कलिंगा लिटरेरी फेस्टिवल भाव संवाद में चर्चा ग़ालिब के 'चिराग-ए-दैर' की

मिर्ज़ा ग़ालिब ने अपनी बनारस यात्रा के दौरान इस शहर की संस्कृति, लोग और यहां के सौन्दर्य पर 'चिराग-ए-दैर' लिखा था.

ग़ालिब ने बनारस के मंदिर, वहां गलियों, गंगा नदी, संस्कृति की याद में फ़ारसी में 108 मिसरों की एक मसनवी लिखी. उस मसनवी का नाम रखा- चिराग़-ए-दैर.

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    भले ही लॉकडाउन के बहुत से प्रतिबंधों से हमें राहत मिल गई हो, फिर भी सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को अभी अनुमति नहीं मिली है. दैनिक गतिविधियों के बीच लोगों को साहित्य, संस्कृति और नई सोच से रू-ब-रू कराने के लिए कलिंगा लिटरेरी फेस्टिवल का भाव संवाद मंच लगातार काम कर रहा है. इस कड़ी में केएलएफ भाव संवाद ने साहित्य प्रेमियों को ग़ालिब की दुनिया की सैर कराई. और इस दौरान चर्चा हुई मिर्ज़ा ग़ालिब के बनारस पर केंद्रीत 'चिराग-ए-दैर' की.

    जिन अहसासों के नाम नहीं होते, उन्हें ग़ालिब अपना नाम दे देते हैं. कुछ ऐसे लेखक हैं जो ग़ालिब को एक नई ज़िंदगी, एक नया रंग देकर हमारे सामने फिर से जिंदा कर देते हैं. कुलदीप सलिल (Kuldeep Salil) उन्हीं लेखकों में से एक हैं. पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया (Penguin Random House India) ने इनकी एक किताब 'चिराग-ए-दैर' (Chirag-E-Dair- Lamp of the Temple) प्रकाशित की है.

    मिर्ज़ा ग़ालिब ने अपनी बनारस यात्रा के दौरान इस शहर की संस्कृति, लोग और यहां के सौन्दर्य पर 'चिराग-ए-दैर' लिखा था.

    कलिंगा लिटरेरी फेस्टिवल भाव संवाद में लेखक कुलदीप सलिल से 'चिराग-ए-दैर' के अनुवाद के दौरान उनके अनुभव, किताब के विषय और उसकी प्रासंगिकता पर लंबी चर्चा हुई तो पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया की लैंग्वेज पब्लिशर वैशाली माथुर किताब के प्रकाशन से जुड़े अनुभव साझा किए. कार्यक्रम का संचालन लेखक और पत्रकार पल्लवी रेब्बाप्रगदा (Pallavi Rebbapragada) ने किया.

    कुलदीप सलिल कहते हैं भले ही ग़ालिब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी रचनाएं, उनके अनगिनत किस्से-कहानी हमारे बीच हैं, जिन्हें हम याद करते हैं, उन पर लंबी चर्चाएं करते हैं.

    कुलदीप ने अपने संबोधन में ग़ालिब को कुछ इस तरह याद किया-

    'नग़्मा-हा-ए-ग़म को भी ऐ दिल ग़नीमत जानिए,
    बे-सदा हो जाएगा ये साज़-ए-​हस्ती एक दिन.'

    'ग़ालिब-ए-ख़स्ता के बग़ैर कौन से काम बंद हैं
    रोइए ज़ार ज़ार क्या कीजिए हाए हाए क्यूं.'

    'घर जब बना लिया तेरे दर पर कहे बगैर,
    जानेगा अब भी तू न मेरा घर कहे बगैर.'

    'चिराग़-ए-दैर' के अनुवाद पर अपने अनुभव साझा करते हुए कुलदीप कहते हैं, 15-20 साल पहले मैं दीवान-ए-ग़ालिब के अनुवाद पर काम कर रहा था. उस समय मैंने उनसे संबंधित तमाम किताबें और लेख पढ़ें. मैंने तमाम जगह चिराग-ए-दैर के बारे में पढ़ा.'

    कुलदीप कहते हैं कि सेकुलरिज्म पर भारत में एक से एक बढ़कर कविताएं लिखी गई हैं. लेकिन 'चिराग़-ए-दैर' की बात ही कुछ और है.

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    'चिराग़-ए-दैर' लिखे जाने के पीछे के किस्से को शेयर करते हुए कुलदीप कहते हैं, 'हम सब ग़ालिब की पेंशन के मामले के बारे में जानते हैं. इस मुद्दे पर ग़ालिब को कलकत्ता जाना पड़ा था. उस समय के अंग्रेजी शासन में ग़ालिब को पेंशन मिलती थी. लेकिन किन्हीं कारणों के चलते उनकी पेंशन अटक गई.'

    'अटकी पेंशन को बहाल कराने के लिए ग़ालिब को कलकत्ता का सफर किया. सफर के दौरान वे कई शहरों में ठहरे, उनमें एक बनारस भी था. ग़ालिब ने बनारस के मंदिरों, वहां गलियों, गंगा नदी, बनारस के लोग, वहां की संस्कृति की याद में फ़ारसी में 108 मिसरों की एक मसनवी लिखी. उस मसनवी का नाम रखा- चिराग़-ए-दैर यानी मंदिर का दीप.'

    KLF Bhava Samvad

    बनारस पर लिखे 'चिराग़-ए-दैर' को लेखक कुलदीप 'द बाइबल ऑफ सेकुलरिज्म' नाम देते हैं. इसकी वजह बताते हुए वे कहते हैं कि बनारस हिंदुओं का पवित्र तीर्थस्थल है. मान्यताओं के मुताबिक, बनारस में आकर गंगा स्थान करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं. परमात्मा का आत्मसाथ कर पाते हैं और जन्म-मृत्यु के झंझट से मुक्त हो जाते हैं. एक मुस्लिम होने के नाते भी ग़ालिब को बनारस में पूरा सम्मान और आज़ादी मिली. वे वहां लोगों से मिले, मंदिर गए, गंगा के किनारों पर लंबा समय बिताया. वे वहां रम गए. ग़ालिब ने बनारस की खूबसूरती और संस्कृति के बारे में लिखा तो वहां की कमियों के बारे में भी खुलकर चर्चा की.

    ये सभी बातें हमें बनारस के सेकुलरिज्म के बारे में बताती हैं.

    कुलदीप कहते हैं कि भले ही ग़ालिब मुसलमान हों, लेकिन वे नियमों को लेकर कट्टर नहीं थे. वे खुलेआम शराब पीते थे और वे रमज़ान में रोज़ा भी नहीं रखते थे. इसके बाद भी वे हिंदू और मुसलमानों में खासे लोकप्रिय थे. ग़ालिब के लिए जाति-धर्म में कोई अंतर नहीं था.

    कुलदीप कहते हैं 'चिराग़-ए-दैर' उनकी पसंदीदा पुस्तक है. और आधुनिक समाज में इसका बहुत ही महत्व है.

    पेंग्विन की लैंग्वेज पब्लिशर वैशाली माथुर ने 'चिराग-ए-दैर' के अनुवाद के दौरान आने वाली चुनौतियों पर चर्चा करते हुए कहा कि 'चिराग-ए-दैर' पारसी में लिखा गया है. देवनागरी पारसी में 'चिराग-ए-दैर' को पढ़ते हुए आप उससे जुड़ाव महसूस करते हैं, भले ही उसका अर्थ समझ में न आए.

    वैशाली बताती हैं कि इस किताब पर 2020 में लॉकडाउन शुरू होने से पहले काम शुरू हुआ था, अब जाकर यह किताब की शक्ल में तैयार हुई है.

    कलिंगा लिटरेरी फेस्टिवल भाव संवाद (KLF Bhava Samvad)
    'कलिंगा लिटरेरी फेस्टिवल' के संस्थापक रश्मि रंजन परिदा (Rashmi Ranjan Parida) बताते हैं कि
    'केएलएफ भाव संवाद' महामारी के कारण लॉकडाउन के दौरान साहित्यिक गतिविधियों को बरकरार रखने के लिए शुरू किया गया था.

    'केएलएफ भाव संवाद' वर्चुअल माध्यम से साहित्यक गोष्ठियों का आयोजन करता है. भाव संवाद कार्यक्रमों में दिग्गज साहित्यकार, कलाकार, पत्रकारों को शामिल किया जाता है. इस मंच की लगातार बढ़ती साहित्यिक गतिविधियों को साहित्य प्रेमियों, लेखक और प्रकाशकों का भी भरपूर सहयोग मिल रहा है.

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