मैथिली साहित्य के लिए बड़ी क्षति है श्याम दरिहरे का जाना

श्याम दरिहरे को भारत के सामाजिक मूल्यों में अत्यधिक विश्वास था. यह विश्वास इनकी कृतियों में भी झलकता है.

श्याम दरिहरे (Shyam Darihare) अपने सद्गुरु के जीवनी-लेखन को अंतिम रूप देने के लिए वृंदावन (मथुरा, उत्तर प्रदेश) गए थे. वही उन्हें मस्तिष्काघात हुआ. इस तरह मैथिली साहित्य का एक प्रगतिशील लेखक-चिंतक ने इस संसार से विदा ले ली.

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    डॉ. कमल मोहन चुन्नू

    26 जून, 2021 की सुबह मैथिली साहित्य (maithili sahitya) का जगमग सितारा श्याम दरिहरे के यूं अचानक ही चले जाने से डूब गया. श्याम दरिहरे (Shyam Darihare) अपने सद्गुरु के जीवनी-लेखन को अंतिम रूप देने के लिए वृंदावन (मथुरा, उत्तर प्रदेश) गए थे. वही उन्हें मस्तिष्काघात हुआ. मथुरा में उनका उपचार भी हुआ लेकिन शायद ईश्वर को यह मंजूर नहीं था और श्रीकृष्ण-साहित्य के गंभीर पाठक श्री दरिहरेजी ने श्रीकृष्ण की लीला-स्थली में ही अपना नश्वर शरीर त्याग किया. बाद में परिजनों के आग्रह पर उनके पार्थिव शरीर को पटना स्थित उनके निवास पर लाया गया, उनके पार्थिव शरीर का सिमरिया (गंगाघाट) पर दाह-संस्कार किया गया. और इस तरह मैथिली साहित्य का एक प्रगतिशील लेखक-चिंतक ने इस संसार से विदा ले ली.

    मैथिली साहित्य (Maithili literature) को एक मुकाम तक पहुंचाने वाले श्याम दरिहरे का जन्म 19 फरवरी, 1954 को मिथिला क्षेत्र के मधुबनी जिले (Madhubani District) के गांव बरहा में हुआ था. एक सामान्य किसान परिवार में जन्मे दरिहरे दसवीं की परीक्षा पास करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए शहर आ गए. यहां उन्होंने स्नातक की पढ़ाई पूरी की.

    श्याम दरिहरे ने बिहार लोक सेवा आयोग (Bihar Public Service Commission) की परीक्षा पास की और पुलिस सेवा को चुना. इस क्रम में बिहार के बेगूसराय, देवघर, पटना, भागलपुर सहित झारखंड के धनबाद, हजारीबाग आदि जगहों पर भी अपनी सेवा दी. जहां भी गए अपनी लेखकीय गरिमा और सेवा की मर्यादा को अक्षुण्ण रखा. नौकरी के साथ ही इनका लेखन कार्य भी चलता रहा. विभिन्न साहित्यिक सांस्कृतिक अनुष्ठानों का आयोजन सहयोग भी चलता रहा. 2013 में झारखंड से प्रमंडलीय समादेष्टा के पद से सेवानिवृत्त हुए.

    दरिहरेजी एक समग्र रचनाकार थे. इन्होंने अपने जीवन-काल में पर्याप्त साहित्यिक लेखन किया. साहित्य में इनका पदार्पण कविता के माध्यम से हुआ. लेकिन जल्द ही कथा-लेखन की ओर मुड़ गए. तब से कथा, उपन्यास लेखन इनके लेखन की मूल विधा सी हो गई. परंतु कविता का भी परित्याग नहीं कर सके.

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    प्रकाशित साहित्य में इनका सर्वप्रथम प्रकाशन अनुवाद-कार्य के रूप में हुआ. इस क्रम में इन्होंने धर्मवीर भारती की काव्य रचना 'कनुप्रिया' (2004) का मैथिली में अनुवाद किया. तदुपरांत कथा लेखन में सक्रिय हो गए. इनके मौलिक प्रकाशन के रूप में सर्वप्रथम 'सरिसों में भूत' (2004) प्रकाशित हुआ। इसके बाद तो मैथिली में 9 पुस्तकें एवं हिंदी में दो कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए।

    इन्हें अपनी गद्य प्रतिभा पर अतीव विश्वास था. विशेषकर कथा एवं उपन्यास में तो इन्होंने महारत ही हासिल की थी. ‘सरिसों में भूत’ के बाद ‘बड़की काकी एट हॉटमेल डॉटकॉम (2013), ‘रक्त-संबंध’ (2020) तीन कथा-संग्रह प्रकाशित हुए. साथ-साथ उपन्यास लेखन में ‘घुरि आउ मान्या’ (2015), ‘जगत सब सपना’ (2017), ‘हमर जनम किए भेले हो रामा’ (2019), 'बाती कोन जराउ' (2020) चार उपन्यास भी लिखे. न जायते म्रियते वा (2021) का प्रकाशन-कार्य चल ही रहा था.

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    मैथिली कविता (Maithili Kavita) लेखन में भी पुस्तक प्रकाशित हुईं जिसमें 'कनुप्रिया' के अतिरिक्त 'क्षमा करू हे महाकवि' (2016) का नाम उल्लेखनीय है. हिंदी में भी दो कविता संग्रह 'गंगा नहाना बाकी है' (2014) एवं 'मन का तोरण द्वार सजा है' (2018) प्रकाशित हैं. दरिहरेजी के प्रकाशन योजना में अभी भी चार उपन्यास, एक कथा संग्रह, लगभग दो दर्जन असंग्रहित कथा एवं एक दीर्घकविता-संग्रह थे.

    श्याम ने अपने लेखन में सामाजिक पक्ष को केंद्र में रखा. उनकी रचनाओं में गरीब, दलित, वंचित महिलाएं समानरूप से स्थान पाती रहीं. इन्होंने सदैव प्रगतिशील मूल्यों का समर्थन-संवर्धन किया.

    श्याम का राष्ट्र मात्र एक भावना नहीं था अपितु वह भूखंड भी था जो भारत को भारत बनाता है. वे उदारतापूर्ण मनस्थिति से भारतीय मनीषा के समर्थक थे. इनकी कथाओं, उपन्यास, कविताओं में भारतीय प्रगतिशील चिन्तनों की मुखर व्याख्या मिलती है.

    श्याम दरिहरे को भारत के सामाजिक मूल्यों में अत्यधिक विश्वास था. यह विश्वास इनकी कृतियों में भी झलकता है.

    उपन्यास लेखन में भी इन्होंने दलित वर्ग एवं नारी विमर्श को केंद्र में रखा. इस क्रम में उन्होंने 'हमर जन्म किए भेलै हो रामा' और 'बाती कोन जराउ' उपन्यास रचकर विशेष ख्याति अर्जित की.

    'हमर जन्म किए भेलै हो रामा' में एक महिला के संघर्ष के माध्यम से आज के नक्सलवाद, माओवाद, मार्क्सवाद आदि विचारों को चित्रित किया. उन्होंने चिंता जाहिर की कि भारतीय समाज का कल्याण बंदूक से नहीं विचार से एवं वैचारिक उदारता से ही संभव है.

    'बाती कोन जराउ' उपन्यास में श्याम ने आज के समाज में नारी की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संघर्ष को विधिवत चित्रित किया. आज भी महिला के प्रति पुरुषों की नजर अपनी भोगवादी प्रवृत्ति को छोड़ नहीं सका है. जबकि, महिलाएं समाज की समृद्धि के साथ-साथ अपनी राजनीतिक सिद्धता भी दिखा चुकी है.

    मैथिली उपन्यास लेखन में इनका एक और काम इन्हें चिर-स्मरणीय बनाकर रखेगा. इन्होंने तीन स्वतंत्र उपन्यास किंतु कथानक के स्तर से धारावाहिक कथाक्रम रूप में विकसित एवं विराट कथा को आबद्ध किया. ‘घुरि आउ मान्या’, ‘जगत सब सपना’ और ‘न जायते म्रियते वा’ इन तीनों उपन्यास में एक ही विराट कथा क्रमवार रूप से वर्णित है.

    लगभग 1100 पृष्ठों में वर्णित एक ही कथा जो तीनों उपन्यासों में फैली है, निश्चय ही अभिलेखीय महत्व का कार्य है. इन उपन्यासों में एक महिला का एक ओर सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक संघर्ष चित्रित हुआ है तो दूसरी ओर धर्म, अध्यात्म, समाज और विज्ञान के आंतरिक संबंध-सूत्रों को भी व्याख्या मिली है. तीनों के सामंजस्य का उपयोग भी किया गया है.

    मैथिली के उपन्यास साहित्य में इनका यह काम एक मील के पत्थर जैसा सिद्ध होता है. इन उपन्यासों में आधुनिक विज्ञान, न्यूक्लियर फिजिक्स, स्पेस साइंस आदि का ऐसा गहरा अध्ययन और गहरा वृतांत प्रस्तुत हुआ है कि लगता है कि समाज का यह वैज्ञानिक पक्ष समाज का एक आवश्यक पक्ष भी है.

    दरिहरेजी एक सच्चे ग्रामीण सरोकार के कथाकार थे. विज्ञान, अध्यात्म, समाज के आंतरिक और अपरिहार्य संबंध के विरल उपन्यासकार थे. ये एक विचार संपन्न कवि थे. एक विचारशील पाठक थे और एक सफल साहित्यिक आयोजक थे.

    ऐसे रचनाकार का यूं एकाएक चला जाना मैथिली भाषा-साहित्य की एक ऐसी क्षति है जिसे निकट भविष्य में भर पाना असंभव सा है. यह एक ऐसे रचनाकार का जाना है जिसकी अनुपस्थिति दशकों तक खलती रहेगी.

    (लेखक डॉ. कमल मोहन चुन्नू, मैथिली भाषा के सुपरिचित साहित्यकार हैं.)

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