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हिमांशु बाजपेयी की दास्तानगोई 'किस्सा किस्सा लखनउवा' अब Storytel पर

हिमांशु बाजपेयी की दास्तानगोई 'किस्सा किस्सा लखनउवा' अब Storytel पर

पुराने लखनऊ के रहने वाले हिमांशु नई शैली के साथ पुरानी घटनाओं के कहानीकार हैं.

पुराने लखनऊ के रहने वाले हिमांशु नई शैली के साथ पुरानी घटनाओं के कहानीकार हैं.

पत्रकार और लेखक हिमांशु बाजपेयी की किताब 'किस्सा किस्सा लखनउवा' लखनऊ शहर और उससे जुड़े लोगों के रोचक किस्सों पर आधारित पुस्तक है.

    लखनऊ के नवाबों के किस्से तमाम प्रचालित हैं, लेकिन अवाम के किस्से किताबों में बहुत कम ही मिलते हैं. जो उपलब्ध हैं, वह भी बिखरे हुए. लेखक और कथाकार हिमांशु बाजपेयी (Himanshu Bajpai) की ऑडियोबुक ‘किस्सा किस्सा लखनउवा’ (Qissa Qissa Lucknowaa) पहली बार उन तमाम बिखरे किस्सों को एक जगह बेहद खूबसूरत भाषा में सामने ला रही है. जैसे एक सधा हुआ दास्तानगो सामने बैठा दास्तान सुना रहा हो. ‘किस्सा किस्सा लखनउवा’ में किस्से नवाबों के नहीं, लखनऊ के और वहां की अवाम के हैं.

    यह किताब हिमांशु की एक कोशिश है, लोगों को अदब और तहजीब की एक महान विरासत जैसे शहर की मौलिकता के क़रीब ले जाने की. इस किताब की भाषा जैसे हिन्दुस्तानी ज़बान में लखनवियत की चाशनी है.

    हिमांशु की यह किताब अवध और लखनऊ के हर खास और आम के बारे जानकारी तो देती है साथ ही वहां की सभ्यता और संस्कृति में उनका क्या योगदान है उसके बारे में भी बताती है.

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    हिमांशु पेशे से पत्रकार रहे हैं. उन्होंने तमाम मीडिया घरानों के साथ काम किया है. उन्होंने अपना दास्तानगोई प्रशिक्षण 2013 में अपने मित्र स्वर्गीय अंकित चड्ढा, एक प्रसिद्ध दास्तानगो और कथाकार, के बाद शुरू किया.

    हिमांशु ऑडियोबुक (Audiobook) के लेखक और कथाकार दोनों हैं. उन्होंने नेटफ्लिक्स (Netflix) सीरीज़ ‘सेक्रेड गेम्स’ (Sacred Games) में दास्तानगोई (Dastangoi) में एक कैमियो किया था.

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    पुराने लखनऊ (Lucknow City) के रहने वाले हिमांशु नई शैली के साथ पुरानी घटनाओं के कहानीकार हैं. उन्होंने पुराने लखनऊ के राजा बाजार इलाके में एक स्कूल में पढ़ने और पढ़ने में रुचि विकसित की. राजा बाजार एक ऐसा क्षेत्र है जहां लोग उर्दू बोलते हैं. उर्दू के साथ खास संबंध और उस क्षेत्र के होने के कारण उन्होंने यह भाषा-बोली सीखी थी.

    स्टोरीटेल (Storytel) हिंदी पेज पर फेसबुक लाइव (Facebook Live) पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि योगेश प्रवीण ने अपने लेखन और भाषा के माध्यम से उन पर बहुत प्रभाव डाला. ‘पद्मश्री’ योगेश प्रवीण का हाल ही में निधन हो गया था. वे लखनऊ के इतिहास पर किए गए विशेष काम के लिए याद किए जाते हैं.

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    किस्सागोई की कला के बारे में अपने परिचय पर उन्होंने कहा कि वह बचपन से ही इस तरह की कला के बारे में अपने पढ़ने की रूचि के कारण जानते थे. बाद में उन्हें पता चला कि यह शैली आज भी मौजूद है और प्रदर्शित होती है.

    उर्दू में खास अंदाज की लंबी कहानियां सुनाने की कला को दास्तानगोई कहते हैं. यह कला वाचिक परंपरा से जुड़ी है और यह मध्यकाल में अपने शबाब पर थी. लेकिन 20 के दशक में यह खत्म हो गई.

    लखनऊ पर और उसके बारे में बहुत सारी पुस्तकें लिखी गई हैं. ‘किस्सा किस्सा लखनुउवा’ की ऑडियोबुक को सुनना निश्चित रूप से श्रोताओं को ऐसी किताबों की ओर आकर्षित करेगा.

    Tags: Books

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