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'छोकरी की टोकरी' पर सोशल मीडिया में घमासान, जानें क्या है मामला और क्या कहते हैं विशेषज्ञ

'छोकरी की टोकरी' पर सोशल मीडिया में घमासान, जानें क्या है मामला और क्या कहते हैं विशेषज्ञ

सोशल मीडिया में पर कक्षा-एक की एक बाल कविता को लेकर घमासान मचा हुआ है.

सोशल मीडिया में पर कक्षा-एक की एक बाल कविता को लेकर घमासान मचा हुआ है.

कविता में शामिल 'छोकरी' और 'आम चूसना' शब्द को लेकर लेखक, पत्रकार, नेता-अभिनेता और आम लोग दो धड़ों में बंटे गए हैं.

इन दिनों सोशल मीडिया में पर कक्षा-एक की हिंदी की पुस्तक में प्रकाशित एक बाल कविता ‘छह साल की छोकरी, भरकर लाई टोकरी’ को लेकर घमासान मचा हुआ है. कविता में शामिल ‘छोकरी’ और ‘आम चूसना’ शब्द को लेकर लेखक, पत्रकार, नेता-अभिनेता और आम लोग दो धड़ों में बंटे गए हैं. कोई इस कविता की हिमायत कर रहा है तो कोई इसे अश्लील बताकर पाठ्यक्रम से बाहर करने की मांग कर रहा है.

कविता के शब्दों को लेकर हमने कवि, लेखक, पत्रकार और प्रकाशकों से बात की. उनके भी इस कविता को लेकर अलग-अलग तर्क हैं. इन तर्कों को जानने से पहले जानें कविता और उसके लेखक के बारे में-

कविता
छह साल की छोकरी
भरकर लाई टोकरी
टोकरी में आम हैं
नहीं बताती दाम है
दिखा-दिखाकर टोकरी
हमें बुलाती छोकरी
हमको देती आम है
नहीं बुलाती नाम है
नाम नहीं अब पूछना
हमें आम है चूसना

कविता के लेखक
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की कक्षा-एक की हिंदी की पुस्तक ‘रिमझिम’ में इस कविता को दिया हुआ है. यह कविता 2006 में पाठ्यपुस्तक शामिल की गई थी. कविता के लेखक कवि रामकृष्ण शर्मा ‘खद्दर’ हैं. रामकृष्ण शर्मा ‘खद्दर’ बाल साहित्याकार थे और दिल्ली-उत्तराखंड के चर्चित कवि. उनका जन्म 1916 में हुआ था और पेशे से वह एक शिक्षक थे. 12 फरवरी, 1975 को उनका निधन हुआ था. इतना निश्चित है कि यह कविता करीब 50 साल पुरानी होगी, क्योंकि 1975 में कवि का निधन हो गया था और कविता इससे पहले ही लिखी गई होगी.

कहां से शुरू हुआ विवाद
छत्तीसगढ़ के आईएएस अधिकारी अवनीश शरण ने इस कविता के बारे में अपने ट्विटर पर कविता शेयर करते हुए टिप्पणी की, ”यह किस सड़कछाप कवि की रचना है, कृपया इस पाठ को पाठ्यपुस्तक बाहर करें.

IAS

आईएएस अधिकारी के ट्विटर से सोशल मीडिया पर इस कविता को लेकर घमासान मचने लगा और लोग दो धड़ों में बंटते चले गए. कुछ सोशल मीडिया यूजर ने शिक्षा मंत्री को भी इस कविता को टैग किया और इसे हटाने की मांग की. बॉलीवुड एक्टर आशुतोष राणा ने भी इस कविता की भाषा शैली पर आपत्ति उठाई है.

ashutosh rana

इस कविता को लेकर सोशल मीडिया पर अन्य प्रतिक्रियाएं भी देखने को मिल रही हैं. लेकिन साहित्यकार, भाषा विशेषज्ञ और पत्रकारों का एक बड़ा धड़ा इस कविता के पक्ष में खड़ा है.

शहरी मानसिकता ने देशज और सहज शब्दों को खत्म कर दिया- कवि सुरेन्द्र शर्मा
प्रसिद्ध हास्य कवि और व्यंग्यकार सुरेन्द्र शर्मा (Kavi Surendra Sharma) ‘छोकरी’ शब्द पर ऐतराज तो नहीं करते लेकिन विवाद को खत्म करने के लिए इस शब्द को हटाने का समर्थन भी करते हैं. वे कहते हैं, ‘समय के साथ-साथ कुछ शब्द पहले प्रचलित थे, आज वे नहीं हैं, उनके बेहतर शब्द हमने तालाश लिए हैं.’

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वे उदाहरण देते हैं कि आज ‘जनसुविधा’ या ‘रेस्टरूम’ का इस्तेमाल होता है, जबकि किसी समय में ‘पेशाबघर’ शब्द प्रचलित था. समझ बढ़ने के साथ-साथ साहित्य और कविता से बहुत से शब्दों को हटा दिया गया है, जबकि शुरू में इनका प्रचूर इस्तेमाल होता था.

कवि कहते हैं कि ‘छोकरी’ शब्द देशज और सहज है और आज भी खूब इस्तेमाल किया जाता है. शहरी मानसिकता ने देशज और सहज शब्दों को खत्म कर दिया है. देशज शब्दों से आत्मीयता छलकती है.

‘छोकरी’ शब्द के इस्तेमाल को लेकर कवि सुरेन्द्र शर्मा की राय कि जिस चीज में झगड़ा पैदा होता हो, उससे मुक्ति पा लेनी चाहिए. उनका कहना है कि अगर किसी लेखक या कवि को ऐसे देशज शब्दों का इस्तेमाल करना भी है तो पूरे वाक्य में लोकभाषा इस्तेमाल का करना चाहिए. एक शब्द देशज और बाकि शहरी शब्दों का मिलान भी अटपटा लगता है.

मानकीकरण से भाषा कूड़दान में चली जाती है- क्षमा शर्मा
वरिष्ठ ‘बाल’ साहित्यकार क्षमा शर्मा (Kshama Sharma) इस विवाद को फालतू का मानती हैं. उनका कहना है कि छोकरी शब्द में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिस पर विवाद हो. वे कहती हैं, ‘महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश में कई स्थानों पर लड़के-लड़कियों को छोकरा-छोकरी या फिर छोरा-छोरी कहकर बुलाया जाता है. और ये बहुत प्यार भरे शब्द हैं.’

क्षमा शर्मा कहती हैं, ‘पूरे देश में एक जैसी भाषा को लेकर कुछ लोगों की जो तानाशाही है, उसी का ये परिणाम है. इस शब्द को पूरे नारी समाज के लिए अपमानित करने वाला शब्द कहा जा रहा.’

चूसना शब्द पर उनका कहना है, ”आम के लिए चूसना शब्द ही इस्तेमाल होता है. इसमें लड़कियों का अपमान कहां से आ गया. इसे जेंडर जस्टिस से कैसे जोड़ सकते हैं.”

”भाषा का मानकीकरण करने पर वह कूड़ेदान में चली जाती है. हिन्दी का मानकीकरण करने की कोशिश की गई है, लेकिन ट्रेन को लोहपथ गामिनी कभी कोई नहीं कहता.”

”आज के समय में जब यह कहा जा रहा है कि मेरी अपनी भाषा हो सकती है, मैं जो चाहे बोल सकता हूं, ऐसे में आप कहें कि यह कविता जेंडर जस्टिस के खिलाफ है, बात हज़म नहीं होती.”

भाषा का भद्दा होना सामाजिक गतिविधि है- अदिति माहेश्वरी
वाणी प्रकाशन (Vani Prakashan) की निदेशक अदिति माहेश्वरी (Aditi Maheshwari) को भी कविता के शब्दों में कोई गंदगी नज़र नहीं आती. उनका तर्क है, ”बच्चों को खेल-खेल में ही काफी चीजें सिखानी होती हैं. बच्चों के लिए जिस पाठ्यक्रम का निर्धारण किया जाता है वह बहुत गंभीर नहीं होता है. लेकिन हम यह भी जानते हैं कि ये बच्चे जब बड़े होंगे और समाज से जुड़ेंगे तो जो शब्द कविता में लिखे हैं, उनका समाना बच्चों को गलत तरीके से करना होगा.”

अदिति कहती हैं, ”मुझे यह लगता है कि यह कविता बहुत अच्छा प्रयास है उन शब्दों को जो सामाजिक परिपेक्ष में मैले हो चुके हैं, उन्हें फिर से साफ-सुथरे परिवेश में मासूमियत के साथ बच्चों के जीवन में फिर से स्थापित करने का. क्योंकि यही बच्चे जब समाज से जुड़ेंगे तो उन्हें यह पता होगा कि ये शब्द सामान्य हैं और उनका गलत प्रयोग हो रहा है.”

अदिति के मुताबिक, ‘छोकरा, चूसना बड़े ही मासूम शब्द हैं, इनमें कोई गंदगी नहीं है, लेकिन समाज में जब ये मैले हो जाते हैं तब हम इन्हें इस्तेमाल करने से बचते हैं. बच्चे इन्हें पढ़ेंगे तो बड़े होकर वे समझेंगे कि किस प्रकार अच्छी भाषा को मलीन कर दिया जाता है. ऐसे में ये बच्चे भाषा को मलीन होने से रोकने का काम करेंगे.’

‘इन शब्दों को नॉर्मलाइज करने की जरूरत है. क्योंकि शब्दों में कोई गंदगी नहीं है. शब्दों को अपने स्वाभाविक परिवेश में फिर से एक स्वस्थ वातावरण में इस्तेमाल करने की जरूरत है. और यह काम पाठ्यक्रम से शुरू हो तो बहुत अच्छा है.’

अदिति कहती हैं, ‘सामाजिक स्तर पर मैले हो चुके शब्दों को बच्चों को कक्षा में प्यार से ग्रुप एक्टिविटी के माध्यम से गाकर, सुनाकर समझाया जाएगा तो उन्हें समझ में आएगा कि ये शब्द बिल्कुल भी गलत नहीं हैं. जब वे बड़े होंगे तो उन्हें समझ में आएगा कि शब्द के साइन एंड सिग्नीफायर (शब्द और संकेत) में कोई समस्या नहीं है, समस्या तो सामाजिक परिवेश में है.’

हालांकि, एक मुद्दे को लेकर अदिति अपना ऐतराज भी प्रकट करती हैं. वे कहती हैं, ‘सिर्फ़ एक समस्या जो इस कविता में नज़र आती है वह यह कि 6 वर्ष की बच्ची आम बेचती दिखती है. यह बाल श्रम को बढ़ावा देने जैसा प्रतीत होता है.’

Tags: Books, Poem

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