भिखारी ठाकुर के जीवन से रू-ब-रू कराता संजीव का उपन्यास 'सूत्रधार'

लेखक संजीव ने भिखारी ठाकुर के जीवन पर आधारित एक उपन्यास 'सूत्रधार' तैयार किया है.

भोजपुरी के शेक्सपियर (Bhojpuri Shakespeare) के तौर पर अपनी पहचान बनाने वाले लोकनर्तक और कलाकार भिखारी ठाकुर (Bhikhari Thakur) की आज पुण्यतिथि है.

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    भोजपुरी के शेक्सपियर (Bhojpuri Shakespeare) के तौर पर अपनी पहचान बनाने वाले लोकनर्तक और कलाकार भिखारी ठाकुर ( Bhikhari Thakur) की आज पुण्यतिथि है. भिखारी ठाकुर का जन्म 18 दिसंबर, 1887 को बिहार राज्य के छपरा जिले के छोटे से गांव कुतुबपुर के एक सामान्य नाई परिवार में हुआ था. उन्होंने अपने नाटक, लोकगीत व दोहा में पलायन की समस्या व महिला की समस्या को प्रमुखता से रखा.

    भिखारी ठाकुर के नाटकों का देश-विदेश मंचन किया गया है. उन पर बनी फिल्म "नाच भिखारी नाच" का कई देशों में प्रदर्शन हो चुका है.

    भिखारी ठाकुर ने अपने एक नाटक 'गबरघिचोर' में गिरमिटिया, चटकलिहा मजदूरों, किसानों के पलायन की संस्कृति पर प्रहार किया है. उनकी मृत्यु 10 जुलाई, 1971 में हुई थी.
    लेखक संजीव (Author Sanjeev) ने भिखारी ठाकुर के जीवन पर आधारित एक उपन्यास 'सूत्रधार' (Sutradhar) तैयार किया है. इस उपन्यास को राधाकृष्ण प्रकाशन (Radhakrishna Prakashan) ने प्रकाशित किया है. तमाम शोध-अध्ययन के बाद तैयार जीवनपरक उपन्यास 'सूत्रधार' काफी चर्चित रहा है. पेश है उपन्यास का एक अंश-

    नाच!
    अन्न नहीं, जल नहीं, दीन नहीं, दुनिया नहीं; जो कुछ है और जितना कुछ है, बस नाच है. उनकी एकमात्रा मंशा थी कि उनका दल सबसे ऊपर हो, अद्वितीय. इसके लिए जो भी सुन्दर चीज जहां भी दिख जाती, वे उठा लाने का स्वप्न पालते. वे ऐसे डोलते मानो नचनियां न होकर कोई बादशाह हों, जो अपने विरुद्ध चल रहे षड्यंत्र का पता लगाने निकला हो!

    “जोगिया के गिरोह में फिरंगी राम नचनिया पुरसे-भर उछल जाता है.” एक सूचना.
    “उसके समाजी भी तो देखो.” कुछ देर तक गोते लगाने के बाद जैसे इस रहस्य का सूत्रा पकड़ पाते हैं शिव बालक, “वह ताल ही है जो फिरंगी राम को उछाल देता है, वरना तो वो वही फिरंगिया न है.”
    “तुम लोग असल पैन्ट (प्वाइंट) को छोड़ दे रहे हो.” जगरूप ने टोंका.
    “का है असल पैन्ट?”
    “मुकुन्दी भांड़ के पास जो नचनिया है, उसकी तान सीवान तक सुनाई पड़ती है. एक बार हम और महटर साहेब आधी रात को सीवान से उस तान को सुनकर चले तो चलते गए, चलते गए, चलते गए—तीन कोस तक चलते गए एक उठनिया...”
    “तीन घंटे तक तान ही नहीं टूटी?” एक चुटकी.
    “बीच में नदी-नार कुछ नहीं था?” दूसरी.
    “अरे ऊ तान पे न सवार थे.” तीसरी.

    जगरूप अपनी बात की किरकिरी होते देख कुढ़ गया, ऊपर से जब जगदेव ने यह कह दिया, “मुकुन्दी में बात तो कोई होती नहीं.” तो अपने नायक की निन्दा पर खीझ गया, “तुम ही सबसे बड़े जानकार हो न?”
    “ए भाई!” भिखारी ने हस्तक्षेप किया, “एकरा में ‘झगरा’ कवन चीज के बा...? हमको फिरंगी की पुरसे-भर की उछाल, जोगिया गिरोह के समाजी, मुकुन्दी के नचनिया की तान—सब कुछ चाहिए, और वह सारा कुछ भी जो सबसे नीमन है, जेकरा पब्लिक पसन्द करती हो.”

    बाबूलाल बैल की तरह जूमते, कुछ बोलते नहीं, बस गुनते और धुनते रहते. जितनी ही जानकारियां मिलतीं वे और भी ज्यादा जानकारियों के लिए उकसातीं. मंथन की इस प्रक्रिया में आखिरकार वे इस निष्कर्ष पर पहुंचते कि दल को अच्छे-अच्छे नाच देखते रहना चाहिए—न सिर्फ नाच-गिरोहों के नाच, बल्कि गोंड नाच, धोबिया नाच, अहीर नाच, चमार, थारू, कुम्हार, नेटुआ, जट-जटिन के नाच भी!

    सबसे पहले नटों का नाच नेटुआ! लहंगा, कुर्ती, ओढ़नी में लवंडे पखावज और करताल की धुन पर बेहद अश्लील गीत पेश कर रह थे—हमारा जोबना में दूगो चवन्नी धइल बा..., हमर जंघिया पे दू गो अठन्नी धइल बा...! वे मशाल हाथ में लिए हुए नाच रहे थे, जिसकी लपटें उनके पसीने से नहाए चेहरे पर मचल रही थीं. नाचते-नाचते वे पखावज बजानेवाले के पास चले आते, फिर नाचते हुए दूर चले जाते.

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    एक खास बात थी इस नाच में, बंशी. बांस की बंशी को होठों से लगाकर फूंकते हुए, छेदों को उंगलियों से बन्द करते-खोलते अजब समां बन रहा था, खासकर तब, जब पखावज और बांसुरी की जुगलबन्दी चलती और करताल धीमा पड़ जाता—धातिंगा, धातिंगा...स्वर चांड़ से धीमे पड़ते, तो बांसुरी का स्वर वल्लरी की तरह लहरा उठता, जैसे कोई मस्त मतवाली नागिन फन निकालकर अपनी लाल-लाल जीभ लपलपा रही हो.

    लौटते हुए, इसी बात पर बतकही होती रही कि और जगहों पर पिपिहरी होती है पतले सुर के लिए, जबकि यहां बांसुरी थी. काश! अपने दल में भी कोई वंशी-बजवैया होता!
    “एक बार अहीर-नाच देख लेते तो अच्छा रहता, वहां भी बांसुरी होती है.” जगरूप ने कहा.
    “मै उनका नगाड़ा नहीं सुन सकता.” जगदेव भला कैसे चुप रहता.
    “नगाड़ा तो कानपुरवाली नौटंकी में भी होता है. सोनपुर के मेले में नहीं देखा था?”

    जब बात इतनी आगे बढ़ गई तो बाबूलाल के लिए लाजमी हो गया कि वे इसका खुलासा कर ही डालें. बोले, “नरम, गरम दूनों होता है न नगाड़ा के साथ, देखोगे क्या तो एक ठो नगाड़ा होता है और एक ठो नगाड़ा का बच्चा—ताशा, जैसे भैंस के साथ पाड़ा! एक ताशा ठंढाया नहीं कि दूसर गरम ताशा हाजिर! लेकिन, जे बा से, कि अहीर नाच में सिरिफ नगाड़ा, गरमे गरम आगे हम्म! आगे हम्म! नाचों में ठेंठ पहलवानी!”
    “जे जौन रही, उहे ना ओकर नाच में आई.” जगदेव को बोलने की जैसे जगह मिल गई.
    सांप बोले और नेवला चुप रहे? जगरूप ने कहा, “पहले ई समझ लो कि पहलवानी आई कहां से.”
    “कहाँ से ?”
    “बलराम जी से.”
    “और बांसुरी कन्हैया जी से—यही न!”
    “हां.”
    “तो क्या हुआ?”
    “दूनो जन अहीर थे, इसलिए.”

    “ए चुप ना रहब-अ. कहां कन्हैया जी और बलदेव जी और कहां ई ऽऽऽऽ! ऊ राजा, ऊ भगवान. उनकर बांसुरी के तान पे मय (सब) गोपी लोग दौड़ल चलि आवें—गाय-गोरू, चिरई-परेवा मुड़-मुड़ के ताके लागें—एकरा से तो हमरे जइसन अमदी (आदमी) भी भाग जाला.”

    HINDI Novel Sutradhar

    इस नोक-झोंक से अलग भिखारी कुछ और ही सोच रहे हैं, “कन्हैया जी और बलराम अहीर थे—कितने गुमान से बोलता है यह गरीब जगरूप अहीर जिसकी तीन पुस्त लाला के यहां बनिहारी करते बीत गईं, पांव में एक रुपए का जूता तक नसीब नहीं हुआ आज तक जिसे. मैं भला किस नायक पर गुमान करूं? कहां रख दूं अपनी जातिगत हीनता को? सबका एक-एक भगवान है, मेरा भगवान कहां है?”
    बाबूलाल कुछ बोलते नहीं. भिखारी को लगा, वे ढीले पड़ रहे हैं “अब...?”
    “पहले एक गो गोंड़ का नाच देखेंगे.”
    “कहां ?”
    “गांव के थोरिके दूर पर है, सितवा के नइहरवा में. अगला पाख में पंचमी के.”
    गोंड का नाच उनके दुआर पर ही हो रहा था. खुंटियाई हुई धोती में पुरुष नर्तक पूरे दुआर पर फैले हुए थे और रावण के दसों सिरों की तरह नाचते हुए घेर रहे थे—‘झमकट, झमकट, झमकट-झमकट!’ लगता, जैसे दूर से कोई लहर बढ़ती चली आ रही है—गरजती-मचलती हुई. बीच-बीच में टप्पे-सा उछाल देते लय को, फिर सम पर आ जाते. लहरें आ-आकर टूट रही थीं, मगर बोल समझ में नहीं आ रहे थे. वाद्य तेज, बोल अबूझ. बाबूलाल को देखा तो वे बड़े ध्यान से नर्तकों का पग-संचालन देख रहे थे.

    “का बूझे?”
    “लगता है, कोई जंगली जानवर हो, जिसे मारने के लिए घेर रहे हैं.”
    वे लौट रहे थे. पंचमी का चांद जर्द होकर नीचे जा रहा था. धुंधली चांदनी में पेड़ किसी विशालकाय जानवर की तरह खड़े थे, जैसे गोंडों द्वारा वहां के खदेड़े गए जंगली जानवर इधर भाग निकले हों.”
    “ई नाच चलेगी?” अचानक बाबूलाल ने सवाल किया.
    “ना” भिखारी ने कहा, “लेकिन एकर परभाव गजब के बा...जैसे बहुत दूर से कोई घेरता हो, फांस-सा कसता चला जाए—चैता में भी झाल की आवाज ऐसे ही उठान पर चलती है.”

    रात छपरा टेसन के मुसाफिरखाने में काटनी थी. लैंप की मरियल रोशनी में गिरोह के सदस्य जमीन झाड़कर बैठ गए. किसिम-किसिम की आवाजें थीं. कहीं इंजन संट कर रहा था, कहीं यूं ही अतिरिक्त भाप छोड़ रहा था, पान-बीड़ी-सिगरेट और चाह, कहीं किस्सा चल रहा था, कहीं गाना. कितने तरह से बोल सकता है आदमी—भिखारी गुपीचुपी मारकर सोच रहे थे. बाकी लोग गमछे ओढ़कर निढाल हो गए थे.

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    ई बाबूलाल कहां गए. जरूर चहवास (चाय की तलब) लगी होगी, कलकतिया आदमी हैं.
    बाबूलाल ने कंधे दबाकर इशारा किया, “भांड़ का किस्सा चल रहा है हुआं, चलो चलते हैं.”
    बेंच पर बैठे चूड़ीदार पाजामा-शेरवानी पहने दो आदमी बात कर रहे थे.
    “किबला बेग साहब, भांड़ों के बारे में अपनी भी बेहतर राय नहीं थी, बेबकूफ, भोंडे...कसम खुदा की, जब से वो वाकया हुआ, मेरे ख्याल ही बदल गए.”
    “कौन-सा वाकया?”
    “अरे वही दाग साहबवाला—हजरत-ए-दाग जहां बैठ गए, बैठ गए.”
    “दाग साहब! क्या नाम लिया आपने! म्यां, अब सुना ही डालिए.”
    “दाग साहब खब्ती मिजाज के, एक शादी के जलसे में उन्होंने भांड़ गिरोह के मालिक, जो खुद भी एक बड़ा फनकार था, की बेइज्जती कर दी.”
    “तो...?”
    “तो क्या बला मोल ले ली! हुआ यूं कि जल्द ही एक दूसरे जलसे में उन दोनों का फिर आमना-सामना हो गया. अब सामने बैठे हैं दाग साहब, हिन्दोस्तान के अजीम शायर, स्टेज पर खड़ा है भांड़—अजीम फनकार. बात-की-बात में भडै़ती रच दी उन पर. उसने स्टेज पर एक आदमी बुलाया, उसके हाथ में बन्दूक थमा दी. निशाना दाग साहब पर.”
    “फिर क्या हुआ?”
    “फिर उसने पूछा—‘क्यों बे, शेर दिखाई पड़ा?’
    “आदमी ने कहा, ‘जी सरकार!’
    “तो देख क्या रहा है, दाग...अंधे दाग....अरे दाग, अक्ल के दुश्मन दाग...

    पूरी महफिल हंसते-हंसते लोट-पोट! और ‘दाग’ साहब तो पानी-पानी! भाग खड़े हुए भरी महफिल से. भांड़ सांड़ की तरह अभी भी खदेड़ रहा था, ‘देख भागने न पाए दाग, अबे अक्ल के दुश्मन दाग!’

    गाड़ी आ गई थी. दोनों अजनबी ट्रेन पर सवार होकर चले गए, छोड़ गए एक दाग भिखारी, बाबूलाल के दिल में—अब भांड़ की अदाकारी देखे बिना चैन नहीं.
    चाहवाले ने ही बताया कि आरा में मुकुन्दी भांड़ आ रहे हैं, वह तो जरूर देखने जाएगा.
    “वही बनारसवाला?”
    “हां वही. जिस शादी-वियाह में आ जाय, समझीं कि ओकर शान बढ़ गइल!”

    सूचना संक्षिप्त थी. विस्तार से ब्यौरा बाद में मिला कि आरा में रामाशंकर राय के यहां पूर्णमासी को लड़की का ब्याह है. उसमें तीन गिरोह नाच है, नेटुआ, रंडी और मुकुन्दी भांड़.

    पूर्णमासी, माने दस दिन हैं अभी. काश, ये दस दिन दस घंटे में बदल जाते. खैर, राम-राम करते-करते पूर्णमासी आई और दिन ढलते-ढलते रामाशंकर राय का अहाता. बड़े-से शामियाने में कांच के कशीदे हैं. मशालें गुजरती हैं तो तारे जैसे जलने-बुझने लगते हैं, मानो उल्कापात हो रहा हो. बड़े-बड़े नादों में पानी है, आग से बचाव के लिए. बरात आई. शोले दगने लगे, अनार, चरखी छूटने लगी. हाथी, घोड़े, ऊंट, पालकी, इत्रा-फुलेल!

    नेटुआ नाच रैयती था, राय साहब की जमीन में ही बसे हुए लोग थे, सो द्वार पूजा से लेकर महफिल तक नाचते-गाते आए. इसके बाद दुल्हा आया. पांव पखारा गया. इत्रा-फुलेल का छिड़काव, नाई पंखे झल रहे थे. दोनों पक्ष के पंडितों ने शास्त्रार्थ किया और अब बारी थी बाईजी की. बनारस की बाईजी, जैसा रूप-रंग, वैसे नाज-ओ-अन्दाज और वैसा ही गला—उसने सबसे पहले ‘सेहरा मुबारक’ गाया— ये है श्रीराम का सेहरा “मुबारक हो, मुबारक हो!” बहुत ही सुन्दर, बहुत ही शालीन, मानो उसके, लौंग जड़ी नाकवाले, सुन्दर मुखड़े से हरसिंगार के फूल झर रहे हों. इसके बाद दूसरी रंडी उठी, उसने ‘देवरा जोगिया’ वाला गीत प्रस्तुत किया.

    बाहर भीड़ का समुद्र उमड़ रहा था, भिखारी और बाबूलाल कई बार धकियाए गए, कई बार पीछे ठेले गए. रंडियां बैठ गई थीं. भिखारी अब भी उन्हें एकटक देखे जा रहे थे, कहीं ये दुनिया बाई, सुन्दरी बाई तो नहीं हैं? अब बारी भांड़ की. रईसों जैसी कमीज और अचकन, चूड़ीदार पायजामा, हाथ में टेढ़ी-मेढ़ी बकुली टेकते बहके रईस-सा आता है भांड़.

    “घोड़ा है, बछेड़ा है, दिन दस बरस का, मेरे घोड़े की चाल देखो!”
    वाह-वाह! भिखारी ने इस संवाद पर मन से दाद दी. लेकिन आगे चलकर उसने बाईजी को लक्षित कर वो छिछोरी भडै़ंती शुरू की कि लाज से गड़ गईं रंडियां. भिखारी कभी भांड़ को देख रहे थे, कभी रंडियों को, उनका मन हुआ वे रंडियों को जाकर ढांड़स बंधाएं और किसी शूर-वीर की तरह म्यान से तलवार खींचकर भरी महफिल में चिल्ला उठें—बन्द करो यह छिछोरापन, राजा भोज की नगरी में ई सब नहीं चलेगा. उन्होंने किसी से पूछा, “ई मुकुन्दी है?”
    “न! उनको मौका नहीं था.”
    वे ‘चुकी-मुकी’ ऐसे लौट रहे थे जैसे चोरी करते हुए पकड़े गए हों. बाबूलाल ने पूड़ी बुंदिया झटक ली थी, रास्ते में देने लगे, “लो खाकर पानी पी लिया जाय.” लेकिन नहीं. नहीं खाया गया. रात ही रात चलकर भोर तक बबुरा पहुंचे.

    भिखारी गंगा में बुड़की लगाकर धो रहे थे रात का पाप. बहुत चूक हो गई. अब ना गंगा माई! मल-मलकर धो रहे हैं, खखार-खखारकर थूक रहे हैं, डुबकी पर डुबकी, फिर भी मैल नहीं धुलती. तीर पर खड़े बाबूलाल मुस्कराते हुए आगे आते हैं, “निकल भी आओ अब. अंधेरे में पक्का आम चुनते हुए लेंड़ (पाखाना) उठा लेता है आदमी. चलो, अब कहीं और भटकने की जरूरत नहीं है. मै ही सिखा दूंगा नाच!”

    पानी से चिपचिपाई पलकों के बीच जिस छोटे-से गंवई आदमी का अक्स आ रहा है, क्या कहता है यह छोटा-सा आदमी?
    “तुम?”
    “हां, मैं. मैंने उस्तादों से भी काम-चलाऊ नाच सीख रखा है. कुछ मैं, कुछ तुम दोनों मिलकर सिखाएं तो ई मुकुन्दी क्या चीज है जी और क्या चीज है रंडी!”

    घर आए तो बाप की नजर तिरछी होकर उलट गई. फिर सदा की तरह सिर उठाकर मरकहे भैंसे की तरह आसमान को संबोधित करने लगे, “बेटा-बेटी जनमा के रात-रात-भर घूम-घूम के नाच देख-अ लोग, सभे बोझा ढोए खातिर हम तो बड़ले बानी...”

    बाप ने वही सारी जली-कटी बातें फिर से दुहराईं जो ऐसे अवसरों पर वह दुहराया करते थे.
    आवाज सुनकर माई ओसारे में निकल आईं. बाबूलाल ने पैलगी की जिसको मन-ही-मन आशीर्वाद देकर वे भिखारी की ओर मुड़ीं, “का बबुआ, एकदम्मे से जोगी हो गए का?”
    “का भइल माई ?”
    “अरे शीला (नाथ) के बियाह खातिर नाऊ आइल रहल. दिन-बार धरा गइल और तोहार पते ना..”
    “कब है?” भिखारी ने ऐसे नीरस भाव से पूछा जैसे किसी दूसरे के बेटे की शादी की बात चल रही हो.
    “का तो...हमारा भोर (विस्मरण) पड़ गइल, बाकी एके महीना रह गया है.”
    “ऐं!” बाबूलाल चिहुंककर उठ बैठे, “सिर्फ एक महीना. इतनी जल्दी का है?”
    “इनके बाबू जी को डर था कि क्या पता, फिर कोई नाई दुआर झांकने आए भी कि नहीं. नचनिया का लड़का नू है. ई हो कहीं भड़क न जाय, सो पंडित जी के बोलवा के जल्दी-जल्दी, गन्ना गनाइल और दिन-वार धरा गइल!”
    “क्या इतने गए गुजरे हैं हमलोग?” भिखारी ने सवाल करती आंखें बाबूलाल पर टेक दीं. बाबूलाल इस सवाल से बचने के लिए बगलें झांकने लगे.

    Author Sanjeev

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