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लखनऊ पुस्तक मेला: बालेन्दु द्विवेदी के उपन्यास 'वाया फुरसतगंज' और 'मदारीपुर जंक्शन' पर चर्चा

पुस्तक मेला में नई-नई पुस्तकों का लोकार्पण हो रहा है, साहित्य चर्चाएं हो रही हैं.

पुस्तक मेला में नई-नई पुस्तकों का लोकार्पण हो रहा है, साहित्य चर्चाएं हो रही हैं.

वाणी प्रकाशन ग्रुप (Vani Prakashan Group) से प्रकाशित चर्चित उपन्यासकार बालेन्दु द्विवेदी के उपन्यास 'वाया फ़ुरसतगंज' और 'मदारीपुर जंक्शन’ पर परिचर्चा का आयोजन किया गया.

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    Lucknow Pustak Mela: लखनऊ में चल रहे 18वें राष्ट्रीय पुस्तक मेला (National Book Fair 2021) में पुस्तक प्रेमियों का उत्साह लगातार बढ़ता हुआ देखा जा सकता है. तमाम बुक स्टॉलों पर साहित्य प्रेमियों का तांता लगा हुआ है. लोग अपनी पुस्तकें तो खरीद ही रहे हैं साथ ही अपने प्रिय रचनाकारों से मिलकर काफी खुश भी नजर आ रहे हैं.

    पुस्तक मेला में रोजाना (Lucknow Book Fair) नई-नई पुस्तकों का लोकार्पण हो रहा है, साहित्य चर्चाएं हो रही हैं. देश के प्रसिद्ध लेखक और कलाकार इस मेले में जुट रहे हैं.

    इस क्रम में वाणी प्रकाशन ग्रुप (Vani Prakashan Group) से प्रकाशित चर्चित उपन्यासकार बालेन्दु द्विवेदी के उपन्यास ‘वाया फ़ुरसतगंज’ और ‘मदारीपुर जंक्शन’ पर परिचर्चा का आयोजन किया गया. परिचर्चा का विषय था “वाया फ़ुरसतगंज : आधुनिक राजनीति के विद्रूप की महागाथा”.

    इस परिचर्चा में मुख्य वक्ता के रूप में अवध ज्योति पत्रिका के संपादक राम बहादुर मिसिर, वरिष्ठ कथाकार मूसा ख़ान अशान्त बाराबंकवी, इंडिया इनसाइड के संपादक अरुण सिंह, वाणी प्रकाशन समूह की कार्यकारी निदेशक अदिति माहेश्वरी गोयल दिव्यांश प्रकाशन के प्रबन्ध निदेशक नीरज अरोड़ा और वरिष्ठ आलोचक देवी प्रसाद तिवारी उपस्थित रहे.

    वरिष्ठ कथाकार मूसा ख़ान अशांत बाराबंकवी कहा कि व्यंग्य एक ऐसी विधा है जिसमें सब कुछ समाहित है. यह किताब शहरी परिवेश और ग्रामीण परिवेश की समस्याओं और द्वन्दों को सामंजस्य के साथ उकेरती है.

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    काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के अध्येता और आलोचक देवी प्रसाद तिवारी ने कहा कि बालेन्दु द्विवेदी की रचना को पढ़कर लगता है कि लिखना अलग बात है और लेखकीय मिज़ाज को पहनना अलग बात है. बालेन्दु, पाठकों के बीच से निकले हुए लेखक हैं इसलिए उनकी लेखनी परिचित सी लगती है.

    Vani Prakashan

    अवध ज्योति पत्रिका के संपादक राम बहादुर मिसिर ने इन पुस्तकों के बारे में कहा कि लेखक ने महानगर और ग्रामीण जीवन का जो तालमेल किया है,वह पढ़ना अद्भुत है. यह स्पष्ट कहा जा सकता है कि यह किताब किसी से प्रभावित नहीं है बल्कि यह कथाकार की स्वयं की अनुभूति है.

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    पुस्तकों के लेखक बालेन्दु द्विवेदी (Balendu Dwivedi) ने इन व्यंग्य रचनाओं पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा, “मैं मूलतः आलोचना के क्षेत्र में काम करना चाहता था. मुझे लगता था कि साहित्य की अन्य विधाओं में लिखने वाले लेखक किसी ईश्वरीय शक्ति से परिपूर्ण होते हैं. पर अब जो व्यंग्य की भाषा लिखा रहा हूं,पाता हूं कि यह मेरे व्यक्तित्व का ही हिस्सा हैं. मैं शहर में रहकर गाँव को जीता हूं.”

    Lucknow Book Fair

    वाणी प्रकाशन ग्रुप की कार्यकारी निदेशक अदिती माहेश्वरी (Aditi Maheshwari) ने कहा कि बालेंदु द्विवेदी को प्रकाशित करना आंचलिकता और शहरीकरण, व्यंग्य और आलोचना, हाशिये और मुख्यधारा के साथ खड़े होना है.

    कुछ चर्चा ‘वाया फुरसतगंज’ की (Via Fursatganj)
    ‘वाया फुरसतगंज’ दरअसल आज़ाद देश में विकसित हो रहे राजनीतिक चरित्र के दोगलेपन की कथा है. राजनीतिक चरित्र का यह दोगलापन सर्वव्यापी है और कदाचित इसका असर भी…! इसीलिए इसका प्रसार जीवन के सभी क्षेत्रों में होता दिखाई देता है. इसने हमारे आसपास के रोज़मर्रा के वातावरण को इस क़दर आच्छादित कर लिया है कि इसके बिना जीवन की किसी एक गतिविधि का संचालन सम्भव नहीं…!

    क्या धर्म, क्या समाज, क्या प्रशासन, क्या पुलिस और क्या न्यायपालिका-एक-एक कर सभी इस बदलाव के अभ्यस्त हो चुके हैं. दुर्भाग्य यह कि हम स्वयं इस बदलाव पर आह्लादित होते चलते हैं…!
    Via Fursatganj

    राजनीति को तो निठल्लेपन, डकैती, लूट, मक्कारी, झूठ और निर्वस्त्रता का रोग लग गया है. वह इसे सार्वभौम बना देना चाहती है. वह इस कोशिश में है कि उसके साथ बारी-बारी सब-के-सब निर्वस्त्र होते चलें..! हम भी कहीं-न-कहीं उसके इस अभियान में उसके साथ खड़े दिखाई देते हैं.

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    ऐसे में वाया फुरसतगंज आधुनिक राजनीति और समाज का वह आईना बनकर हमारे सामने आता है जहां हम अपने चेहरे के विद्रूप को ठीक करने और उस पर लगी कालिख को साफ़ करने के बजाय आईने को साफ करने की कोशिशों में लगे दिखाई देते हैं.

    हमारे लिए हर घटना केवल मनोरंजन-मात्र है और इसके अतिरिक्त यदि वह कुछ है तो केवल एक-दूसरे को नीचा दिखाने का खेल और आपसी षड्यन्त्र का मैदान भर…! राजनीति का मकसद केवल सत्ता हासिल करना रह गया है और आश्चर्य यह कि भोली एवं बेवकूफ़ जनता, उसके साथ इस खेल में शामिल होकर, बेतहाशा नर्तन करते हुए आत्मविभोर दीखती है. उसका यह बेतुका आत्मसमर्पण न केवल फुरसतगंज बल्कि पूरे देश के निवासियों के रगों में बहने वाले तरल की नियति बनकर रह गया है.

    बात ‘मदारीपुर जंक्शन’ की (Madaripur Juction)
    मदारीपुर गांव, उत्तर प्रदेश के नक्शे में ढूंढें तो यह शायद आपको कहीं नहीं मिलेगा लेकिन निश्चित रूप से यह गोरखपुर जिले के ब्रह्मपुर नाम के गांव के आस-पास के हजारों-लाखों गांवों से ली गई विश्वसनीय छवियों से बना एक बड़ा गांव है जो भूगोल से गायब होकर उपन्यास में समा गया है.

    उल्लेखनीय है कि ब्रह्मपुर वह स्थान है जहां उपन्यासकार बालेन्दु द्विवेदी का बचपन बीता. मदारीपुर में रहने वाले छोटे-बड़े लोग अपने गांव को अपनी संपूर्ण दुनिया मानते हैं. इसी सोच के कारण यह गांव संकोच कर गया और कस्बा होते-होते रह गया. गांव के केंद्र में ‘पट्टी’ है जहां ऊंची जाति के लोग रहते हैं. इस पट्टी के चारों ओर झोपड़पट्टियां हैं जिनमें तथाकथित निचली जातियों के पिछड़े लोग रहते हैं.

    Madaripur Juction

    यहां कभी रहा होगा ऊंची जाति के लोगों के वर्चस्व का जलवा! लेकिन आपसी जलन, कुंठाओं, झगड़ों, दुरभिसंधियों और अंतरकलहों के रहते धीरे-धीरे अंततः पट्टी के इस ऊंचे वैभव का क्षरण हुआ. संभ्रांत लोग लबादे ओढ़कर झूठ, फरेब, लिप्सा और मक्कारी के वशीभूत होकर आपस में लड़ते रहे, लड़ाते रहे और झूठी शान के लिए नैतिक पतन के किसी भी बिंदु तक गिरने के लिए तैयार थे.

    पट्टी में से कई तो इतने ख़तरनाक थे कि किसी बिल्ली का रास्ता काट जाएं तो बिल्ली डर जाए और डरपोक इतने कि बिल्ली रास्ता काट जाए तो तीन दिन घर से बाहर न निकलें. फिर निचली कही जाने वाली बिरादरियों के लोग अपने अधिकारों के लिए धीरे-धीरे जागरूक हो रहे थे और समझ रहे थे – पट्टी की चालपट्टी..!

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