स्वाति शर्मा की कविता: अनंत के शोर-ओ-गुल में अनंत की शान्ति

स्वाति शर्मा दिल्ली में डिजटल एजेंसी चलाती हैं. उनकी कविताएं, लेख और समीक्षाएं हिंदी और अंग्रेजी में नियमित प्रकाशित होते हैं. स्वाति जर्मन और फ़ारसी भाषाओं में भी लेखन करती हैं.

स्वाति शर्मा दिल्ली में डिजटल एजेंसी चलाती हैं. उनकी कविताएं, लेख और समीक्षाएं हिंदी और अंग्रेजी में नियमित प्रकाशित होते हैं. स्वाति जर्मन और फ़ारसी भाषाओं में भी लेखन करती हैं.

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    शान्ति
    ज़ोर के घूमते दरयायी भंवरों से
    पिसते गोल-मटोल पत्थरों की गुड़-गुड़
    झरनों का बौख़ला कर
    चट्टानों पर टूटते हुए गुर्राना
    रहट चक्की की जीवन सरीख़ी
    अन्तहीन सांय-सांय
    सताये या भूखे हैं ये पंछी
    आसमानों से पुकार करते हुए
    जब सूरज उगता है
    ढोल बजाता चला आता है
    जब शाम ढलती है
    कपड़ों पिंड जान तक से लड़ती-झगड़ती
    ओस की बूंदें मसल जाती हैं
    मन कचोट देने वाली
    देवदारों से छनती चीख़ती चांदनी
    भरभरा कर बिखर जाती है
    तन पर रेंगती हुई
    कीट-पतंगों की रीं-रीं
    क़दमों की धमक से कराहता
    लकड़ी का कमज़ोर बूढ़ा सा फ़र्श
    बेइन्तहां आवाज़ों का रूहानी एकांत
    और चौबारे से पैर लटका कर
    ख़ाली कप हाथ में लिए बैठी मैं
    क्या ढूंढ रही हूं मैं यहां
    अनंत के शोर-ओ-गुल में
    अनंत की शान्ति

    ट्रैफ़िक जाम

    शामें
    जो आधी ब्रेक लाइट्स
    और आघी स्ट्रीट लाइट्स
    में बंट जाती हैं
    रातें
    जो ख़्वाबों के ट्रैफ़िक जाम में
    हैंड ब्रेक लगाए
    एक ही जगह फुदकती रहती हैं
    सड़कें
    जो रैड लाइट्स के
    मनके फेरती रहती हैं
    बड़े शहर के जाम में
    घर पहुंचना
    टीस को टालने सा होता है
    जाम जिससे हर शाम छुट्टी मिलती है
    पर मुक्ति नहीं

    दो मन

    दो मन होंगे मेरे शायद
    एक मन पीली स्ट्रीट लाइट्स ने बनाया होगा
    और एक मन बालकनियों ने
    एक के ऊपर रह कर देखने से
    और एक के नीचे रह कर देखने से
    सब कुछ उलझ जाता है
    उलझनें दिलक़श चीज़ें होतीं हैं

    दो मन होंगे मेरे शायद
    पुराना मन सितारों ने बनाया होगा
    और नया दूरबीनों ने
    एक का साथ यायावरी
    और दूसरे का आश्चर्य
    दूर होने और दूर रहने के अनुभव दो हैं
    दूरियां ही ठीक से समझ आतीं हैं

    दो मन होंगे मेरे शायद
    बड़ा जंगलों ने बनाया होगा
    और छोटा झुमकों ने
    एक को ओढ़ लेने से
    और एक को पहन लेने से
    श्रृंगार की एकरसता घनी हो जाती है
    कुछ न बूझने पर सजावट ही ठौर होती है

    दो मन होंगे मेरे शायद
    ऊपर वाला गोरैया ने बनाया होगा
    और नीचे वाला नृत्य ने
    एक उड़ कर स्थिर होने को चाहता है
    दूसरा गति की स्थिरता का संचारण करता है
    द्रवित होना फिसलना, उठना, फिर फिसलना होता है
    परिवर्तन की लय नियंत्रित चाल है

    दो मन होंगे मेरे शायद
    पास वाला खिड़कियों ने बनाया होगा
    और दूर वाला सैरों ने
    एक से सब कुछ समेट लेने की कोशिश
    एक में सब कुछ बिखेर देने की कवायद
    साधनों की जमाखोरी है
    वक़्त के टालने को सारे पुर्ज़े चाहिए.

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