मुंशी प्रेमचंद ने अपने ही घर में की चोरी! क्या हुआ अंज़ाम, पढ़ें पूरा किस्सा

मुंशी प्रेमचंद और उनके चचेरे भाई हलधर ने मिलकर घर से एक रुपया उड़ाया था. अब ज़रा उसकी दास्तान उन्हीं से सुनिए.

राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित 'कलम का सिपाही' की प्रस्तावना प्रेमचंद के पौत्र आलोचक-लेखक आलोक राय (Alok Rai) ने लिखी है. 'कलम का सिपाही' का पहला संस्करण 1962 में प्रकाशित हुआ था.

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    मुंशी प्रेमचंद (Premchand) की जीवनी 'कलम का सिपाही' (Kalam Ka Sipahi) का 'राजकमल प्रकाशन' के 'हंस प्रकाशन' (Hans Prakashan) ने फिर से प्रकाशन किया है. इस बार 'कलम का सिपाही' की प्रस्तावना प्रेमचंद के पौत्र विद्वान आलोचक-लेखक आलोक राय (Alok Rai) ने लिखी है. इसी जीवनी से उपन्यास सम्राट के जीवन के कुछ रोचक प्रसंग यहां प्रस्तुत किए जा रहे हैं.

    आठवें साल में नवाब (Premchand ke bachpan ka naam) की पढ़ाई शुरू हो गई थी, ठीक वही पढ़ाई जिसका कायस्थ घरानों में चलन था, उर्दू-फ़ारसी. लमही से मील-सवा मील की दूरी पर एक गांव है लालपुर. वहीं एक मौलवी साहब रहते थे जो पेशे से तो दर्ज़ी थे मगर मदरसा भी लगाते थे. मुंशीजी ने अपनी एक कहानी ‘चोरी’ में उस जमाने को ख़ूब डूब-डूबकर याद किया है-

    हाय बचपन, तेरी याद नहीं भूलती! वह कच्चा, टूटा घर, वह पुआल का बिछौना, वह नंगे बदन, नंगे पाँव खेतों में घूमना, आम के पेड़ों पर चढ़ना—सारी बातें आँखों के सामने फिर रही हैं. चमरौधे जूते पहनकर उस वक़्त जितनी ख़ुशी होती थी, अब फ्लेक्स के बूटों से भी नहीं होती, गरम पनुए रस में जो मज़ा था वह अब गुलाब के शर्बत में भी नहीं, चबेने और कच्चे बेरों में जो रस था बह अब अंगूर और खीरमोहन में भी नहीं मिलता.

    मौलवी साहब के यहां पढ़ाई
    मैं अपने चचेरे भाई हलधर के साथ दूसरे गांव में एक मौलवी साहब के यहां पढ़ने जाया करता था. मेरी उम्र आठ साल थी, हलधर मुझसे दो साल जेठे थे. हम दोनों प्रात:काल बासी रोटियां खा दोपहर के लिए मटर और जौ का चबेना लेकर चल देते थे. फिर तो सारा दिन अपना था. मौलवी साहब के यहां कोई हाज़िरी का रजिस्टर तो था नहीं! और न ग़ैरहाज़िरी का जुर्माना ही देना पड़ता था. फिर डर किस बात का. कभी तो थाने के सामने खड़े सिपाहियों की क़वायद देखते, कभी किसी भालू या बन्दर नचानेवाले मदारी के पीछे-पीछे घूमने में दिन काट देते, कभी रेलवे स्टेशन की ओर निकल जाते और गाड़ियों की बहार देखते. गाड़ियों के समय का जितना ज्ञान हमको था उतना शायद टाइम टेबिल को भी न था.

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    रास्ते में शहर के एक महाजन ने एक बाग लगवाना शुरू किया था, वहां एक कुआं खुद रहा था. वह भी हमारे लिए दिलचस्प तमाशा था. बूढ़ा माली हमें अपनी झोपड़ी में बड़े प्रेम से बैठाता था. हम उससे झगड़-झगड़कर उसका काम करते. कहीं बाल्टी लिये पौधों को सींच रहे हैं, कहीं खुरपी से क्यारियां गोड़ रहे हैं, कहीं कैंची से बेलों की पत्तियां छांट रहे हैं. उन कामों में कितना आनन्द था. माली बाल-प्रकृति का पंडित था, हमसे काम लेता पर इस तरह मानो हमारे ऊपर कोई एहसान कर रहा है. जितना काम वह दिन-भर में करता, हम घंटे-भर में निबटा देते.

    ग़ैरहाज़िर पर बहाना
    कभी-कभी हम हफ़्तों ग़ैरहाज़िर रहते पर मौलवी साहब से ऐसा बहाना कर देते कि उनकी चढ़ी हुई त्योरियां उतर जातीं. उतनी कल्पना-शक्ति आज होती तो ऐसा उपन्यास लिख मारता कि लोग चकित रह जाते. अब तो यह हाल है कि बहुत सिर खपाने के बाद कोई कहानी सूझती है.

    ख़ैर, हमारे मौलवी साहब दर्ज़ी थे. मौलवीगीरी केवल शौक़ से करते थे. हम दोनों भाई अपने गांव के कुर्मी-कुम्हारों से उनकी ख़ूब बड़ाई करते थे या कहिए कि हम मौलवी साहब के सफ़री एजेंट थे. हमारे उद्योग से जब मौलवी साहब को कुछ काम मिल जाता था, हम फूले नहीं समाते. जिस दिन कोई अच्छा बहाना न सूझता, मौलवी साहब के लिए कोई-न-कोई सौगात ले जाते. कभी सेर-आध सेर फलियां तोड़ लीं तो कभी दस-पांच ऊख, कभी जौ या गेहूं की हरी-हरी बालें ले लीं. इन सौगातों को देखते ही मौलवी साहब का क्रोध शान्त हो जाता. जब इन चीज़ों की फ़सल न होती तो हम सज़ा से बचने का कोई और ही उपाय सोचते.

    मौलवी साहब को चिड़ियों का शौक़ था. मकतब में श्यामा, बुलबुल, दहियल और चंडूलों के पिंजरे लटकते रहते थे. हमें सबक़ याद हो या न हो पर चिड़ियों को याद हो जाते थे. हमारे साथ ही वह भी पढ़ा करती थीं. इन चिड़ियों के लिए बेसन पीसने में हम लोग ख़ूब उत्साह दिखाते थे. मौलवी साहब सब लड़कों को पतिंगे पकड़ लाने की ताकीद करते रहते थे. इन चिड़ियों को पतिंगों से विशेष रुचि थी. कभी-कभी हमारी बला पतिंगों ही के सिर चली जाती थी. उनका बलिदान करके हम मौलवी साहब के रौद्र रूप को प्रसन्न कर लिया करते थे.

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    भगवान को प्रसाद चढ़ाए बिना कब वरदान मिला है और गुरु की सेवा किए बिना कब किसे विद्या आई है. पुराना क़ायदा तो कम-से-कम यही था. और भी बहुत-सी ख़िदमतें अंज़ाम देनी होती होंगी, मसलन् बकरी के वास्ते हरी-हरी पत्तियां तोड़ लाना, बाज़ार जाकर सौदा-सुलुफ़ ले आना—और हुक्क़ा तर करने का तो जैसे ज़िक्र ही बेकार है, उसके बिना कभी किसी को कुछ भी आया है!

    पढ़ाई का तरीक़ा वही पुराना रहा होगा जो कि बाद के तमाम नए प्रयोगों के बावजूद शायद सबसे अच्छा था यानी रटन्त. गणित के मास्टर साहब पहाड़ा रटाते थे और दर्जे-भर के लड़के झूम-झूमकर समवेत गायन की तरह पहाड़ा रटते थे—सात के सात, सात दुनी चौदह, सात तियां इक्कीस...संस्कृत के पंडित जी गच्छति गच्छत: गच्छन्ति, राम: रामौ रामा: रटाते थे और मौलवी साहब आमदनामा लेकर माझी और मजहूल, हाल और मुस्तक़बिल, अम्र और निही के तमाम सींगों में सैकड़ों मज़दरों और मुज़ारों की गिरदान करवाते थे—आमद आमदन्द आमदी आमदेद आमदम आमदेम. गोयद गोयन्द गोयी गोयेद गोयम गोयेम. (क्या अजब कि यह चीज़ मौलवी साहब के दहियलों और चालों की ज़बान पर लड़कों से पहले चढ़ जाती थी!)

    जब आमदनामा पक्का हो जाता तब सादी के गुलिस्तां-बोस्तां और करीमा-मामुक़ीमा की बारी आती. फ़ारसी पढ़ाने का यह क़ायदा आज सैकड़ों साल से दुनिया में चल रहा है. नवाब ने भी इसी क़ायदे से फ़ारसी पढ़ी और चुहलबाजियां तो जो होनी थीं, होती रहीं, ताहम ऐसा लगता है कि मौलवी साहब ने नवाब की फ़ारसी की जड़ काफ़ी मज़बूत कर दी. उर्दू के बारे में कहा जाता है कि उर्दू पढ़ाई नहीं जाती, घलुए में आती है; पढ़ाई तो फ़ारसी जाती है.

    जो भी बात हो, इसमें शक नहीं कि इन मौलवी साहब ने उनकी फ़ारसी की बुनियाद ख़ूब पक्की कर दी थी, कि उस पर यह महल खड़ा हो सका. प्राइवेट तौर पर जब इंटर और बी.ए. करने की नौबत आई, उस वक़्त नवाब राय को यह तय करने में एक मिनट नहीं लगा कि एक विषय ज़रूर फ़ारसी होना चाहिए.

    घर से एक रुपया उड़ाया
    इस तरह थोड़ा-बहुत पढ़ते और सारे दिन मटरगश्ती करते, खेलते-कूदते, मज़े में दिन बीत रहे थे. और इन्हीं दिनों की बात है कि उन्होंने और हलधर (बलभद्र) ने मिलकर घर से एक रुपया उड़ाया था. अब ज़रा उसकी दास्तान उन्हीं से सुनिए-

    ...मुंह-हाथ धोकर हम दोनों घर आए और डरते-डरते अन्दर क़दम रखा. अगर कहीं इस वक़्त तलाशी की नौबत आई तो फिर भगवान ही मालिक है. लेकिन सब लोग अपना-अपना काम कर रहे थे. कोई हमसे न बोला. हमने नाश्ता भी न किया, चबेना भी न लिया, किताब बग़ल में दबायी और मदरसे का रास्ता लिया.

    बरसात के दिन थे. आकाश पर बादल छाये हुए थे. हम दोनों ख़ुश-ख़ुश मकतब चले जा रहे थे...हज़ारों मंसूबे बांधते थे, हज़ारों हवाई क़िले बनाते थे. यह अवसर बड़े भाग्य से मिला था. इसलिए रुपए को इस तरह ख़र्च करना चाहते थे कि ज़्यादा से ज़्यादा दिनों तक चल सके. उन दिनों पांच आने सेर बहुत अच्छी मिठाई मिलती थी और शायद आध सेर मिठाई में हम दोनों अफर जाते लेकिन यह ख़याल हुआ कि मिठाई खाएंगे तो रुपया आज ही ग़ायब हो जाएगा. कोई सस्ती चीज़ खानी चाहिए जिसमें मज़ा भी आए, पेट भी भरे और पैसे भी कम ख़र्च हों. आख़िर अमरूदों पर हमारी नज़र गई. हम दोनों राज़ी हो गए. दो पैसे के अमरूद लिये. सस्ता समय था, बड़े-बड़े बारह अमरूद मिले, हम दोनों के कुर्तों के दामन भर गए. जब हलधर ने खटकिन के हाथ में रुपया रखा तो उसने सन्देह से देखकर पूछा—रुपया कहां पाया लाला? चुरा तो नहीं लाए?

    जवाब हमारे पास तैयार था. ज़्यादा नहीं तो दो-तीन किताबें पढ़ ही चुके थे. विद्या का कुछ-कुछ असर हो चला था. मैंने झट से कहा—मौलवी साहब की फ़ीस देनी है. घर में पैसे न थे तो चाचा जी ने रुपया दे दिया.

    मदरसे पहुंचे. हम अभी सबक़ पढ़ ही रहे थे कि मालूम हुआ, आज तालाब का मेला है, दोपहर से छुट्टी हो जाएगी. मौलवी साहब मेले में बुलबुल उड़ाने जाएंगे. यह ख़बर सुनते ही हमारी ख़ुशी का ठिकाना न रहा. बारह आने तो बैंक में जमा ही कर चुके थे, साढ़े तीन आने में मेला देखने की ठहरी. ख़ूब बहार रहेगी. मज़े से रेवड़ियां खाएंगे, गोलगप्पे उड़ाएंगे, झूले पर चढ़ेंगे, और शाम को घर पहुंचेंगे.

    लेकिन मौलवी साहब ने एक कड़ी शर्त यह लगा दी थी कि सब लड़के छुट्टी के पहले अपना-अपना सबक़ सुना दें. जो सबक़ न सुना सकेगा, उसे छुट्टी न मिलेगी. नतीजा यह हुआ कि मुझे तो छुट्टी मिल गई पर हलधर क़ैद कर लिये गए. और कई लड़कों ने भी सबक़ सुना दिए थे, वे सभी मेला देखने चल पड़े. मैं भी उनके साथ हो लिया. पैसे मेरे ही पास थे इसलिए मैंने हलधर को साथ लेने का इन्तज़ार न किया. तय हो गया था कि वह छुट्टी पाते ही मेले में आ जाएं और दोनों साथ-साथ मेला देखें. मैंने वचन दिया था कि जब तक वह न आएंगे एक पैसा भी ख़र्च न करूंगा लेकिन क्या मालूम था कि दुर्भाग्य कुछ और ही लीला रच रहा है.

    मुझे मेला पहुंचे एक घंटे से ज़्यादा गुज़र गया, पर हलधर का कहीं पता नहीं. क्या अभी तक मौलवी साहब ने छुट्टी नहीं दी, या रास्ता भूल गए? आंखें फाड़-फाड़कर सड़क की ओर देखता था. अकेले मेला देखने में जी भी नहीं लगता था. यह संशय भी हो रहा था कि कहीं चोरी खुल तो नहीं गई और चाचाजी हलधर को पकड़कर घर तो नहीं ले गए.

    आख़िर जब शाम हो गई तो मैंने कुछ रेवड़ियां खाईं और हलधर के हिस्से के पैसे जेब में रखकर धारे-धीरे घर चला. रास्ते में ख़याल आया, मकतब होता चलूं. शायद हलधर अभी वहीं हों, मगर वहां सन्नाटा था. हां, एक लड़का खेलता हुआ मिला. उसने मुझे देखते ही ज़ोर से क़हक़हा मारा और बोला, 'बच्चा, घर जाओ तो, कैसी मार पड़ती है! तुम्हारे चचा आए थे. हलधर को मारते-मारते ले गए हैं. अजी, ऐसा तानकर घूंसा मारा कि मियां हलधर मुंह के बल गिर पड़े. यहां से घसीटते ले गए हैं. तुमने मौलवी साहब की तनख़्वाह दे दी थी, वह भी ले ली. अभी कोई बहाना सोच लो, नहीं तो बेभाव की पड़ेगी.'

    मेरी सिट्टी-पिट्टी भूल गई, बदन का लहू सूख गया. वही हुआ जिसका मुझे शक हो रहा था. पैर मन-मन भर के हो गए. घर की ओर एक-एक क़दम चलना मुश्किल हो गया. देवी-देवताओं के जितने नाम याद थे, सभी की मानता मानी—किसी को लड्डू, किसी को पेड़े, किसी को बताशे. गांव के पास पहुंचा तो गांव के डीह का सुमिरन किया क्योंकि अपने हलके में डीह ही की इच्छा सर्वप्रधान होती है.

    यह सब कुछ किया लेकिन ज्यों-ज्यों निकट आता दिल की धड़कन बढ़ती जाती थी. घटाएं उमड़ी आती थीं. मालूम होता था आसमान फटकर गिरा ही चाहता है. देखता था—लोग अपने-अपने काम को छोड़-छोड़ भागे जा रहे हैं, गोरू भी पूंछ उठाए घर की ओर उछलते-कूदते चले जाते हैं. चिड़ियां अपने घोंसले की ओर उड़ी चली आती थीं, लेकिन मैं उसी मन्द गति से चला जाता था, मानो पैरों में शक्ति नहीं. जी चाहता था, ज़ोर का बुख़ार चढ़ आए, या कहीं चोट लग जाए, लेकिन कहने से धोबी गधे पर नहीं चढ़ता. बुलाने से मौत नहीं आती, बीमारी का तो कहना ही क्या. कुछ न हुआ और धीरे-धीरे चलने पर भी घर सामने आ ही गया. अब क्या हो?

    हमारे द्वार पर इमली का एक घना वृक्ष था, मैं उसी की आड़ में छिप गया कि ज़रा और अंधेरा हो जाए तो चुपके से घुस जाऊं और अम्मां के कमरे में चारपाई के नीचे जा बैठूं. जब सब लोग सो जाएंगे तो अम्मां से सारी कथा कह सुनाऊंगा. अम्मां कभी नहीं मारतीं. ज़रा उनके सामने झूठ-मूठ रोऊंगा तो वह और भी पिघल जाएँगी. रात कट जाने पर फिर कौन पूछता है. सुबह तक सब का ग़ुस्सा ठंडा हो जाएगा. अगर ये मंसूबे पूरे हो जाते तो इसमें सन्देह नहीं कि मैं बेदाग़ बच जाता. लेकिन वहां तो विधाता को कुछ और ही मंजूर था.

    मुझे एक लड़के ने देख लिया और मेरे नाम की रट लगाते हुए सीधे मेरे घर में भागा. अब मेरे लिए कोई आशा न रही. लाचार घर में दाख़िल हुआ तो सहसा मुंह से एक चीख़ निकल गई, जैसे मार खाया हुआ कुत्ता किसी को अपनी ओर आता देखकर भय से चिल्लाने लगता है. बरोठे में पिता जी बैठे थे. पिता जी का स्वास्थ्य इन दिनों कुछ ख़राब हो गया था. छुट्टी लेकर घर आए हुए थे. यह तो नहीं कह सकता कि उन्हें शिकायत क्या थी, पर वह मूंग की दाल खाते थे और संध्या समय शीशे के गिलास में एक बोतल में से कुछ उंडेल-उंडेलकर पीते थे. शायद यह किसी तजुर्बेकार हक़ीम की बताई हुई दवा थी. दवाएं सब बसानेवाली और कड़वी होती हैं. यह दवा भी बुरी ही थी, पर पिता जी न जाने क्यों इस दवा को ख़ूब मज़ा ले-लेकर पीते थे. हम जो दवा पीते हैं तो आंखें बन्द करके एक ही घूंट में गटक जाते हैं, पर शायद इस दवा का असर धीरे-धीरे पीने में ही होता हो. पिता जी के पास गांव के दो-तीन और कभी-कभी चार-पांच और रोगी भी जमा हो जाते, और घंटों दवा पीते रहते थे.

    रोगियों की मंडली जमा थी, मुझे देखते ही पिता ने लाल-लाल आंखें करके पूछा—कहां थे अब तक?
    मैंने दबी ज़बान से कहा—कहीं तो नहीं.
    'अब चोरी की आदत सीख रहा है? बोल, तूने रुपया चुराया कि नहीं?'
    मेरी ज़बान बन्द हो गई. सामने नंगी तलवार नाच रही थी. शब्द भी निकलते हुए डरता था.
    पिता जी ने ज़ोर से डांटकर पूछा—बोलता क्यों नहीं? तूने रुपया चुराया कि नहीं?
    मैंने जान पर खेलकर कहा—मैंने कहां...
    मुंह से पूरी बात भी न निकल पाई थी कि पिता जी विकराल रूप धारण किए, दांत पीसते, झपटकर उठे और हाथ उठाए मेरी ओर चले. मैं ज़ोर से चिल्लाकर रोने लगा—ऐसा चिल्लाया कि पिताजी भी सहम गए. उनका हाथ उठा ही रह गया. शायद समझे कि जब अभी से इसका यह हाल है तब तमाचा पड़ जाने पर कहीं इसकी जान ही न निकल जाए. मैंने जो देखा कि मेरी हिकमत काम कर गई, तो और भी गला फाड़-फाड़कर रोने लगा. इतने में मंडली के दो-तीन आदमियों ने पिताजी को पकड़ लिया और मेरी ओर इशारा किया कि भाग जा! बच्चे बहुधा ऐसे मौक़े पर और भी मचल जाते हैं, और व्यर्थ मार खा जाते हैं. मैंने बुद्धिमानी से काम लिया.

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    लेकिन अन्दर का दृश्य इससे कहीं भयंकर था. मेरा तो ख़ून सर्द हो गया. हलधर के दोनों हाथ एक खम्भे से बंधे थे, सारी देह धूल-धूसरित हो रही थी, और वह अभी तक सिसक रहे थे. शायद वह आंगन-भर में लोटे थे. ऐसा मालूम हुआ कि सारा आंगन उनके आंसुओं से भीग गया है. चाची हलधर को डांट रही थीं, और अम्मां बैठी मसाला पीस रही थीं. सबसे पहले मुझ पर चाची की निगाह पड़ी. बोलीं—लो, वह भी आ गया. क्यों रे, रुपया तूने चुराया था कि इसने?
    मैंने नि:शंक होकर कहा—हलधर ने.
    अम्मा बोलीं—अगर उसी ने चुराया था, तो तूने घर आकर किसी से कहा क्यों नहीं?

    अब झूठ बोले बग़ैर बचना मुश्किल था. मैं तो समझता हूं कि जब आदमी को जान का ख़तरा हो, तो झूठ बोलना क्षम्य है. हलधर मार खाने के आदी थे, दो-चार घूंसे और पड़ने से उनका कुछ न बिगड़ सकता था. मैंने मार कभी न खाई थी. मेरा तो दो ही चार घूंसों में काम तमाम हो जाता. फिर हलधर ने भी तो अपने को बचाने के लिए मुझे फंसाने की चेष्टा की थी. नहीं तो चाची मुझसे यह क्यों पूछतीं—रुपया तूने चुराया या हलधर ने? किसी भी सिद्धान्त से मेरा झूठ बोलना इस समय स्तुत्य नहीं, तो क्षम्य ज़रूर था. मैंने छूटते ही कहा—हलधर कहते थे किसी से बताया, तो मार ही डालूंगा.

    अम्मां—देखा, वही बात निकली न! मैं तो कहती ही थी कि बच्चा की ऐसी आदत नहीं, पैसा तो वह हाथ से छूता ही नहीं लेकिन सब लोग मुझी को उल्लू बनाने लगे.
    हलधर—मैंने तुमसे कब कहा था कि बतलाओगे, तो मारूंगा?
    मैं—वहीं तालाब के किनारे तो!

    गुड़ की चोरी
    गुड़ से मुंशीजी को बेहद प्रेम था. गुड़ मिठाइयों का बादशाह है. सारी ज़िन्दगी गुड़ का यह प्रेम इसी तरह बना रहा. खाने के साथ थोड़ा-सा गुड़ ज़रूरी था. गुड़ की चोरी का एक निहायत दिलचस्प क़िस्सा, अपने बचपन का, मुंशीजी ने ‘होली की छुट्टी’ में सुनाया—

    अम्मां तीन महीने के लिए अपने मैके या मेरी ननिहाल गई थीं और मैंने तीन महीने में एक मन गुड़ का सफ़ाया कर दिया था. यही गुड़ के दिन थे. नाना बीमार थे, अम्मां को बुला भेजा था. मेरा इम्तिहान पास था, इसलिए मैं उनके साथ न जा सका...जाते वक़्त उन्होंने एक मन गुड़ लेकर एक मटके में रखा और उसके मुंह पर एक सकोरा रखकर मिट्टी से बन्द कर दिया. मुझे सख़्त ताकीद कर दी कि मटका न खोलना. मेरे लिए थोड़ा-सा गुड़ एक हांडी में रख दिया था. वह हांडी मैंने एक हफ़्ते में सफ़ाचट कर दी.

    सुबह को दूध के साथ गुड़, दोपहर को रोटियों के साथ गुड़, तीसरे पहर दानों के साथ गुड़, रात को फिर दूध के साथ गुड़. यहां तक जायज़ ख़र्च था, जिस पर अम्मां को भी कोई एतराज न हो सकता. मगर स्कूल से बार-बार पानी पीने के बहाने घर में आता और दो-एक पिंडियां निकालकर रख लेता. उसकी बजट में कहां गुंजाइश थी.

    मुझे गुड़ का कुछ ऐसा चस्का पड़ गया कि हर वक़्त वही नशा सवार रहता. मेरा घर में आना गुड़ के सिर शामत आना था. एक हफ़्ते में हांडी ने जवाब दे दिया. मगर मटका खोलने की सख़्त मनाही थी और अम्मां के घर आने में अभी पौने तीन महीने बाक़ी थे.

    एक दिन तो मैंने बड़ी मुश्किल से जैसे-तैसे सब्र किया लेकिन दूसरे दिन एक आह के साथ सब्र जाता रहा और मटके की एक मीठी चितवन के साथ होश रुख़सत हो गया.
    फिर तो इस दो अंगुल की जीभ ने क्या-क्या नाच नचाया है—
    ‘अपने को कोसता, धिक्कारता—गुड़ तो खा रहे हो मगर बरसात में सारा शरीर सड़ जाएगा, गन्धक का मलहम लगाए घूमोगे, कोई तुम्हारे पास बैठना भी न पसन्द करेगा! कसमें खाता, विद्या की, मां की, स्वर्गीय पिता की, गऊ की, ईश्वर की...’

    कुछ भी काम न आया, तो ‘बड़े भक्तिभाव से ईश्वर से प्रार्थना की—भगवान्, यह मेरा चंचल लोभी मन मुझे परेशान कर रहा है, मुझे शक्ति दो कि उसको वश में रख सकूं. मुझे अष्टधातु की लगाम दो जो उसके मुंह में डाल दूं!’

    मगर सब बेसूद. कोठरी में ताला लगाकर एक बार उसकी चाबी दीवार की संधि में डाल दी जाती है और दूसरी बार कुएं में फेंक दी जाती है, मगर तब भी रिहाई नहीं मिलती और वह मन-भर का मटका पेट में समा जाता है!

    kalam ka sipahi

    प्रेमचंद की जीवनी- कलम का सिपाही (Premchand ki Jivani- Kalam Ka Sipahi)
    मुंशी प्रेमचंद (Premchand) की जीवनी 'कलम का सिपाही' (Kalam Ka Sipahi) ने हिंदी के जीवनी साहित्य में अपनी खास जगह बनाई है. 'कलम का सिपाही' का 'राजकमल प्रकाशन' के 'हंस प्रकाशन' (Hans Prakashan) ने फिर से प्रकाशन किया है. इस बार 'कलम का सिपाही' की प्रस्तावना प्रेमचंद के पौत्र विद्वान आलोचक-लेखक आलोक राय (Alok Rai) ने लिखी है. 'कलम का सिपाही' का पहला संस्करण 1962 में प्रकाशित हुआ था.

    'कलम का सिपाही' के जीवनीकार प्रेमचंद के पुत्र और ख्यात लेखक-कथाकार अमृतराय (Amrit Rai) हैं. लेकिन उन्होंने यह जीवनी पुत्र होने के नाते नहीं, बल्कि एक लेखक की निष्पक्षता के साथ लिखी है.

    प्रेमचन्द ने ‘हंस’ नाम की एक पत्रिका शुरू की थी. प्रेमचन्द के दूसरे बेटे अमृतराय ने 1948 में अपने प्रकाशन की शुरुआत की तो उसका नाम रखा—हंस प्रकाशन. पिछले वर्ष प्रेमचंद की जयंती 31 जुलाई, 2020 के दिन 'हंस प्रकाशन' हिंदी के बड़े प्रकाशन समूह 'राजकमल प्रकाशन समूह' (Rajkamal Prakashan) में शामिल हो गया.

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