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कौन है महाश्वेता देवी की 'द्रौपदी', क्या है पूरी कहानी, पढ़ें यहां

कौन है महाश्वेता देवी की 'द्रौपदी', क्या है पूरी कहानी, पढ़ें यहां

दिल्ली विश्वविद्यालय ने बीए (ऑनर्स) के अंग्रेजी पाठ्यक्रम से महाश्वेता देवी की चर्चित लघुकथा ‘द्रौपदी’ को हटा दिया है.

दिल्ली विश्वविद्यालय ने बीए (ऑनर्स) के अंग्रेजी पाठ्यक्रम से महाश्वेता देवी की चर्चित लघुकथा ‘द्रौपदी’ को हटा दिया है.

महाश्वेता देवी की कई रचनाओं पर फ़िल्म भी बनाई गईं. उनके उपन्यास 'रुदाली' पर कल्पना लाज़मी ने 'रुदाली' तथा 'हजार चौरासी की माँ' पर इसी नाम से 1998 में फिल्मकार गोविन्द निहलानी ने फ़िल्म बनाई.

    दिल्ली विश्वविद्यालय अकादमिक परिषद (Delhi University Academic Council) ने बीए (ऑनर्स) के अंग्रेजी पाठ्यक्रम से महाश्वेता देवी (Mahasweta Devi) की चर्चित लघुकथा ‘द्रौपदी’(Draupadi) को हटा दिया है. परिषद के इस फैसले से साहित्य जगत में भूचाल मचा हुआ है. परिषद ने महाश्वेता देवी के साथ दो अन्य लेखकों की रचनाओं को भी कोर्स से हटाया है.

    सोशल मीडिया (Social Media) पर लोग ‘द्रौपदी’(Draupadi) कहानी को लेकर दो धड़ों में बंट गए हैं. कुछ अकादमिक परिषद के फैसले का विरोध कर रहे हैं तो कुछ पक्ष में तर्क दे रहे हैं.

    एक पक्ष का तर्क है दिल्ली यूनिवर्सिटी जानबूझ कर कोर्स से दलित और आदिवासी लेखकों की रचनाओं का हटा रही है. जबकि दूसरे पक्ष का कहना है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी ही नहीं अन्य विश्वविद्यालय और राज्य सरकारें भी अपने कोर्स में समय-समय पर बदलाव करती रहती हैं. पुरानी कहानियों को हटाकर अन्य कहानियों जगह दिया जाना भी महज इसी बदलाव का ही हिस्सा है.

    इस मामले पर साहित्यकारों (Writers) की राय जानने से पहले जानते हैं कि महाश्वेता देवी की लघुकथा ‘द्रौपदी’(Draupadi Short Story) की कहानी में ऐसा क्या है जिसे लेकर हल्ला मचा हुआ है. लेकिन द्रौपदी को जानने से पहले हमें लेखिका महाश्वेता देवी (Mahasweta Devi) के बारे में भी जान लेने जरूरी है.

    महाश्वेता देवी (Mahasweta Devi)
    पद्मश्री, पद्म विभूषण, बंग विभूषण, साहित्य अकादमी (Sahitya Akademi Samman) और ज्ञानपीठ पुरस्कार (Gyan Peeth Puraskar) जैसे तमाम पुरस्कारों से सम्मानित महाश्वेता देवी एक प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और लेखिका रही हैं. उनका जन्म 14 जनवरी, 1926 को ढाका में हुआ था. उस समय ढाका बांग्लादेश का नहीं भारत का ही एक हिस्सा था. उनके माता-पिता, दोनों ही नामचीन लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता थे. 28 जुलाई, 2016 को कोलकाता के एक अस्पताल में उनकी मृत्यु हुई थी.

    Delhi University: बीए अंग्रेजी पाठ्यक्रम से हटाई गई महाश्वेता देवी की लघुकथा ‘द्रौपदी’

    महाश्वेता देवी ने कम उम्र में कहानी-कविता लिखना शुरू कर दिया था. उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘अरण्येर अधिकार’, ‘नटी’, ‘मातृछवि’, ‘अग्निगर्भ’ ‘जंगल के दावेदार’ (Jungle Ke Davedar), ‘1084 की मां’ (Hajar Churashir Maa), ‘माहेश्वर’ और ‘ग्राम बांग्ला’ हैं.

    नक्सल आंदोलन (Naxal movement) पर लिखा उनका उपन्यास 1084 की मां (Hajar Churashir Ma) बहुत ही चर्चित उपन्यास है.

    महाश्वेता देवी की कई रचनाओं पर फ़िल्म भी बनाई गईं. उनके उपन्यास ‘रुदाली’ पर कल्पना लाज़मी ने ‘रुदाली’ तथा ‘हजार चौरासी की माँ’ पर इसी नाम से 1998 में फिल्मकार गोविन्द निहलानी ने फ़िल्म बनाई. साहित्य अकादमी से पुरस्कृत इनके उपन्यास ‘अरण्येर अधिकार’ आदिवासी नेता बिरसा मुंडा की गाथा है. उपन्यास ‘अग्निगर्भ’ में नक्सलबाड़ी आदिवासी विद्रोह की पृष्ठभूमि में लिखी गई चार लंबी कहानियां हैं.

    दौपदी कहानी (Draupadi Short Story)
    महाश्वेता देवी की लघु कथा द्रौपदी भी इसी विषय (नक्सल आंदोलन) पर है. उन्होंने यह कहानी 1978 में लिखी थी. इस कहानी के केंद्र में पश्चिम बंगाल की संथाल जनजाति की एक आदिवासी महिला द्रौपदी है. द्रौपदी पर नक्सली होने का आरोप है. नक्सली होने के आरोप में पुलिस द्रौपदी को पकड़ लेती है.

    पुलिस जानकारी हासिल करने के लिए द्रौपदी का उत्पीड़न करती है. यहां तक कि एक पुलिस अधिकारी अपने कुछ सिपाहियों को द्रौपदी के साथ बलात्कार करने का भी निर्देश देता है. बलात्कार के बाद सिपाही उसे वापस कपड़े पहनने को कहते हैं ताकि उसे अधिकारी के पास ले जाया जा सके, लेकिन वो कपड़े पहनने से इनकार कर देती है. इतना ही नहीं उसके तन पर जो कपड़े थे उन्हें भफी फाड़ देती है. वो बिना कपड़े के ही पुलिस अधिकारी के सामने चली जाती है. द्रौपदी अधिकारी के सामने चीख कर कहती है, ‘मैं कपड़े क्यों पहनूं, यहां पर कोई इंसान ऐसा नहीं जिससे मैं शर्माऊं.’ द्रौपदी के इस रूप को देखकर वहां मौजूद सभी लोग डर जाते हैं.

    महाश्वेता देवी की इस लघुकथा में एक महिला की शक्ति का प्रदर्शन किया है कि किस तरह एक पुलिस अधिकारी निहत्थी और नग्न लड़की के सामने भी असहाय महसूस करता है. उनकी कहानी का यह चरित्र पितृसत्ता के खिलाफ लड़ाई लड़ता है. एक गरीब आदिवासी लड़की तमाम यातनाएं सहन करती है, मगर हार नहीं मानती.

    क्या कहती हैं वरिष्ठ साहित्यकार क्षमा शर्मा
    वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार क्षमा शर्मा (Kshama Sharma) कहती हैं कि कोर्स में पुराने विषय, कहानी-किस्सों को हटाकर उनके स्थान पर नई रचनाओं को शामिल करना यह प्रक्रिया का हिस्सा है.

    वे कहती हैं कि अपनी पढ़ाई के दौरान जिन लेखकों या रचनाओं को उन्होंने पढ़ा था, उनमें से कई अब कोर्स से बाहर हो चुके हैं.

    महाश्वेता देवी की रचना हटाए जाने पर वे कहती हैं कि महाश्वेता देवी एक बड़ी लेखिका हैं, उनकी रचनाओं पर कोई भी फैसला लेने से पहले संबंधित प्रशासन को अन्य अधिकारियों, कमेटी के सदस्यों या अन्य लोगों से सलाह-मशविरा जरूर करना चाहिए.

    क्षमा शर्मा (Author Kshama Sharma) का कहना है कि महाश्वेता देवी ही नहीं अन्य लेखकों की रचनाओं के बारे में कोई भी फैसला लेने से पहले संबंधित विभाग को इस पर लंबी चर्चा करनी चाहिए, राय-शुमारी करनी चाहिए.

    Tags: Books

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