प्रेम की खोज की यात्रा है विजय सिंह का उपन्यास 'जया गंगा'

आत्मकथात्मक शैली में लिखे गए उपन्यास 'जया गंगा' में जितना रहस्य है, उतना ही रोमांस और शृंगार भी है.

जया गंगा' उपन्यास प्रेम की तलाश में एक ऐसे सफर की कहानी है जहां बाहरी और आंतरिक दुनियाओं का विलय हो जाता है.

  • Share this:
    लेखक, फिल्मकार और पटकथा लेखक विजय सिंह का उपन्यास 'जया गंगा' राजकमल प्रकाशन (Rajkamal Publication) से हिंदी में प्रकाशित हुआ है. अंग्रेजी और फ्रेंच में प्रकाशित होते ही इस किताब ने इन भाषाओं के पाठकों के बीच जबरदस्त लोकप्रियता हासिल की थी. इस पर बनी फिल्म भी फ्रांस और इंग्लैंड में पसंद की गई, जबकि करीब 40 देशों में प्रदर्शित हुई. 'जया गंगा' पहली बार फ्रेंच भाषा में वर्ष 1985 में प्रकाशित हुई थी. लगभग 35 वर्ष बाद यह पुस्तक हिंदी में प्रकशित हुई है.

    हिंदी में 'फ्रेंच इंस्टिट्यूट इन इंडिया' के सहयोग से प्रकाशित यह उपन्यास पेरिस में रहने वाले एक युवा भारतीय निशांत की हिमालय में गंगा के उद्गम से शुरू की गई यात्रा की कहानी है.

    उपन्यास के हिंदी में प्रकाशन के बारे में भारत में फ्रांस के राजदूत इमैनुएल लेनैन (France Ambassador Emmanuel Lenain) ने कहा कि जया गंगा का हिंदी में अनुवाद एक चक्र के पूरा होने और भारतीय व फ्रांसीसी संस्कृतियों के बीच परस्पर आदान-प्रदान का एक आदर्श उदाहरण है. फ्रांस सरकार इस सहयोग को लेकर उत्साहित है और इसका पूरा समर्थन करती है.

    यह उपन्यास प्रत्यक्ष तौर पर प्रेम की खोज की यात्रा की कहानी है, लेकिन यह यात्रा भौतिक और आध्यात्मिक दोनों धरातलों पर एक साथ चलती है.

    यह भी पढ़ें- भारतीय इतिहास, भारत के विकास के साथ कई और विषयों की कथा 'बुधिनी'

    उपन्यास का नैरेटर निशांत गंगा के प्रवाह के साथ यात्रा करता हुआ अपनी आत्मीय जया की स्मृति से भी गुजरता जाता है. इसी दौरान उसकी मुलाकात जेहरा से होती है जो तवायफ है. मन के भीतर जया और जेहरा की छवियां लिये वह अपने मार्ग में साधुओं, नाविकों, इंजीनियरों, स्थानीय पत्रकारों, तवायफों और दलालों से भी रू-ब-रू होता है. इसके साथ ही यह यात्रा जीवन और संबंधों के प्रति एक बिलकुल अलहदा नजरिया पेश करने वाले रूपक में बदल जाती है.

    उपन्यास के हिंदी में प्रकाशन पर प्रसन्नता जताते हुए इसके लेखक विजय सिंह ने कहा, 'इस किताब को दुनिया में बसते हुए आज 35 साल हो चुके हैं. इसकी फ्रेंच और इंग्लिश में काफी चर्चा भी हुई है. लेकिन इस दौरान मैंने हमेशा महसूस किया है कि इस किताब की जो आत्मा है, जो इसकी रूह है, वह हिंदी में ही पहचानी जा सकती है.'

    आत्मकथात्मक यात्रावृत्त की शक्ल में लिखा गया यह उपन्यास जब पहली बार फ्रांस में छपा था तब वहां के साहित्यिक दायरे में इसको काफी प्रशंसा मिली. इसको ऐसी कृति बताया गया जिसमें बाहरी और आंतरिक दुनिया अभूतपूर्व रूप से आपस में घुल मिल गई है. आगे चलकर लेखक ने इस उपन्यास पर एक फिल्म भी बनाई जो फ्रांस और इंग्लैंड के सिनेमाघरों में रिकॉर्ड 49 सप्ताह चली, जबकि दुनिया के 40 देशों में इसे प्रदर्शित किया गया.

    'जया गंगा' के हिंदी में प्रकाशन को एक महत्वपूर्ण साहित्यिक परिघटना करार देते हुए राजकमल प्रकाशन (Rajkamal Prakashan) के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी (Ashok Maheshwari) ने कहा, 'हम इस बात से काफी रोमांचित हैं कि 'जया गंगा' भारत में राजकमल द्वारा हिंदी में प्रकाशित हो रही है. यह हमारे लिए एक विशेष मार्मिक क्षण भी है क्योंकि यह प्रसिद्ध कवि मंगलेश डबराल द्वारा अनूदित अंतिम किताब है.' उन्होंने कहा, 'हमें विश्वास है इसमें लिखे हुए शब्द और गंगा दोनों की यात्रा हमेशा चलती रहेगी और पाठक के मन पर निरंतर नए-नए छाप छोड़ेगी.'

    'जया गंगा' पहली बार फ्रेंच भाषा में वर्ष 1985 में प्रकाशित हुई थी इसके बाद यह अंग्रेजी में आई.करीब 35 साल बाद अब यह हिंदी में प्रकाशित हुई है.

    लेखक विजय सिंह के बारे में (Author Vijay Singh)
    लेखक और फिल्मकार विजय सिंह पेरिस में रहते हैं. सेंट स्टीफेंस कॉलेज दिल्ली और जेएनयू से इतिहास का अध्ययन के बाद आप शोधकार्य के लिए इकोले दे हॉट्स एटीट्यूड एन साइंसेज सोशिएल्स, पेरिस चले गए. विद्यार्थी जीवन से ही आपने ल मोंदे, ल मोंदे डिप्लोमेटिक लिबरेशन और गार्डियन आदि पत्रों में लेखन आरम्भ कर दिया था जो आज तक जारी है.

    रंग निर्देशक के रूप में आपने 1976 में ‘वेटिंग फॉर बैकेट बाइ गोदो’ नाटक का निर्देशन किया. आपने ‘मैन एंड एलिफैंट’ फिल्म का निर्देशन (1989) किया.

    आपकी प्रकाशित पुस्तकों में ‘जया गंगा’ (1990), ‘ल नुइट पोइग नार्दे’ (1987), ‘व्हर्लपूल ऑफ़ शैडोज़’ (1992), ‘द रिवर गॉडेस’ (1994) आदि शामिल हैं. साहित्यिक लेखन के लिए आपको प्रिक्स विला मेडिसिस हॉर्स लेस मुर्स तथा फिल्म पटकथा लेखन के लिए बोर्स लिओनार्दो डि विंसी पुरस्कार मिल चुके हैं.

    अनुवादक मंगलेश डबराल (Mangalesh Dabral)
    मंगलेश डबराल का जन्म 16 मई, 1948 को उत्तराखंड में टिहरी जिले के गांव काफलपानी में हुआ. विभिन्न पत्र–पत्रिकाओं में लम्बे समय तक काम करने के बाद वे तीन वर्ष तक नेशनल बुक ट्रस्ट के सलाहकार रहे. उनके पांच कविता-संग्रह ‘पहाड़ पर लालटेन’, ‘घर का रास्ता’, ‘हम जो देखते हैं’, ‘आवाज़ भी एक जगह है’, ‘नये युग में शत्रु’; तीन गद्य-संग्रह ‘एक बार आयोवा’, ‘लेखक की रोटी’ और ‘कवि का अकेलापन’ और साक्षात्कारों का एक संकलन प्रकाशित है.

    उन्होंने बेर्टोल्ट ब्रेश्ट, हांस माग्नुस ऐंत्सेंसबर्गर, यानिस रित्सोस, ज़्बिग्नीयेव हेर्बेत, तादेऊष रूज़ेविच, पाब्लो नेरूदा, एर्नेस्तो कार्देनाल, डोरा गाबे आदि की कविताओं का अंग्रेजी से अनुवाद किया है. 9 दिसम्बर, 2020 को नई दिल्ली में मंगलेश डबराल का निधन हुआ था.

    पढ़ें Hindi News ऑनलाइन और देखें Live TV News18 हिंदी की वेबसाइट पर. जानिए देश-विदेश और अपने प्रदेश, बॉलीवुड, खेल जगत, बिज़नेस से जुड़ी News in Hindi.