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मीठी यादें: कथाकार जैनेन्द्र कुमार 'जिन खोजा तिन पाइयां'

मीठी यादें: कथाकार जैनेन्द्र कुमार 'जिन खोजा तिन पाइयां'

जैनेन्‍द्र कुमार का हिन्दी गद्य के निर्माण में बड़ा योगदान रहा है.

जैनेन्‍द्र कुमार का हिन्दी गद्य के निर्माण में बड़ा योगदान रहा है.

हिन्दी जगत के प्रसिद्ध कथाकार जैनेन्‍द्र कुमार (Jainendra Kumar) ने उपन्‍यास, कहानी, निबन्‍ध तथा संस्‍मरण आदि अनके गद्य विधाओं पर लेखनी चलाई है.

    हिन्दी जगत के प्रसिद्ध कथाकार जैनेन्‍द्र कुमार (Jainendra Kumar) ने उपन्‍यास, कहानी, निबन्‍ध तथा संस्‍मरण आदि अनके गद्य विधाओं पर लेखनी चलाई है. जैनेंद्र अपने पात्रों को बड़े कौशल से प्रस्तुत करते हैं. हिन्दी गद्य के निर्माण में आपका बड़ा योगदान था. भाषा के स्तर पर जैनेन्द्र द्वारा की गई तोड़-फोड़ ने हिन्दी को तराशने का अभूतपूर्व काम किया. जैनेन्द्र ने हिन्दी को एक पारदर्शी भाषा और भंगिमा दी, एक नया तेवर दिया. जैनेन्‍द्र कुमार का जन्‍म 2 जनवरी, 1905 को अलीगढ़ जनपद के कौड़ियागंज नामक कस्‍बे में हुआ था. 24 दिसम्‍बर 1988 को इनका देहावसान हो गया.

    सुपरिचित लेखिका शशि अरुण ने वरिष्ठ कथाकार जैनेन्द्र कुमार के साथ मुलाकातों को कलमबद्ध किया है. शशि अरुण की पहली किताब जैनेन्द्र जी के ही 'पूर्वोदय प्रकाशन' से प्रकाशित हुई. उनके साथ अपने अनुभवों को साझा कर रही हैं शशि अरुण-

    पहली कहानी ने किया प्रभावित
    1964 में जब मैं मामा का बाजार स्कूल, लश्कर, ग्वालियर में नौवीं कक्षा में पढ़ती थी उस समय अपने कोर्स में एक कहानी पढ़ी थी ‘अपना अपना भाग्य.’ कहानी के लेखक थे जैनेन्द्र कुमार जैन. कहानी "मैं" कर के लिखी गई थी. बहुत ही भावुक और मार्मिक कहानी थी. एक पहाड़ी गरीब बच्चे की, लेखक और उनके मित्र मदद करना चाहते हैं लेकिन कर नहीं पाते हैं. वह गरीब बेसहरा बच्चा रात खुले आसमान में एक पेड़ के नीचे सो जाता है. रात को इतनी बर्फ पड़ती है कि बच्चा दब कर ठंड से मर जाता है. जिसका लेखक को बहुत पछतावा होता है कि वह उस बच्चे की मदद क्यों नहीं कर पाये.

    उस कच्ची उम्र में मेरे भी कोमल मन में यह बात बैठ गई थी कि लेखक को उस बच्चे की मदद करना चाहिये थी. उसके कुछ दिन बाद हमारे स्कूल में कुछ लोग समाजवादी साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिये आये. उन्होंने किताबों की प्रर्दशनी भी लगाई.

    सबने कोई न कोई किताब खरीदी. मैंने भी अपने प्रिय लेखक जैनेन्द्र कुमार जैन की दो किताबें खरीदीं, एक ‘त्यागपत्र’ (Tyagapatra) और दूसरी ‘सुनीता’(Sunita). मेरी हिन्दी की टीचर ने देखकर कहा भी कि तुमने यह क्यों खरीदीं? यह तुम्हारी समझ में नहीं आएगी. मेरी समझ में नहीं आया कि जब मैं किताब पढ़ लेती हूं तो समझ में क्यों नहीं आएगी. वह मेरे प्रिय लेखक की किताबें थीं इसलिये छोड़ कैसे देती.

    ‘त्यागपत्र’ भी 'मैं' सम्बोधन करके लिखीं गई थी इसलिये सभी पात्र आस-पास के ही लगे. जब बड़ी होकर दुबारा किताबें पढ़ीं तब लगा कि मेरी हिन्दी की टीचर ने उस समय जो कहा था सच था. जैनेंद्र जी के दर्शन को समझना इतना आसान या बच्चों का काम नहीं है. बचपन में क्या समझी क्या नहीं, पता नहीं. वह तो ऐसे लेखक हैं जो समाज में प्रचलित मान्यताओं से एकदम हट कर लिखते थे और जितनी बार पढ़ो लगता है, यह बात तो तब समझी ही नहीं थी.

    लेखन की शुरुआत
    मेरी एमए की पढ़ाई खत्म हो गई तो मैंने कहानियां लिखना शुरू किया. सन् 1973 में मेरी लिखी पहली ही कहानी ‘टीनू की बहादुरी’ ‘चंपक’ में छपी. तब से लगातार मैं लिखती रही और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और आकाशवाणी तथा दूरदर्शन पर मेरी कहानियां और लेख छपते रहे और प्रसारित होते रहे.

    मेरे पति का तबादला डी. आई. जी. कुमायूं रेंज के पद पर नैनीताल हो गया. हम लोग नैनीताल पहुंच गये. एक बार नैनीताल की पी. सी. एस. एकेडमी के डायरेक्टर टंडन साहब हमारे यहां आये. पता चला उन्हें पढ़ने-लिखने का भी बहुत शौक है. मैने उन्हें अपना नाम बताया तो वह चहक उठे. उन्होंने बताया कि उन्होंने मेरी कई कहानियां पढ़ी हैं.

    उन्होंने मुझे अपने लेखन को किताब की शक्ल देने की सलाह दी. लेकिन पति के तबादलों के चलते मैं किताब के प्रकाशन पर ज्यादा काम नहीं कर पाई. जब कुछ सेटल हुई तो किताब की याद आई. मैंने फाइल निकाली और पोस्ट करना ही चाहती थी कि मेरे पति ने कहा कि आर. पी. एफ. लखनऊ के सहायक सुरक्षा अघिकारी हुसैनी आज रात की गाड़ी से दिल्ली जा रहे हैं. वहां दो-तीन दिन रहेंगे. मैंने वह लिफाफा उनको दे दिया और उनसे अनुरोध किया कि यदि समय मिल जाये तो आप यह लिफाफा इस पते पर पहुंचा दें.

    करीब एक हफ्ते बाद हुसैनी हमसे मिलने आये. आकर बोले, ‘मैडम आपने मुझे कहां फंसा दिया. मैं तो आपका लिफाफा देने गया था उन्होंने तो मुझे पकड़ ही लिया और न जाने कौन-कौन सी किताबों के बारे में बोलते रहे.’

    मैंने पूछा, ‘क्या नाम है उनका’
    वह बोले, ‘नाम तो उन्होंने अपना कुछ बताया था लेकिन मैं भूल गया. कह रहे थे कि उनके अब्बा हुजूर कोई बड़े भारी हिन्दी के लेखक हैं. उनकी दो किताबें भी उन्होंने दीं हैं एक आपके लिये दूसरी मेरे लिये.’

    उन्होंने किताब मेरी ओर बढ़ाई किताब का नाम था ‘त्यागपत्र’. देखकर मैं तो दंग ही रह गई आश्चर्य से उनसे बोली, ‘आप इनसे मिले! क्या कह रहे हैं? यह तो मेरे प्रिय लेखक हैं जैनेन्द्र जी. यह पहली किताब है जिसे मैंने उस समय खरीदा था जब मैं कक्षा 9 में पढ़ती थी.’

    मैं बहुत खुश थी मन चाहता था कि उड़ कर दिल्ली चली जाऊं और जैनन्द्र जी से मिलूं . मैंने अपने पतिदेव से कहा कि मुझे दिल्ली जाना है। वह बोले, कुछ दिन बाद चलेंगे. जैनेन्द्र जी से मिलने को मेरा मन छटपटा रहा था क्योंकि मैं जैसे-जैसे बड़ी होती गई पढ़ने का शौक भी बढ़ता चला गया. जैनेन्द्र जी की तो शायद ही कोई किताब बची होगी जो मैंने नहीं पढ़ी होगी.

    एक बार उन्होंने धर्मयुग में लिख दिया था ‘पत्नी घर में प्रेयसी मन में’ उस पर बहुत हंगामा हुआ था. तरह तरह की अलोचनायें हुईं लेकिन वह अपनी बात पर अडिग रहे. मैंने सोचा जाने से पहले एक बार और उनकी किताबें पढ़ लूं बातचीत करने में आसानी रहेगी.

    जैनेंद्र जी से मुलाक़ात
    करीब एक महीने बाद मेरे पति दिल्ली गये, मैं भी साथ गई. रेलवे की यह बड़ी अच्छी बात होती थी, शायद अब भी होगी. अधिकारियों को गोल्डेन-सिल्वर पास आदि मिलते थे. वह सिक्के जैसे होते थे और चाबी के छल्ले में पड़े रहते थे. उससे अधिकारी अपने माता-पिता और बच्चों के साथ रेलवे में ए. सी. स्लीपर में कहीं भी जा सकते थे. उन्हें किराया नहीं देना पड़ता था. हम लोग दिल्ली गये. नई दिल्ली स्टेशन पर एक ओर कनाट प्लेस की तरफ सैलून साइडिंग थी. जहां कई सैलून जो पटरी पर किसी टेक्निकल खराबी के कारण चल नहीं सकते थे खड़े थे. उन्हें गेस्ट हाउस की तरह प्रयोग किया जाता था. हम लोग उसी में रुके.

    मैं एक ऑटो लेकर ‘पूर्वोदय प्रकाशन’ दरियागंज के कार्यालय के लिये चली. मेरा दिल धड़क रहा था. मैं समझ नहीं पा रही थी कि अपने श्रद्धेय लेखक से कैसे और क्या बात करूंगी. मैं बोलने में हमेशा से बहुत संकोची प्रवृत्ति की रही हूं. ऑटोवाले ने मुझे ‘पूर्वोदय प्रकाशन’ के सामने ले जाकर उतार दिया. मेरा दिल धड़क रहा था. मैं आगे बढ़ी एक चैकीदार टाइप के आदमी ने मुझसे पूछा, ‘किससे मिलना है?’

    मैंने जैनेन्द्र जी का नाम बताया. मुझे अंदर बुलाया गया, देखा एक दुबले पतले करीब 40-45 साल के व्यक्ति बैठे थे वह बोले, ‘मैं प्रदीप कुमार हूं उनका बेटा. आज बाबूजी अभी आये नहीं हैं. आप कौन हैं और आपको उनसे क्या काम है?’.
    मैंने अपना नाम बताया और कहा, ‘मैंने अपनी कुछ कहानियां आपके यहां भेजी हैं. उनके बारे में जानना चाहती हूं कि क्या मेरी किताब छप जायेगी.’
    प्रदीप जी मुस्कराये और बोले, ‘जब इतना अच्छा लिखती हैं तो किताब तो छापनी ही पड़ेगी.’
    ‘आपने अपनी किताब का नाम तो बताया ही नहीं.’
    मैंने कहा, ‘मुझे कुछ नहीं मालूम है, यह मेरी पहली किताब है. आप ही कुछ नाम रख दीजिये.’
    उन्होंने कहा, ‘ठीक है मैं ही कुछ सोच लूंगा.

    वह बोले, ‘आप बाबूजी से मिलना चाहती हैं. वह घर पर हैं, मैं किसी को आपके साथ भेज देता हूं. पास ही घर है. आप उनसे घर पर ही मिल लीजिये.’

    घर पहुंचकर मैंने देखा एक दुबले-पतले करीब 5 फीट 7 इंच के गोरे से व्यक्ति छत पर ही बैठे थे. मैंने श्रद्धा से उनके पांव छुये. मैं पास ही रखी एक कुर्सी पर बैठ गई. मेरे मुंह से शब्द नहीं निकल रहे थे. तभी शायद मेरा संकोच देखकर बाबू जी बोले, ‘मैंने तुम्हारी कहानियां पढ़ी, अच्छा लिखती हो. ऐसे ही सदैव लिखती रहना.’
    बाबू जी ने कहा, ‘तुम अपनी किताब की भूमिका किसी से लिखवा लो जरूरत पड़ेगी.’
    मैंने कहा, ‘बाबूजी आप ही आशीर्वाद स्वरूप कुछ शब्द लिख दीजिये.’

    वह मुस्कुराये और बोले,‘मेरा आशीर्वाद तो है ही, तभी तो अपने प्रकाशन से छाप रहा हूं. तुम वहीं किसी से लिखवा लेना. लखनऊ में तो बहुत बड़े-बड़े साहित्यकार रहते हैं.’

    इससे आगे मैं क्या कहती इसलिये उन्हें धन्यवाद कहा और उनके चरण स्पर्श करके वापस आ गई. मैंने तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि कभी अपने प्रिय लेखक से मिल भी पाऊंगी लेकिन न सिर्फ मिली बल्कि मेरी पहली किताब भी उन्हींने छापी.

    रवींद्रालय लखनऊ
    कुछ साल बाद शायद 1985 में बाबू जी को उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान से काफी बड़ा पुरस्कार मिला जिसका नाम मैं भूल रही हूं लेकिन इतना याद है कि पुरस्कार की धनराशि एक लाख रुपया थी. प्रदीप जी का पत्र आया कि बाबू जी को इस दिन रवीन्द्रालय में पुरस्कार मिलेगा. उन्होंने कार्ड भी भेजा था.

    निर्धारित तारीख को हम लोग रवीन्द्रालय पहुंच गये. मेरे पति जैनेंद्र जी से पहली बार मिले थे. कार्यक्रम में बाबूजी बोले, 'मुझे पुरस्कार मिला अच्छा लगा. पुरस्कार किसे बुरा लगता है. इससे मिलने वाली धनराशि के लिये भी मैं धन्यवाद देता हूं और सहर्ष स्वीकार भी करता हूं. मैं इतना अमीर नहीं हूं कि महान बनने के लिये कह दूं कि इसे लौटाता हूं या किसी को दान स्वरूप देता हूं. मैं कोशिश करूंगा कि इस धनराशि का साहित्य की सेवा में ही उपयोग करूं.'

    1987 में मेरे पति की पोस्टिंग मेरठ डी. आई. जी. के पद पर हो गई. प्रदीप जी से पता चला कि बाबू जी की तबियत और खराब रहने लगी है. हम लोग उनसे मिलने दिल्ली गये. अब वह मोतीबाग के बड़े से बंगले में रह रहे थे. सरकार की ओर से अलॉट कर दिया गया था.

    24 दिसम्बर, 1988 को अचानक पता चला कि बाबूजी चले गये. भारी मन से हम लोग दिल्ली गये और अंतिम यात्रा में शामिल हुये. इसके बाद भी प्रदीप जी से कई सालों तक सम्बंध चलते रहे. हम लोग जब कभी दिल्ली जाते तो उनसे मिलने जाते थे. बाद में यह सिलसिला कम होते-होते टूट गया. लेकिन जैनेंद्र जी की यादें, वो आज भी मन मस्तिष्क में ऐसे ताज़ा हैं, मानो कल ही की बात हो.Shashi Arun

    Tags: Books

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