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कहानियों में भले रह गई हो चूक, पर प्रेमचंद की कहानियां हैं अचूक

नवाब राय ने प्रेमचंद का रूप धरा और उनकी पहली कहानी 'बड़े घर की बेटी' प्रकाशित हुई.

नवाब राय ने प्रेमचंद का रूप धरा और उनकी पहली कहानी 'बड़े घर की बेटी' प्रकाशित हुई.

जिस किस्सागो प्रेमचंद को हमसब जानते हैं उनके बारे में यह कहना ज्यादा बेहतर होगा कि उनका जन्म 'सोजे-वतन' के जब्त होने के बाद हुआ. इससे पहले तो प्रेमचंद थे ही नहीं, जो कथालेखक था वह तो नवाब राय था.

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Premchand: प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई, 1980 (1880 नहीं) में हुआ था – यह जानकारी गूगल पर मौजूद विकिपीडिया में दिख रही है, यह अलग बात है कि लिंक चटका कर पेज पर जाने पर यह चूक नहीं दिखती और विकिपीडिया बताता है कि प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई, 1880 को हुआ था और निधन 8 अक्टूबर, 1936 को.

इस चूक को यहां रखने का मकसद सिर्फ उस असावधानी की ओर इशारा करना है, जिसकी इन दिनों इंटरनेट पर भरमार है. बहुत सी जगहों पर प्रेमचंद का नाम ‘प्रेमचंद्र’ लिखा दिख जाएगा. इंटरनेट पर अलग-अलग जगहों पर मौजूद उनकी कहानियों में हिज्जे की जितनी चूकें दिखती हैं, वे बताती हैं कि भाषा के प्रति हम कितने असावधान होते गए हैं.

हाल के दिनों में प्रकाशित किताबें भी अशुद्धियों के मामले में अपवाद नहीं रह गईं. प्रकाशक भी शुद्धता की इस पेशेवर जिम्मेवारी का निर्वाह ईमानदारी से नहीं कर रहे. इंटरनेट का मामला ज्यादा गंभीर है. प्रेमचंद की बहुचर्चित कहानी ‘ईदगाह’ एक प्रतिष्ठित वेबसाइट पर ‘ईदगाद’ के रूप में दिखी. यह सुखद है कि ध्यान दिलाने के बाद इस लापरवाही को तुरंत सुधार लिया गया.

वैसे, जिस किस्सागो प्रेमचंद को हमसब जानते हैं उनके बारे में यह कहना ज्यादा बेहतर होगा कि उनका जन्म ‘सोजे-वतन’ के जब्त होने के बाद हुआ. इससे पहले तो प्रेमचंद थे ही नहीं, जो कथालेखक था वह तो नवाब राय था. 1908 में नवाब राय का कहानी संग्रह ‘सोजे-वतन’ प्रकाशित हुआ था. देशभक्ति की भावना में डूबे इस संग्रह को अंग्रेज सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया और इसकी सभी प्रतियां जब्त कर लीं और इसके लेखक नवाब राय को भविष्‍य में लेखन न करने की चेतावनी दी. इसी घटना के बाद नवाब राय ने प्रेमचंद का रूप धरा और उनकी पहली कहानी ‘बड़े घर की बेटी’ प्रकाशित हुई.

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बहरहाल, फिर उसी मूल मुद्दे पर आया जाए, जिसमें हमने भाषा की सजगता की बात कही थी. संपादन की ऐसी चूक किसी से भी हो सकती है. इसे मानवीय भूल की तरह ही लेना चाहिए. मगर ‘मानवीय भूल’ अगर ट्रेंड बनने लगे, तो मामला गंभीर हो जाता है. खुद प्रेमचंद की कुछ कहानियां संपादन की इस मानवीय भूल की शिकार हैं, जबकि प्रेमचंद सिर्फ कथाकार ही नहीं, संपादक भी थे. ‘ईदगाह’ प्रेमचंद की खूब चर्चित कहानियों में से एक है. आइए आज इस कहानी को याद करते हुए इसके कुछ हिस्सों का हम पुनर्पाठ करें.

यह कहानी ईद के दिन की है. गांव के बड़े-बूढ़े, बच्चे-नौजवान, अमीर-गरीब सब शहर की ईदगाह जा रहे हैं. कथाकार प्रेमचंद ईदगाह की ओर जाने वाले लोगों में से बच्चों की एक टोली से हमारा परिचय कराते हैं. बच्चों की इस टोली में 5 बच्चे हैं. मोहसिन, महमूद, सम्मी, नूरे और हामिद. सभी लगभग हमउम्र हैं.

दिल्ली, बुराड़ी के प्रकाशक मनोज पब्लिकेशन की ओर से छपे मानसरोवर (भाग-1) के पेज नंबर 700 से यह कहानी शुरू होती है. इस संग्रह के पेज 704 की पहली पंक्ति है ‘सहसा ईदगाह नजर आया’. इससे पहले के पन्नों पर प्रेमचंद ने इतने जीवंत तरीके से गांव से शहर की ईदगाह की ओर जाते लोगों की चर्चा की है कि अनजाने ही पाठक भी इस भीड़ का हिस्सा बन जाता है.

मुहम्मद मुस्तफा खां ‘मद्दाह’ का उर्दू-हिंदी शब्दकोश ‘ईदगाह’ शब्द को स्त्रीलिंग बताता है. इस लिहाज से ‘सहसा ईदगाह नजर आया’ वाक्य अशुद्ध है, यह वाक्य ‘सहसा ईदगाह नजर आई’ होना चाहिए था. चूंकि प्रेमचंद की लिखी मूल प्रति मैंने नहीं देखी है और न ही किसी चर्चित और सजग प्रकाशक से छपकर आए किसी अन्य संग्रह में यह कहानी पढ़ी है, इसलिए यह बहुत दावे के साथ नहीं कह सकता कि भाषा की यह चूक प्रेमचंद ने की थी या प्रकाशक की है.

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इसी पन्ने पर शुरू होती है ईदगाह से लौटते बच्चों की बातचीत. हामिद के अलावा सभी बच्चों के पास अपनी इच्छा पूरी करने के लिए पर्याप्त पैसे हैं. हामिद के पास हैं महज 3 पैसे. इसलिए वह खुद को समझाता रहता है, दिलासा देता चलता है. बाल मन को परे धकियाकर क्षणभंगुरता का तर्क गढ़ता है. आइए देखें कि ईदगाह कहानी में प्रेमचंद के इन बालपात्रों अपने लिए क्या खिलौने खरीदे हैं –

‘…सब चर्खियों से उतरते हैं। अब खिलौने लेंगे। इधर दुकानों की कतार लगी हुई है। तरह-तरह के खिलौने हैं—सिपाही और गुजरिया, राजा और वकील, भिश्ती और धोबिन और साधु। वाह! कितने सुन्दर खिलौने हैं। अब बोला ही चाहते हैं। महमूद सिपाही लेता है, खाकी वर्दी और लाल पगड़ीवाला, कंधे पर बंदूक रखे हुए। मालूम होता है, अभी कवायद किये चला आ रहा है। मोहसिन को भिश्ती पसंद आया। कमर झुकी हुई है, ऊपर मशक रखे हुए है। मशक का मुंह एक हाथ से पकड़े हुए है। कितना प्रसन्न है। शायद कोई गीत गा रहा है। बस, मशक से पानी उड़ेला ही चाहता है। नूरे को वकील से प्रेम है। कैसी विद्वत्ता है उसके मुख पर। काला चोगा, नीचे सफेद अचकन, अचकन के सामने की जेब में घड़ी, सुनहरी जंजीर, एक हाथ में कानून का पोथा लिए हुए। मालूम होता है, अभी किसी अदालत से जिरह या बहस किये चले आ रहे हैं। यह सब दो-दो पैसे के खिलौने हैं। हामिद के पास कुल तीन पैसे हैं; इतने महंगे खिलौने वह कैसे ले? खिलौना कहीं हाथ से छूट पड़े, तो चूर-चूर हो जाय। जरा पानी पड़े तो सारा रंग धुल जाय। ऐसे खिलौने लेकर वह क्या करेगा; किस काम के!

मोहसिन कहता है— मेरा भिश्ती रोज पानी दे जायेगा; सांझ-सवेरे।

महमूद— और मेरा सिपाही घर का पहरा देगा कोई चोर आयेगा, तो फौरन बंदूक से फैर कर देगा।

नूरे— और मेरा वकील खूब मुकदमा लड़ेगा।

सम्मी- और मेरी धोबिन रोज कपड़े धोयेगी।

हामिद खिलौने की निंदा करता है— मिट्टी ही के तो हैं, गिरे तो चकनाचूर हो जायें, लेकिन ललचाई हुई आंखों से खिलौनों को देख रहा है और चाहता है कि जरा देर के लिए उन्हें हाथ में ले सकता। उसके हाथ अनायास ही लपकते हैं, लेकिन लड़के इतने त्यागी नहीं होते, विशेषकर जब अभी नया शौक है। हामिद ललचाता रह जाता है।...’ (मानसरोवर, भाग-1, बुराड़ी, दिल्ली)

यह कहानी जिस दौर में लिखी गई, उस वक्त हिंदी से चंद्रबिंदी गायब नहीं हुई थी. मुझे भरोसा है कि प्रेमचंद की कहानी में चंद्रबिंदी (ँ) रही होगी, अर्द्धविराम (;) भी रहे होंगे, अर्द्धचंद्र नहीं रहे होंगे (हिंदी में अंग्रेजी से आए कुछ शब्दों में अर्द्धचंद्र का इस्तेमाल पिछले कुछ दशकों से होने लगा है). ‘हामिद खिलौने की निंदा करता है’ उम्मीद करता हूं कि यह प्रेमचंद का लिखा नहीं है. प्रेमचंद का लिखा वाक्य रहा होगा ‘हामिद खिलौनों की निंदा करता है’. लेकिन प्रकाशक ने इन चिह्नों के इस्तेमाल में पर्याप्त सतर्कता नहीं बरती है, न भाषा के प्रति सजगता दिखाई. इंटरनेट पर मौजूद कहानियों का हाल तो और भयानक है. वहां तो कई बार प्रेमचंद के शब्द तक बदले नजर आ जाते हैं. यह इतिहास के साथ खेलवाड़ (खिलवाड़ नहीं) करने जैसा है. आने वाली पीढ़ियां प्रेमचंद की कहानियों को इन्हीं ‘विकृतियों’ के साथ पढ़ेंगी और लेखक के बारे में अपनी धारणा तैयार करेंगी. यह वाकई दुखद है.

आइए अब उस हिस्से की ओर चलें, जहां हामिद अपनी तर्कशक्ति से अपने साथियों के बीच अपने चिमटे का लोहा मनवाता है. बच्चों के बीच की इस रोचक बहस का पाठ करें –

‘…खेलें खिलौने और खायें मिठाइयां। मै नहीं खेलता खिलौने, किसी का मिजाज क्यों सहूं? मैं गरीब सही, किसी से कुछ मांगने तो नहीं जाता। आखिर अब्बाजान कभी-न-कभी आयेंगे। अम्मां भी आयेंगी ही। फिर इन लोगों से पूछूंगा, कितने खिलौने लोगे? एक-एक को टोकरियों खिलौने दूं और दिखा दूं कि दोस्तों के साथ इस तरह सलूक किया जाता है। यह नहीं कि एक पैसे की रेवड़ियां लीं तो चिढ़ा-चिढ़ाकर खाने लगे। सब-के-सब खूब हंसेंगे कि हामिद ने चिमटा लिया है। हंसें। मेरी बला से। उसने दुकानदार से पूछा— यह चिमटा कितने का है?
दुकानदार ने उसकी ओर देखा और कोई आदमी साथ न देखकर कहा— तुम्हारे काम का नहीं है जी?
‘बिकाऊ है?’
‘बिकाऊ क्यों नहीं है? और यहां क्यों लाद लाये हैं?’
‘तो बताते क्यों नहीं, कै पैसे का है?’
‘छै पैसे लगेंगे।’
हामिद का दिल बैठ गया।
‘ठीक-ठीक पांच पैसे लगेंगे, लेना हो लो, नहीं चलते बनो।’
हामिद ने कलेजा मजबूत करके कहा- तीन पैसे लोगे?
यह कहता हुआ वह आगे बढ़ गया कि दुकानदार की घुड़कियां न सुने। लेकिन दुकानदार ने घुड़कियां नहीं दीं। बुलाकर चिमटा दे दिया। हामिद ने उसे इस तरह कन्धे पर रक्खा, मानो बंदूक है और शान से अकड़ता हुआ संगियों के पास आया। जरा सुनें, सबके सब-के-सब क्या-क्या आलोचनाएं करते हैं।
मोहसिन ने हंसकर कहा— यह चिमटा क्यों लाया पगले, इसे क्या करेगा! हामिद ने चिमटे को जमीन पर पटककर कहा— जरा अपना भिश्ती जमीन पर गिरा दो। सारी पसलियां चूर-चूर हो जायें बच्चा की।
महमूद बोला—तो यह चिमटा कोई खिलौना है?
हामिद— खिलौना क्यों नही है? अभी कंधे पर रखा, बंदूक हो गयी। हाथ में लिया, फकीरों का चिमटा हो गया। चाहूं तो इससे मजीरे का काम ले सकता हूं। एक चिमटा जमा दूं, तो तुम लोगों के सारे खिलौनों की जान निकल जाय। तुम्हारे खिलौने कितना ही जोर लगावें, मेरे चिमटे का बाल भी बांका नही कर सकते। मेरा बहादुर शेर है – चिमटा।
सम्मी ने खंजरी ली थी। प्रभावित होकर बोला— मेरी खंजरी से बदलोगे? दो आने की है।
हामिद ने खंजरी की ओर उपेक्षा से देखा- मेरा चिमटा चाहे तो तुम्हारी खंजरी का पेट फाड़ डाले। बस, एक चमड़े की झिल्ली लगा दी, ढब-ढब बोलने लगी। जरा-सा पानी लग जाय तो खत्म हो जाय। मेरा बहादुर चिमटा आग में, पानी में, आंधी में, तूफान में बराबर डटा खड़ा रहेगा।
चिमटे ने सभी को मोहित कर लिया; अब पैसे किसके पास धरे हैं! फिर मेले से दूर निकल आये हैं, नौ कब के बज गये, धूप तेज हो रही है। घर पहुंचने की जल्दी हो रही थी। बाप से जिद भी करें, तो चिमटा नहीं मिल सकता। हामिद है बड़ा चालाक। इसीलिए बदमाश ने अपने पैसे बचा रखे थे।
अब बालकों के दो दल हो गये हैं। मोहसिन, महमूद, सम्मी और नूरे एक तरफ हैं, हामिद अकेला दूसरी तरफ। शास्त्रार्थ हो रहा है। सम्मी तो विधर्मी हो गया। दूसरे पक्ष से जा मिला, लेकिन मोहसिन, महमूद और नूरे भी, हामिद से एक-एक, दो-दो साल बड़े होने पर भी हामिद के आघातों से आतंकित हो उठे हैं। उसके पास न्याय का बल है और नीति की शक्ति। एक ओर मिट्टी है, दूसरी ओर लोहा, जो इस वक्त अपने को फौलाद कह रहा है। वह अजेय है, घातक है। अगर कोई शेर आ जाय तो मियां भिश्ती के छक्के छूट जायें, मियां सिपाही मिट्टी की बंदूक छोड़कर भागें, वकील साहब की नानी मर जाय, चुगे में मुँह छिपाकर जमीन पर लेट जाये। मगर यह चिमटा, यह बहादुर, यह रूस्तमे-हिंद लपककर शेर की गरदन पर सवार हो जायेगा और उसकी आंखें निकाल लेगा।
मोहसिन ने एड़ी—चोटी का जोर लगाकर कहा— अच्छा, पानी तो नहीं भर सकता?
हामिद ने चिमटे को सीधा खड़ा करके कहा— भिश्ती को एक डांट बतायेगा, तो दौड़ा हुआ पानी लाकर उसके द्वार पर छिड़कने लगेगा।
मोहसिन परास्त हो गया; पर महमूद ने कुमुक पहुंचाई— अगर बच्चा पकड़ जायें, तो अदालत में बंधे-बंधे फिरेंगे। तब तो वकील साहब के पैरों पड़ेंगे।
हामिद इस प्रबल तर्क का जवाब न दे सका। उसने पूछा— हमें पकड़ने कौन आयेगा?
नूरे ने अकड़कर कहा— यह सिपाही बंदूकवाला।
हामिद ने मुंह चिढ़ाकर कहा— यह बेचारे हमारे बहादुर रुस्तमे—हिंद को पकड़ेंगे! अच्छा लाओ, अभी जरा कुश्ती हो जाय। इसकी सूरत देखकर दूर से भागेंगे। पकड़ेंगे क्या बेचारे!
मोहसिन को एक नयी चोट सूझ गयी— तुम्हारे चिमटे का मुंह रोज आग में जलेगा।
उसने समझा था कि हामिद लाजवाब हो जायेगा; लेकिन यह बात न हुई। हामिद ने तुरंत जवाब दिया— आग में बहादुर ही कूदते हैं जनाब, तुम्हारे यह वकील, सिपाही और भिश्ती लौंडियों की तरह घर में घुस जायेंगे। आग में कूदना वह काम है, जो यह रुस्तमे-हिन्द ही कर सकता है।
महमूद ने एक जोर लगाया— वकील साहब कुरसी-मेज पर बैठेंगे, तुम्हारा चिमटा तो बावरचीखाने में जमीन पर पड़ा रहेगा।
इस तर्क ने सम्मी और नूरे को भी सजीव कर दिया। कितने ठिकाने की बात कही है पट्ठे ने। चिमटा बावरचीखाने में पड़े रहने के सिवा और क्या कर सकता है?
हामिद को कोई फड़कता हुआ जवाब न सूझा, तो उसने धांधली शुरू की— मेरा चिमटा बावरचीखाने में नही रहेगा। वकील साहब कुर्सी पर बैठेंगे, तो जाकर उन्हें जमीन पर पटक देगा और उनका कानून उनके पेट में डाल देगा।
बात कुछ बनी नहीं। खासी गाली-गलौज थी; कानून को पेट में डालने वाली बात छा गयी। ऐसी छा गयी कि तीनों सूरमा मुंह ताकते रह गये, मानो कोई धेलचा कनकौआ किसी गण्डेवाले कनकौए को काट गया हो। कानून मुंह से बाहर निकलने वाली चीज है। उसको पेट के अंदर डाल दिया जाना बेतुकी-सी बात होने पर भी कुछ नयापन रखती है। हामिद ने मैदान मार लिया। उसका चिमटा रुस्तमे-हिन्द है। अब इसमें मोहसिन, महमूद नूरे, सम्मी किसी को भी आपत्ति नहीं हो सकती।
विजेता को हारने वालों से जो सत्कार मिलना स्वाभविक है, वह हामिद को भी मिला। औरों ने तीन-तीन, चार-चार आने पैसे खर्च किए; पर कोई काम की चीज न ले सके। हामिद ने तीन पैसे में रंग जमा लिया। सच ही तो है, खिलौनों का क्या भरोसा? टूट-फूट जायेंगे। हामिद का चिमटा तो बना रहेगा बरसों?…’

बच्चों की इतनी लंबी बातचीत का हिस्सा उसकी रोचकता की वजह से ही उठाया. पर आपने गौर किया कि कहानी के इस हिस्से में प्रेमचंद अपने पात्रों की खरीदे हुए खिलौने खुद याद न रख सके? प्रेमचंद ने बच्चों की शुरुआती बातचीत के दौरान बताया था कि सम्मी ने धोबिन खरीदा था. पर हामिद ने जब चिमटा खरीद लिया और उसकी बहस से सबके खिलौने पर उसका चिमटा ज्यादा भारी पड़ने लगा तो सम्मी ने समझौता करने के लिए अपने खिलौने से हामिद के चिमटे को बदलना चाहा. इस वक्त प्रेमचंद बतलाते हैं कि सम्मी ने खंजरी ली थी. कहानी में सम्मी प्रभावित होकर हामिद से कहता है ‘मेरी खंजरी से बदलोगे? दो आने की है।’ जाहिर है खुद प्रेमचंद को ध्यान नहीं रहा कि सम्मी ने खंजरी (एक तरह का वाद्ययंत्र) नहीं खरीदी थी, उसने धोबिन खरीदा था.

प्रेमचंद की कहानियां ही नहीं, उनके उपन्यासों में भी ऐसी असावधानियां दिख जाती हैं. लेकिन असल सवाल है यह है कि क्या इन असावधानियों से प्रेमचंद का किस्सागो बौना हो जाता है? मेरा जवाब है – नहीं, जरा भी नहीं. प्रेमचंद की कहानियों में जो किस्सागोई है, जिस तरह से उन्होंने समाज के उपेक्षित वर्ग को अपनी कहानियों का केंद्र बनाया है, जिस तरह से उनकी समस्याओं से दूसरों को रूबरू कराते हैं, जिस तरह से वे अपनी कहानियों में आदर्श की स्थापना करते हैं, एक बेहतर समाज और बेहतर इनसान रचते हैं, वह उन्हें बाकी कथाकारों से अलग भी करता है और पहचान भी देता है.

आगे पढ़ें कहानी ‘अलग्योझा’ में प्रेमचंद से हुई चूक.

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