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कृष्‍ण के जन्‍म लेने का आखिर क्‍या अर्थ है?- ओम निश्चल

कृष्‍ण के जन्‍म लेने का आखिर क्‍या अर्थ है?- ओम निश्चल

कृष्‍णमयता हमारे जीवन में आदि से अंत तक विद्यमान रहती है.

कृष्‍णमयता हमारे जीवन में आदि से अंत तक विद्यमान रहती है.

हम अवतारवाद और उसके उद्देश्‍यों की मिथकीय शक्‍तियों और अंतर्कथाओं की अटूट श्रृंखलाओं से कहां परिचित हो पाते जो हमारे वांग्मय की धरोहर है. राम-कृष्‍ण तथा तमाम देवी-देवता मिथक होते हुए भी मानवीय आस्‍थाओं में रचे-बसे हैं.

    Krishna Janmashtami: जिस धार्मिकता से पूरा भारत ओत-प्रोत है और जिसे लेकर एकतिहाई हिंदी साहित्‍य भरा है, वह कृष्‍णमयता हमारे जीवन में आदि से अंत तक विद्यमान रहती है. कृष्‍ण का कौन सा रूप ऐसा है जिसका दर्शन हम अपने जीवन में नहीं करते. कृष्‍ण की ऐसी कौन सी लीला है जो हमें मोहित नहीं करती. उनका ऐसा कौन सा रूप है जो हमें विमुग्‍ध नहीं करता. यह कृष्‍णमयता हम सबके भीतर कहीं न कहीं विद्यमान है. अक्‍सर कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी आती है और हमें बार-बार उनकी महिमा से परिचित करा जाती है. अक्‍सर हम इस कृष्‍णमयता के भीतर न जाकर व्रत-उपासना के स्‍तर पर कृष्‍ण को पूज कर संतुष्‍ट हो जाते हैं. स्‍त्रियां व्रत-उपवास करती हैं. फलाहार से उद्यापन करती हैं. घरों में बच्‍चों को बाल कृष्‍ण के रूप में सजा कर हम इस उत्‍सवता को एक सौम्‍य स्‍वरूप दे कर खुश हो लेते हैं. और यह केवल हिंदुस्‍तान में ही नहीं, जहां-जहां कृष्‍ण का यह स्‍वरूप गया है, विदेशों में जहां भी भारतवंशी हैं, वे कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी को ऐसे ही मनाते और उत्‍सवरत होते हैं.

    किन्‍तु कृष्‍ण को क्‍या हम इतने में ही समझ लेते हैं. उन्‍हें पा लेते हैं. हृदयंगम कर पाते हैं. बिल्‍कुल नहीं.

    कृष्‍ण की व्‍याप्‍ति तो अपार है. वे केवल पूजा-पाठ की वस्‍तु नहीं, वे तो हर रूप में हमारे जीवन को आंदोलित करने वाले हैं. उनका जीवन संघर्षों की पाठशाला है. वह दुखों का आगार बन गया होता यदि कुछ अलौकिकताएं उनके साथ न होतीं. वे भले ईश्‍वरीय अलौकिकताएं हों, बहुत कुछ अविश्‍वसनीय भी, पर हम आस्‍थाओं के पथिक हैं. कृष्‍ण ने जो-जो किया, उस पर हमने विश्‍वास किया.

    कृष्‍ण को लेकर कवियों ने जो जो कल्‍पनाएं कीं, हमने उसे अपनी आस्‍था में सहेज लिया. आज पूरा देश, पूरा विश्‍व कृष्‍णमय है. कृष्‍ण सोलह कलाओं के अवतार हैं. ऐसे अवतारी पुरुषों से स्‍वत्‍व की सुगंध आती है. उनका जीवन पग-पग पर सीख लिए होता है. अवतारी देवताओं और पुरुषों का जीवन कोई सपाट और सुविधामय नहीं रहा. बल्‍कि पग-पग पर उन्‍हें जीवन में दुष्‍टों से लोहा लेना पड़ा. राम को भी कृष्‍ण को भी.

    कृष्‍ण का बचपन देखें. वे कितनी कठिनाई में जन्‍मे. मामा कंस को पता चला कि उसकी बहन का पुत्र ही उसके वध का कारण होगा तो कितनी बाधाएं खड़ी कीं. किन्‍तु दैवी लीलाओं ने सदैव मार्ग प्रशस्‍त किया. वे बच निकले. देवकी के सभी बच्‍चे संशय में मारे जाते रहे पर आठवां बच निकला. क्‍योंकि संभवामियुगेयुगे.

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    दुष्‍टदलन के लिए ही तो उनका जन्‍म होना था. कैसे देवकी वसुदेव कारागार में बंद रहे. पहरे के बीच रहते हुए कैसे नियति ने उनका सहयोग किया. जो परिश्रम करते हैं, भाग्‍य उनका साथ देता है. निरपराध देवकी की यह आठवीं संतान हुई भी तो वह गोद में न रह सकी. गोकुल पहुंचा दी गयी. भादों की अंधेरी रात में. और जब कंस को पता चला कि ऐसा कोई पराक्रमी बालक गोकुल में पल रहा हैतो उसके होश उड़ गए. कितने नाना प्रकार के षडयंत्र किए उसने उन्‍हें मारने मरवाने के लिए. पूतना इत्‍यादि तमाम विधियों से. पर कहा गया है न कि ‘जाको राखे साइयां मार सके ना कोय’. कृष्‍ण बच निकले और अपनी लीलाओं से अपना विकास करते रहे. अपने पुरुषार्थ का प्रदर्शन करते रहे.

    बाल कृष्‍ण का जो प्‍यार-दुलार मां देवकी के भाग्‍य में न हुआ. उसका सुख उन्‍हें पालने वाली यशोदा ने उठाया. नटखट कृष्‍ण का वह हर रूप देख सकी जो किसी-किसी को ही सुलभ होता है. जिसके ध्‍यान में योगी रमण करते हैं. उसका नित दिग्‍दर्शन किसी न किसी भांति यशोदा मां कर लेती थीं.

    यशोदा के घर का कोलाहल कलरव भी क्‍या अदभुत रहा होगा. जो यशोदा मां भी न देख सकीं. उसे सूरदास जैसे कवि ने देख लिया. बाल लीला का कोना-कोना खंगाल लिया सूर ने आंखें न होते हुए. कल्‍पना की आंखों से कृष्‍ण की जो भांति-भांति की मुद्राएं अपने पदों में उकेरीं. वे आज धरोहर हैं. कितनी राग-रागिनियों के ज्ञाता थे सूरदास जी. संगीत के लिए ‘सूर सागर’ एक वरदान की तरह है. इतनी तरह ही बंदिशें, इतनी राग-रागिनियों में उपनिबद्ध पद कि संगीत के ज्ञाता चकरा जाएं.

    कवियों के लिए इसीलिए कहा गया है कि ‘जहां न जाय रवि वहां जाय कवि’. सूर का यह पद कितना लुभावना आज भी जान पड़ता है. जब यह पद रेडियो या टीवी पर बजता है- ‘किलकत कान्‍ह घुटुरुवन आवत’ तो लगता है सचमुच कृष्‍ण फुदुक-फुदुक कर फर्श पर चलने का प्रयास कर रहे हैं. किलकारी भर कर लोगों को रिझा रहे हैं. हर बच्‍चे में कृष्‍ण का यह भाव आ बिराजता है जब वह घुटरुवन चलने का प्रयास कर रहा होता है.

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    कृष्‍ण का बाल स्‍वरूप तो नटखट था ही. मां यशोदा को भी कभी अपना विराट स्‍वरूप दिखलाकर हतप्रभ कर देते थे. माखन चुराते पकड़े गए तो मां ने धर दबोचा. कहा मुंह खोलो. बच्‍चे ने मुंह खोल दिया कि देखों मां कहां- ‘मक्‍खन खाया है मैंने’. मां चकित. यह क्‍या. यह तो पूरा ब्रह्मांड देख रही हूं. सिर चकरा गया. इससे पहले कि वे बेहोश होतीं कृष्‍ण फिर अपने प्रकृत स्‍वभाव में आ गए.

    यशोदा का यह सुख कि एक साथ मां होने का संतोष पा रही हैं, दूसरी ओर यह भी कि कृष्‍ण में वह पुरुषार्थ भी देख रही हैं जो आगे चल कर धर्म की स्‍थापना में सहायक होगा. कालिय नाग का दहन जिस तरह कृष्ण ने किया, जिस तरह पूरे ब्रजवासियों को गोवर्धन पर्वत उठा कर हाथों में सहेज लिया और भीगने से बचाया वह कि किंवदन्‍ती की तरह अविश्‍वसनीय किन्‍तु आस्‍थावानों के लिए सच की तरह है. किशोर होते कृष्‍ण के सामने भी कोई सहज जीवन न था. उन्‍हें मारने के लिए तमाम कोशिशें कंस ने कीं, पर वे हर बार विफल होते रहे.

    कृष्‍ण और बड़े हुए तो महाभारत सामने था. एक तरफ दुर्योधन की कुटिलता और भाइयों का हक छीनने का षडयंत्र. उन्‍हें लाक्षागृह में ही जला कर भस्‍म कर देने की साजिश. अज्ञातवास के माध्यम पांडवों को अपमानित करने की कुटिलताएं. फिर जुए का दांव. सब कुछ हमारी नजरों के सामने है. कृष्‍ण कहां नहीं है. इन सब के बीच वे द्रष्‍टा है. कर्ता है. भोक्‍ता है और धर्म की स्‍थापना और दुष्‍टदलन के लिए संकल्‍पित भी.

    अब कुरुक्षेत्र का मैदान और आमने-सामने सेनाएं हैं. वे पांडु पुत्रों के साथ रहे. द्रोपदी के चीरहरण में संकटमोचक की तरह आ धमके और जब सुलह से भी समाधान न देखा तो युद्ध के मैदान में अर्जुन का रथ हांकने पहुंच गए. यहां तक कि अपने सारथी को कभी-कभी अर्जुन स्‍वयं न पहचान सके. यदा-कदा दंभ भी हुआ कि अरे मैं अर्जुन और यह रथ हांकने वाला सारथी. कर्ण के प्रहार से रथ के झंडे के हिलने भर से वाह कर्ण वाह कर्ण कह उठता है, जब कि मैं सौ योजन तक कर्ण के रथ को खदेड़ देता हूं. पर इस सारथी के मुंह से एक शब्‍द नहीं निकलता. पर ईश्‍वर आपके दंभ कोचूर भी करता है. कृष्‍ण अपने स्‍वरुप में आकर कह ही उठते हैं कि अर्जुन देखो यह मैं नहीं पूरा ब्रह्मांड है. तुम्‍हारे रथ पर जिसका झंडा वह हिला देता है. कदाचित मैं न रहूं तो तुम्‍हे पता भी न चलेगा कि तुम्‍हारा यह रथ कहां जा गिरा. तो इसे समझो.

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    महाभारत के युद्ध के समय भी लोग संबंधों को देख कर सकुचाते रहे और उधर, दुर्योधन ताल ठोकता रहा. वह सब कुछ नेस्‍त-नाबूद करने पर आमादा था. युधिष्‍ठिर, अर्जुन, भीम, नकुल और सहदेव सब संकोच में हैं. उधर, मामा हैं, चाचा हैं, ताऊ हैं, सब तो अपने ही हैं. कैसे धनुष वाण उठाऊं. पर कृष्‍ण तो सब जानते थे. यह सब कुछ नहीं संबंधों की माया है. सभी संबंधी हैं तो युद्ध और मार-काट पर क्‍यों आमादा हैं. अपने अपने शिविर लौट क्‍यों नहीं जाते या दुर्योधन को युद्ध के परिणामों से सावधान क्‍यों नहीं करते. पर कोई नहीं जो यह जिम्‍मा ले.

    भीष्‍म पितामह तो अपने संकल्‍प से बंधे हैं. सब कुछ अपनी आंखों से देखने को विवश हैं. गांधारी पुत्र मोह से ग्रस्‍त हैं तो पिता उतने ही पुत्रमोह से बंधे. उन्‍हें भाइयों के पुत्रों के प्रति कोई स्‍नेह न था. बड़े होने के नाते बस दिखावा भर था. तब कृष्‍ण ने सारथी के साथ साथ ईश्‍वरीय रूप का दिग्‍दर्शन भी कराया. दिखाया कि देखिए कौन किसका भाई, कौन किसका पिता, कौन किसका मामा, सब एक दूसरे को मार-काट रहे हैं. यही होना है. इसलिए मोह त्‍यागिए और महासमर में आइये. यहीं गीता का वह चर्चित श्‍लोक भी है जहां वे अपने परमतत्‍व का आभास कराते हैं –

    सर्व धर्मान् परित्‍यज्‍य मामेकं शरणं ब्रज।
    अहम्त्‍वाम सर्वपापेभ्‍यो मोक्षियष्‍यामि मा शुच।

    महाभारत का परिणाम क्‍या हुआ, हम सब जानते हैं. कौरवों का नाश हुआ. पांडव जीते. पर यह महाभारत जीत कर भी कृष्‍ण ने अपने को अमर नहीं माना. वे भी एक साधारण लीलापुरुष ही थे. प्रारब्‍ध के निमित्‍त उनका जन्‍म हुआ. बचपन बीता, कैशोर्य बीता, यौवन आया तो महासमर छिड़ गया. क्षुद्रताओं का साम्राज्य पहले भी था. आज भी है. आज भी भाइयों-भाइयों में पट्टीदारी दिखती है. एक-दूसरे के खून के प्‍यासे हो उठते हैं. खून के रिश्‍तों पर ही बंदूकें तान देते हैं. कोर्ट-कचहरियों में मुकद्दमे चलते हैं. फैसला किसी एक के हक में हुआ भी तो मानने को राजी नहीं होते. भौतिकता का बोलबाला जैसा पहले था, वैसा ही अब भी है. पूंजी के प्रभुत्‍व के साथ ही धर्म-कर्म के पाखंड का भी वर्चस्‍व बढ़ता गया है. धर्म का असली स्‍वरूप गुम होता गया है.

    कृष्‍ण का जन्‍मदिन तो हम मनाते हैं, पर उनका जीवनोद्देश्‍य भूल जाते हैं. उनका योगदान पीड़ित मनुष्‍यता के लिए क्‍या है. यह मिथक भी है तो कितना कुछ संदेशों से भरा. हम वास्‍तविक जीवन से न सीखें तो कम से कम अपने पुराण, आरण्‍यक, उपनिषद और रामायण- महाभारत से ही कुछ सीखें. किन्‍तु हमने गतानुगतिकता में धर्म का बाह्य आडंबर तो स्‍वीकारा किन्‍तु उसके असली मर्म को भूलते गए.

    कृष्‍ण का एक स्‍वरूप सख्‍य का है. प्रेम का है. गोपियों के साथ चुहलबाजियों का है. यह प्रेम लौकिक होकर भी अलौकिक हो उठता है जब पूरी दुनिया प्रेममय होकर राधेकृष्‍ण-राधेकृष्‍ण करने लगती है. राधा-कृष्‍ण का प्रेम उसे काम्‍य लगता है. कृष्‍ण की बांसुरी अमर हो गयी. राधा-कृष्‍ण का प्रेम अमर हो गया. पर यह प्रेम भी परवान कहां चढ़ सका. बीच राह में प्रेम की इस डगर को छोड़ कर कृष्‍ण को ब्रज छोड़ कर जाना पड़ा.
    प्रारब्‍ध जहां-जहां ले गया कृष्ण वहां जाते रहे. गए तो फिर ब्रज की ओर दुबारा लौटना न हुआ. कितने सारे काम अधूरे थे जो इसी अवतार में पूरे करने थे. एक मिशन पर वे अवतरण हुए थे. महासमर जीत लेने के बाद भी कोई पूछे कि कृष्‍ण को इससे क्‍या मिला,पांडवों को इससे क्‍या मिला. कौरवों को इससे क्‍या मिला. कुछ नहीं बस एक सीख कि क्‍या हम अपनी वासनाओं को छोड़ कर महाभारत को होने से रोक सकते हैं.

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    अपने-अपने महाभारत में हम सब युद्धरत हैं. अब कृष्‍ण तो नहीं पर उनकी आस्‍था है जो हमारी रक्षा करती है. मीरा इन्‍हीं सगुण कृष्‍ण से प्रेम कर बैठी थीं. राणा से मन खिन्‍न हुआ तो उन्‍होंने कृष्‍ण को ही अपना सखा मान लिया. ‘हे री मैं तो प्रेम दीवानी मेरो दरद न जाने कोय’. मीरा कृष्‍ण के इस प्रेम के प्रति इतनी विश्‍वासी हो चली थीं कि जहर का प्‍याला हँस हँस कर पी गईं और उनका बाल-बांका न हुआ. वे नंगे पांव बनारस चल कर आई संत रैदास से मिलने. एक अटूट भक्‍ति भाव को जिया मीरा ने कि इसे हम भक्‍ति का मीरा भाव भी कह सकते हैं. गोपियों ने कृष्‍ण को चाहा. पूरा का पूरा साहित्‍य कृष्‍ण और राधा व गोपियों और कृष्‍ण के लास से भरा है. प्रेम का यह मॉडल सार्वजनिक जीवन में भले न मान्य हो पर वेलेंटाइन के इस जमाने में कृष्‍ण आधुनिक प्रेमियों को अपने जीवन से प्रेम करना सिखाते हैं. उनके लिए सूर भी गोपियों से यह अभ्‍यर्थना और मनुहार करते हुए आगे आते हैं-

    रह री मानिनि मान न कीजै
    यह जोबन अंजुरी को जल है
    ज्‍यों गुपाल मांगैं त्‍यों दीजै।

    सूरदास जी ने इसी में पूरा जीवन सारांश उड़ेल दिया. क्‍या है यह जीवन और यौवन. एक अंजुरी का जल भर. उसके छीजने में देर नहीं लगती. इसलिए यह जीवन भक्‍ति और प्रेम को समर्पित हो सके तो इससे बड़ा जीवन का फलितार्थ भला क्‍या है.

    महाभारत गुजर चुका है. कृष्‍ण का ओज और उदात्‍त अब वैसा नहीं रहा जैसा पहले था. उनकी वीरता जैसे तिरोहित हो चुकी है. द्वारका गहरे जल में डूब चुकी है. यदुवंश बिला चुका है. वे स्‍वयं असहाय हैं और एक वृक्ष के नीचे विश्राम कर रहे हैं कि एक बहेलिये के तीर से वे बिंध जाते हैं और प्राण त्‍याग देते हैं. यह प्रारब्‍ध है.

    वे यह सीख देते हैं कि प्रारब्‍ध और समय के आगे सब समान हैं. क्‍या राम, क्‍या कृष्‍ण, क्‍या विष्‍णु, क्‍या राधा, क्‍या रुक्‍मिणी! पुरुष बली नहीं होत है, समय होत बलवान, भीलन लूटी गोपिका, वही अर्जुन वही वाण.

    कृष्‍ण के उत्‍तर जीवन पर क्‍या खूब उपन्‍यास लिखा है काशीनाथ सिंह ने ‘उपसंहार’. जीवन यथार्थ से ऊभ-चूभ करते लेखन के बावजूद काशीनाथ सिंह का यह उपन्‍यास उनके लेखन में सर्वोपरि है.

    कृष्‍ण का जीवन बहुत उथल पुथल भरा रहा. पर आगे चल कर कविता के लिए उनका जीवन चरित उपजीव्‍य बन गया. भक्‍तिकाल के सगुणोपासक कवियों का एक बड़ा संप्रदाय कृष्‍ण भक्‍ति में लीन रहा है. बल्‍लाभाचार्य, आचार्य निम्‍बार्क, आचार्य हित हरिवंश, स्‍वामी हरिदास, कृष्‍ण चैतन्‍य महाप्रभु, अष्‍टछाप के कवियों में गोस्‍वामी विट्ठल नाथ, सूरदास, कुंभन दास, परमानंद और कृष्‍ण दास.

    अष्‍टछाप के कवियों की भी यों तो एक लंबी परंपरा है पर इन सबसे में सूरदास श्रेष्‍ठतम हैं. कृष्‍ण काव्‍य के ये प्रतिनिधि कवि हैं. सूर सागर, सूर सारावली तथा साहित्‍य लहरी इनकी प्रमुख रचनाएं हैं. गोस्‍वामी विट्ठल दास के शिष्‍यों में नंददास सूर के बाद सबसे ज्‍यादा चर्चित कवियों में गिने जाते हैं जिन्‍होंने रूप मंजरी, रस मंजरी, सुदामा चरित, भँवरगीत, गोवर्धन लीला व नंददास पदावली जैसी कृतियां लिखीं. कुंभनदास के लिए यह किंवदंती प्रसिद्ध है कि एक बार उनके पदों ख्‍याति सुनकर उनके समकालीन अकबर ने उन्‍हें बुलवा भेजा तो कुंभनदास ने यह कह कर उस हरकारे को वापस लौटा दिया कि-

    संतन को कहा सीकरी सों काम।
    आवत जात पनहिया टूटत बिसरि गयौ हरिनाम।
    जाको देखे दु:ख लागैं ताकौ करन परी परनाम।
    कुंभन दास ताल गिरिधर बिन यह सब झूठो धाम।

    कृष्‍ण के जन्‍म लेने का आखिर क्‍या अर्थ है. हजारों लोग जन्‍म लेते हैं, उन्‍हीं में कृष्‍ण भी एक हैं. विशेष क्‍या है इसमें. कृष्‍ण न जन्‍म लेते तो आखिर क्‍या अधूरापन रहता जीवन में? इसे देखते हैं तो पाते हैं कि हमें साहित्‍य में वात्‍सत्‍य रस कहां देखने पढ़ने को मिलता. वह श्रृंगार रस हम कहां देख पाते जो राधा-कृष्‍ण के प्रेम के बहाने साहित्य और जीवन में परिव्‍याप्‍त है. भक्‍ति का वह चरम रूप कहां दिखता जो कृष्‍ण के प्रति पूरे समाज में छाया है.

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    हम अवतारवाद और उसके उद्देश्‍यों की मिथकीय शक्‍तियों और अंतर्कथाओं की अटूट श्रृंखलाओं से कहां परिचित हो पाते जो हमारे वांग्मय की धरोहर है. राम-कृष्‍ण तथा तमाम देवी-देवता मिथक होते हुए भी मानवीय आस्‍थाओं में रचे-बसे हैं. राम मर्यादा पुरुषोत्‍तम होते हुए मर्यादाओं के अनुपालन के लिए जाने गए तो कृष्‍ण महापुरुष होते हुए भी प्रेम के लिए नंगे पांव दौड़ कर सुदामा जैसे बाल सखा को गले लगा लेने के लिए. उन्‍होंने गोपियों के बहाने समाज को प्रेम करना सिखाया. गोपियों में कृष्‍ण के सगुणरूप के प्रति अनुरक्‍ति थी तो मीरा जैसी कवयित्री में कृष्‍ण के सगुण-निर्गुण दोनों रूपों के प्रति आस्‍था थी. कृष्‍ण निर्बलों और वंचितों के लिए शक्‍ति थे. जिसने जिस रूप में कृष्‍ण को चाहा, उसी रूप में उसे दर्शन दिए- जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी.

    कृष्‍ण सांवले थे. सांवला रंग सुंदरता के लिए अनूकूल नहीं माना जाता. किन्‍तु इस सांवले सलोनेपन को भी सुंदरता का मानक सिद्ध करते हुए कहा गया कि सांवला तो कृष्‍ण का रंग है. सांवले रंग को लेकर ओशो ने अलग ही व्‍याख्‍या दी है कि असली सुंदरता गोरेपन में नहीं, सांवलेपन में है. इस सांवले सौंदर्य में ही गहराई है. गोराई में उथलापन है. वह दृष्‍टि में देर तक नहीं टिकता. सांवलापन चित्‍त में समा गया तो देर तक टिकता है.

    सूर को कहीं भी कृष्‍ण का सांवला रूप नहीं कचोटता. क्योंकि वे तो रंग नहीं, कृष्‍ण के चित्‍त को निहारने वाले कवि थे. उनकी बाल लीलाओं के दीवाने थे. उन्‍हें तो वे ‘शोभित कर नवनीत लिए’ रूप में दिखते थे. कृष्‍ण ने विरह को साधना सिखाया. उसे जीना सिखाया. ‘बिनु गोपाल बैरिन भइ कुंजें, निसिदिन बरसत नैन हमारे. कृष्‍ण के विरह में विप्रलंभ श्रृंगार जैसे फूला फला है साहित्‍य में. यह कृष्‍ण का ही प्रताप था कि ब्रज एक संस्‍कृति की तरह जन चित्‍त में छा गया. रसखान के चित्‍त में ब्रज की महिमा ऐसी बस गयी कि वे गा उठे —

    मानुस हौं तो वही रसखान
    बसौं ब्रज गोकुल गांव के ग्‍वारन।
    जौ पसु हौं तो कहा बस मेरो,
    चरौं नित नंद की धेनु मझारन।
    पाहुन हौं तो वही गिरि को
    जो धर्यो कर छत्र पुरंदर धारन
    जो खग हों तो बसेरो करौं
    मिलि कालिंदी कूलकदंब की डारन।

    इस तरह कृष्‍ण का जीवन पग-पग पर जीवन के उल्‍लास, संघर्ष और ओज और उदात्‍त से भरा है. वे एक जगह टिक कर नहीं बैठे. जीवन भर भागते रहे ताकि संसार में आततायियों का नाश हो, धर्म की संस्‍थापना हो, लोग सुखी रहें. प्रेम से रहें. वे कर्तव्‍यों के प्रति सचेत रहें. फल के प्रति नहीं. ‘कर्मण्‍येवाधिकास्‍ते मा फलेष कदाचन्‘ का संदेश गीता में उन्‍होंने दिया.

    हमारे लोकगीतों, पदों और भजनों सबमें कृष्‍ण की लीलाओं का बखान मिलता है. पर सच्‍ची सीख तो यही है कि हम कृष्‍ण की राह पर चलें और गीता में दिए उनके उपदेशों को जीवन में उतारें. अवतारी पुरुष हर काल में पैदा होते हैं पर हम तब उन्‍हें पहचान नहीं पाते. सदियों से भक्‍ति से शक्‍ति ग्रहण करता हुआ यह देश अगर सच्‍चे अर्थों में धर्म और कर्म के प्रति सचेत हो सके तो अवतार के रूप में कृष्‍ण का हमारे लिए कोई अर्थ है. उनका जन्‍म सार्थक है और हमारे लिए उनका जन्‍मोत्‍सव मनाना भी. कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी का शायद यही सम्‍यक् उद्देश्‍य और अर्थ है.

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