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ममता किरण के गज़ल संग्रह 'ऑंगन का शजर' को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का पुरस्कार

ममता किरण के गज़ल संग्रह 'ऑंगन का शजर' को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने महादेवी वर्मा पुरस्कार के लिए चयनित किया है.

ममता किरण के गज़ल संग्रह 'ऑंगन का शजर' को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने महादेवी वर्मा पुरस्कार के लिए चयनित किया है.

'ऑंगन का शजर' ममता की 75 गज़लों का संग्रह है. यह उनका पहला गज़ल संग्रह है. इससे पहले उनके कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं.

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    Uttar Pradesh Hindi Sansthan: हिंदी की सुपरिचित लेखिका और कवि ममता किरण (Mamta Kiran) के गज़ल संग्रह ‘ऑंगन का शजर’ (Aangan Ka Shajar) को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने महादेवी वर्मा पुरस्कार (Mahadevi varma Purskar) के लिए चयनित किया है. उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने हाल ही में वर्ष 2020 के सम्मान और पुरस्कारों की घोषणा की थी.

    उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने देशभर से विभिन्न विषयों पर 34 पुस्तकों को सम्मानित करने का फैसला किया है. इनमें दिल्ली की प्रसिद्ध कवि ममता किरण (Kavi Mamta Kiran) भी शामिल हैं.

    ‘ऑंगन का शजर’ ममता की 75 गज़लों का संग्रह है. यह उनका पहला गज़ल संग्रह है. इससे पहले उनके कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. वर्ष 2012 में प्रकाशित ममता किरण की कविताओं का संग्रह ‘वृक्ष था हरा भरा’ काफी चर्चित रहा है.

    ‘ऑंगन का शजर’ की गज़लें बहुस्तरीय और बहुआयामी हैं. ममता ने अपनी गज़लों में जहां स्त्री-जीवन से जुड़े कई आयाम शामिल किए हैं तो पर्यावरण और वैश्विक मुद्दों पर भी अपनी चिन्ताएं प्रकट की हैं.

    ममता किरण का मन सबसे ज़्यादा स्त्रियों की दुनिया में रमता दिखाई देता है. बेटियों के प्रति उनका ख़ास अनुराग दिखाई देता है. इन अनुराग को ‘ऑंगन का शजर’ के अलग-अलग पृष्ठों पर कुछ इस तरह देखा जा सकता है-

    बाग़ जैसे गूंजता है पंछियों से ,
    घर मेरा वैसे चहकता बेटियों से ।
    फ़ोन वो ख़ुशबू कहाँ से ला सकेगा,
    वो जो आती थी तुम्हारी चिट्ठियों से।

    जन्मी जो एक प्यारी सी बिटिया हमारे घर,
    बेनूर था जो घर उसे पुरनूर कर गई।

    जब से चिड़िया ने बनाया घोंसला,
    घर मेरा तब से बहुत गुंजान है।

    बग़ावत है तो है अब जो भी होना है सो हो जाए,
    जनम देना है बेटी को न मारा जाय है मुझसे!

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    ममता किरण ने कोरोना महामारी के कारण उपजे हालातों को भी बहुत ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है. कोरोना काल में जहां एक ओर अमीरों की धनसम्पदा बेहिसाब तरीके से बढ़ी है वहीं ग़रीबों के लिए ये काल त्रासदी बन के टूटा है-

    भूमण्डलीकरण ने बनाये बहुत अमीर ,
    लेकिन गरीब लोगों की दुनिया बिखर गयी।

    एक रोटी को चुराने की मुक़र्रर है सज़ा ,
    मुल्क़ जो लूट ले उसकी कोई ताज़ीर नहीं।

    ये चमकता हुआ जाल बाज़ार का ,
    इस चकाचौंध में नौजवाँ खो गया।

    ‘अगर मुझे कायरता और हिंसा के बीच में चुनाव करना हो तो मैं हिंसा को चुनूंगा’ – महात्मा गांधी

    ममता किरण का संवेदनशील ग़ज़लकार और कवि के सामाजिक सरोकारों को भी स्पष्ट करता है-

    हालात ज्यों के त्यों ही रहे मेरे गांव के,
    काग़ज़ पे ही विकास की दिल्ली ख़बर गई।
    भूमंडलीकरण ने बनाए बहुत अमीर,
    लेकिन ग़रीब लोगों की दुनिया बिखर गई।
    पूरी तरह से खिल भी न पाई थी जो कली,
    हाथों में वहशियों के कुचलकर वो मर गई।

    ईंट-पत्थर के इन जंगलों में किरण,
    मेरे हिस्से था जो आसमां खो गया।

    ममता किरण ने अपने इस गज़ल संग्रह में तकरीबन जीवन के हर विषय को बड़ी ही संजिदगी के साथ उठाया है. यादों के झरोखों में झांकती ममता पुराने दिनों को कुछ इस तरह याद करती हैं-

    अपने बचपन का सफ़र याद आया
    मुझको परियों का नगर याद आया।

    कोई पत्ता न हिले जिसके बिना
    रब वही शाम-ओ-सहर याद आया।

    इतना शातिर वो हुआ है कैसे
    है सियासत का असर याद आया।

    क्यों वही रोज़ है हर सुर्खी में
    है यही उसका हुनर, याद आया।

    जब कोई आस ही बाक़ी न बची
    तब मुझे तेरा ही दर याद आया।

    मेरा अपना जो कभी था ही नहीं
    क्यूँ मुझे आज वो घर याद आया।

    मोड़ वो उम्र का आया है जहां
    अब जुदा होने का डर याद आया।

    फिर लगा हाथ है माँ का सर पर
    ‘फिर मुझे दीद-ए-तर याद आया।’

    जिसकी छाया में सभी खुश थे ‘किरण’
    घर के आँगन का शजर याद आया।

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