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लॉकडाउन के समय का अहम दस्तावेज है '1232KM कोरोना काल में एक असंभव सफ़र'

लॉकडाउन के समय का अहम दस्तावेज है '1232KM कोरोना काल में एक असंभव सफ़र'

Vinod Kapdi ने  लॉकडाउन में प्रवासी मजदूरों की घर वापसी की संघर्षगाथा को '1232 किमी: कोरोना काल में एक असंभव सफर' नाम से एक किताब की शक्ल दी है.

Vinod Kapdi ने लॉकडाउन में प्रवासी मजदूरों की घर वापसी की संघर्षगाथा को '1232 किमी: कोरोना काल में एक असंभव सफर' नाम से एक किताब की शक्ल दी है.

‘1232km : कोरोना काल में एक असम्भव सफ़र’ ऐसे ही सात प्रवासी मजदूरों की गांव वापसी का आंखों देखा वृत्तान्त है. उन्होंने दिल्ली से सटे गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश) से अपना सफ़र शुरू किया, जहां से सहरसा (बिहार) स्थित उनका गांव 1232 किलोमीटर दूर था. उनके पास साइकिलें थीं लेकिन उनका सफ़र कतई आसान नहीं था.

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    Hindi Sahitya News: कोरोना महामारी के दौरान लगे लॉकडाउन में प्रवासी मजदूरों की व्यथा हम सभी ने देखी है. सिर पर सामान रखे नन्हें-नन्हें बच्चों की उंगलियां थामे लाखों मजदूर पैदल ही हजारों किलोमीटर की यात्रा पर निकल पड़े थे. भूख-प्यास और थकान से बेहाल कई लोगों ने तो रास्ते में ही दम तोड़ दिया था.

    पत्रकार-फिल्मकार विनोद कापड़ी (Vinod Kapdi) ने प्रवासी मजदूरों की इस पद यात्रा को कलमबद्ध किया है और इस संघर्ष को ‘1232 किमी: कोरोना काल में एक असंभव सफर’ नाम से एक किताब की शक्ल दी है. राजकमल प्रकाशन से छपकर आई इस किताब का इंडिया हैबिटेट सेंटर लोकार्पण किया गया.

    लोकार्पण के समय दिग्गज पत्रकार और लेखकों ने इस पुस्तक पर चर्चा भी की. चर्चा में यह बात निकलकर सामने आई कि ‘1232 किमी: कोरोना काल में एक असंभव सफर’ एक मुश्किल वक्त का वृत्तान्त तो है ही, आने वाली पीढ़ियों को सबक देने वाला एक जरूरी दस्तावेज भी है. महामारी के प्रकोप के बीच देश जब विभाजन के दौर से भी बड़ा पलायन देख रहा था, तब साइकिल से 1232 किलोमीटर का सफर तय कर अपने गांव पहुंचने वाले सात श्रमिकों की यह कहानी जितनी मार्मिक है, उतनी ही प्रेरक भी है.

    चर्चा में किताब के लेखक विनोद कापड़ी और इसके दो नायकों रितेश कुमार पंडित व रामबाबू पंडित से वरिष्ठ पत्रकार स्मिता शर्मा और जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता योगिता भयाना ने बातचीत की.

    विनोद कापड़ी ने बताया कि उन्होंने कोरोना के कारण बीते साल लगे लॉकडाउन के दौरान मजदूरों के अभूतपूर्व पलायन और मुसीबतों को दर्ज करना अपना नैतिक और सामाजिक कर्तव्य समझा. उन्होंने कहा- ‘मुझे बड़ा संकोच हो रहा था कि लोग इसको आपदा में अपना स्वार्थ साधना समझ सकते हैं, लेकिन आखिरकार मुझे मजदूरों के साथ जाना और उनकी आपबीती को दर्ज करना सबसे जरूरी लगा.’

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    विनोद कापड़ी कहते हैं, ‘लॉकडाउन के बाद लाखों मजदूरों ने जो पलायन किया वह आजादी के बाद का सबसे बड़ा पलायन था. ऐसे सात मजदूरों के एक समूह के साथ मैं और मेरे एक दोस्त भी पूरे सफ़र में साथ-साथ चले, मुझे हमेशा यह डर सता रहा था कि अगर इनमें किसी एक को भी कुछ हो गया तो मैं अपने आप को कभी माफ़ नही कर पाऊंगा.’

    इस यात्रा के अनुभवों को किताब की शक्ल देने के अपने विचार के बारे में विनोद कापड़ी ने कहा, ‘किताब इस पूरी कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. हम मजदूरों के साथ डॉक्यूमेंट्री बनाने निकले थे, लेकिन किताब लिखना जरूरी लगा क्योंकि इसमें वह हर चीज आ गई जो हम डॉक्यूमेंट्री में शामिल नही कर पाए थे. इस किताब के प्रति लोगों ने जबरदस्त उत्साह दिखाया जिससे वे अभिभूत हैं. जल्द ही यह किताब तमिल, मराठी, तेलुगु, और कन्नड में भी प्रकाशित होने वाली है. इंग्लिश में यह पहले ही प्रकाशित हो चुकी है.’

    राजकमल प्रकाशन समूह के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने कहा कि ‘1232 किमी : कोरोना काल में एक असंभव सफर’ हमारे समय की एक बड़ी त्रासदी का मार्मिक वृत्तान्त है. सात श्रमिकों की आपबीती के बहाने कोरोना काल के दौरान हुए श्रमिकों के पलायन की जो कहानी इसमें दर्ज है, वह आधुनिक भारत के इतिहास का सबसे अनपेक्षित और दुखद तथ्य है.

    यह उन श्रमिकों की मुश्किलों की, साथ ही उनके जज्बे की कहानी है. यह जितनी उनकी कहानी है उतनी ही हमारे देश-समाज और दौर की है.

    अशोक माहेश्वरी ने कहा कि यह किताब बतलाती है कि आपदा के समय एक लोकतांत्रिक समाज के रूप में हम किस हद तक विफल रहे. यह उन असमानताओं और विसंगतियों को उजागर करती है जिनसे अनजान बने रहकर, हम दुनिया में अव्वल होने का दम भरते आये थे. इसीलिए हमने इसे प्रकाशित करना जरूरी समझा. यह एक जरूरी दस्तावेज है, जो हमें अपने समय को समझने का एक नजरिया देगी. साथ ही आने वाली पीढ़ियों के लिए, इतिहास के एक जरूरी यादगार के रूप में, सबक का जरिया भी बनेगी.

    Vinod Kapdi Book

    बातचीत के दौरान इस किताब के नायकों रितेश और रामबाबू ने भी अपने अनुभव साझा किए. रामबाबू ने कहा, कोरोना काल में लॉकडाउन हम गरीबों लिए घातक साबित हुआ, गरीब भी भारत के नागरिक हैं. इसलिए सरकार को कोई फैसला लेते वक्त गरीबों को भी ध्यान में रखना चाहिए.

    रितेश और रामबाबू ने लॉकडाउन के दौरान भुगते कष्ट का बयान भी किया और बताया कि काम व खाने-पीने की दिक्कत होने के बाद ही हमने सोचा कि परदेस में भूखों मरने से अच्छा है अपने गांव जाकर मरें. यही सोचकर हम सात साथी गाजियाबाद से सहरसा तक 1232 किलोमीटर के सफर पर साइकिल से ही निकल पड़े.

    ‘1232km : कोरोना काल में एक असम्भव सफ़र’ के बारे में
    कोरोना के कारण 2020 में घोषित लॉकडाउन ने करोड़ों भारतीयों को अकल्पनीय त्रासदी का सामना करने के लिए विवश कर दिया. नगरों-महानगरों में कल-कारखानों पर ताले लटक गए; काम-धन्धे रुक गए और दर-दुकानें बन्द हो गईं. इससे मजदूर एक झटके में बेरोजगार, बेसहारा हो गए. मजबूरन उन्हें अपने गांवों का रुख करना पड़ा. उनका यह पलायन भारतीय जनजीवन का ऐसा भीषण दृश्य था, जैसा देश-विभाजन के समय भी शायद नहीं देखा गया था. लॉकडाउन के कारण आवागमन के रेल और बस जैसे साधन बन्द थे, इसलिए अधिकतर मजदूरों को अपने गांव जाने के लिए डेढ़-दो हजार किलोमीटर की दूरी पैदल तय करनी पड़ी. कुछेक ही ऐसे थे जो इस सफर के लिए साइकिल जुटा पाए थे.

    ‘1232km : कोरोना काल में एक असम्भव सफ़र’ ऐसे ही सात प्रवासी मजदूरों की गांव वापसी का आंखों देखा वृत्तान्त है. उन्होंने दिल्ली से सटे गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश) से अपना सफ़र शुरू किया, जहां से सहरसा (बिहार) स्थित उनका गांव 1232 किलोमीटर दूर था. उनके पास साइकिलें थीं लेकिन उनका सफ़र कतई आसान नहीं था. पुलिस की पिटाई और अपमान ही नहीं, भय, थकान और भूख ने भी उनका कदम-कदम पर इम्तिहान लिया. फिर भी वे अपने मकसद में कामयाब रहे.

    यह किताब सात साधारण लोगों के असाधारण जज़्बे की कहानी है, जो हमें उन कठिनाइयों, उपेक्षाओं और लाचारी से भी रू-ब-रू करती है, जिनका सामना भारत के करोड़ों-करोड़ लोगों को रोज करना पड़ता है.

    Tags: Hindi Literature

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