स्वांग: जहाज का किराया रोज बदलता है, ऐसे ही रिश्वत के भी फ्लैक्सी रेट होते हैं

'स्वांग' में एक गांव के बहाने समूचे भारतीय समाज के विडम्बनापूर्ण बदलाव की कथा दिलचस्प ढंग से कही गई है.

'स्वांग' में ज्ञान चतुर्वेदी ने कोटरा गांव के जनजीवन के जरिये दिखलाया है कि किसी समय मनोरंजन के लिए किया जाने वाला स्वांग अर्थात अभिनय अब लोगों के जीवन का ऐसा यथार्थ बन चुका है जहां पूरा समाज एक विद्रूप हो गया है.

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    'स्वांग' (Swang) ज्ञान चतुर्वेदी का नया उपन्यास है. इसे 'बारामासी' और 'हम न मरब' के बुन्देलखंड की पृष्ठभूमि पर उनकी उपन्यास-त्रयी की अंतिम कड़ी के रूप में भी पढ़ा जा सकता है. इस उपन्यास को राजकमल प्रकाशन (Rajkamal Prakashan) ने प्रकाशित किया है.

    'स्वांग' में ज्ञान चतुर्वेदी (Gyan Chaturvedi) ने कोटरा गांव के जनजीवन के जरिये दिखलाया है कि किसी समय मनोरंजन के लिए किया जाने वाला स्वांग अर्थात अभिनय अब लोगों के जीवन का ऐसा यथार्थ बन चुका है जहां पूरा समाज एक विद्रूप हो गया है. पेश हैं स्वांग के कुछ अंश-

    ईमानदारी का भगंदर
    “तो क्या सारे अफसर बेईमान ही होते हैं?” चबूतरे पर बैठे नौजवान ने अचानक ही चर्चा में उतरते हुए पूछ लिया.
    ***
    कोटरा के बाज़ार में बने इस चबूतरे का जिक्र हम पहले भी कर चुके हैं. गजानन बाबू का भी यही स्थायी ठीया है. पीपल का एक बहुत पुराना-सा पेड़ है. उसी के साथ बना है यह चबूतरा. फुरसती लोग बैठे रहते हैं यहां. कभी ताश की फड़, कभी पड़. कभी यूं ही, बस अलसाते हुए. कुछ लोग यहां बैठकर अखबार भी पढ़ते हैं. इन लोगों के बीच बतकही चलती रहती है. इससे थोड़ी दूर पर ही चाय का एक खोखा है. यहां तंबाकू, बीड़ी, सिगरेट, गुटखे की झालरें—अर्थात आनंदपूर्वक समय काटने के समस्त साधन उपलब्ध हैं. चबूतरे पर बिराजा व्यक्ति आवाज़ दे तो चाय वहीं पहुंचा दी जाती है.
    ***
    “तो क्या सारे अफसर बेईमान ही होते हैं?” नौजवान ने पूछा.
    सबने चर्चा रोककर उसे गौर से देखा.
    कोई नौजवान है. नौजवानों को हक है कि वे ऐसे मूर्ख प्रश्न उठाएं. गौर से देखा गया तो सब उसे पहिचान भी गए. गंगेलेजी का लौंडा है. अभी-अभी शहर से पढ़-लिखकर लौटा है. इसने पंडिज्जी के स्कूल में मास्टरी की नौकरी के लिए कागज भी डाल रखे हैं. उस तरह के कॉम्पिटीशन्स की तैयारी भी कर रहा है, जिनमें बैठ-बैठकर इस तरफ़ के नौजवान एक दिन ओवर-एज होकर अन्ततः कहीं कुछ छोटामोटा काम पकड़ लेते हैं. इस नौजवान की अभी शुरुआत है. अभी यह सपनों की पकड़ में है. इसे उम्मीदें हैं. होती ही हैं. पढ़-लिख लो तो शुरू-शुरू में कुछ ज़्यादा ही होती हैं. इसे भी हैं तो ऐ-सी कुछ गलत बात नहीं. धीरे-धीरे समझेगा. दुनिया को उस तरह से समझना अभी इसे बाकी है जैसी वह वास्तव में है. इसीलिए जब नौजवान ने यह मूर्खतापूर्ण प्रश्न किया तो चबूतरे पर बैठे लोगों ने उसे माफ कर दिया.
    इससे पूर्व वह नौजवान वहां चुपचाप बैठकर कोई किताब पढ़ रहा था परन्तु साथ-साथ वह, वहां एकत्रित फुरसतियों के बीच चल रहे विमर्श को भी बड़ी देर से सुनता जा रहा था.

    किसी अधेड़ ने बात यहां से शुरू की थी कि वैसे तो सारे ही अफसर हरामी होते हैं पर अभी आया ये वाला कुछ विकट ही हरामी लग रहा है. स्साला ऐसा बेईमान है कि अब पुराने वाले अफसरों की सोचें तो वे तो संत टाइप लग रहे हैं. बात एक बार चल पड़ी, फिर तो सभी उसमें उतर गए. खूब छपाछप मची.

    हां, इस एक बात पर लगभग सर्व-सहमति दिखी कि अफसर है, तो वह बेईमान होगा ही. सबने माना कि बेईमान होना तो अधिकार है अफसर का. भाई साहब, किसी अफसर से यह उम्मीद ही क्यों करना कि वह बिना आपसे पैसा लिए आपकी कटी उंगली पर मूतेगा? ऐसा सोचना भी आपकी नादानी है! वास्तव में, यह संयम तो अफसरी की ट्रेनिंग में ही सिखा दिया जाता है कि कैसे अपनी पेशाब और दस्तखत को तब तक रोक के रखा जाए जब तक कि कटी उंगली लेकर प्रस्तुत हुआ शख़्स उचित रिश्वत प्रस्तुत न कर दे.

    फिर विभिन्न अफसरों की अफसरी के किस्से चल पड़े. रिश्वत की बात चली तो थानेदार साहब की बात तो सबसे पहले निकलनी ही थी. ‘हुस्न की बात चली तो सब तेरा नाम लेंगे’वाला मामला.

    याद करते हुए पूछा गया, “बघेल साब की याद है कि नहीं? ऐसा कड़क थानेदार कि एक बार ठीक से घूर के देख ले तो आदमी के बदन पे नील पड़ जाएं. ...जरा-जरा-सी बात पर आदमी को घर से उठवा लेता, और एक बार उठवा ले तो फिर आदमी कहीं बैठने लायक नहीं रह जाता था. गाल से लेकर अपने चूतड़ तक सुजवाकर ही आदमी थाने से लौट पाता था. पन्द्रह दिन तो आदमी अपने घर मूं के बल लेटा रहता था....ऐसे में कभी एक मानवाधिकार वाले साहब थाने पहुंच के उनसे फालतू के तर्क-वितर्क करने लगे. बोले कि निरपराधी को ऐसे पकड़ना तो ठीक नहीं है.

    थानेदार साहब ने पुचकारते हुए उनसे पूछ लिया कि फिर आप ही हमें गाइड करें कि इनको कैसे पकड़ना ठीक रहेगा? गर्दन से पकड़ें कि कलाई से? या कहें तो पिल्ले की तरह इनके दोनों कान पकड़ के इन्हें उठाया जाए? आप जैसा भी निर्देश देंगे, हम आगे से इन स्सालों को वैसा ही उठाया करेंगे. मानवाधिकार वाले साहब के पास इन यक्ष-प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं था. वे मौन रह गए. फिर, वे चुपचाप ही उठकर जाने को हुए तो थानेदार ने उनसे पूछा कि तुम अभी जा कहां रहे हो? तुम अपनी तो बताते जाओ; तुम्हें कैसे पकड़ा जाए? और पकड़ के तुम्हें कहां लटकाया जाए? फिर बघेल साब ने उनकी चैंथी के बाल अपनी मुठ्ठी में पकड़ के, उन्हें वहीं तीन चक्कर घुमा के कहा कि बेटा, जब तक हम यहां के थानेदार हैं तब तक इधर आस-पास भी न दिखियो वर्ना हवाई जहाज बना के उल्टा टांग देंगे और नीचे हवाई पट्टी पे तेल डाल देंगे तो जहाज उतर भी न पाएगा.”

    सब देर तक हंसे. नौजवान, किताब पर आंखें गड़ाए उनकी हंसी सुनता रहा ...अरे, कैसे हैं ये लोग?
    इसी तारतम्य में पिछले तहसीलदार साब के भी कसीदे काढ़े गए. सबने उनकी इस बात के लिए भूरि-भूरि प्रशंसा की कि उन्होंने रिश्वत देने का सिस्टम इतना आसान तथा बोधगम्य बना डाला था कि वे सीधे ही क्लाइंट को अपना फाइनल रेट खुद बता देते थे. वे यहां तक बता देते थे कि यदि तुम आज शाम तक बंगले पर दस हजार रुपए पहुंचा देते हो, तो ठीक, वरना हम कल के रेट का आज खुद भी नहीं कह सकते. हो सकता है कि परसों आओ तो हम इसी काम के तुमसे पूरे पन्द्रह हजार मांगें. हवाई जहाज का किराया रोज-रोज बदलता रहता है कि नहीं? रिश्वत का सिस्टम भी वैसा ही मान लो. रिश्वत के भी फ्लैक्सी रेट होते हैं.

    ...उनके इस खुले व्यवहार से आमजन के लिए चीजें बड़ी आसान हो गई थीं. आदमी सीधे उनसे ही पूछ लेता था कि साहब हमें ये काम कराना है, इसका भाव बता दिया जाए तो हम वैसा इंतजाम करके आ जाएं? ...एकदम दुकानदारी टाइप मामला बना दिया था साहब ने. दुकान में क्या होता है? सामान सामने रखा होता है. रेट भी सामने हैं. पैसे दो. सामान लो. निकलो. किसी भी दुकान पर आप बिना पैसे के जाते हो क्या? नहीं न? वहां पहुंचकर आप यह तो नहीं कहते न कि यार, हमें जे साबुन मुफ्त में दे दो? जानते हैं, कोई नहीं देगा. मार के भगा देगा. काम कराना है तो दाम तो देने पड़ेंगे न?...“बिना पैसे के आ गए तो हम तुम्हारी क्या गत करेंगे यह बात तो खुद हमें पता नहीं है. सच्ची.”...वे लोगों से कहते. ...ऐसेई एक नादान बलम कभी इनके पास पहुंच गए थे. कहने लगे कि सरकारी काम कराने के कैसे पैसे? यह तो हमारा अधिकार है. आप तुरन्त हमारा काम करके दें क्योंकि हमारा केस एकदम कानून-सम्मत है.

    सारी बात को सुनकर तहसीलदार साहब पहले तो ख़ूब हंसे, फिर बोले कि “यार, तुम यहां एकदम गलत जगह आ गए हो. यहाँ कोई चुटकुलों वाला कम्पटीशन नहीं चल रहा. वो होता तो हम तुम्हारे इस चुटकुले पर स्वयं तुम्हें फर्स्ट प्राइज देते” शुरू में हंसने के बाद फिर साहब गुस्सा खा गए. गरम हो के पूछने लगे कि “तुम्हें यह किसने समझा दिया है कि नियम-कायदे के काम की रिश्वत न माँगी जाएगी?” गुस्से में तमतमाकर कुर्सी से खड़े हो गए साहब। नादान सज्जन का कंधा पकड़कर पूछने लगे, “अरे, अगर तुम्हें गर्भगृह में खड़े होकर प्रसाद चढ़ाने से ही इनकार करना था तो फिर अपने घर पर ही बैठकर भगवान का ध्यान कर लेते न. यहां मन्दिर में क्यों आए?

    “अभी देंगे एक चपाटा...” कहकर तहसीलदार साब झापड़ मारने ही वाले थे कि उस आदमी का एक समझदार दोस्त भागा-भागा वहां पहुंच गया. उसने खूब हाथ-पांव जोड़े. माफी मांगी. बताया कि साब, ये बेचारा एकदम सीधा-सादा आदमी है. तहसील भी पहली बार ही आया है. तहसील की हवा में पहली बार श्वास ले रहा है. इसे पता ही नहीं, यहां की हवा में कित्ता आक्सीजन है, कित्ता कार्बन डाई आक्साइड? नादान है. चूतिया ही मान लें....
    यह किस्सा सुनकर भी चबूतरे पर बैठे सब लोग खूब हंसे.

    फिर और भी अफसरों की दंत कथाएं निकलीं. अफसरों की अफसरी, रिश्वत वसूलने के हरेक के अलग तथा अनोखे तरीकों, गरीबों को लतियाए जाने के दृश्यों का ऐसे हंस-हंसकर बयान किया गया मानो समाज ने अफसरी, रिश्वत, शरीफों और गरीबों की दुर्गति आदि को न केवल नियति के तौर पर स्वीकार कर लिया है, उसे इस बात पर गर्व मिश्रित आनन्द भी है कि ऐसे प्रशासन-तंत्र में भी उसके लोग कितने कौशल से जिए जा रहे हैं. सबके पास अपने-अपने किस्से थे कि कैसे उन्होंने एकदम असम्भव-सा लगता गैरकानूनी काम रिश्वत देकर मिनटों में करा लिया था क्योंकि दुनियादारी यही कहाती है.

    नौजवान बेचैन होकर तब से सब कुछ सुने जा रहा था. अन्ततः कसमसाकर उसने किताब बन्द कर दी और व्यंग्यात्मक लहजे में पूछा, “तो क्या सारे अफसर बेईमान ही होते हैं?”
    सब लोग पलटकर उसे देखने लगे.
    वह बोला, “मैं तबसे आपकी अजीब-अजीब बातें सुन रहा हूं. ऐसा लगता है, बिना बेईमान हुए यहां कोई अफसरी कर ही नहीं सकता है. क्या आपने कभी कोई ईमानदार अफसर देखा ही नहीं? यहां हमेशा ऐसे ही अफसर आते रहे हैं क्या? अरे, ईमानदार अफसर भी तो होते हैं कि नहीं?”
    सब उसका मुंह देखते रहे ...बोल लेने दो. पेट की गैस है, जित्ती बाहर निकल जाए उत्ती बढ़िया.

    अपनी बात बोलकर वह क्षोभ में भरा हुआ किताब-कागज समेटने लगा.
    तब कोई उसकी बात के उत्तर में बोला, “तुमने एकदम सही कहा. क्यों नहीं हो सकता! जरूर हो सकता है.अफसर ईमानदार भी हो सकता है. जैसे कि आदमी पागल भी हो सकता है. क्यों नहीं हो सकता? बिलकुल हो सकता है.”
    सब हंसने लगे. नौजवान खिसिया गया.

    एक ने उसे पुचकारते हुए समझाया कि होने को तो दुनिया में कुछ भी हो सकता है. हम उसकी तो बात ही नहीं कर रहे कि क्या-क्या हो सकता है? हम तो यहां उसकी बात कर रहे हैं, जो है. ...तो भैया, है तो जेई; हमारी तो ऐसेई अफसरों से निभाते हुए जिंदगी गुजरी है भैया. वैसे तुम भी ठीक ही कह रहे हो. ईमानदार अफसर भी कहीं होता ही होगा. ...जरूर होता होगा. ...परन्तु सरकार ऐसे ईमानदार आदमी को कहां रखती है, उसको टिकट लगाकर दिखाती है कि बिना टिकट के; यह सब हमें नहीं पता...अलबत्ता, हमने तो कोई ईमानदार अफसर कभी देखा नहीं.

    एक बुजुर्ग सज्जन ने इस बात पर तुरन्त एतराज प्रकट किया. उन्होंने कहा, “नहीं, ऐसा भी नहीं है. तुम भूल रहे हो. ...एक ईमानदार अफसर इतें भी आए तो हते. भूल गए उनको? कैसी आग मूती थी बिनने; याद नहीं?”
    फिर वे उस ईमानदार अफसर का किस्सा सुनाने बैठ गए :
    पन्द्रह साल पहले यहां भी आए थे ऐसे एक अफसर. बड़े ईमानदार. बड़े कड़क. सब तरफ उनकी चर्चा कि एक ईमानदार नायब तहसीलदार ने ज्वाइन किया है भैया. पहले तो कोई इस अनहोनी पर भरोसा करने को राजी नहीं हुआ कि अरे, ऐसे कैसे? फिर दूर-दूर के लोग मात्र इसीलिए तहसील आने लगे कि देखें तो, ईमानदार अफसर स्साला दिखता कैसा है?...कई लोग तो अपने बाल-बच्चों को भी साथ लेकर आए कि ठीक से देख लो, ऐसी शक्ल निकल आती है ईमानदार आदमी की.

    एक ईमानदार अफसर की आमद से ही यहां का जीवन उथल-पुथल हो गया था. रिश्वत देकर ही सारे काम कराने के आदी नागरिकों के लिए वे छह माह बड़े ही कठिन गुजरे थे.
    ईमानदार होकर भी कोई नायब तहसीलदार था, या नायब तहसीलदार होते हुए भी कोई ईमानदार था—इस दैवीय चमत्कार पर लोगों को तब जाकर विश्वास हुआ जब स्वयं उनका कोई काम इनसे फंस गया...वैसे तो उनका चपरासी ही लोगों को बाहर चेता देता था कि अन्दर रिश्वत का इशारा भी मत कर बैठना वर्ना हमारे ये नए साहब क्या कर बैठें, उन्हें खुद नहीं पता ...रिश्वत की बात सुनकर एकदम बौखला जाते हैं नए साहब.

    सबको पता चल गया कि ये तो वास्तव में रिश्वत नहीं लेते! यही नहीं, लोगों को यहां तक पता चला कि अपनी इस मूर्खता पर इन साहब को ख़ासा गर्व भी है. यह बात तो और भी चिंतनीय थी. इसका मतलब यह हुआ कि ये इस मजबूरी में ईमानदार नहीं थे कि बेईमानी करने में अक्षम रहे हों बल्कि इनको तो ईमानदारी का रोग था. इनकी ईमानदारी भगंदर टाइप थी जो आदमी को न तो ठीक से बैठने दे, न लेटने.

    इस तरह न केवल आमजन, तहसील कर्मचारी भी उनसे बेहद परेशान हो गए. स्साला, हर फाइल ऐसी ख़राब कर देता है कि फिर उसे सुधारना भी असम्भव—वे सब कहते! अब इसकी ईमानदारी का क्या इंतज़ाम किया जाए? पूरे कोटरा में लोग चिन्तित रहने लगे थे.
    लोग परेशान थे. वैसे वे आपस में सांत्वना भी देते रहते थे कि यह आदमी यहां ज्यादा दिन नहीं चलने वाला. सबको विश्वास था कि गवर्नमेंट इसे लम्बा बरदाश्त नहीं करेगीॉ. स्साले की ईमानदारी का घड़ा जल्दी ही फूटेगा!...पर ऐसा नहीं हुआ. उनका ट्रान्सफर किसी लूप लाइन में नहीं किया गया जैसा कि आमतौर पर ऐसों के साथ होता है. वे कोटरा में ही बने रहे. उनके रहते चहल-पहल वाली तहसील एकदम विधवा टाइप उदास तथा उजाड़ लगने लगी. रिश्वत का सिंदूर माथे पर नहीं लगने से ऐसा लगे मानो आफिस का सुहाग ही लुट गया हो.
    फिर?
    कैसे ठीक किया जाए इन्हें? विचार-विमर्श चले.

    फिर इलाके के कुछ जिम्मेदार नागरिक इनके बड़े साहब तक जा पहुंचे. उनसे प्रार्थना की गई कि आप इनको ठीक से समझा लें कि दुनिया ऐसे नहीं चलती है. ...साहब ने भी माना कि इनके द्वारा फालतू की ईमानदारी झाड़ने से तहसील का सौहार्द्रपूर्ण वातावरण ख़राब हुआ है. बड़े साहब सहमत थे कि आदमी को प्रैक्टिकल होना चाहिए. साहब ने आश्वस्त किया कि हम भी इन्हें एक दिन बुलाकर समझाएंगे. पर उन्होंने साथ में यह भी कहा कि यह आदमी बहुत टेढ़ा है. हमसे भी समझेगा कि नहीं, कहना कठिन है. इसकी रेपुटेशन बड़ी ख़राब है। घुन्ना आदमी है.
    फिर?
    फिर एक दिन साहब ने उन्हें अपने चेंबर में बुलाकर चाय पिलाई. बात करने की कोशिश की :
    “यार, आप लेते क्यों नहीं?” साहब ने सीधे ही पूछ लिया.
    “क्या लेना है सर?”
    “वही, जो सब लेते हैं...”
    “...जी सर?” वे समझे ही नहीं.
    “यार, लोगों की फाइलें क्लियर करते ही हो, कुछ ले लिया करो.”
    “थक जाते हैं तो चाय ले लेते हैं, सर.” वे बोले.
    “तुम ऐसे ही हो, या फिर जानबूझकर चूतिया टाइप बिहेव कर रहे हो? क्यों?”
    “सर, मैं तो एकदम नियम-कायदे से चल रहा हूं.”
    “क्यों चल रहे हो?”
    “जी?”
    “जी. ...अच्छा, अब हम तुमसे सीधे ही पूछते हैं. तुम रिश्वत क्यों नहीं लेते?”
    वे चुप रहे. मौन होकर रुआंसा चेहरा लिए साहब को देखते रहे.
    “पैसे ख़राब लगते हैं तुम्हें?” साहब ने पूछा।
    “सर, यह मेरे सिद्धांतों के खिलाफ़ है.”
    “कौन-सा सिद्धांत? न्यूटन का, कि आर्किमिडीज का? यार, यह कौन-सी साइंस पढ़ ली है तुमने? तुम क्या समझते हो? हमारा कोई सिद्धांत नहीं है?”
    “सर, मैं आपका कैसे कहूँ?”
    “यार, सिद्धांत ऐसा हो जो थ्योरी भर का न हो, वह प्रैक्टिकल भी तो हो. तुम अपना सिद्धांत थोड़ा ठीक कर लो.”
    “सर, मैं ईमानदारी नहीं छोड़ पाऊंगा. क्षमा करें.”
    “मूर्खता को ईमानदारी मानने की भूल मत करो.”
    नायब तहसीलदार साहब मौन हो गए. कुछ बोले नहीं। उनकी आंखें भर आईं. मुंह लाल हो गया. होंठ थरथराने लगे. चैंथी के बाल खड़े हो गए. बोले, “सर, मैं यह सब नहीं कर सकूंगा.”
    साहब ने गहरी श्वांस ली.
    नायब तहसीलदार साहब लाल आंखें और उतरा हुआ मूं लिए वहां से उठ आए. फिर, बात एमएलए साहब तक भी पहुंची. वे बोले कि भगाने को तो स्साले को हम आज भगवा दें पर इसे कोई अपने यहां लेने को राजी तो हो. कोई इसे लेने को ही राजी नहीं. लूप-लाइन वाले तक इसे अपने यहां नहीं चाहते. ऐसा डिब्बा लूप-लाइन की पटरी पर भी बोझ माना जाता है. वहां भी यह अपने बोझ से पटरी को खराब ही करेगा.
    फिर?
    फिर क्या, एक दिन अपनी ईमानदारी की गठरी उठाकर यहां से मुंह काला कर गए. लोकतंत्र है भाई. निकल गए. सरकार ने न जाने कहां. किस कोने में, कोई ऐसी कुर्सी खोज निकाली जो एकदम आरामकुर्सी टाइप की थी. पड़ी थी कहीं. वहीं बिठा दिया इनको. कहा कि अब तुम यहीं रहे आओ. झूलते रहो.
    नौजवान ने सारी कहानी सुनी.

    कहानी की शिक्षा कहीं इस नादान नौजवान को समझ में न आई हो तो वह भी उन बुजुर्ग ने विस्तार से बता दी. कहा, “इसीलिए यह मत समझना कि सरकार में ईमानदार अफसर नहीं होते. होते हैं. ख़ूब होते हैं. सरकारी मशीनरी में ईमानदार अफसर भी देखे जाते हैं. बस, होता यह है कि वे इस मशीन में फिट नहीं हो पाते. हरदम खड़-खड़ करते रहते हैं.”

    यहां बुजुर्ग सज्जन थोड़ा रुके. नौजवान का मुंह देखते रहे. मुस्कुराए भी. फिर आगे बोले : “हां, तुम जैसे नौजवान कोई क्रांति कर डालें तो शायद कुछ हो.

    “वैसे क्रांति से भी कुछ बदलता नहीं. क्रांति हो भी गई तो क्या होगा? क्रांति करने वाले भी बाद में क्रांति करने का मुआवजा वसूलने लगते हैं. हर क्रांति अन्ततः इस या उस सिस्टम में ढल जाती है. मशीन तो सबको यही लगती है न? सो तुम परेशान न हो. अभी नौजवान हो. अपना खून फालतू में ऐसे न छनकाओ. तुमाई आगे शादी-ब्याह की उम्र है. खून को सही काम के लिए बचा के रखो वर्ना शादी के बाद हकीमों के चक्कर काटते फिरोगे.”

    सब हंसने लगे. नौजवान खिसियाकर कसमसाने लगा. वह कुछ कह पाता कि तभी मुन्ना मास्साब वहां से तेज-तेज निकलते दिखे.
    लोगों ने आवाज दी तो उनको रुकना पड़ा.
    “जल्दी-जल्दी कितें खों जा रये मास्साब?” कोई बोला.
    “स्कूल जा रये; इस टेम पे और कितें जाएंगे?”
    “अरे, रुक के थोड़ी चाय तो पी लो हमारे साथ.”
    “नहीं, आज तो बिलकुल भी टेम नहीं है भैया.”
    “अरे, ऐसी क्या जल्दी मची है? टेम पे पोंच के कौन-सा किसी लड़के को विद्वान बना दोगे?”
    “उन्हें विद्वान बनाने की स्कूल में व्यवस्था अलग से है. वो बात नहीं है.”
    “फिर बैठो न.”
    “नहीं, हम बैठ न पाएंगे.”
    “काय? नीचे कछू हो गओ का?”
    सब हंस पड़े.
    “आप हमारे नीचे की चिन्ता न करो. उतें सब दुरुस्त है. हमें अभी पंडिज्जी के साथ कालपी जाना है. पंडिज्जी भी पहुंच रहे होंगे.”
    “कालपी? काय के लाने?”
    “नए शिक्षाधिकारी आए हैं. अभी-अभी ज्वाइन किए हैं. उनके दर्शन करने जाएंगे पंडिज्जी. हम साथ में.”
    “भौत ईमानदार अफसर तो नहीं हैं न?” किसी ने पूछा.
    सब लोग नौजवान की तरफ देखकर हंसने लगे. वह और भी खिसिया गया.
    मुन्ना मास्साब हंसी का कारण तो नहीं समझ पाए परन्तु हंस दिये. ईमानदारी का जिक्र आया है तो जरूर कोई मजाक की ही बात रही होगी—यह मानकर हंस दिये मुन्ना मास्साब.
    “ईमानदार तो नहीं, कड़क हैं—ऐसा कहते हैं.” मुन्ना मास्साब ने कहा.
    “कड़क अफसर को मुलायम करने का टोटका खूब जानते है अपने पंडिज्जी.” किसी ने कहा.
    “वो तरीका तो पूरा हिंदुस्तान जानता है भैया. अफसर को मुलायम करने का एक ही तरीका पूरे हिंदुस्तान में चलता है; गांधीवादी तरीका. जेब में कड़क कागज वाले गांधीजी हों तो सब मुलायम हो जाते हैं.” कोई और बोला।
    सब फिर से हंसे.
    नौजवान सिहर गया. ...रोने की बात पर कोई कैसे हंस सकता है?
    नौजवान मुन्ना मास्साब को जाता हुआ देखता रहा.
    उसने भी तो इसी कॉलेज में नौकरी के लिए आवेदन दे रखा है. क्या वह भी एक दिन इन जैसा ही हो जाएगा? नौजवान के शरीर और मन में झुरझुरी-सी उठ गई.
    चबूतरे पर फिर से किसी बात पर सब लोग हो-हो करके हंस रहे हैं.

    डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी (Gyan Chaturvedi)
    डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी का जन्म मऊरानीपुर (झांसी), उत्तर प्रदेश में 2 अगस्त, 1952 को हुआ. मध्य प्रदेश में इनकी विशिष्ट पहचान हृदयरोग विशेषज्ञ के रूप में है. लेखन की शुरुआत सत्तर के दशक में ‘धर्मयुग’ पत्रिका से हुई. प्रथम उपन्यास नरक-यात्रा अत्यन्त चर्चित रहा जो भारतीय चिकित्सा-शिक्षा और व्यवस्था पर थाॉ. इसके बाद 'बारामासी', 'मरीचिका' तथा 'हम न मरब' जैसे उपन्यास आए. 'प्रेत कथा', 'दंगे में मुर्गा', 'मेरी इक्यावन व्यंग्य रचनाएं', 'बिसात बिछी है', 'खामोश! नंगे हमाम में हैं', 'प्रत्यंचा' और 'बाराखड़ी' व्यंग्य-संग्रह प्रकाशित.

    भारत सरकार द्वारा 2015 में ‘पद्मश्री’ से सम्मानित हुए. ‘राष्ट्रीय शरद जोशी सम्मान’, (म.प्र. सरकार), हिंदी अकादमी दिल्ली का व्यंग्य-लेखन के लिए दिया जानेवाला प्रतिष्ठित ‘अकादमी सम्मान’; ‘अन्तरराष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा-सम्मान’ (लन्दन) तथा ‘चकल्लस पुरस्कार’ के अलावा कई विशिष्ट सम्मान प्राप्त.

    पुस्तक : स्वांग
    लेखक : ज्ञान चतुर्वेदी
    प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
    पेपरबैक : 392 पेज
    मूल्य – 269/-

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