे? बेसी पंडिताई मत छांट, औकात भुलाइ गइल बाड़े तू आपन?’ इसके बाद चाची अपनी बेटी पायल को लेकर दुकान से बाहर आ जाती हैं, पर उनका गुस्सा कम नहीं हुआ है. वह कहती हैं. ‘चार धाम कइले बानी हम दू-दू बेरी. अब इ मियवां हमरा के परवचन दीहि कि रामजी का बतवले बाड़ें? बड़ा बाजार से मेन रोड तक एक हजार दर्जी बाड़ सन. तूं ही नइखे एगो’. चाची ने कहना जारी रखा, ‘एक त पंडीजी गलती कइले कि इहां मुसलमान बसवले, आ अब ऊपर से मेहरत टोली, राम-राम…’ कथावाचक बताता है कि पायल ने आशिक को इस अंदाज में देखा जैसे कह रही हो – माफ कर देना भइया.

इन दो प्रसंगों की चर्चा का मकसद यह याद दिलाना है कि जिन शहरों में कौमी एकता सिर चढ़कर बोलती थी, अब आडवाणी की रथयात्रा शुरू होने के बाद इनसानों की पहचान हिंदू और मुसलमान के रूप में होने लगी है. लेकिन इस बीच एक पीढ़ी ऐसी भी सामने हो रही है, जो आंखों से ही सही, मगर कह देती है – माफ करन देना भइया. दूसरी बात कि इस रथयात्रा की पृष्ठभूमि में आशिक जैसे लोग भी हैं, जिन्हें मुसलमान भी संदेह से देखता है और हिंदुओं के लिए तो वह संदिग्ध है ही. लेकिन असल सवाल कि यह आशिक कौन है? क्या वह मुसलमान है या कि वह हिंदू है? उपन्यासकार की स्थापना है कि वह सिर्फ और सिर्फ इनसान है. उसके भीतर तमाम मानवीय संवेदनाएं हैं. उपन्यास में कई ऐसे प्रसंग आए हैं, जहां उपन्यासकार मानवता के प्रति खड़ा दिखता है और उसके पात्र इनसानियत की ऊंचाई छूते नजर आते हैं. उपन्यास में कई चरित्रों के बचपन की घटनाओं से राकेश कायस्थ याद दिलाते हैं कि हिंदू और मुसलमान का फर्क बचपन में ही कैसे घुट्टी में पिलाई जाती है – लाल चींटी मुसलमान होती है और काली चींटी हिंदू. लाल चींटी हिंदुओं को काटती है, मुसलमानों को नहीं. या इस उपन्यास के इस प्रसंग को देखें, जहां त्योहार पर होने वाले खर्चे की लोग चर्चा कर रहे हैं.

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यहां आशिक के अब्बू गनी मियां भी हैं, जो बतलाते हैं कि हम भी अब घर में 5 ही लोग हैं. सबसे बड़ी लड़की अल्लाह को प्यारी हो गई. अब 2 लड़कियां है और एक ठो इ लड़कवा’. इस पर गनी मियां से एक शख्स पूछता है – ‘सब एक्के मेहरारू से है?’ गनी मियां पूछते हैं ‘हम समझे नहीं आपकी बात?’ वह शख्स समझाता है ‘अरे आप लोग में चार बीवी रखना जरूरी होता ना है? हम सुने हैं, इसीलिए पूछ रहे हैं.’ ऐसे बेतुके सवाल का जवाब भी गनी मियां ने बड़े धीरज से दिया. अपने बेटे आशिक को बुलाकर उससे कहा – ‘चचा को बताओ, कितनी अम्मी हैं तुम्हारी.’ आशिक चुपचाप जमीन की तरफ देखता रहा फिर उसने ऊंगली के इशारे से बताया – एक. पर बात यहीं खत्म नहीं हुई. पता नहीं कैसे लेकिन मुहल्ले के बच्चों में यह बात फैल गई कि मास्टर जी की चार बीवियां हैं. इसके बाद आशिक जब भी दुकान की ओर अकेला आता, हमउम्र बच्चे एक सुर में गाते – असिकवा घूमे बीच बजार, बप्पा एक, मइया चार. ऐसी ही आवाज पर एक दिन भड़के हुए आशिक ने पत्थर उठाकर एक बच्चे के सिर पर निशाना साध दिया. इस घटना के बाद भी एक-दो घटनाएं ऐसी हुई कि जब आशिक का मन भड़का. लेकिन पत्थर फेंकने वाली घटना के बाद अपने आहत अब्बू का चेहरा उसे याद आ जाता. उनकी दी हुईं नसीहतें याद आ जातीं, जीवन को देखने का उनका आशावादी नजरिया याद आ जाता. आशिक ने सुना था अब्बू को किसी से कहते – इनसान चाहे जितना भी बुरा हो, लेकिन असल में भीतर से अच्छा ही होता है.

इस उपन्यास में आडवाणी की रथयात्रा के दौरान देश की बदल रही आबोहवा की खूब गहरी पहचान है. कैसे एक अल्पसंख्यक मुहल्ले को नेस्तोनाबूद करने की साजिश रची जा रही है या कैसे पड़ोस की रैयत टोली अचानक कटुआ टोली के रूप में पहचानी जाने लगती है. कैसे मुहल्ले का बैजू पागल हो जाता है और क्यों आरामगंज मुहल्ले में आभा दीदी को फिर से गिद्ध नजर आने लगे. इस आरामगंज मुहल्ले में कैसे ऊंची और नीची जाति के बीच फर्क होता है और समाज की नैतिकता और धर्म की ठेकेदारी करते सर्वदमन बाबू और जटाशंकर शर्मा जैसे लोग कैसे युवाओं को बरगलाते हुए माहौल अपने मुताबिक गढ़ते हैं.

इस उपन्यास में इसके मुख्य पात्र आशिक की मौत हो जाती है. बल्कि मौत नहीं, हत्या हो जाती है. हत्यारा पागल है, हत्या को अंजाम देने से ठीक पहले उसने ‘जै सिरी लाम’ का नारा लगाया था. जश्न के माहौल में आशिक की दर्दनाक मौत हुई है. लेकिन यह जश्न कैसा था, सरेराम यह हत्या कैसे हुई – जैसे सवालों के जवाब सपाटबयानी से नहीं दिए जा सकते, इसके लिए उपन्यास पढ़ना जरूरी होगा. तभी ‘गद्दार’ आशिक की पीड़ा महसूस की जा सकेगी. लेकिन ऐसा नहीं कि आशिक की मौत से उपन्यास खत्म हो जाता है. मरने के बाद भी रंगबाज आशिक जिंदा रह जाता है. उसका नया रूप ‘रंगीला शमी’ है, रंगबाज आशिक का बेटा. शमी न्यूजीलैंड में सेटेल होने जा रहा है, मगर जाने से पहले वह आरामगंज में कुछ दिनों के लिए आया है. लोगों से मिल रहा है. आभा दी से भी मिलता है जो उसके पिता के हत्यारे ‘पागल बैजू’ को रोज खाना खिलाया करती हैं. बैजू से भी मिलता है. अपने पिता के हत्यारे को सामने देखकर उसका युवा खून भीतर ही भीतर उबलने लगता है, पर वह है उस आशिक का बेटा जिससे उसने सीखा था कि न अली पावरफुल होता है, न बजरंगबली. इन सबसे ज्यादा पावरफुल होता है स्पाइडरमैन जो बजरंगबली की तरह उड़ता है और हिजरत पर जा रहे किसी बेगुनाह की जान पर बन आए तो उसे बचाने के लिए तुरंत जाल बुन देता है. शमी ने भी ‘बेगुनाह’ बैजू को माफ कर दिया. वह अपने मन में उपजे हिंसा के जाल से निकलकर फिर खो गया अपने अब्बू आशिक मियां उर्फ रामभक्त रंगबाज की यादों में.

इस उपन्यास के आखिरी हिस्से में शमी के ब्लॉग की चर्चा है. 38 वर्षीय शमी ने राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद जो लिखा वह इस देश के उन तमाम संवेदनशील लोगों की नुमाइंदगी करता है, जो जानते और मानते हैं कि इस फैसले के बाद भले फासला नहीं आया, लेकिन इसने न्याय के फलसफे को नुकसान जरूर पहुंचाया है. रामभक्त रंगबाज के बेटे शमी ने लिखा ‘मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का भव्य मंदिर दो ढांचों को गिरकर बनाया जा रहा है. पहला ढांचा अयोध्या में था और दूसरा दिल्ली में. पहला ढांचा मैंने कभी देखा नहीं, उससे मेरा कोई भावनात्मक लगाव भी नहीं है लेकिन दूसरे ढांचे पर मेरा वजूद टिका था. वह मेरे हिफाजत की गारंटी था. जब वही धराशायी हो गया तो फिर मुझ जैसों के लिए बचा क्या?’ उपन्यास के इस हिस्से में पहुंचने के बाद आपको रामभक्त रंगबाज उर्फ आशिक मियां के बाबा यानी इंद्रदेव पांड़े की बात याद आएगी ‘राम का मार्ग दुखों का मार्ग है.’

अपनी व्यंग्य शैली की वजह से यह उपन्यास आपको कई बार गुदगुदाता है तो कई बार तिलमिला भी देता है. मुहल्ले के भांति-भांति के लोग, किस्म-किस्म के उनके विचार, तरह-तरह की उनकी भाषा और बिल्कुल अलग-अलग ढंग के व्यवहार इस उपन्यास में आपको मिलेंगे. पात्रों के इन चारित्रिक गुणों को उपन्यास के अंत तक रोचकता के साथ बनाए रखना कोई बहुत आसान काम नहीं है. लेकिन राकेश कायस्थ ने इसे बहुत ही सहजता से साधा है. हां, प्रूफिंग की चूकों को प्रकाशक का ‘जन्मसिद्ध अधिकार’ मानकर नजरअंदाज करें और आरामगंज की भाषा में इस ‘खतरनाक’ उपन्यास के लिए राकेश कायस्थ को बधाई दें.

उपन्यास : रामभक्त रंगबाज
लेखक : राकेश कायस्थ
प्रकाशक : हिंद युग्म, नोएडा
कीमत : 199 रुपये

Tags: Books, Novelist, Review

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