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काका हाथरसी हास्य कवि सम्मेलन में कभी हंसी और ठहाकों की फुहार, तो कभी गंभीर कटाक्ष

काका हाथरसी हास्य कवि सम्मेलन में कभी हंसी और ठहाकों की फुहार, तो कभी गंभीर कटाक्ष

हास्य सम्राट काका हाथरसी (Kaka Hathrasi) की स्मृति में नई दिल्ली के प्यारेलाल भवन में हास्य कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया.

हास्य सम्राट काका हाथरसी (Kaka Hathrasi) की स्मृति में नई दिल्ली के प्यारेलाल भवन में हास्य कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया.

कवि सम्मेलन में जहां देर शाम तक हंसी और ठहाकों की फुहार में श्रोता सराबोर रहे, वहीं कुछ कवियों ने सामाजिक और राजनीतिक कुव्यवस्थाओं पर गंभीर व्यंग्य बाण भी छोड़े. सम्मेलन की अध्यक्षता प्रसिद्ध हास्य कवि और व्यंग्यकार सुरेंद्र शर्मा ने की तथा संचालन युवा कवि चिराग जैन ने किया.

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    Hasya Kavi Sammelan: हास्य सम्राट काका हाथरसी (Kaka Hathrasi) की स्मृति में नई दिल्ली के प्यारेलाल भवन में हास्य कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया. कवि सम्मेलन का आयोजन काका हाथरसी पुरस्कार ट्रस्ट (Kaka Hathrasi Puraskar Trust) और राजस्थान क्लब (Rajasthan Club) के संयुक्त तत्वावधान में किया गया.

    इस अवसर पर हास्य कवि सरदार मनजीत सिंह को ‘काका हाथरसी हास्य रत्न’ से सम्मानित किया गया. सम्मान समारोह के बाद देश-विदेश में प्रतिष्ठित कवियों ने काव्य पाठ किया.

    कवि सम्मेलन में जहां देर शाम तक हंसी और ठहाकों की फुहार में श्रोता सराबोर रहे, वहीं कुछ कवियों ने सामाजिक और राजनीतिक कुव्यवस्थाओं पर गंभीर व्यंग्य बाण भी छोड़े. सम्मेलन की अध्यक्षता प्रसिद्ध हास्य कवि और व्यंग्यकार सुरेंद्र शर्मा ने की तथा संचालन युवा कवि चिराग जैन ने किया.

    काव्य पाठ की शुरूआत कवि सरदार मनजीत सिंह के राजनीतिक व्यवस्था पर व्यंग्य बाणों से हुई. उन्होंने राजनीति के अपराधीकरण के लिए कहीं हद तक खुद जनता को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा-

    खरबूजा मीठा चुनने में टाइम लगाते हैं
    तरबूज ठोक-बजा के घर में लाते हैं
    देते हैं गाली, कोसते नेता को पांच साल
    भ्रष्टों को चुनने में ना एक मिनट लगाते हैं।

    हिंदी साहित्य की वाचिक परंपरा के स्थापित कवि मनजीत सिंह (Sardar Manjeet Singh) ने एक अन्य रचना में वर्तमान नेताओं को हमारे पौराणिक खलनायकों से भी बड़ा बताया-

    नेता जी के पांव से लिपट गया कुंभकर्ण
    नेता बोला गंगा काहे उलटी बहाते हैं
    परमपूज्य आप हैं और कितने हैं मितव्ययी
    छह माह सोते बस एक दिन खाते हैं।
    कुंभकर्ण बोला- आप ही हमारे देवता हैं
    किसी को ना दिखता है, हर पल खाते हैं
    वोट जब पड़ते हैं आप तब जगते हैं
    आंखें खुली छोड़ पांच साल सो जाते हैं।।

    कवि महेन्द्र अजनबी (Kavi Mahendra Ajnabi) ने लॉकडाउन में घर लौटते प्रवासी मजदूरों की व्यथा पर एक बड़ी ही मार्मिक और जीवंत रचना प्रस्तुत की-

    देखो-देखो वह जा रहा है
    उसे रोक लो वह जा रहा है
    कोरोना का नहीं उसे कोई भय
    मन में नहीं है उसके कोई संशय
    कदमों की देखो-देखो उसकी लय
    होकर चला-चला वो निर्भय
    पोटली में स्वाभिमान दबा कर
    कांधे पर बच्चों को बिठाकर
    अंगोछे का मास्क बनाकर
    देखो-देखो वह जा रहा है।।
    रोक लो उसे वह जा रहा है
    रोजी छूटी, छूट गया काम
    जेब में नहीं बचे थे दाम
    नहीं पता क्या महामारी है
    उससे बड़ी उसकी लाचारी है
    इस शहर में हमेशा फुटपाथ देखा
    ढूंढ़ने चला वह अपनी लक्ष्मण रेखा
    उसे भरोसा था अपने हाथों पर
    जिसे इस शहर तो तोड़ दिया
    अब भरोसा है अपने पैरों पर
    इसलिए पैदल ही जा रहा है
    देखो-देखो वह जा रहा है
    रोक लो उसे वह जा रहा है।।
    वह जा रहा है साइकिल-रिक्शे से
    वह जा रहा है माल ढोते ट्रक से
    वह जा रहा है मालगाड़ी से
    वह जा रहा है टैंकर के भीतर बैठकर
    वह जा रहा है कंटेनर से
    फिर भी कोई नहीं ले रहा है
    तो वह पैदल ही जा रहा है
    देखो-देखो वह जा रहा है।।
    उसके सोशल डिस्टेंस का पैमाना बहुत बड़ा है
    वो आपसे दो गज़ की दूरी पर नहीं
    मीलो-मील दूर खड़ा है
    बुनकर लाया था वह यहां अनगिनत सपने
    पर ये शहर वाले कब हुए उसके अपने
    आंखों में घर की प्यास लेकर
    अपनों से मिलने की आस लेकर
    सूनी डगर पर चलता जाता
    नगर छोड़ चला नगर निर्माता
    वह चला जाएगा दुत्कार खाता हुआ
    वह चला जाएगा यूं मार खाता हुआ
    कीटनाशक की बौछार पाता हुआ
    देखो-देखो वह जा रहा है
    उसे रोक लो वह जा रहा है।।
    वह पहुंच गया है बॉर्डर पर
    वह पहुंच गया है बरेली
    वह पहुंच गया है चंदौली
    वह चला जायेगा मधुबनी के किसी गांव में
    वह चला जायेगा अपने पीपल की छांव में
    वह चला जाएगा अपनों के बीच
    ताकि उनके साथ जी भर कर जी सके
    या फिर कुछ ऐसा कर सके
    अगर किसी भी तरह जी न पाया
    तो जी भर के मर सके
    देखो-देखो वह जा रहा है
    उसे रोक लो वह जा रहा है।।

    हास्य कवि सरदार मनजीत सिंह ‘काका हाथरसी हास्य रत्न’ से सम्मानित

    कवि सम्मेलन का संचालन कर रहे चिराग जैन (Kavi Chirag Jain) अपने काव्य पाठ की शुरूआत कुछ इस तरह की-

    ”प्यादों को बहुत देर तक पैदल मत चलने देना
    कहीं ऐसा ना हो कि ये पैदल चलते-चलते वजीर हो जाएं”

    Kavi Chirag Jain

    लॉकडाउन में घर में कैद आदमियों की स्थिति पर चिराग ने बहुत ही शानदार दृश्य खींचा. चिराग जैन ने कहा कि अगर हमारे पुराने कवि इस लॉकडाउन में घरों मे कैद होते तो उसकी क्या स्थिति होती. चिराग ने घर में कैद काका हाथरसी और गोपालदास नीरज की व्यथा को कुछ इस तरह बयां किया-

    (काका हाथरसी के बारे में)
    किसी काम ना आ रही सम्मेलन की ड्रेस
    काकाजी खुद लग गए करने कपड़े प्रेस
    करते कपड़े प्रेस गंध महकी घर भर में
    क्या फूंका…का मंत्र गूंजा काकी के स्वर में
    जब तक काकी ने कमरे के भीतर झांका
    कपड़े नहीं इस्त्री फूंक चुके थे काका

    (गोपालदास नीरजजी के बारे में)
    हींग भी गली ना थी कि हाय छौंक जल गया
    क्या हुआ जो फ्राईपेन का कलर बदल गया
    सब्जियां मचल गईं, मटर-मटर उछल गया
    ये हसीन सीन घर की लक्ष्मी को खल गया
    सात सुर पिछड़ गए, छंद सब बिगड़ गए
    फिर रसाई की तरफ तब किसी के पांव बढ़ गए
    और हम डरे-डरे शोकसुप्त खड़े-खड़े
    गैस की मशाल का कमाल देखते रहे
    कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

    युवा कवि मनीषा शुक्ला (Kavi Manish Shukla) एक गीत सुनाया-

    हमें सूरज उगाने हैं, मिटा कर रात जाएंगे
    जुवा कट जाएगी फिर भी बता कर बात जाएंगे
    अंधेरों के शहर में हम चिरागों की जमानत हैं
    तुम ही बोलो, भला कैसे हवा के साथ जाएंगे

    Kavi Manish Shukla

    मनीषा शुक्ला ने अपने गीत ‘मीठा कागज़’ (Meeta Kaagaz) पर श्रेताओं की खूब तालियां बटोरीं. उन्होंने सुनाया-

    हमसे पूछो दिन में कितने दिन, रातों में कितनी रातें
    हमसे पूछो कोई खुद से कर सकता है कितनी बातें.

    रेलवे के वरिष्ठ अधिकारी और हास्य कवि महेश गर्ग ‘बेधड़क’ (Mahesh Garg Bedhadak) ने कहा कि हास्य तो रोजमर्रा की घटनाओं से निकलता है. उन्होंने छोटी-छोटी रचनाओं के माध्यम से हास्य की फुहार छोड़ी-

    फ्रंट रो एक नेता चल रहे थे साथ-साथ
    झकझकाती ड्रेस उनकी देखकर मैंने कहा
    तीन पीढ़ी से यही पोशाक, कोई खास बात
    वो जरा से मुस्कुराए, कवि से कोई क्या छिपाए
    आजकल इसके बिना पहचान नहीं है
    और असल बात इसमें गिरेबान नहीं है

    लॉकडाउन में एक अधिकारी की व्यथा को महेश गर्ग कुछ ऐसे बयां किया-

    अफसर होना व्यर्थ है, घर में पूछ ना ताछ
    पत्र प्रपोजल छोड़कर बना रहे हैं छाछ
    बना रहे हैं छाछ प्रभु क्या हालत किनी
    मैडम का भी काम रह गया है नुक्ताचीनी
    बच्चे भी कोस रहे हैं इन्हें आता-जाता खाक नहीं
    केवल बॉस रहे हैं

    कवि वेद प्रकाश वेद (Poet Ved Prakash Ved) ने भी अपनी रचनाओं से खूब गुदगुदाया. वेद प्रकाश वेद वो कवि है जो अपने हास्य व्यंग की कविताओं से समाज पर सीधा कटाक्ष करते है. उन्होंने कहा-
    लॉकडाउन में हमारे विचार तो खुल गए
    लेकिन जिंदगी तकियानूसी हो गई

    हास्य कवि अरुण जैमिनी (Arun Gemini) ने भी काफी देर तक अपनी रचनाओं के माध्यम से श्रोताओं को काव्य रस से सराबोर किया.

    वरिष्ठ कवि सुरेंद्र शर्मा (Kavi Surendra Sharma) ने अपने संबोधन में खुद को सबसे कम उम्र का व्यक्ति बताते हुए कहा कि वह खर्च की हुई उम्र की नहीं बल्कि बची हुई उम्र की बात करते हैं. संपत्ति वो नहीं होती जो आपने खर्च कर दी, संपत्ति वह होती है जो आपके पास बची हुई है.

    उन्होंने कहा कि बेवजह 90 साल की जिंदगी जीने से बेहतर है कि सार्थक 40 साल की स्वामी विवेकानंद की जिंदगी जी जाए.

    सुरेंद्र शर्मा (Surender Sharma) ने कहा कि कवि वह होता है जो किसी को नहीं बख्शता. यहां उन्होंने सूरज पर अपनी एक कविता का पाठ किया-

    सूर्य तुम बड़े महान हो
    तुम्हारी महानता को मैं मानता हूं
    तुम्हारी ताकत को मैं स्वीकारता हूं
    क्योंकि तुम सुखा देतो हो
    नदियां-नाले-पोखर-झरने-तालाब
    पर मुझे
    तुम्हारी कमजोरी पर बड़ा तरस आता है
    जब तुम नहीं सुखा पाते
    किसी मजदूर के पसीने की बूंदें

    हास्य के स्थापित हस्ताक्षर सुरेंद्र शर्मा ने कहा कि आज संकट पर कविता नहीं लिखी जा रही है बल्कि, कविता के द्वारा संकट जरूर पैदा किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि गंदगी पर लेखनी चलनी चाहिए ना कि लेखनी से गंदगी फैलनी चाहिए.

    सुरेंद्र शर्मा ने कहा कि आज समाधान ही खुद समस्या बने हुए हैं. इस बात को उन्हें अपनी कविता के माध्यम से कुछ तरह बयां किया-

    हमारी कुछ गंभीर समस्याएं हैं,
    कैसे सुलझाएं
    देश के नेताओं के पास जाएं
    उन्हीं की वजह से तो समस्याएं हैं
    अब कोई जवाब नहीं मिलता
    मैं कहां जाऊं।
    रिश्वत ने नाक में दम कर रखा है
    किस से कहें
    थाने में रिपोर्ट लिखाओ
    रिपोर्ट लिखने वाला ही मांगता है
    तो अदालत के दरवाजे खटखटाओ
    वहां तो चपरासी से लेकर हाकिम तक मांगता है
    न्याय करना भी इस देश में धन्धा है
    कानून अंधा है
    मैं कहां जाऊं।
    ऑफिसर के पास जाओ
    ऑफिसर ऊंघ रहा है
    मंत्री के पास जाओ
    मंत्री सो रहा है
    प्रधानमंत्री के पास जाओ
    प्रधानमंत्री मदहोश है
    राष्ट्रपति के पास जाओ
    राष्ट्रपति खामोश है
    तो देश के मसीहा के पास जाओ
    आप क्या जानते हैं कि
    क्या हो गया था
    हर बड़े नारे के बाद
    इस देश का मसीहा गूंगा हो गया था
    तो आखिरी रास्ता बचता है
    ईश्वर के पास जाओ
    घाव यही तो गहरा है
    ईश्वर तो मेरे देश का बरसों से बहरा है।
    मरहम कोई नहीं लगाता
    मैं कहां जाऊं।।

    Tags: Hindi Literature

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