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  • 'अगर मुझे कायरता और हिंसा के बीच में चुनाव करना हो तो मैं हिंसा को चुनूंगा' - महात्मा गांधी

'अगर मुझे कायरता और हिंसा के बीच में चुनाव करना हो तो मैं हिंसा को चुनूंगा' - महात्मा गांधी

गांधीजी कहते हैं कि स्वतंत्रता के साथ सर्वोच्च कोटि का अनुशासन और विनय हो तो, वही सच्चा स्वराज्य है.

गांधीजी कहते हैं कि स्वतंत्रता के साथ सर्वोच्च कोटि का अनुशासन और विनय हो तो, वही सच्चा स्वराज्य है.

यदि हम गांधीजी के जीवन में गहरा पैठें तो यह समझने में कोई कठिनाई नहीं होगी कि उनके लिए स्वराज्य का मूल अर्थ था, 'अत्याचार का विरोध' और सच्चा स्वराज्य तभी प्राप्त किया जा सकता है जब सब लोग मिलकर सत्ता के दुरुपयोग का प्रतिकार करने की सामर्थ्य रखते हों.

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    Gandhi Jayanti 2021: गांधीवादी लेखकों में सबसे पहले विष्णु प्रभाकर (Vishnu Prabhakar) का नाम आता है. गांधीजी के आदर्शों को सही मायनों में विष्णु प्रभाकर जी ने ही अपनाया था. यहां तक कि मृत्यु के बाद उन्होंने अपना शरीर दिल्ली के एम्स में दान कर दिया था.

    वाणी प्रकाशन (Vani Prakashan) से उनकी पुस्तक ‘गांधी: समय समाज और संस्कृति’ गांधीजी के विचारों और आर्देशों का गहन विश्लेषण करती है. पुस्तक में विष्णु प्रभाकर ने गांधीजी के रामराज्य और अहिंसा की बड़े ही सुंदर तरीके से व्याख्या की है. प्रस्तुत हैं इस पुस्तक के चुनिंदा अंश-

    गांधी: समय, समाज और संस्कृति

    गांधीजी ने स्वाधीनता आन्दोलन के समय ‘स्वराज्य’ शब्द के साथ अक्सर एक और शब्द का प्रयोग भी किया है. वह शब्द है-‘रामराज्य’.

    उस समय के विचारकों ने, विशेषकर वह जो उनसे सहमत नहीं थे, उन्होंने इस शब्द का अर्थ जानना चाहा. ‘रामराज्य’ अर्थात् क्या? तुलसीदास जी ने ‘रामचरितमानस’ में ‘रामराज्य’ की व्याख्या करते हुए कहा है- ‘दैहिक, दैविक भौतिक तापा, रामराज कबहु न व्यापा’

    समझने के लिए यह व्याख्या पर्याप्त है. जिस राज्य में किसी तरह का दुख नहीं है, चाहे वह देह का दुख हो या दैवी कारणों से होने वाली आपदाएं या फिर भौतिक जगत् की परेशानियां हों, रामराज्य में ये व्याप्त नहीं होती.

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    अगर इसके शाब्दिक अर्थ लिए जाएं तो विचारक यही कहेंगे कि ऐसा राज्य तो कदाचित ही सम्भव हो. यह तो वायवी व्याख्या है लेकिन अगर हम इस व्याख्या के पीछे के अर्थ को समझने की चेष्टा करें तो गांधीजी ने बार-बार स्पष्ट शब्दों में ‘स्वराज्य’ का अर्थ बताया है कि ‘स्वराज्य’ एक पवित्र शब्द है; इसका स्रोत वैदिक है, जिसका अर्थ आत्म-शासन और आत्म-संयम है.

    उन्होंने एक और स्थान पर इसे और स्पष्ट किया है : स्वराज्य अर्थात् स्वतंत्रता का अर्थ क्या…? गांधीजी कहते हैं कि स्वतंत्रता के साथ सर्वोच्च कोटि का अनुशासन और विनय हो तो, वही सच्चा स्वराज्य है.

    यदि हम गांधीजी के जीवन में गहरा पैठें तो यह समझने में कोई कठिनाई नहीं होगी कि उनके लिए स्वराज्य का मूल अर्थ था, ‘अत्याचार का विरोध’ और सच्चा स्वराज्य तभी प्राप्त किया जा सकता है जब सब लोग मिलकर सत्ता के दुरुपयोग का प्रतिकार करने की सामर्थ्य रखते हों.

    इसके पीछे एक मार्मिक घटना है. यद्यपि गांधीजी बचपन से सात्विक वृत्ति के उपासक रहे लेकिन सर्वथा ऐसा भी नहीं है कि उन्होंने सांसारिक दृष्टि से बुरे काम न किए हों. इसी के पश्चात्ताप-स्वरूप उनका झुकाव सात्विक वृत्ति की ओर हुआ. इसी कारण भारत में रहते हुए वे जीविका के किसी क्षेत्र में सफल न हो सके, तब दक्षिण अफ़्रीका में रहने वाले व्यापारियों के सलाहकार के रूप में वे वहां चले गए. वहां पर अनेक भारतवासी व्यवसाय से लेकर मजदूर तक का काम करते थे.

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    दक्षिण अफ़्रीका में गोरों का राज्य था और वे गोरे शासक भारतीयों से घृणा करते थे, उन्हें ‘काला आदमी’ कहकर अपमानित करने का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने देते थे. संपन्न और रसूख वाले भारतीयों को रेल की प्रथम श्रेणी में यात्रा करने की अनुमति नहीं थी.

    बैरिस्टर गांधी को वहां के व्यापारियों के सलाहकार के रूप में एक बार, उनके किसी काम से ट्रांसवाल जाना था. अपने मित्रों, शुभचिंतकों द्वारा मना करने पर भी उन्होंने प्रथम श्रेणी का टिकट लिया और उसी में सफर किया. डिब्बे में बैठे लोग क्रोध और घृणा से उनकी ओर देख रहे थे कि यह काला आदमी यहां कैसे बैठा है? उन्होंने गार्ड से शिकायत की तब ‘मेरित्सबर्ग स्टेशन’ आने पर गार्ड डिब्बे में आया और गांधीजी को उतर जाने को कहा.

    गांधीजी ने प्रथम श्रेणी का टिकट दिखाया, बहस हुई दोनों में लेकिन अंततः उन सबने मिलकर कुलियों से उनका सामान बाहर फिंकवा दिया और धक्के देकर उन्हें भी डिब्बे से नीचे उतार दिया.

    गांधीजी के मन में तब एक ‘तुमुलनाद’ गूंज रहा था. जाड़े की रात थी और वह वेटिंग रूम में बैठे सोच रहे थे, ‘मैं क्या करूं? क्या भारत लौट जाऊं ‘मुझे इनके झगड़े में पड़ने की क्या जरूरत है ? वहीं अपना काम करूंगा.’

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    लेकिन अंतर की आवाज़ कहती थी कि यहां तुम्हारे हज़ारों भाई अपमान का जीवन जी रहे हैं, ऐसी हालत में क्या तुम उन्हें छोड़कर भाग जाओगे? बहुत देर तक घमासान मचता रहा, अंततः एक बुलन्द आवाज ने उन्हें चेताया और उन्होंने उसी क्षण निर्णय लिया कि मैं अपने भाइयों को ऐसी दुर्दशा में छोड़कर नहीं जाऊंगा और संघर्ष करते हए अत्याचार का विरोध करूंगा. और उसी क्षण से उन्होंने अत्याचार का विरोध करना शुरू कर दिया. आगे क्या हुआ? कैसे हुआ? यह सभी जानते हैं. इस प्रकार स्वराज्य या स्वतंत्रता का मुख्य अर्थ हुआ- ‘अत्याचार का विरोध’.

    ‘गुलामी का विरोध’ और ‘अत्याचार का विरोध’ इन दोनो का अर्थ एक ही है इसे ‘स्वराज्य’ और ‘स्वतंत्रता’ भी कह सकते हैं. उन्होंने कहा, ‘मेरे स्वराज्य में अपना दायित्व निभाने का अधिकार पहले है, दूसरे अधिकार बाद में. मैं ऐसे सविधान की रचना करना चाहूंगा जिसमें हर तरह की गुलामी से मुक्ति का प्रावधान हो.

    उन्होंने यहां तक कहा कि, ‘लोगों को पाप करने की भी स्वतंत्रता हो.’

    भारत गरीब देश है. और जब गांधीजी दक्षिण अफ़्रीका से भारत लौटे, तब तक वह यह समझ गए थे कि सबसे पहले हमें जो सबसे नीचे है उसे जगाना है.

    उसे अत्याचार का विरोध करने का मार्ग बताना है. दक्षिण अफ़्रीका में उन्होंने बहुत सोच-समझकर अहिंसा के मार्ग से अत्याचार का विरोध करने का निश्चय किया था. वही किया भी. यहां आकर उन्होंने अहिंसा के मार्ग से, अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करने का आह्वान किया. लेकिन उनकी अहिंसा का अर्थ कायरता नहीं था. मात्र शस्त्र उठाना भी नहीं था. बल्कि अपना बलिदान करके विरोधी का हृदय परिवर्तन करना था. किसी का उनसे मतभेद हो सकता है और मतभेद होना चेतना का ही लक्षण है. पर लोगों ने उनकी अहिंसा को ठीक से समझा नहीं. उन्होंने स्पष्ट कहा है कि, ‘अगर मुझे कायरता और हिंसा के बीच में चुनाव करना हो तो मैं हिंसा को चुनूंगा.’

    mahatma gandhi jayanti

    हिटलर ने जब चेकोस्लोवाकिया पर आक्रमण किया और चेकोस्लोवाकिया ने उसका जवाब युद्ध से दिया, तब गांधीजी ने उस युद्ध को अहिंसक युद्ध कहा था. कहा था कि, ‘मैं चाहता था कि ‘चैक’ लोग शस्त्रों का प्रयोग नहीं करें, देखें हिटलर कितनों को मार सकता है लेकिन वे यदि ऐसा नहीं कर सकते तो उन्हें पीठ नहीं दिखाना है बल्कि शस्त्रों के उपयोग का उत्तर शस्त्रों के उपयोग से देना है.’

    इसी प्रकार भारत में कुछ लड़कियां उनसे मिलने आईं. उन दिनों श्री किशोरलाल मशरूवाला गांधीजी के सचिव थे, उन्होंने लड़कियों से पूछा कि उन्हें गाँधीजी से क्या काम है?

    लड़कियों ने उत्तर दिया कि लड़के हमें छेड़ते हैं, हम क्या करें? मशरूवाला बोले, ‘बस इसी बात के लिए उन्हें तंग करने आई हो, तुम्हारे पैर में चप्पल नहीं है क्या? उतारकर उन्हें पीटो.’

    लड़कियां घबरा गईं. अहिंसा के पुजारी का सचिव हिंसा की बात करता है. वे गांधीजी के पास गईं और सारी बात उन्हें बतायी.

    गांधीजी हंसते हुए बोले, ‘बस! उसने चप्पल मारने की बात कही है, मैं तो कहता हूं कि तुम्हारे हाथ में छुरा हो तो, छुरा मारो. कुछ करो तो. मेरा मार्ग यह है कि लड़के तुम्हें कितना छेड़ते हैं, छेड़ने तो दो, तुम शांत उनके सामने खड़ी रहो. अगर तुम ऐसा नहीं कर सकती तो उनका डटकर विरोध करो. मेरे पास भागकर आई हो, यह कायरता है. मैं कायरता से नफ़रत करता हूं और हिंसा को उससे अच्छा समझता हूं. तो यह है गांधी का असली रूप.

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