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लोकगीतों में गांधी : बुद्ध को भी नहीं मिली यह मंजिल, जो महात्मा को जीते-जी हुई हासिल

2 अक्टूबर महात्मा गांधी की 153वीं जयंती पर विशेष आलेख.

2 अक्टूबर महात्मा गांधी की 153वीं जयंती पर विशेष आलेख.

Gandhi Jayanti : बौद्ध स्तूप आपने सुने हैं, गया में गांधी की भस्म को सहेजने वाला एक स्तूप है. बुद्ध की तरह गांधी की प्र ...अधिक पढ़ें

महात्मा गांधी ने कहा था ‘लोकगीतों में धरती गाती है, पर्वत गाते हैं, नदियां गाती हैं, फसलें गाती हैं…’ फसलों, नदियों, पर्वतों और धरती ने गांधी को गाया है. ऐसे बिरले ही महापुरुष धरती पर हुए हैं, जिन्हें जीते-जी ही लोकगीतों में गाया गया. इस पर सभी विद्वान सहमत नहीं हैं कि गौतम बुद्ध को ऐसा सौभाग्य मिला हो. भारत ही नहीं, दुनिया के कई विद्वानों ने बुद्ध और गांधी के बीच कई सिरों से समानता देखी है और तुलना की है. वस्तुतः ‘अप्प दीपो भवः’, सत्य और अहिंसा के दर्शन को चरितार्थ करने वाले इन दो महापुरुषों के जीवन की ‘बिटवीन द लाइन्स’ पढ़ने के लिए शोध भी हो रहे हैं. इस विषय में देवेंद्र सत्यार्थी का गांधीजी के साथ एक संवाद भी बेहद महत्वपूर्ण है, जिससे लोकगीतों में गांधी की व्यापकता को लेकर कई सिरे खुलते हैं.

हो बापू यो राज तमी ने पलटायो साबरमती का रेवा वारा।
म्हं गानो बजानो कंई जाणा – जंगल का रेवा वारा।

जीवन की ही तरह साहित्य के दो आधार माने गये हैं – लोक और शास्त्र. लोक साहित्य एक काल विशेष में रचे जाने के बावजूद अंतर्धारा की तरह बहता रहता है. चूंकि ये अक्सर समूह और समवेत स्वरों की परंपरा में रचे-बसे होते हैं इसलिए समय की नदी के समरूप लोकगीत बहते हैं. गांधी पर गोली चलाये जाने के बाद भी उनके विचार अमर हैं और स्वयं गांधी इन लोकधुनों में, गीतों में भारत के अंतर्मन तक पैठे हुए हैं, आज भी. लगातार इस विषय पर प्रकाशित हो रहे ग्रंथ इस बात की तस्दीक कर रहे हैं.

अवधी, कुमायूंनी, भोजपुरी, बुंदेली, छत्तीसगढ़ी, गोंडी, हरियाणवी, पंजाबी से लेकर मराठी, उड़िया, तेुलुगू तक कौन सी ऐसी भाषा है, जिसकी लोक स्वर लहरियों में गांधी नहीं हैं! आपको यह बात भी हैरान कर सकती है कि लोकगीतों के कितने प्रारूपों में गांधी को गाया गया है. दादरा, टप्पा, बिरहा, लावणी, फाग, कजरी, आल्हा, चालीसा और भक्तिगीतों जैसे अनेक रूपों में गांधी को ग्राम ही नहीं बल्कि वनों तक गाया जाता रहा है. यहां पहले कुछ महत्वपूर्ण, चर्चित और रोचक लोकगीत अंश उदाहरण के तौर पर रखे जा रहे हैं:

1. यह लोकगीत एकाधिक रूपों में मिलता है, इसका निमाड़ी रूप अंश इस तरह है.

म्हारा चरखा को टूट नी तार, चरखा चालू रह ।
गांधी महातमा दूल्लव बण्या छे, दूलेण बणी सरकार ।
सबई स्वयंसेवक बण्या बराती, नाई बण्यो थानेदार ।
गांधी महातमा नेग म मचल्या, दायजा म मांगा सुराज ।

2. उड़िया लोकगीत का एक अंश.

गांधी महात्मा आसीले, कले देश स्वाधीन
कर्ण मंत्र देई गले है, का ताहार आन
रखीबा ताहार आन है, आस करीबा सेवा
मद निशा सब छाड़ आन है, आस सागेर जीवा।

3. तेलुगू लोकगीत का एक अंश.

राटमु ओड़ाकारम्मा, ओ अम्मालारा?
गांधी की जय अंचु दारामु तीयारे।
एकुलु रामसु इंटिकन्दम्मु, महात्मा गांधी प्रजल कंदम्मु।

4. हरियाणवी लोकगीत का एक अंश.

घर-घर लेडी चंदन रोवे, गांधी बनो गले का हार
घुटनन कर दिई गवरमेंट, अब वा के थोथे बाजे हथियार
बर्र तितैया जैसे चिटमन लागें, बेड़ा कौण लगावे पार?

5. एक भोजपुरी बिरहा लोकगीत का अंश.

गांधी के लड़इया नाहिं जितबे, रे फिरंगिया! चाहे कर केतना उपाय,
भल-भल मजवा उड़ौले ऐहि देसवा में
अब जइहैं कोठियां बिकाय।

6. गोमती प्रसाद विकल रचित गांधी चालीसा का एक अंश.

आजादी का अमर उजाला। चक्र सुदर्शन चरखा वाला।
सत्य अहिंसा समता वाला। अहसयोग आंदोलन वाला।
युग को राम-रहीम पढ़ाया। दया प्रेम का दीप जलाया।
विपुल वासना का विषपायी। सात्विक जीवन का अनुयायी।

7. राधेश्याम शांडिल्य रचित वर्णमाला गीत का अंश.

क से करमचंद के घर में
मोहन हुए पोरबंदर में।
ख से खादी के क्या कहने
बिछावें, ओढ़ें, कातें पहनें।
ग से गर्व संत ने छोड़ा
और प्रेम से नाता जोड़ां
घ से घड़ी लगाते बापू
काम समय पर करते बापू।

संथाली, बघेली, कोरकू, हलबी जैसी कई आदिवासी भाषाओं के लोकगीतों में गांधी की गूंज है. कई लोकभाषाओं में गांधी को देवता या अवतार की तरह निरूपित किया गया है. बस्तर में तो नशाबंदी के गीतों में भी महात्मा के संदेश गूंजे हैं. लोक साहित्य के विद्वान रामनारायण उपाध्याय ने लिखा है, ‘गांधी के आने और चले जाने के बाद लिखी गई कविताओं की अपेक्षा उन लोकगीतों का अधिक महत्व है, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम का उद्घोष किया और गांधी के जीवन-काल में उनका संग-साथ निभाया’.

‘लोकगीत की रस्सी’ से बंधने पर क्या बोले थे गांधी?

फैज़पुर कांग्रेस अधिवेशन के समय गांधीजी के साथ लोकगीतों को लेकर प्रसिद्ध लेखक और लोक साहित्य के अध्येता देवेंद्र सत्यार्थी ने एक संवाद किया था, जिसे बाद में उन्होंने अपने लेखों और भाषणों में भी बराबर याद किया, उसके ये अंश इस विषय पर गांधी जी की निष्काम भावना को प्रदर्शित करते हैं.

सत्यार्थी – और कोई नेता तो अभी लोकगीत की रस्सी से नहीं बंधा बापू… भारत के लोकगीतों में बुद्ध का नाम कहीं भी सुनाई नहीं देता और यह बुद्ध की जन्मभूमि के लिए लज्जा की बात है.

गांधी – बुद्ध के व्यक्तित्व में तो इससे कुछ अंतर नहीं पड़ा. लोकगीत की रस्सी में बंधकर ही कौन सुख मिलता है!

सत्यार्थी – जब बौद्ध धर्म को भारत से देश निकाला दिया गया होगा, तब लोकगीतों से भी बुद्ध का नाम निकाल दिया गया होगा…

गांधी – रस्सी आखिर रस्सी है. मुझे बंधना नापसंद है. यह बात बुद्ध को भी नापसंद रही होगी.

सत्यार्थी – यह तो बहुत पक्की नज़र आती है. अब आप इस रस्सी से छूटने के नहीं.

गांधी – यह भी हो सकता है कि कल ही मैं धरती से उठ जाऊं और मेरे पीछे लोकगीत से मेरा नाम हटाकर कोई दूसरा नाम जोड़ दिया जाये! मुझे तो खुशी ही होगी!

सत्यार्थी – बुद्ध का नाम निकालकर लोगों ने जो भूल की थी, अब नहीं दोहराएंगे.

गांधी – जब मैं हूंगा न तुम, तब कौन देखने आएगा?

आइंस्टीन ने कहा था कि आने वाली पीढ़ियों को विश्वास नहीं होगा कि गांधी जैसा हाड़-मांस का कोई इंसान सच में पैदा हुआ था. इतिहास के दार्शनिक टाॅयनबी ने प्रेम की नैतिकता के उत्थान के मामले में गांधी को जीसस क्राइस्ट से भी आगे कहा था और कई चिंतकों ने गांधी को बुद्ध के समकक्ष खड़ा किया. माउंटबैटन ने लिखा था, ‘गांधी को इतिहास में क्राइस्ट और बुद्ध के समकक्ष रखा जाएगा’. ये सब नाम विद्वानों के हैं और लोक के मन में गांधी की छवि देवता या मसीहा की रही, तो इतने भारी भरकम विचारों या शब्दों में नहीं बल्कि सीधे, भोले और सरस शब्दों व भावों में.

शोध एवं प्रस्तुति : भवेश दिलशाद

संदर्भ स्रोत:
1. साबरमती आश्रम, अहमदाबाद की चित्र वीथिकाएं
2. महात्मा गांधी 125वां जन्मवर्ष समारोह समिति, भोपाल द्वारा प्रकाशित ग्रंथ ‘गांधी लोकगीत’
3. एस.एन. शुक्ल विवि, शहडोल के कुलपति मुकेश कुमार तिवारी संपादित ग्रंथ ‘महिमामंडित मध्यप्रदेश में महात्मा गांधी’

Tags: Gandhi Jayanti, Mahatma gandhi, महात्मा गांधी

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