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साहित्य: कहानी के प्रवाह में बाधा बनतीं 'लंगड़ी उपमाएं'

साहित्य: कहानी के प्रवाह में बाधा बनतीं 'लंगड़ी उपमाएं'

उपमाओं का प्रयोग करते समय ध्यान रखना चाहिए कि वे लंगड़ी ना हों! भाषा का सौंदर्य तभी बचाया जा सकता है. (Google Image)

उपमाओं का प्रयोग करते समय ध्यान रखना चाहिए कि वे लंगड़ी ना हों! भाषा का सौंदर्य तभी बचाया जा सकता है. (Google Image)

अधिक उपमाएं कहानी के प्रवाह को बाधित करती हैं. इस तरह की उपमाएं अगर ये उपमाएं लंगड़ी हों तो मूल कहानी का मूल भाव ही नष्ट हो जाता है.

    सुधांशु गुप्त

    कहानियों में उपमाएं रूप की दृष्टि से ही नहीं, शिल्प की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं. शायद यही वजह है कि प्रेमचंद से लेकर अमरकान्त तक की कहानियों में उपमाएं देखने को मिलती हैं. इनके बाद के कथाकार भी उपमाओं के प्रयोग का लोभ संवरण नहीं कर पाए हैं. उपमाएं भाषा का सौंदर्य है. लेकिन हमें यह भी देखना चाहिए कि उपमाएं मौलिक और सटीक हों, वे लंगड़ी ना हों. उपमाओं और भाषा के सौंदर्य के मोह में लेखक कई बार लंगड़ी उपमाओं का प्रयोग कर बैठता है.

    यहां लेखक, या उनकी कहानियों पर चर्चा करना मकसद नहीं है मकसद सिर्फ इतना भर है कि उपमाओं का सही इस्तेमाल किया जाए. पिछले दिनों एक कहानी पढ़ी. कहानी का नायक गटर साफ करने का काम करता है. एक दिन तेज बारिश आती है. नायक बारिश में तमाम रूमानी उपमाएं गढ़ता है. ये उपमाएं तकनीकी रूप से ग़लत नहीं हैं. लेकिन संदर्भ ग़लत है. गटर साफ करने वाले को बारिश आने के बाद बारिश की टिप-टिप नहीं सुनाई देगी बल्कि वह यह सोचेगा कि आज गटर साफ करने का उसे अधिक काम मिल सकता है. वह अधिक पैसा कमा सकता है. बारिश उसके लिए सीधे-सीधे गटर से जुड़ी है. इसलिए यहां बारिश को रूमानियत से जोड़ना असंगत होगा.

    पता नहीं क्यों ऐसा हो रहा है कि कहानियों में चांद, तारे, बारिश, हरियाली और पहाड़ जब तब उपमा के रूप में चले आते हैं. कहीं-कहीं तो ये इतने खराब तरीके से आते हैं कि कहानी तक के प्रवाह को बाधित करते हैं. मुलाहिजा फरमाइए, एक गरीब बच्चा भूख से रो रहा है. उसकी आंखों में आंसू हैं. आंसू मां को चांद की तरह दिखाई देते हैं. यह उपमा असंगत है. जिस मां का बच्चा भूख से रो रहा है, वह उसके लिए खाने-पीने के इंतज़ाम के बारे में सोचेगी. चांद, तारे उसके ‘काग्निटो’ में नहीं हो सकते, नहीं होने चाहिए.

    एक वरिष्ठ लेखक की कहानियों में भी उपमाओं का गलत इस्तेमाल देखा जा सकता है. यानी वे भी लंगड़ी उपमाएं इस्तेमाल करते हैं. पिछले दिनों एक कहानी में इसी तरह की लंगड़ी उपमा देखने को मिली. कहानी का प्रौढ़ नायक अपने बेटे के रॉक शो में जाता है. वहां वह युवा लड़कियों को देखता है. छोटी उम्र की इन लड़कियों के वक्ष टेनिस बॉल की तरह हैं और उछल रहे हैं. ये उपमा तकनीकी रूप से गलत है, टेनिस की बॉल जितने वक्ष उछलते हुए दिखाई नहीं देंगे. यहां लेखक का मन वक्षों पर टिका है और इसके लिए वह गलत उपमा का भी प्रयोग करने से ख़ुद को नहीं रोक सकता.

    ऐसा नहीं है कि पहले के साहित्य में उपमाओं का प्रयोग नहीं किया गया. कालिदास ने काव्यात्मक सौंदर्य से भरी उपमाओं का बहुत प्रयोग किया है. लेकिन कालिदास की उपमाएं लंगड़ी नहीं होतीं. बॉलीवुड में भी स्त्री सौंदर्य के लिए भरपूर उपमाओं का प्रयोग किया गया है.

    जावेद अख्तर का लिखा एक गीत देखिएः एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा, जैसे खिलता गुलाब, जैसे शायर का ख्वाब, जैसे उजली किरण, जैसे वन में हिरण, जैसे चांदनी रात, जैसे मन्दिर में हो एक जलता दिया.

    यहां निरंतर एक सुन्दर लड़की को लेकर उपमाएं मौजूद हैं. ये उपमाएं सुनने में भी अच्छी लगती हैं. लेकिन याद रखिए यह गीत है. इसमें संगीत अपनी भूमिका निभा रहा है. लेकिन सोचिए यह उपमाएं किसी कहानी में होतीं तो कहानी का प्रवाह कितना बाधित होता.

    कई लेखक कहानियों में इसी तरह की उपमाओं का प्रयोग करते हैं. मिसाल के तौर पर मैं उस शाम के गाल पर ढुलक गई आंसू की बूंद थी, मैं सप्तम स्वर से पहले ही टूट गई वीणा के तार का अधूरा संगीत थी, हम रेल की उन दो समानांतर पटरियों से थे, जो कभी नहीं मिल पाए. हमारी अधूरी कथा अधूरी झाड़ियों में खो गई उस गेंद की तरह थी जो कभी नहीं मिली. मेरी रात का कोई दिन नहीं था. अलग से दी गई ये उपमाएं कहानी के प्रवाह को नष्ट करती हैं.

    आलोचक नामवर सिंह ने भी कहा था, अधिक उपमाएं कहानी के प्रवाह को बाधित करती हैं. इस तरह की उपमाएं अगर ये उपमाएं लंगड़ी हों तो मूल कहानी का मूल भाव ही नष्ट हो जाता है. लिहाजा हमें उपमाओं का प्रयोग करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि वे लंगड़ी ना हों! भाषा का सौंदर्य तभी बचाया जा सकता है.

    सुधांशु गुप्त (Sudhanshu Gupta)
    तीन दशकों तक पत्रकारिता करने के बाद सुधांशु गुप्त अब पूरी तरह से साहित्य में रम गए हैं. आपके तीन कहानी संग्रह 'खाली कॉफी हाउस', 'उसके साथ चाय का आख़िरी कप' और 'स्माइल प्लीज़' प्रकाशित हो चुके हैं. आपकी कहानियां, सामाजिक ताने-बाने पर लेख और समीक्षाएं तमाम पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं. रेडियो पर आपकी कई कहानियों का प्रसारण हो चुका है. आप  कतर-ब्योंत नाम से एक ब्लॉग भी चलाते हैं.

    Tags: Books

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